ऑपरेशन खामेनेई ह्यूमन और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस की बेजोड़ मिसाल।
प्रदीप सिंह।
अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जो युद्ध शुरू हुआ है,उसका दायरा बढ़ता जा रहा है। अब पूरा मिडिल ईस्ट इसकी जद में आ गया है। ईरान हर उस देश पर हमला कर रहा है, जहां अमेरिकी एसेट,एयरबेस या सैन्य ठिकाने हैं। इसके अलावा वह उन जगहों पर भी हमला कर रहा है, जहां उसको आशंका है कि अमेरिकी सैनिक रुके हुए हैं। इसीलिए बुर्ज खलीफा और दुबई में फाइव स्टार होटलों को निशाना बनाया गया है। हालांकि इस बात में कोई शक नहीं है कि अमेरिका और इजराइल की संयुक्त सैन्य ताकत के सामने ईरान की मिलिट्री ताकत बहुत ही कम है। लेकिन इस युद्ध में इजराइल की खुफिया एजेंसियों ने जिस तरह की भूमिका अब तक निभाई है या कहें जैसी चोट ईरान को पहुंचाई है, वह पूरी दुनिया के लिए उदाहरण है।
इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद जिस तरह का कमाल बार-बार करती है, उसका सानी दुनिया में नहीं है। हालांकि इस मामले में केजीबी और सीआईए का भी बड़ा नाम है, लेकिन मोसाद का काम करने का तरीका अलग ही है। इस बदलती दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बहुत ज्यादा होने लगा है। सेटेलाइट और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से दुश्मनों को ट्रैक किया जाता है। लेकिन इजराइल इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और टेक्नोलॉजी के साथ ही ह्यूमन इंटेलिजेंस का जैसा उपयोग करता है,उसका कोई मुकाबला नहीं है। दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ह्यूमन इंटेलिजेंस का कोई जवाब नहीं है। इजराइल ने बहुत बार ह्यूमन इंटेलिजेंस के सहारे बेहद सटीक हमलों को अंजाम दिया है। हिजबुल्ला के चीफ नसरल्लाह को उसने ईरान में आईआरजीसी की सुरक्षा में सेंध लगाकर मारा था। इसी तरह इस युद्ध में खामेनई और उनकी पूरी कोर टीम, जिनमें रक्षा मंत्री, आईआरजीसी के चीफ समेत कई महत्वपूर्ण लोग शामिल थे,मार दिए गए। मोसाद के पास पूरी जानकारी थी कि खामेनई कब और कहां पर बैठक करने वाले हैं,कितने बजे बैठक शुरू होगी और कौन-कौन उसमें शामिल होगा? आमतौर पर मिसाइल अटैक या फाइटर जेट से जो बम गिराए जाते हैं, वे रात में होते हैं। पहली बार ऐसा हुआ कि दिन के उजाले में सुबह सवा आठ बजे अटैक हुआ। खामेनेई कितना एहतियात बरतते थे उसे इससे समझा जा सकता है कि उनके सबसे करीबी सुरक्षा सलाहकार तक को जब खामेनेई से मिलना होता था तो उसको आंख पर पट्टी बांधकर ले जाया जाता था ताकि मालूम नहीं हो कि कहां ले जाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस तरह की सावधानी बरतने वाले खामेनेई के आसपास के जो लोग थे, उनमें इजराइल ने अपने लोग प्लांट कर दिए थे या उनके लोगों को खरीद लिया था। इसी कारण इतनी बड़ी सफलता पहली ही स्ट्राइक में अमेरिका और इजराइल को मिली।

इसी के साथ एक और काम इजराइल ने किया,जो मुझे नहीं लगता कि दुनिया में कोई और एजेंसी या देश कर पाया होगा। खामेनेई की डेड बॉडी की तस्वीर सबसे पहले इजराइल ने ईरान को दिखाई। ईरान की आईआरजीसी या उनकी जो भी इंटेलिजेंस है, उन सबको मात देते हुए इजराइल ने फोटो भेजकर बताया कि यह देखो खामेनेई की डेड बॉडी। अब किसी सेटेलाइट से तो ऐसी फोटो मिल नहीं सकती है जरूर कोई ऐसा व्यक्ति है, जो अटैक के बाद घटनास्थल पर पहुंचा और उसने फोटो खींचकर इजराइल को भेजी। आप इससे समझ लीजिए कि खामेनेई का सुरक्षा तंत्र कितना कॉम्प्रोमाइज था। हाल ही में कुछ ऐसा ही तरीका अमेरिका ने वेनेजुएला में अपनाया था जब उसने वहां के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को उठा लिया और कोई रेजिस्टेंस नहीं हुआ था।

तो अमेरिका भी कुछ उसी तरह से काम करता है,जैसे इजराइल करता है। और ऐसा नहीं है कि हमारे देश की खुफिया एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) कोई बहुत पीछे हो। उसने भी ऐसे कई ऑपरेशन किए हैं। इनमें दो का जिक्र करना चाहूंगा। पाकिस्तान के बालाकोट में जो बेहद सटीक एयर स्ट्राइक हुई थी उसके पीछे रॉ थी। रॉ के पास पूरी ह्यूमन इंटेलिजेंस थी कि वहां पर कितने आतंकवादी बैठक के लिए आ रहे हैं। कहां रुकेंगे? दो दिन के सम्मेलन में कौन-कौन होगा? उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस कि कितने मोबाइल फोन उस इलाके में एक्टिव हैं। दूसरी घटना थोड़ी पुरानी है। मुशर्रफ पाकिस्तान के आर्मी चीफ थे और भारत में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। मुशर्रफ के आर्मी चीफ रहते हुए उनके सलाहकारों ने कहा कि लेजिटिमेसी के लिए जरूरी है कि आप राष्ट्रपति बन जाएं। कहते हैं कि एक कोर ग्रुप की बैठक, जिसमें सिर्फ पांच से सात लोग शामिल थे, में तय हुआ कि मुशर्रफ को अब राष्ट्रपति घोषित कर दिया जाए और इसकी सूचना सार्वजनिक कर दी जाए। जनरल परवेज मुशर्रफ उस बैठक से निकले। उसी समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का फोन गया। कहा- बधाई हो राष्ट्रपति जी। कहते हैं कि मुशर्रफ बिल्कुल सकते में आ गए। उनको समझ में नहीं आया कि इतने क्लोज ग्रुप में जो फैसला हुआ वह तुरंत भारत के प्रधानमंत्री को कैसे पता चल गया। हालांकि रॉ को जनता पार्टी के समय में मोरारजी देसाई ने बर्बाद किया। मोरारजी ने उसकी फंडिंग रोक दी। तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिए। उसकी वजह यह थी कि मोरार जी को लगता था कि रॉ इंदिरा गांधी के काले पैसे को विदेश में इन्वेस्ट करने में मदद करता था। जो कि बिल्कुल गलत था। उसके अलावा एक आईएफएस ऑफिसर हुआ, जो ईरान में एंबेसडर था और बाद में देश का उपराष्ट्रपति बना- हामिद अंसारी। उसने ईरान में हमारे जितने रॉ एजेंट थे,उनकी जानकारी ईरानियन एजेंसीज को दे दी। सब के सब मारे गए थे। ऐसा ही इंद्र कुमार गुजराल ने किया। जब वह प्रधानमंत्री थे तो पाकिस्तान को अपने खुफिया एजेंटों की जानकारी दे दी और एक-एक करके सब मारे गए। अगर ये दो-तीन झटके न लगे होते तो रॉ आज मोसाद, सीआईए, केजीबी से कम न होती। आज भी नहीं है। पिछले 11 सालों में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने रॉ को जिस तरह से ताकतवर बनाया है, वह अभूतपूर्व है। ये जो अननोन गन मैन विदेशों में भारत विरोधियों को निशाना बनाते हैं, ये उनके लिए अननोन हैं। भारत के लिए अननोन नहीं हैं। ये भारत के एसेट्स हैं।

तो इजराइल को पहले ही हमले में मिली इतनी बड़ी सफलता के बाद अब ईरान में जो सेकंड या थर्ड टियर की लीडरशिप है,उनके लिए उस तरह से लड़ना संभव नहीं होगा जैसे पहले की सत्ता लड़ रही थी। हो सकता है कि आने वाले दिनों में वह कॉम्प्रोमाइज के लिए तैयार हो जाए। ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्ध 7 से 10 दिन से ज्यादा नहीं चलने वाला है। ईरान असल में पूरी दुनिया में इस समय अकेला पड़ गया है। चीन और रूस उसके दो मजबूत साथी माने जाते थे। दोनों में से कोई साथ देने सामने नहीं आया। ईरान ने अपनी बदले की कारवाई से खाड़ी के बाकी देशों को भी अपने खिलाफ कर लिया है। अब सऊदी अरब कह रहा है कि जो भी ईरान पर अटैक करेगा, हम उसका साथ देंगे। इंग्लैंड जो पहले घोषणा कर चुका था कि वह अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ नहीं होने देगा, अब वह भी अमेरिका का साथ देने को तैयार हो गया है। इसके अलावा इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू जर्मनी और फ्रांस से भी संपर्क कर रहे हैं कि वे भी साथ आएं। इस लड़ाई को अमेरिका और इजराइल एक ऐसे आतंकवादी देश के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं, जिसके पास परमाणु हथियार और बैलिस्टिक व सुपरसोनिक मिसाइलों का इतना बड़ा जखीरा होना पूरी दुनिया के लिए खतरा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



