राबड़ी देवी का नम्बर आया,सोनिया का कब आएगा।
प्रदीप सिंह।
राजनीति में कभी-कभी एक छोटी सी खबर भविष्य की बड़ी घटना का संकेत देती है। अभी दो-तीन दिन पहले यह खबर पटना से आई है।
बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का 10 सर्कुलर रोड पटना में बंगला है। इस बंगले पर 20 साल से उनका कब्जा था या कहें उन्हें अलॉटेड था। यह सरकारी बंगला था, इसके बावजूद इसे उन्होंने अपनी निजी संपत्ति जैसे मान लिया था। नीतीश कुमार की सरकार ने शपथ ग्रहण के कुछ ही दिन बाद राबड़ी देवी से कहा है कि यह बंगला खाली करना पड़ेगा। उनको हार्डिंग रोड पर एक दूसरा मकान अलॉट कर दिया गया है। अब देखने में तो यह बात बड़ी सामान्य से लगती है कि आप अगर एंटाइटल्ड नहीं हैं तो वह चीज आपको छोड़नी पड़ेगी। राबड़ी देवी इस समय विधान परिषद में प्रतिपक्ष की नेता हैं। इस नाते पता नहीं उनका एंटाइटलमेंट क्या है लेकिन जाहिर है ये 10 सर्कुलर रोड बंगला उनके एंटाइटलमेंट से ऊपर ही होगा।
राजनीति में दो चीज़ों से नेता के कद का आकलन किया जाता है। एक सरकारी आवास है कि नहीं और है तो कितना बड़ा है। दूसरा सरकारी सुरक्षा का तामझाम कितना बड़ा है। जैसे ही इसमें कमी आती है,नेता को लगता है कि उसका राजपाट जा रहा है। उसकी हैसियत कम हो गई है। ऐसा उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों को भी लगता है। तो यह खबर आरजेडी के लिए अच्छी नहीं है। अब इस चुनाव में आरजेडी को कुल 25 सीटें मिली हैं और पूरे महागठबंधन को कुल 36 सीटें। ऐसे में आरजेडी अकेले न तो किसी को राज्यसभा में भेज सकती है और न ही विधान परिषद में। महागठबंधन चाहे तो भेज सकता है, लेकिन उसके साथ बहुत बड़ी शर्त जुड़ी हुई है कि अगर महागठबंधन उस चुनाव तक एक रहे। अभी जो स्थिति है उसमें ऐसा लग रहा है कि आरजेडी और कांग्रेस के विधायकों में बेचैनी बढ़ रही है। अब यह बेचैनी कब दलबदल में बदल जाएगी किसी को पता नहीं है। हालांकि एनडीए को किसी को तोड़ने की जरूरत नहीं है। उसको 243 में से 202 सीटें पहले ही मिली हुई हैं लेकिन विपक्ष या अपने विरोधी का मान मर्दन करने के लिए भी पार्टियां ये काम करती हैं। हमेशा जरूरत हो इसीलिए दलबदल हो, यह आवश्यक नहीं होता। अब कोई पार्टी टूटेगी या नहीं, यह भविष्य की बात है। हालांकि यह बात सही है कि वहां बेचैनी है।
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बिहार में जो स्थिति आरजेडी की है, कुछ उसी तरह की स्थिति दिल्ली में कांग्रेस की है। सोनिया गांधी 10 जनपथ के जिस बंगले में रहती हैं, मुझे नहीं लगता कि उसके लिए वह एंटाइटल्ड हैं। यह बंगला राजीव गांधी को 1989 में प्रतिपक्ष के नेता के तौर पर अलॉट हुआ था। अहम बात यह है कि प्रधानमंत्री सात लोक कल्याण मार्ग के जिस बंगले में रहते हैं वह बंगला इस 10 जनपथ के बंगले से छोटा है। उससे पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उसी बंगले में रहते थे। उससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी और पीवी नरसिम्हाराव भी उसी में रहते थे। इन सबके बंगले 10 जनपथ वाले से छोटे थे। इसके अलावा सोनिया को एसपीजी सुरक्षा भी मिली हुई थी। वह तब भी थी जब वह न तो कांग्रेस अध्यक्ष थीं,न कांग्रेस की लोकसभा में नेता थीं,न प्रतिपक्ष की नेता थीं,न ही कोई सरकारी पद था उनके पास। उनकी एसपीजी की सुरक्षा तब तक नहीं हटी जब तक मोदी सरकार ने एसपीजी एक्ट में अमेंडमेंट करके यह सुरक्षा नहीं हटाई। जो कानून है उसके मुताबिक जो प्रधानमंत्री हैं,उनके पद से हटने के एक साल बाद तक उनको यह सुरक्षा मिलती है। उसके बाद उनकी भी सुरक्षा डाउनग्रेड कर दी जाती है, लेकिन गांधी परिवार की नहीं हुई थी। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस परिवार का एंटाइटलमेंट क्या है? और इस एंटाइटलमेंट के टूटने से ही परिवार और परिवार से जुड़ी जो पार्टी है, उसका आभामंडल क्षींण होता है। दिल्ली में इस समय गांधी परिवार के तीन सदस्यों सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के पास सरकारी बंगले हैं।

लुटियंस दिल्ली में बंगले पर काबिज रहने के लिए नेता कई तरह की रणनीति अपनाते हैं। काला कांकर के पूर्व राजा दिनेश सिंह ने तो बंगला बना रहे इसलिए पार्टी तक छोड़ दी थी। जो नेता रिटायर हो जाते हैं या जो सांसद या मंत्री हार जाते हैं,वे भी बंगले को बनाए रखने के लिए तमाम तरह की तरकीबें अपनाते हैं। जैसे- मैं बीमार हूं। मेरे परिवार का कोई सदस्य बीमार है। उसका इलाज यहीं पर हो सकता है। अदालत में केस डाल दिया। एक स्टे आर्डर ले आए और बने हुए हैं। हालांकि अब सरकार ने नियम बना दिया कि आपको 3 महीने में बंगला खाली करना होगा। तो अब कई नेताओं के साथ ऐसा हुआ कि उनका सामान निकालकर बाहर कर दिया गया और इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष में कोई भेदभाव नहीं किया गया। सवाल यह है कि जो लोग चुनाव हार गए हैं या पद से हट गए हैं, वे अगर सरकारी बंगले खाली नहीं करेंगे तो नए लोगों को कैसे मिलेगा।
तो बात सिर्फ इतनी नहीं है कि राबड़ी देवी से 10 सर्कुलर रोड का बंगला खाली करने को कहा गया है बल्कि यह विधानसभा चुनाव के बाद के पॉलिटिकल इंपैक्ट को बताता है। यह आने वाले समय के बारे में संदेश दे रहा है कि आरजेडी का जो कोर वोट है मुस्लिम-यादव, उसमें से यादव वोट दरक सकता है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि यादव वोट आरजेडी को छोड़ देगा, लेकिन लालू यादव के नेता बनने के बाद से जिस तरह से चट्टान की तरह अभी तक खड़ा रहा है, अगले चुनाव तक रहेगा इसमें भारी शंका है। क्योंकि अब यादव समाज के लोगों को लग रहा है कि लालू को सत्ता हमने दी,लेकिन उस सत्ता को उन्होंने अपने परिवार की सत्ता बना दिया। वृहत्तर यादव समाज के लिए कुछ किया नहीं। लालू प्रसाद यादव के शासन को भी नेगेटिव रूप में यानी जंगल राज के रूप में याद किया जाता है। किस तरह का आतंक का राज था। गुंडा राज था। उस समय जो आरजेडी का नेता, कार्यकर्ता, मंत्री कह दें वही कानून था। तो यह 10 सर्कुलर रोड का बंगला जाना बिहार में यादव राजनीति के पतन की शुरुआत है।

आरजेडी का जो वर्चस्व था वह अब टूटता हुआ दिखाई दे रहा है। क्योंकि आपके पास जब बांटने के लिए कुछ नहीं होता है तो दिक्कतें बढ़ने लगती हैं। आप लोगों को न भी दें तो यह उम्मीद बनी रहती है कि शायद कल हमारा भी नंबर आए। आरजेडी से अब वह उम्मीद भी खत्म हो गई है और तेजस्वी यादव का जो नेतृत्व है वह किसी तरह की उम्मीद नहीं जगाता है बल्कि निराशा पैदा करता है। राजनीति करना तेजस्वी यादव के बस का ही नहीं है क्योंकि उसमें मेहनत करनी पड़ती है। उनका जिस परिवेश में जन्म हुआ, सब कुछ बना बनाया उनको मिला। कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी। बालिग होने से पहले करोड़पति हो गए। अब वह सब चलने वाला नहीं है। अब जो उन्होंने पा लिया है, वह कब तक बना रहेगा मालूम नहीं। लेकिन जितना अर्जित कर लिया है, उसमें अब कोई बढ़ोतरी होती हुई दिखाई नहीं दे रही है। तो जब आपके पास बांटने के लिए कुछ नहीं रहता तब आप याचक की मुद्रा में आ जाते है और जिसके अंदर अहंकार भरा हुआ हो उससे याचना नहीं हो पाती है। तो इसलिए यह परिवार याचना करेगा ऐसी उम्मीद नहीं है। तो यह परिवार टूटेगा और जब मैं परिवार कह रहा हूं तो परिवार और पार्टी में कोई फर्क नहीं कर रहा हूं। यह परिवार ही पार्टी है और पार्टी ही परिवार है। बात केवल यह है कि परिवार और पार्टी टूटने में समय कितना लगेगा और उसके टूटने का इंतजार करने का धैर्य कितना है बीजेपी और जेडीयू में क्योंकि वहां पर कांग्रेस कोई पॉलिटिकल फोर्स नहीं है। प्रशांत किशोर का गुब्बारा फूलने से पहले ही फूट गया। उनमें कोई दम नहीं था। वह सब उनका आडंबर था,जिसको बिहार के लोगों ने बहुत जल्दी पहचान लिया। इसीलिए कहते हैं कि बिहार के लोगों की राजनीतिक समझ बहुत तेज है। जो आम लोगों के लिए लगता है कि संभव नहीं है बिहार के लोग वह करके दिखा देते हैं और यह 2025 का जो जनादेश है, वह उन्होंने वही करके दिखाया है। उन्होंने जंगल राज को हमेशा के लिए दफन कर दिया है।
तो राबड़ी देवी का तो नंबर आ गया। उनको 10 सर्कुलर रोड का बंगला खाली करना पड़ा। सवाल यह है कि सोनिया गांधी का नंबर कब आएगा? 10 जनपथ कब खाली होगा? जिस दिन 10 जनपथ खाली होगा, आप समझ लीजिए कि गांधी परिवार का जो आभा मंडल बचा खुचा है, वह भी समाप्त हो जाएगा। आपको 10 जनपथ के अंदर जाकर आभास होगा कि वहां उसी तरह की व्यवस्था बनाई गई है जिस तरह से प्रधानमंत्री आवास में होता है। सोनिया गांधी आज भी अपने को इस देश की महारानी समझती हैं। उनका पूरा आचरण,उनकी कामकाज की शैली आज भी उसी तरह से है कि सत्ता गई नहीं है। टेंपरेरी कुछ समय के लिए चली गई है। तो मानकर चलिए कि राबड़ी देवी के बाद अब सोनिया गांधी का भी नंबर आएगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)


