मधुसूदन आनन्द नहीं रहे ।

सुधांशु गुप्त।
कल (18 फरवरी) लगभग दस बजे के करीब विष्णु नागर जी की पोस्ट से पता चला कि वरिष्ठ पत्रकार और कहानीकार मधुसूदन आनन्द जी (20 दिसंबर 1952 – 18 फरवरी 2026) नहीं रहे… कल ही मैं पिछले तीन दिन से उन्हें फोन कर रहा था, फोन न उठने की वजह से मेरे मन में अनेक सन्देह पैदा हो रहे थे। कहीं उनकी तबीयत अधिक न बिगड़ गई हो।
इससे पहले 4 फरवरी को आनन्द जी की पत्नी ज्योत्सना जी से मुझे पता चला कि वह पीएसआरआई अस्पताल, शेख सराय दिल्ली में, आईसीयू में हैं। छह फरवरी को जब वह जनरल वार्ड में शिफ्ट हो गये तो मैं उनसे मिलने अस्पताल गया। बेहद कमज़ोर से दिख रहे आनन्द जी में मुझे उस समय भी जिजीविषा दिखाई दे रही थी। उन्होंने कहा भी, मेरे मन में बहुत कुछ घुमड़ रहा है। ठीक होने के बाद लिखना शुरू करूँगा। उन्होंने यह भी कहा, आप भी उपन्यास लिखिए…मैंने उनसे कहा कि बस अब उपन्यास ही लिखना है। मैं उनसे उपन्यास लिखने का वादा करके लौट आया।
7 फरवरी को उनका फोन आया। सात मिनट तक बात होती रही। मुझे लग रहा था कि वह ठीक होकर घर लौट आएँगे और घर पर ही बहुत सारी बातें की जाएँगी। लेकिन….
अक्तूबर 2018 में फेसबुक मैसेंजर पर ही उन्हें नया ज्ञानोदय का सम्पादक बनने पर बधाई दी तो उन्होंने कहा, ऑफिस आओ कभी। किसी दिन मैं ऑफिस गया। साहित्य की दुनिया पर काफी बातें हुई। ज्ञानोदय में लिखने का सिलसिला शुरू हुआ…निरंतर चलता रहा। मुझे आनन्द जी ने तब से लगातार प्रोत्साहित किया। घर पर और ऑफिस में उनसे बेहतर संवाद होता रहा। मैं कहानियाँ ख़ूब पढ़ रहा था तो आनन्द जी अच्छी कहानियाँ नया ज्ञानोदय के लिए भेजने को कहते…मैं भेजता, कहानियाँ छपती रहीं। वह लगातार यह भी कहते कि और पत्रिकाओं में भी लिखो। मैंने अन्य पत्रिकाओं के लिए भी लिखना शुरू किया। आनन्द जी से मैं यह सीखने की कोशिश करता कि सामने वाले को स्पेस देना कितना ज़रूरी होता है। उन्होंने मुझे भी स्पेस दिया, अपनी बात कहने का, लिखने का और आगे बढ़ने का…। लिखने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन वह फिर कभी….
सोच रहा हूँ आनन्द जी के ना रहने का क्या अर्थ है… क्या यह साहित्य-पत्रकारिता की दुनिया में विनम्रता, सादगी और स्वयं से परे देख पाने की प्रवृत्तियों के अन्त की शुरुआत है? 
आनन्द जी होते तो वह समझाते, ऐसा नहीं है सुधांशु, हमें निरपेक्ष होकर अपना काम करते रहना चाहिए और दुनिया से बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं पालनी चाहिए। तोल्स्तॉय की आत्मकथा का ज़िक्र करते हुए वह अक्सर कहते थे, उन्होंने जितना काम किया है, हम उनके मुकाबले कुछ भी नहीं हैं। इसलिए अपना अधिकांश समय काम पर लगाओ…
अब कहाँ से मिलेगा ‘थोड़ा सा उजाला’…
(लेखक की सोशल मीडिया वॉल से साभार)
मधुसूदन आनंद राजेंद्र माथुर की परंपरा के पत्रकार थे। अगर माथुर का असर किसी हिंदी पत्रकार में दिखता है तो वहां मधुसूदन आनंद ही हैं। वह हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों में से एक थे और यही कारण है कि वह अपनी बात काफी श्रेष्ठतम ढंग से कहना जानते थे।
–विष्णु नागर