ईरान ने सैन्य टकराव को आर्थिक युद्ध में बदला
प्रदीप सिंह।ईरान के विरुद्ध अमेरिका और इजराइल का युद्ध शुरू हुए करीब दो हफ्ते हो रहे हैं, लेकिन इसके थमने के कोई आसार नहीं नजर आ रहे हैं। युद्ध कब तक चलेगा, इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं है। ईरान बोल रहा है कि हम किसी भी हालत में युद्ध रोकेंगे नहीं। हम लंबे समय तक लड़ने के लिए तैयार हैं। अमेरिका और इजराइल कह रहे हैं कि हम ईरान पर और बड़ा हमला करने के लिए तैयार हैं। लेकिन कुछ वास्तविकताएं हैं, उन पर भी ध्यान देना चाहिए। जब युद्ध शुरू हुआ था तो जितने बड़े पैमाने पर ईरान मिसाइल छोड़ रहा था और ड्रोन भेज रहा था, उसकी संख्या में भारी कमी आई है। कहा यह भी जा रहा है कि इजराइल और अमेरिका के पास भी इतनी युद्धक सामग्री नहीं है कि युद्ध को लंबे समय तक चला सकें।अब सवाल है कि यह युद्ध जीत कौन रहा है। अब तक की लड़ाई में आप इस बारे में कोई फैसला नहीं कर सकते। ईरान का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है, इसमें कोई शक नहीं है। उधर, ईरान ने भी इजराइल को नुकसान पहुंचाया है, लेकिन अमेरिका तक उसकी पहुंच नहीं है। ईरान को यह बात तो समझ आ गई है कि सैन्य शक्ति में वह अमेरिका और इजराइल का मुकाबला नहीं कर सकता। दूसरी ओर अमेरिका को भी समझ में आ गया है कि ईरान कोई वेनेजुएला नहीं है, जहां अपने कमांडो भेजेंगे और राष्ट्रपति को उठाकर ले आएंगे। ईरान के सबसे बड़े मजहबी नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और वहां की मिलिट्री व पॉलिटिकल लीडरशिप को खत्म कर अमेरिका और इजराइल ने पहला लक्ष्य हासिल कर लिया है। खामेनेई के बाद उनके बेटे मोजतबा ईरान के सर्वोच्च लीडर बनाए गए हैं, लेकिन वह भी घायल हैं। माना जा रहा है कि वह उसी हमले में घायल हुए, जिसमें उनके पिता मारे गए थे। मोजतबा अपने पिता से भी ज्यादा कट्टर हैं। वह सीधे-सीधे कह रहे हैं कि परमाणु बम बनाना हमारा लक्ष्य है। तो यह शंका तो पूरी तरह दूर हो गई है कि ईरान परमाणु बम नहीं बनाना चाहता।

हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद माना जा रहा था कि ईरान बहुत जल्दी घुटने टेक देगा, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। इस युद्ध में ईरान के पास खासतौर से दो हथियार हैं। उसकी बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइलें और दूसरा ड्रोन। इनके जरिए ईरान ने इस युद्ध का चरित्र बदल दिया है। अब यह युद्ध सैन्य की बजाय आर्थिक युद्ध में बदल गया है। ईरान खाड़ी में अमेरिका के जो साथी देश हैं या जहां अमेरिकी मिलिट्री बेस हैं, उन पर हमला कर रहा है। इन देशों पर ईरान के ज्यादातर हमले ड्रोन से हो रहे हैं,जिनकी कॉस्ट बहुत कम है जबकि एक ड्रोन को मार गिराने के लिए अमेरिका और उसके साथियों को मिसाइल चलानी पड़ती है,जिनकी कॉस्ट बहुत ज्यादा है। तो ईरान ने इस वॉर को वर्टिकल से हॉरिजॉन्टल में बदल डाला है। ईरानी हमलों से खाड़ी में अमेरिका के साथी देशों का इंफ्रास्ट्रक्चर बुरी तरह बर्बाद हो रहा है। इस आधार पर ईरान कह रहा है कि लंबे समय तक लड़ने की क्षमता रखते हैं क्योंकि उसके पास ड्रोन की कोई कमी नहीं है। उसके पास सबसे ज्यादा प्रभावी और मारक ड्रोन टेक्नोलॉजी है।
मुझे लगता है कि इस युद्ध में इजराइल और अमेरिका की स्ट्रेटजी में सबसे बड़ी खामी यह रही कि वे इस बात का अनुमान नहीं लगा पाए कि ईरान खाड़ी के देशों पर भी हमला कर सकता है। दूसरा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा का कोई बंदोबस्त उन्होंने नहीं किया। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से ही दुनिया का करीब 30% तेल और गैस गुजरता है। इस पर ईरान का कब्जा है और वह यहां से गुजरने वाले जहाजों पर लगातार हमला कर रहा है। एक तरीके से उसने इस मार्ग को बंद ही कर दिया है जिससे दुनिया में तेल और गैस का संकट बढ़ता जा रहा है। तो ईरान को यह समझ में आ गया है कि खाड़ी के देशों पर हमला और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद करने से अमेरिका और इजराइल ज्यादा परेशान होंगे और पूरी दुनिया का दबाव उन पर बढ़ेगा। उधर इजराइल ईरान के प्रॉक्सीज खासतौर से हिजबुल्ला को खत्म करने पर लगा है। वह लेबनान में लगातार हमले कर रहा है।

हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप का यह भी बयान आया है कि हम ईरान में पैदल सेना भी उतार सकते हैं, जो कि संभव नहीं लगता है। पैदल सेना उतारने का मतलब है कि युद्ध बहुत लंबा चलेगा और लंबे युद्ध में अमेरिका का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत ही खराब है। चाहे आप वियतनाम देख लीजिए, चाहे अफगानिस्तान या इराक देख लीजिए, हर जगह अमेरिका को मात मिली है। ट्रंप की नीति लंबे युद्ध की नहीं है। वह इस युद्ध से जल्द ही निकलना चाहेंगे। इसीलिए उन्होंने इस युद्ध के इतने सारे उद्देश्य बता दिए हैं। वह किसी दिन किसी मुद्दे को लेकर कह सकते हैं कि हमने यह हासिल कर लिया इसलिए हम युद्ध जीत गए। अब युद्ध समाप्त। लेकिन इजराइल की स्थिति दूसरी है। अमेरिका अपने अस्तित्व के लिए नहीं लड़ रहा है। इजराइल अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है। इसलिए वह ईरान को इतना कमजोर कर देना चाहता है कि वह फिर उठकर खड़ा न हो पाए और इजराइल के लिए खतरा न बने। वह हर कीमत पर ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम और मिसाइल व ड्रोन की मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी को खत्म कर देना चाहता है।
अगर यह युद्ध लंबा चला तो पूरी दुनिया के लिए तेल और गैस की समस्या बहुत ज्यादा बढ़ने वाली है। अभी कुल मिलाकर स्थिति यह है कि अमेरिका और इजराइल जीत नहीं रहे हैं और ईरान हार नहीं रहा है। युद्ध लंबा खिंचने पर डोनाल्ड ट्रंप के लिए घरेलू स्तर पर समस्या होने वाली है। वहां महंगाई बढ़ रही है। उनकी अपनी पार्टी में ही ऐसे लोगों की संख्या अच्छी खासी है जो इस युद्ध के समर्थक नहीं है। वह ईरान को जितना कमजोर कर देना चाहते थे उतना अभी तक कर नहीं पाए हैं। अमेरिका का ईरान में रिजीम चेंज का जो लक्ष्य था,वह भी अभी पूरा होने वाला नहीं है। युद्ध खत्म होने के बाद ही उसकी परिस्थितियां बन सकती हैं, जब ईरान में आर्थिक बदहाली आएगी। वर्तमान रिजीम का अत्याचार जब बढ़ेगा तब लोग सड़कों पर उतर सकते हैं। अभी तो चूंकि उनके देश पर हमला हुआ है तो सभी लोग इस रिजीम के साथ खड़े हो गए हैं।
उधर, ईरान ने हमला रोकने के लिए खाड़ी देशों के सामने दो शर्तें रखी हैं। पहली शर्त है कि खाड़ी के देश अमेरिका और इजराइल की जितनी एंबेसीज हैं, उन सबको बंद कर दें। दूसरा अमेरिका के जो सैन्य बेस हैं, उनको वहां से हट जाने को कहें। यह होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि अमेरिका से नाता अगर खाड़ी के देश तोड़ लेते हैं तो उनकी सुरक्षा और कमजोर हो जाएगी। फिर वे ईरान के रहमोकरम पर होंगे। तो यह युद्ध आर्थिक युद्ध में बदल रहा है। अब यह सिर्फ तीन देशों का नहीं, पूरी दुनिया का मामला हो गया है। पूरी दुनिया में एनर्जी क्राइसिस हो रही है। मुझे लगता है कि इस युद्ध का सबसे निर्णायक दौर अगला एक हफ्ता होने वाला है। उसमें तय होगा कि युद्ध अब किस दिशा में जाएगा और किस रूप में सामने आएगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



