विज्ञापनों से हास्य खत्म हो गया है- सुहेल सेठ

आपका अखबार ब्यूरो।

संस्कृति मंत्रालय के स्वायत्त संस्थान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) ने 25 मार्च, 2025 को एक विशेष और अनूठी प्रदर्शनी ‘Ad Art Exhibition : Four Decades of Indian Advertising’ (ऐड आर्ट एक्जीबिशन : भारतीय विज्ञापन के चार दशक) का आयोजन किया। इस प्रदर्शनी में भारतीय विज्ञापन के चार दशकों (1950-1990) की अनमोल धरोहर को प्रदर्शित किया गया है। इस अवसर पर एक चर्चा का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे मार्केटिंग एक्सपर्ट, लेखक, अभिनेता और कॉलमिस्ट श्री सुहेल सेठ, विशिष्ट अतिथि थे हिंदुस्तान टाइम्स के एडिटर-इन-चीफ श्री सुकुमार रंगनाथन और अध्यक्षता की पांचजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने। कार्यक्रम का संचालन और स्वागत भाषण श्री अनुराग पुनेठा ने किया। इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर हैं श्री इक़बाल रिज़वी। यह अनूठी प्रदर्शनी आईजीएनसीए की दर्शनम् गैलरी में 28 मार्च तक चलेगी।

इस अवसर पर सुहेल सेठ ने कहा, “विज्ञापन किसी देश की सांस्कृतिक प्रवृत्ति का बैरोमीटर हैं। यह मानना गलत है कि ये केवल उपभोक्ता प्रवृत्ति का प्रतिबिंब हैं। उपभोक्तावाद अक्सर संस्कृति से उपजा होता है और भारतीय त्योहारों के दौरान, दिवाली, होली, ईद, क्रिसमस के दौरान सबसे अधिक पैसा खर्च करते हैं। इसलिए बहुत सारा खर्च संस्कृति से जुड़ा हुआ है।” उन्होंने कहा कि लोग जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह यह है कि वे मानते हैं कि विज्ञापन का मतलब ब्रांड बेचना है। लेकिन ऐसा नहीं है। विज्ञापन का मकसद लोगों से जुड़ाव स्थापित करना है। हो सकता है कि आप आज मेरा ब्रांड न खरीदें, लेकिन क्या आप कल इसे खरीदने के लिए तैयार होंगे? तो यह लगभग बीज बोने जैसा है। हाल ही में संपन्न हुए महाकुंभ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “आपने अभी-अभी सबसे बड़ा मार्केटिंग उत्सव देखा, जो तीन नदियों के संगम पर संपन्न हुआ। उस उत्सव की आध्यात्मिकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, लेकिन आपको यह भी देखना चाहिए कि कुम्भ के इर्द-गिर्द क्या हो रहा था। उस राज्य के मुख्यमंत्री ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि महाकुम्भ से उस राज्य में पर्यटन को बढ़ावा मिला है।” अपने सम्बोधन के अंत में सुहेल सेठ ने कहा, “मुझे सबसे बड़ा अफ़सोस है कि आज भारतीय विज्ञापन से हास्य गायब हो गया है।” उन्होंने युवाओं से व्यापक रूप से पढ़ने का आग्रह किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि विज्ञापनों को सीखने के स्रोत के रूप में गहरी दिलचस्पी के साथ देखा जाना चाहिए।

सुकुमार रंगनाथन ने वेंस पैकार्ड की किताब ‘द हिडन पर्सुएडर्स’ का हवाला देते हुए बताया कि आप कैसे लोगों की राय को आकार दे सकते हैं और उनसे वह करवा सकते हैं, जो आप करना चाहते हैं। लेकिन पिछले दशक में इंटरनेट ने इस गतिशीलता को बदल दिया है। पिछले दशक में इंटरनेट की बदौलत यह हुआ है कि कंपनियां, व्यक्ति, राजनीतिक दल, संगठन सभी अपने नैरेटिव के मास्टर बन गए हैं। पहले ऐसा नहीं था। पहले, आपको एक मीडिया की आवश्यकता होती थी, जो एक समाचार पत्र या पत्रिका या एक टीवी चैनल होता था। फिर आपको कुछ ऐसे लोगों की आवश्यकता होती थी, जो आपके लिए संदेश तैयार करते थे यानी विज्ञापन एजेंसियां की आवश्यकता होती थी। लेकिन इंटरनेट ने इन सभी बातों को समीकरण से हटा दिया है। इसलिए आप सीधे ग्राहक या उपभोक्ता के पास जाते हैं और अपना नैरेटिव खुद गढ़ सकते हैं।

आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि विज्ञापन भी एक कला है। लेकिन विज्ञापनों का डॉक्यूमेंटेशन नहीं होता, आर्काइविंग नहीं होती। उन्होंने विज्ञापनों पर शोध और उनके अध्ययन पर जोर देते हुए कहा कि एडवर्टाइजिंग के माध्यम से हमारे समाज की मानसिकता में जो बदलाव आता है, उसके बारे में भी हम बात कर सकते हैं। विज्ञापन मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिवर्तन को प्रतिबिंबित करते हैं। ये पूरा जगत एडवर्टाइजिंग के माध्यम से आगे बढ़ता है। ये जो मार्केटिंग की दुनिया है, बाजारीकरण की दुनिया है, वो विज्ञापनों के जरिये आगे बढ़ती है। अपने संदेश में उन्होंने विचार के लिए एक सूत्र भी दिया कि जब इतनी सारी विविधता किसी एक रूप (विज्ञापन) में है, तो क्या उसे कला रूप की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए! विज्ञापन फिल्म नहीं है, बल्कि उससे इतर अपने आप में एक पूरा विकसित कला शास्त्र है।

श्री हितेश शंकर ने अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में कहा कि विज्ञापनों में समाज, संस्कृति, राजनीतिक व्यवस्था, सब झलकती है। उन्होंने एक विज्ञापन का उद्धरण देते हुए यह कहा कि विज्ञापनों में सामाजिक आयाम भी दिखाई देते हैं। विज्ञापनों के जरिये पता चलता है कि केवल उत्पाद नहीं बदल रहे, बल्कि एक समाज के तौर पर हम भी बदल रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विज्ञापन केवल उत्पाद के बारे में नहीं हैं, बल्कि नैरेटिव भी गढ़ते हैं। हमें विज्ञापन जगत के डायनेमिक्स को और समझना पड़ेगा। विज्ञापन तरह-तरह की अपील का भी खेल है। आपकी जेब से पैसा कैसे निकालना है, इस तरह के काम, इस तरह के कमाल विज्ञापन करता है।

यह अनूठी प्रदर्शनी न केवल पुराने विज्ञापनों का संग्रह है, बल्कि यह भारतीय समाज, संस्कृति और उपभोक्तावाद में हुए बदलावों का एक दर्पण भी है। विज्ञापनों ने भारत के बाजार, भावनाओं और पहचान को गहराई से प्रभावित किया है। दरअसल, यह प्रदर्शनी विज्ञापनों की कला, लेखन शैली और तत्कालीन सामाजिक संदर्भ को समझने की कोशिश है और यह भी कि विज्ञापनों ने समाज पर क्या प्रभाव डाला। इस प्रदर्शनी में शामिल विज्ञापनों ने दशकों तक भारत के हर घर में अपनी छाप छोड़ी।

सालाना इनकम में मध्यम वर्ग को राहत, 7.27 लाख पर नहीं लगेगा टैक्स

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने मध्यम वर्ग के लोगों को कई कर लाभ दिये हैं। इसमें 7.27 लाख सालाना आय वाले लोगों को आयकर से छूट शामिल है। सीतारमण ने कहा कि सरकार समाज के हर व्यक्ति को साथ लेकर चल रही है।  जब 2023-24 के केंद्रीय बजट में सात लाख रुपये तक की कमाई वालों के लिए आयकर छूट प्रदान करने का फैसला किया गया था, तब कुछ तबकों में इसको लेकर संदेह जताया गया था। संदेह इस बात को लेकर था कि सात लाख रुपये से कुछ अधिक की कमाई वाले का क्या होगा।

वित्त मंत्री ने कहा कि इसलिए, हमने यह पता लगाने के लिये कि आप प्रत्येक अतिरिक्त एक रुपये के लिये किस स्तर पर कर का भुगतान करते हैं, एक टीम के रूप में बैठकर विचार किया… उदाहरण के लिये 7.27 लाख रुपये के लिये, अब आप कोई कर नहीं देते हैं। आप तभी कर देते हैं, जब कमाई इससे ऊपर होती है। उन्होंने कहा, ”आपके पास 50,000 रुपये की मानक कटौती भी है। नई योजना के तहत, शिकायत यह थी कि कोई मानक कटौती नहीं थी। यह अब दी गई है।

सरकार की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) का कुल बजट 2013-14 में 3,185 करोड़ रुपये था, जो 2023-24 में बढ़कर 22,138 करोड़ रुपये हो गया है। सीतारमण ने कहा कि यह नौ साल में बजटीय आवंटन में लगभग सात गुना बढ़ोतरी है। यह छोटे उद्यमों को सशक्त बनाने के लिये सरकार की प्रतिबद्धता को बताता है। उन्होंने कहा कि सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिये सार्वजनिक खरीद नीति के तहत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के 158 उद्यमों ने कुल खरीद का 33 प्रतिशत एमएसएमई से किया है और यह अब तक का सबसे अधिक है।(एएमएपी)

ज्ञानवापी पर कोर्ट का बड़ा फैसला, वजूखाने को छोड़कर पूरे परिसर का होगा एएसआई सर्वे

वाराणसी के बहुचर्चित ज्ञानवापी परिसर में वजूस्थल को छोड़कर परिसर के सर्वे वाली याचिका पर आदेश आ गया है। जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत ने मां श्रृंगार गौरी मूल वाद में ज्ञानवापी के सील वजूखाने को छोड़कर बैरिकेडिंग वाले क्षेत्र का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से रडार तकनीक से सर्वे कराने के आवेदन को मंजूर कर लिया है। आदेश के मुताबिक, सील परिसर को छोड़कर बाकी सभी स्थानों का सर्वे होगा।बिना कोई क्षति पहुंचाए हो सर्वेक्षण अदालत ने एएसआई के निदेशक को सर्वेक्षण के लिए आदेशित किया है। अदालत ने कहा कि बिना कोई क्षति पहुंचाए वे वैज्ञानिक तरीके से सर्वेक्षण कराएं। कोर्ट ने एएसआई के निदेशक को 4 अगस्त तक सर्वेक्षण के लिए टीम गठित करने का आदेश दिया है। अदालत के फैसले को हिन्दू पक्ष अपनी बड़ी जीत बता रहा है। अदालत ने हिन्दू पक्ष की दलीलों को मान लिया है। मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों को खारिज कर दिया गया है।

हिंदू पक्ष ने जताई खुशी

जिला जज की अदालत में आवेदन मंजूर  होने पर हिंदू पक्ष ने खुशी जताते हुए इसे बड़ी जीत बताया है।  हिंदू पक्ष के अधिवक्ताओं की दलील है कि सर्वे से यह स्पष्ट हो जाएगा कि ज्ञानवापी की वास्तविकता क्या है। सर्वे में बिना क्षति पहुचाएं पत्थरों, देव विग्रहों, दीवारों सहित अन्य निर्माण की उम्र का पता लग जाएगा। वहीं, विपक्षी अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी ने सर्वे कराने के आवेदन का विरोध किया है।

अगली सुनवाई चार अगस्त को

चार अगस्त को मामले पर अगली सुनवाई होगी। उस दिन तय होगा कि सर्वे किस तरह से होगा। सर्वे रोजाना होगा तो उसका समय क्या रखा जाएगा। इस जीत के साथ ही हिन्दू पक्ष हाईकोर्ट में कैविएट भी दाखिल करेगा। इससे अगर मुस्लिम पक्ष आज के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाता है तो बिना हिन्दू पक्ष को सुने हुए अदालत स्टे या कोई आदेश नहीं दे सके।

यह है पूरा मामला

गौरतलब है कि श्रृंगार गौरी के पूजा का अधिकार मांग रही चार महिलाओं लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास व रेखा पाठक ने 16 मई को जिला जज की अदालत में अर्जी देकर गुहार लगाई थी कि वुजूखाना को छोड़ शेष सभी हिस्सों का वैज्ञानिक तरीके से सर्वे कराया जाए। उनकी तरफ से अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन ने इस दौरान पिछले साल वुजू खाने में हुए कोर्ट कमीशन की रिपोर्ट पेश करते हुए कहा था कि उस दौरान शिवलिंग जैसी आकृति मिली थी। आकृति की एएसआई जांच का मामला सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। वुजूखाने को सील किया गया है। ऐसे में उसके आसपास के क्षेत्र का एएसआई सर्वे किया जा सकता है।

विष्णु जैन ने अदालत से कहा कि ज्ञानवापी परिसर का सर्वे हो तो एक और शिवलिंग मिल सकता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि ज्ञानवापी परिसर के पश्चिमी दीवार के पास खंडहरनुमा अवशेष, तीन गुम्बदों और व्यास जी के तहखाने की जांच भारतीय पुरातत्विक सर्वेक्षण, जीपीआर, वैज्ञानिक व डेटिंग पद्धति से कराई जाए।  विष्णु जैन ने सर्वे व हिंदू मंदिर के समर्थन में कई सुबूत व तथ्य भी अदालत में रखे हैं। अदालत ने 22 मई, 12 व 14 जुलाई को भी सुनवाई की। वहीं, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि पहले श्रृंगार गौरी के पूजा का अधिकार मांगा गया और अब ज्ञानवापी के सर्वे की मांग केवल केस को उलझाने के लिए की जा रही है।(एएमएपी)

भारत ने बंद किया चावल का एक्सपोर्ट, यूएस के बाजारों में खरीददारों की लगी होड़

भारत सरकार ने बीते दिनों चावल के निर्यात को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। इसके तहत केंद्र ने बासमती चावल को छोड़कर सभी तरह के कच्चे चावल के निर्यात पर बैन लगा दिया। ये फैसला आगामी त्योहारी सीजन के दौरान घरेलू डिमांड में बढ़ोतरी और खुदरा कीमतों पर नियंत्रण को ध्यान में रखकर लिया गया है। इस बैन का बड़ा असर अमेरिकी बाजारों में देखने को मिल रहा है और यहां सुपरमार्केट में चावल खरीदने के लिए लोगों में होड़ सी मची है।चावल खरीदने के लिए बाजारों में उमड़ी भीड़
खाद्य मंत्रालय की ओर से बीते सप्ताह जारी बयान में कहा गया था कि बासमती चावल और सभी तरह के उसना चावल के निर्यात नीति में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यानी केवल गैर-बासमती कच्चा चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि भारत से बड़े पैमाने पर बासमती चावल का निर्यात किया जाता है। सरकार ने गैर बासमती चावल के घरेलू कीमतों में बढ़ोतरी को देखते हुए निर्यात पर बैन लगाने का फैसला किया है। इसके बाद अमेरिका में चावल खरीदने के लिए मची अफरा-तफरी के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।

सोशल मीडिया पर खरीदारी के जो वीडियो और तस्वीरें वायरल हो रही हैं, उन्हें देख चावल के निर्यात पर भारत द्वारा लगाए गए बैन से पड़ रहे असर का अंदाजा लगाया जा सकता है। स्थानीय लोग ट्विटर पर वहां के स्टोर्स का वीडियो शेयर कर रहे हैं। इससे संबंधित रिपोर्ट्स में तो यहां तक कहा जा रहा है कि लोग छुट्टियां लेकर चावल खरीदने के लिए लाइन में लग रहे हैं। स्टोर्ट के अंदर एक-एक आदमी 10-10 चावल के पैकेट खरीदता हुआ नजर आ रहा है। यही रहीं 9 किलो चावल का एक पैकेट 27 डॉलर (2215 रुपये) में बिक रहा है।

लंबी कतारों में खड़े नजर आ रहे लोग

हालांकि, सोशल मीडिया पर जो वीडियो और तस्वीरें वायरल हो रही हैं, हम उनकी पुष्टि नहीं कर रहे है। लेकिन इनमें बताया जा रहा है कि सुपर मार्केट के बाहर लोग चावल खरीदने के लिए लंबी कतारों में लगने को मजबूर हैं। गौरतलब है कि अमेरिका में बड़े पैमाने पर भारतीय मूल के लोग रहते हैं और चावल इनके रोजमर्रा के खाने का अहम हिस्सा है।

अमेरिका में भारत से एक्सपोर्ट होने वाले चावल की बड़ी खपत है और भारत के चावल पर प्रतिबंध के फैसले के चलते वहां इस तरह के हालात पैदा हो गए हैं। बताया तो ये भी जा रहा है कि स्टोर्स पर उमड़ रही इस भीड़ को देखते कई जगह चावल ऊंची और मनमानी कीमतों पर बेचा जा रहा है।

भारत से इन 5 देशों में सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट

देश से निर्यात होने वाले कुल चावल में गैर-बासमती सफेद चावल की हिस्सेदारी करीब 25 फीसदी है। भारत से गैर-बासमती सफेद चावल का कुल निर्यात 2022-23 में 4.2 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था, जबकि पिछले वित्त वर्ष यानी 2021-22 में यह 2.62 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था। भारत सबसे ज्यादा गैर-बासमती सफेद चावल थाईलैंड, इटली, स्पेन, श्रीलंका और संयुक्त राज्य अमेरिका को निर्यात करता है।

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में लगभग 15.54 लाख टन सफेद चावल का निर्यात किया गया है, जो कि एक साल पहले की अवधि में केवल 11.55 लाख टन ही था, यानी सालाना आधार पर चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में निर्यात में 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

इस वजह से सरकार ने लगाया है बैन

सिर्फ इन पांच देशों में ही नहीं भारत दुनिया के 100 से अधिक देशों में चावल का निर्यात करता है। भारत 2012 से चावल का सबसे बड़ा निर्यातक रहा है। अब अचानक भारत सरकार की ओर से निर्यात पर बैन लगाने के फैसलों से अमेरिका के अलावा अन्य देशों में भी इस तरह के हालात देखने को मिल सकते हैं। यहां बता दें कि सरकार ने गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर बैन लगाकार घरेलू बाजार में बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने का फैसला किया है।

पिछले कुछ दिनों में चावल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखी जा रही है, इस महीने चावल के दाम में 10 से 20 फीसदी तक का उछाल आया है। हालांकि कुछ शर्तों के साथ चावल के निर्यात को अनुमति दी जाएगी। अगर नोटिफिकेशन से पहले जहाजों में चावल की लोडिंग शुरू हो गई है तो उसके निर्यात की अनुमति होगी। (एएमएपी)

घाट घाट में राम बसत है, बिना ज्ञान नहि देइ दिखाई

कबीर के राम को जिसने समझ लिया वह राम का हो गया

शिवचरण चौहान।

कबीर के राम लोकनायक नहीं हैं। कबीर के राम जननायक नहीं हैं। कबीर के नाम बाल्मीकि के राम नहीं हैं। कबीर के राम गुणहीन नहीं हैं- गुणातीत हैं। साकार नहीं निराकार हैं। कबीर के राम दशरथ के पुत्र भर नहीं हैं। कबीर के राम सभी के हृदय में निवास करते हैं- ‘एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट घट में लेटा/ एक राम का सकल पसारा, एक राम है सबसे न्यारा/ सब में रमै रमावई सोई, ताकर नाम राम अस होई/ घाट घाट में राम बसत है, बिना ज्ञान नहि देइ दिखाई।’

सबके हृदय में बसे राम

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कबीरदास के राम तो सबके हृदय में बसे हैं। वह न तो राजाराम हैं न दशरथ के पुत्र। उनके राम तो निराकार हैं गुणातीत हैं । कबीरदास का जन्म सन 1397 में काशी में हुआ था। उन दिनों विदेशी आक्रमणकारी भारत में कब्जा जमाए बैठे थे और हिंदू धर्म पर अत्याचार हो रहे थे। लोगों को जबरदस्ती इस्लाम धर्म अंगीकार करवाया जाता था। उन्हीं दिनों आचार्य रामानंद काशी में धर्म प्रचार कर रहे थे। रामानंद बहुत श्रेष्ठ विद्वान थे। कबीर ने उन्हें ही अपना गुरू स्वीकार किया।
कबीर की रचनाएं पढ़ने पर लगता है कि वह अद्भुत विद्वान थे। कबीर ने गहन अध्ययन, मनन और सत्संग किया था। आज से छह- साढ़े छह सौ वर्ष पहले जब कबीर का जन्म हुआ- से लेकर आज तक- कबीर जैसा विद्वान नहीं पैदा हुआ। उस समय जात पात, धर्म संप्रदाय के झगड़े आम बात थी। हिंदू मुसलमान में ऊंच-नीच के झगड़े होते रहते थे। ऐसे समय में कबीर ने सभी को सच्ची राह दिखाई।
कबीर उस समय के पहले व्यंग्यकार हैं जिन्होंने अपने व्यंग्य बाणों से किसी को भी नहीं बख्शा। ऐसी खरी खरी बातें लिखीं-सुनाईं और कहीं कि लोग विरोध तक नहीं कर पाये। न हंस पाए- न रो पाए।

ताको करो विचार

‘चार राम है जगत में तीन राम व्यवहार, चौथ राम सो सार है ताको करो विचार’- जो राम सार रूप है उस पर भी विचार करो। ‘जाति जुलाहा मति को धीर, सहज सहज गुन रमै कबीर/ भारी कहूं तो बहु डरूं हल्का कहूं तो झूंठ, मैं क्या जानू राम कू आखिन कभूं न दीख’ …कबीर कहते हैं मैंने राम को तो नहीं देखा फिर मैं कैसे कह दूं कि राम कैसा है? मैं तो मंदमति जुलाहा हूं। पढ़ा लिखा हूं नहीं तो मैं राम का गुण कहां से वर्णन कर पाऊंगा? ‘मसि कागद छूओ नहीं कलम गही नहि हाथ’ मैंने स्याही और कागज को छुआ और कलम को हाथ में नहीं पकड़ा।
‘कबीर कूता राम का मोतिया मेरा नाम, गले राम की जेवडी, जित खींचे तित जाऊ।’ …मैं तो राम का कुत्ता हूं मोती मेरा नाम है। मेरे गले में राम नाम की जंजीर पड़ी है। उधर ही चला जाता हूं जिधर वह ले जाता है। ऐसे बंधन में मौज ही मौज है।

पत्थर पूजे हरि मिले…

Sant Kabir - Sant Kabir Biography - Saint Kabir Life History - Guru Kabir  ke Dohe - Kabir Profile

कबीर ने बहुत तीखे व्यंग्य किए। जाति पाति, आडंबर अंधविश्वास, मूर्ति पूजा, पाखंड का जमकर विरोध किया- ‘पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़, तासे यह चकिया भली, पीस खाय संसार/ निरगुन बाह्मन न भला गुरु मुख भला चमार, देवतन से कुत्ता भला, नित उठ भूंके द्वार।’ जिस ब्राह्मण को कुछ ना आता हो उससे तो चमार भला। उन देवताओं को पूजने से क्या फायदा जो आपकी रक्षा ना करें। उससे तो कुत्ता भला जो एक रोटी खाकर आपके दरवाजे की रक्षा करता है। कहते हैं इस दोहे पर कश्मीर में बवाल हो गया था।
कबीर छह सौ साल पहले भी प्रासंगिक थे और आज भी प्रासंगिक हैं। जाति पात, धर्म आडंबर, ऊंच-नीच, हिंदू मुस्लिम विवाद, चोरी बेईमानी, छल कपट, धोखा- तब भी समाज में था और आज भी समाज में उसी तरह व्याप्त हैं। इसलिए कबीर आज भी प्रासंगिक हैं।

हमको मिला जियावन हारा

Understanding the Valmiki Ramayana

कबीर के समय तुलसीदास तो थे नहीं। कबीर के पूर्व वाल्मीकि की रामायण थी। बाल्मीकि रामायण में एक प्रसंग आता है कि जब राम की लीलाएं खत्म हो गयीं तो एक दिन तपस्वी के भेष में एक युवक आया। उसने राम से अकेले में कहा आपने अपनी लीला से मुझे काल स्वरूप प्रदान किया था। अब आपका धरती का कार्यकाल पूरा हो चुका है। अब आपको नश्वर शरीर त्यागना पड़ेगा। तुलसीदास ने कहा- ‘तेहि अवसर इक तापस आवा/ तेज पुंज लघु बयस सुहावा।’ राम दुखी हुए, विचलित हुए किंतु उन्हें परमधाम वापस जाना पड़ा।
कबीर के राम अजन्मा है मरते नहीं हैं- ‘हम ना मरौं मरय संसारा, हमको मिला जियावन हारा।’ जिस राम का जन्म ही नहीं होता वह मरेगा कहां से? राम तो अजर अमर अविनाशी अजन्मा, निराकार हैं। ऐसा राम जिसको मिल जाए वह भी अजर अमर ही तो होगा।
पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को अजर अमर कर दिया है। द्विवेदी जी ने कबीर की रचनाएं खोजी हैं और उन पर अपनी व्याख्याएं दी हैं। भारत के और विदेश के अनेक विद्वानों ने कबीर के साहित्य पर शोध किए हैं और पाया है कबीर अप्रतिम कवि, समाज सुधारक और विचारक हैं। कबीर सदियों पहले जितने प्रासंगिक थे उतने आज भी हैं। कबीर के राम को जिसने समझ लिया वह राम का हो गया।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

क्या करे भारत? उसके इजराईल, ईरान दोनों से पुराने कारोबारी और सांस्कृतिक रिश्ते

प्रहलाद सबनानी।
रूस – यूक्रेन एवं इजराईल – हम्मास के बीच युद्ध अभी समाप्त भी नहीं हुआ है और तीसरे मोर्चे इजराईल – ईरान के बीच भी युद्ध प्रारम्भ हो गया है। हालांकि इस बीच भारत-पाकिस्तान के बीच भी युद्ध छिड़ गया था परंतु भारत की बड़े भाई की भूमिका के चलते इस युद्ध को शीघ्रता से समाप्त करने में सफलता मिल गई थी। दो देशों के बीच युद्ध में किसी एक देश का फायदा नहीं होकर बल्कि दोनों ही देशों का नुक्सान ही होता है। परंतु, आवेश में आकर कई बार दो बड़े देश भी आपस में टकरा जाते हैं एवं इन दोनों देशों के पक्ष एवं विपक्ष में कुछ देश खड़े हो जाते हैं जिससे कुछ इस प्रकार की परिस्थितियां निर्मित हो जाती हैं कि विश्व युद्ध छिड़ जाते हैं।

वर्ष 1914 से वर्ष 1918 के बीच प्रथम विश्व युद्ध एवं वर्ष 1939 से वर्ष 1945 के बीच द्वितीय विश्व युद्ध इसके उदाहरण हैं। इजराईल – ईरान के बीच हाल ही में प्रारम्भ हुए युद्ध में अमेरिका भी कूदने की तैयारी करता हुआ दिखाई दे रहा है। अगर ऐसा होता है तो बहुत सम्भव है कि ईरान की सहायता के लिए रूस एवं चीन भी इस युद्ध में कूद पड़ें एवं यह युद्ध तृतीय विश्व युद्ध का स्वरूप ले ले। हालांकि यह अभी बहुत दूर की कौड़ी है। ऐसा कहा जा रहा है कि इजराईल एवं अमेरिका ईरान में सत्ता परिवर्तन करवाना चाह रहे हैं ताकि ईरान में उनके हितों को साधने वाली सरकार स्थापित हो सके।

वैश्विक स्तर पर आज परिस्थितियां बहुत सहज रूप से नहीं चल रही है। विभिन्न देशों के बीच विश्वास की कमी हो गई है जिसके चलते छोटे छोटे मुद्दों को तूल दी जाकर आपस में खटास पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं। कुछ देश, दो देशों के बीच, इन मुद्दों को हवा देते हुए भी दिखाई दे रहे हैं। जैसे आतंकवाद के मुद्दे को ही लें, यदि ये देश आतंकवाद से स्वयं ग्रसित हैं तो इनके लिए आतंकवाद बुराई की जड़ है और यदि कोई अन्य देश आतंकवाद को लम्बे समय से झेल रहा है तो इन देशों के लिए आतंकवाद कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। बल्कि, आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों को प्रोत्साहन दिया जाता हुआ दिखाई दे रहा है। चौधरी बन रहे कुछ देश अपनी विस्तरवादी नीतियों के चलते कई देशों में अपने हित साधने वाली सरकारों की स्थापना करना चाह रहे हैं एवं इन देशों में इस प्रकार की परिस्थितियां निर्मित करने के प्रयास कर रहे हैं ताकि ये देश आपस में लड़ाई प्रारम्भ करें। रूस एवं यूक्रेन के बीच युद्ध इसका जीता जागता उदाहरण है । साथ ही, कुछ देशों की कथनी और करनी में पाए जाने वाले फर्क के चलते भी वैश्विक स्तर पर परिस्थितियां बिगड़ रही हैं। चौधरी बन रहे देशों को तो उदाहरण पेश करते हुए अपनी कथनी एवं करनी में फर्क को समाप्त करना ही होगा। अन्यथा, वैश्विक स्तर पर परिस्थितियां भयावह स्तर तक पहुंच सकती हैं।

चूंकि इजराईल भी आतंकवाद से पीड़ित देश है एवं इजराईल की सीमाएं चार मुस्लिम राष्ट्रों से जुड़ी हुई हैं; यथा, उत्तर में लेबनान, दक्षिण पश्चिम में ईजिप्ट (एवं गाजा), पूर्व में जॉर्डन (एवं वेस्ट बैंक) एवं उत्तर पूर्व में सीरिया। अतः इजराईल अत्यधिक आक्रात्मकता के साथ आतंकवादियों (हम्मास एवं हूथी आदि संगठनों) से युद्ध करता रहता है। इस्लाम के अनुयायी यहूदियों के कट्टर दुश्मन हैं, इसके चलते भी इजराईल के नागरिकों को आतंकवाद को लम्बे समय से झेलना पड़ रहा है।

ईरान के बारे में तो कहा जा रहा है कि ईरान स्थित लगभग 60 प्रतिशत मस्जिदों में इबादत के लिए कोई भी व्यक्ति पहुंच ही नहीं रहा है क्योंकि ईरान में एवं ईरान द्वारा पड़ौसी देशों में फैलाए गए आतंकवाद से ईरान के मूल नागरिक अत्यधिक परेशान हैं। महिलाओं पर आतंकवादियों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों से स्थानीय  नागरिक बहुत दुखी हैं। अतः अब वे अपने पुराने धर्म जोरोस्ट्रीयन को अपनाने के लिए आतुर दिखाई दे रहे हैं अथवा इस्लाम धर्म का परित्याग करना चाह रहे हैं। जोरोस्ट्रीयन, ईरान का मूल धर्म हैं एवं यह अब ईरान के कुछ (बहुत कम) क्षेत्रों में सिमट कर रह गया है। भारत में भी जोरोस्ट्रीयन धर्म को मानने वाले पारसी समुदाय के कुछ नागरिक शांतिपूर्वक रह रहे हैं एवं भारत के आर्थिक विकास में अपना भरपूर योगदान दे रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर निर्मित हो रही इन परिस्थितियों के बीच भारत की विशेष भूमिका रह सकती है क्योंकि भारत के इजराईल एवं ईरान दोनों ही देशों के साथ आर्थिक रिश्ते बहुत मजबूत हैं। भारत, ईरान से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता रहा है एवं भारत ने ईरान में चाबहार बंदरगाह के निर्माण में भारी आर्थिक एवं तकनीकी सहायता प्रदान की है। चाबहार बंदरगाह का संचालन भी ईरान की सरकार के साथ भारतीय इंजीनियरों द्वारा ही किया जा रहा है। भारत और ईरान के बीच प्रतिवर्ष 200 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि का विदेशी व्यापार होता है। दूसरी ओर, इजराईल भारत का रणनीतिक साझीदार है। भारत इजराईल से भारी मात्रा में सुरक्षा उपकरण भी खरीदता है। भारत और इजराईल के बीच प्रतिवर्ष 650 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि का विदेशी व्यापार होता है, इसमें भारत द्वारा इजराईल से आयात किये जाने वाले सुरक्षा उपकरणों की राशि शामिल नहीं है। कुल मिलाकर, भारत के इजराईल एवं ईरान, दोनों देशों के साथ बहुत पुराने व्यापारिक एवं सांस्कृतिक रिश्ते हैं।

भारतीय सनातन हिंदू संस्कृति में “वसुधैव कुटुम्बकम”; “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” एवं “सर्वे भवंतु सुखिन:” की भावना पर विश्वास किया जाता है। अतः भारतीय नागरिक सामान्यतः शांत स्वभाव के होते है एवं पूरे विश्व में ही भ्रातत्व के भाव का संचार करते हैं। आज 4 करोड़ से अधिक भारतीय मूल के नागरिक विभिन्न देशों के आर्थिक विकास में अपना भरपूर योगदान दे रहे हैं। इन देशों में होने वाले अपराधों में भारतीय मूल के नागरिकों की संलिप्तता लगभग नहीं के बराबर पाई गई है। इसी कारण के चलते आज वियतनाम, जापान, इजराईल, आस्ट्रेलिया एवं सिंगापुर जैसे कई देश भारतीय मूल के नागरिकों को अपने देश में कार्य करने एवं बसाने में सहायता करते हुए दिखाई दे रहे हैं। खाड़ी के देश यथा ओमान, बहरीन, सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात आदि में भी लाखों की संख्या में भारतीय मूल के नागरिक निवास कर रहे हैं एवं शांतिप्रिय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कुल मिलाकर, विभिन्न देशों में निवासरत भारतीय मूल के नागरिकों का रिकार्ड बहुत ही संतोषजनक पाया जाता है, क्योंकि, भारतीयों की मूल प्रकृति ही सनातन हिंदू संस्कारों के अनुरूप पाई जाती है एवं वे किसी भी प्रकार के कर्म में धर्म को जोड़कर ही इसे सम्पन्न करने का प्रयास करते हैं। और, धर्म के अनुरूप किये गए किसी भी कार्य से किसी का अहित हो ही नहीं सकता।

उक्त वर्णित परिप्रेक्ष्य में वैश्विक स्तर पर जब चौधरी बन रहे देशों द्वारा अन्य देशों के साथ न्याय नहीं किया जाता हुआ दिखाई दे रहा है तो ऐसे में भारत को आगे आकर युद्ध में झौंके जा रहे देशों के नागरिकों की मदद करनी चाहिए। भारत की तो वैसे भी नीति ही “वसुधैव कुटुम्बकम” की है। यदि पूरे विश्व में भाईचारा फैलाना है तो सनातन हिंदू संस्कृति के अनुपालन से ही यह सब सम्भव हो सकता है। उक्त परिस्थितियों के बीच सनातन हिंदू संस्कृति की स्वीकार्यता विभिन्न देशों के नागरिकों की बीच तेजी से बढ़ भी रही है क्योंकि कई देश अब आतंकवाद से बहुत अधिक परेशान हो चुके हैं। अतः अब वे किसी तीसरे रास्ते की तलाश में हैं। इन विपरीत परिस्थितियों के बीच उनके पास अब विकल्प केवल सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कारों को अपनाने का ही बचता है, जिसके प्रति वे लालायित भी हैं। और फिर, आतंकवाद से यदि छुटकारा पाना है तो इससे लड़ते हुए छुटकारा पाने में तो कुछ देशों को कई प्रकार के बलिदान देने पड़ सकते हैं और यदि सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कारों को स्वीकार कर लिया जाता है तो कई देशों के नागरिकों को इस बलिदान से बचाया जा सकता है। अतः विश्व के देशों में सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कारों को तेजी से वहां के स्थानीय नागरिकों के बीच किस प्रकार फैलाया जा सकता है, इस विषय पर विश्व में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से अब गहन चिंतन एवं मनन करने की आवश्यकता है।
(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक हैं)

मध्‍य प्रदेश : अलीराजपुर में पकड़ी गई ईसाई मतांतरण की फैक्ट्री

न मान्‍यता न नियमों का पालन, फिर भी चल रहा है 35 सालों से मिशनरी बालगृह।

71 बच्‍चों में हैं 59 नाबालिग, इनमें सबसे अधिक अनाथ बच्‍चे।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी।

कानून को जेब में रखकर कैसे चला जाता है और कानून की धज्‍जियां कैसे उड़ाई जा सकती हैं, यह समझना है तो मध्‍य प्रदेश में ईसाई मिशनरी की गतिविधियों को देखकर समझा जा सकता है। न नियम, न नियमन और न ही किसी प्रकार की कानूनी औप‍चारिकताएं, जिन्‍हें पूरा करना किसी भी संस्‍थान के लिए अनिवार्य है।  यहां ऐसे सभी नियमों को खुलेआम नकारा जा रहा है। इस संबंध में प्रदेश के अलीराजपुर के जोबट के नर्मदा नगर से जो सच सामने आया है, उससे एक बार फिर न सिर्फ यहां चल रही ईसाई धर्मांतरण की सच्‍चाई पता चली, बल्‍कि यह भी पता लगा है कि विदेशी फंडिंग और विदेशी मेहमानों को खुश करने के लिए कैसे-कैसे जतन किए जाते रहे हैं।दरअसल, मध्‍य प्रदेश राज्‍य बाल संरक्षण आयोग की टीम 35 साल बाद आज यहां नहीं पहुंचती तो शायद यह सच कभी उजागर ही नहीं होता कि शासन के नियमों की धज्‍ज‍ियां यह ईसाई मिशनरी संस्‍था किस-किस रूप में कैसे-कैसे उड़ा रही है।  मध्‍य प्रदेश बाल सरंक्षण आयोग की कार्रवाई के साथ ही राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के अध्‍यक्ष प्रियंक कानूनगो ने अब इस पूरे मामले को अपने संज्ञान में लिया है।

तिरंगे का अपमान, छात्रावास में कंडोम, सर्जिकल औजार मिले

यहां राष्‍ट्रीय ध्‍वज का अपमान सामने आया है।  गंभीर प्रकार के मेडिकल उपकरण और सर्जिकल टूल्स (ऑपरेशन औजार) यहां पाए गए हैं। बच्‍चों को बिना किसी शासकीय अनुमति के रखने वाले इस संस्‍थान में बाल आयोग को निरीक्षण दौरान उपयोग किए हुए  निरोध(कंडोम) मिले हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति समाज के बच्‍चों का मतान्‍तरण करने के सीधे साक्ष्‍य यहां पाए गए हैं  । करोड़ों की फंडिंग यहां सेवा के नाम से विदेशों से प्राप्‍त की गई है और इनके अलावा भी अन्‍य अनेक खामियां इस ईसाई छात्रावास में मिली हैं।

ईसाई मिशनरी गतिविधियों के विरोध में हिन्‍दू संगठन आगे आए

इन तमाम गड़बड़ियों की जानकारी लगते ही अब हिन्‍दू संगठन भी मुखर हो गए हैं। उनमें जनजाति विकास मंच, विश्‍वहिन्‍दू परिषद, हिन्‍दू जागरण मंच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद छात्रावास के बाहर प्रदर्शन करने पहुंचे और राज्‍य बाल संरक्षण आयोग की टीम में विशेषकर सोनम निनामा और ओंकार सिंह को उन्‍होंने ज्ञापन सौंपा। उन्‍होंने कहा है कि कैसे पुलिस प्रशासन एवं शासन की नाक के नीचे भोले-भाले जनजाति बन्‍धुओं और उनके बच्‍चों को ये ईसाई मिशनरी पूरे अलीराजपुर में धोखें में रखकर और उनका माइण्‍डवॉश कर अपना शिकार बना रही हैं।

35 वर्षों से चल रहा मिशनरी बालगृह,  ज्‍यादातर  बच्‍चे अनाथ

ये ईसाई मिशनरी किसी भी कानून को न मानते हुए कितनी स्‍वतंत्र हैं, इसका अंदाजा मध्‍य प्रदेश राज्‍य बाल संरक्षण आयोग की सदस्‍य सोनम निनामा के शब्‍दों में इसी बात से लगा सकते हैं कि  जब ‘आदिवासी सेवा सहायता समिति’, द्वारा संचालित मिशनरी बालगृह में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की टीम औचक निरीक्षण करने पहुंचती है तब उनकी कमियों को आयोग द्वारा उनके ध्‍यान में लाया जाता है तो वह उन्‍हें मानने तक को इस बालगृह का प्रबंधन तैयार नहीं होता। आयोग सदस्‍य सोनम कहती हैं कि बिना पंजीयन के ही यह बाल गृह 35 सालों से चल कैसे रहा है, यही बड़ा आश्‍चर्य है । यहां 71 बालक-बालिकाएं मिले, जिनमें नाबालिगों की संख्‍या 59 है। 35 बच्चियां हैं और उस पर भी अधिकांश बालिकाएं अनाथ हैं। फिलहाल संस्था अध्यक्ष के ऊपर किशोर न्याय अधिनियम का उल्लंघन करने पर महिला बाल विकास विभाग (सीडीपीओ) की ओर से एफआइआर दर्ज करा दी गई है।

मिशनरी संस्‍था की लापरवाही बच्‍चों पर इस प्रकार पड़ी भारी

सोनम निनामा ने बताया कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 42 के अंतर्गत जब मिशनरी अनाथालय समिति अध्यक्ष कल्पना डेनियल से बाल गृह पंजीयन के दस्तावेज मांगे गए तो वह उन्‍हें उपलब्ध नहीं करा पाईं। समिति अध्यक्ष ने लिखकर दिया है कि बिना पंजीयन के ही बाल गृह चलाया जा रहा था। जबकि मप्र शासन द्वारा अलग-अलग आयु वर्ग के हिसाब से बाल गृह संचालन के नियम बने हैं। वास्‍वत में इस मिशनरी संस्‍था का सबसे बड़ा अपराध यह है कि इन अनाथ बच्‍चों का समय रहते पुनर्वास कराया जा सकता था और जो यहां कई वर्षों से रहते हुए आज बालिग हो गए हैं, ऐसे सभी बच्‍चों को पुनर्वास संबंधी शासन की योजनाओं का लाभ देकर उन्‍हें कौशलनिर्माण से जोड़कर आत्‍मनिर्भर बनाया जा सकता था, लेकिन इस संस्‍था की लापरवाही के कारण अब तक यह नहीं हो सका है।

चिल्‍ड्रन होम्‍स सील, शिफ्ट हुए बच्‍चे

सोनम निनामा का कहना यह भी रहा कि चिल्‍ड्रन होम्‍स सील हो चुका है। अनाथ बच्‍चों में 15 बालकों को इंदौर के जीवन ज्‍योति आवास गृह में शिफ्ट कर दिया गया है। साथ ही 15 अनाथ और नाबालिग छात्राओं को धार के मांडू में बालिका छात्रावास में शिफ्ट कर दिया है। कुल यहां यहां 35 बालिकाएं मिलीं, जिनमें 30 नाबालिग हैं और अधिकांश अनाथ भी । 36 बालक मिले, जिनमें 29 नाबालिग हैं। इसके साथ ही यहां वृद्धाश्रम भी संचालित होता हुआ पाया गया, जिसमें 13 वृद्ध रह रहे हैं।

छात्रावास में जनजाति बच्‍चों को लाकर रखा गया, ह्यूमन ट्रैफिकिंग के एंगल से जांच की मांग

वहीं, इस मामले में मप्र राज्‍य बाल संरक्षण आयोग के सदस्‍य ओंकार सिंह का कहना है कि यहां ज्‍यादातर बच्‍चे अनुसूचित जनजाति के मिले हैं। बच्‍च‍ियों ने शिकायत की है कि हर रोज रात में सिर्फ दाल-चावल का भोजन मिलता है। नॉनवेज भी भोजन में हर रोज कुछ न कुछ खिलाया जाता है। इस संस्‍था की ह्यूमन ट्रैफिकिंग के एंगल से जांच होने की आवश्‍यकता है। क्‍योंकि मालूम चला है कि 2018 में एक बच्‍ची सीहोर से यहां लाई गई थी, किंतु उसका अब तक कुछ पता नहीं चला। पता नहीं ऐसे कितने मामले और हों, आगे जांच करेंगे तो अन्‍य बहुत कुछ भी सामने आएगा।

सभी बच्‍चों के पास मिली बाईबिल, विदेशी फडिंग का ऐंगल भी आया सामने

उन्‍होंने साथ में यह भी बताया कि यहां जांच के दौरान ध्‍यान में आया कि हर बच्‍चे के पास कुछ हो न हो, लेकिन बाईबिल जरूर है।  यह सभी बच्‍चों के पास पाई गई । जिससे अनाथ बच्चों का मतांतरण किए जाने की आशंका है। इसके साथ ही ओंकार सिंह ने बताया कि बच्चों को स्थानीय चर्च में प्रार्थना के लिए भी ले जाया जाता था। जांच में यह भी सामने आया है कि संस्था को स्विट्जरलैंड से करोड़ों रुपये का फंड मिलता है । जिसके दस्‍तावेज भी मिले हैं। यहां कंडोम भी बरामद हुए हैं, जोकि यूस में लाए जा चुके हैं, वहीं अन्‍य का उपयोग होना है, जबकि इन छात्रावासों में इनका क्‍या काम?

एनसीपीसीआर ने कलेक्‍टर को सख्‍त कार्रवाई एवं जांच संबंधी जरूरी निर्देश दिए

ओंकार सिंह ने कहा कि इस परिसर में जिस तरह से राष्‍ट्रीय ध्‍वज को रखा गया था, वह सीधे तौर पर उसका अपमान है।  गंभीर प्रकार के मेडिकल उपकरण और सर्जिकल टूल्स का यहां पाया जाना कई प्रकार के संदेह पैदा करता है। इसके साथ ही इस पूरे प्रकरण को अब राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के अध्‍यक्ष प्रियंक कानूनगो ने भी अपने संज्ञान में लिया है। उन्‍होंने कलेक्टर को नोटिस देकर निर्देशित किया है कि वह केंद्रीय आयोग कार्यालय में बच्चों का पूरा ब्योरा, उनके पुनर्वास के लिए शासन द्वारा उठाए कदम इत्‍यादि उनसे जुड़ी सभी आवश्‍यक जानकारियां तीन कार्यदिवस के भीतर भेजें। (एएमएपी)

‘हमारे यहाँ वो टॉयलेट कर सकती है… मम्मा!’

लक्ष्मण पार्वती पटेल/ कहानी वाला।
आपके घर सारा दिन काम करने वाली बाई आपके घर का toilet उसकी नेचर काल पर उपयोग करती होगी ना!
आज की कहानी वाला की कहानी जन्मी है जयपुर की एक लेखिका स्वर्ण कांता की एक पोस्ट से उपजे एक सवाल से। उनकी पोस्ट में जब एक माँ से उनकी बेटी ने अचानक सवाल पूछा- मम्मा, संजना दीदी हमारे यहां टॉयलेट कर सकती है?

छोटे से सवाल से जोर का झटका लगा उस माँ को!
सुरु घर खेलने आई अपनी दोस्त के बारे में पूछ रही थी… संजना… वो हमारे सामने वाली बिल्डिंग के चौकीदार की 10 साल की बेटी है। उससे माँ ने पूछा- आखिर तुमने ये सवाल क्यों किया… तुम्हारी दूसरी कई दोस्त आती हैं तब तो कभी ऐसा नहीं पूछती तुम… कि मम्मा फलां फलां कह रही है कि टॉयलेट यूज कर लूं।
सुरु बोली- मम्मा, मैं कहां सवाल कर रही थी। वो तो संजना ने खुद कहा कि पहले पूछ लो कहीं… तुम्हारी मम्मी गुस्सा तो नहीं होगी? और मम्मा मैं भी यही सोच रही हूं कि संजना दीदी ने ऐसा क्यों पूछा?
उस चौकीदार की मासूम बेटी ने ये सवाल क्यों पूछा? जवाब दीजिए ना। आप तो इजाज़त देते होंगे ना आपके किसी भी नौकर को अगर उसे toilet यूज करना है आपके घर का। आपकी बेटी उसका जवाब तुरंत देगी ना येस यू  केन यूज। पूछना क्यों इतनी सी बात उसने।

पर शायद न तो हममें से अधिकांश ने कभी ये जवाब किसी नौकर को दिया न ही अपने बच्चे को इस तरह देना सिखाया भी। क्योंकि हम पड़े लिखे अमीर लोग है। हमारे toilet को वो नौकर यूज करेंगे तो गंदा कर देंगे ना …भगवान ने हमारा तरीक़ा अलग और उन तमाम नौकर के toilet करने का तरीक़ा अलग बनाया है। तभी तो उन्हें मालिक के घर के बाहर जाकर टॉयलेट करके आना होता है, ये उन्हें खुद पता होता है।
एक क़िस्सा हमारे घर का भी है। आपको toilet की बात निकली है तो मैं उसे आपको बताता हूँ ..बैंगलोर के डॉक्टर मनन लाहोटी ने बोला।


रविवार था उस दिन। घर में कुछ दोस्तों की लंच पार्टी थी।
अचानक हमारी हाउस हेल्प हेमा ( खाना बनाने वाली बाई ) तेज़ी से पाखी ( वाइफ़ ) के पास आई और कुछ बोली धीरे से कान में। और उसने हाँ में इशारा कर दिया, वो लगभग भागते हुए घर से बाहर निकली।
मुझे लगा कोई इमर्जेन्सी होगी तभी वो ऐसे भागी।
उत्सुकता से मैंने पूछा क्या हुआ कोई दिक़्क़त? पर पत्नी ने खाना खाते खाते बोला नहीं बस नीचे गई है जल्दी आ जाएगी कुछ काम था।
थोड़ी देर में ही वो आ भी गई।
उसके बनाए खाने में इतना स्वाद होता था कि जो भी हमारे घर से कुछ भी खा कर जाता वो कितने दिन तक उस स्वाद की तारीफ़ करते थकता नहीं था।
सब दोस्त लोग घर से चले गए और हम भी दोनों आराम से टीवी देख रहे थे तब मैंने पूछा कुछ परेशान दिख रही थी हेमा आज , कोई ज़रूरत हो तो उसकी हेल्प कर देना। ‘आप भी ना कुछ समझते तो हो नहीं और पैसे दे दो, बस ये कर दो बोल देते हो’- पत्नी झल्ला कर बोली।
अरे तो क्या हुआ था जो वो भाग कर गईं नीचे , मैंने पूछा। सब बात आपको बताऊँ ये कोई ज़रूरी नहीं , हम औरतों की बात है आप बीच में मत बोला करो।
अब मुझे भी थोड़ा ग़ुस्सा आ गया था।
इसमें औरत, मर्द की बात कहाँ से आ गई।
हमारे यहाँ सालो से काम करती है , घर के सदस्य जैसी है तो उसकी तकलीफ़ पर चिंता तो होगी ना।
अरे आप भी ना छोटी बात को खींच देते हो, वो भी तैश में आकर बोली।
कुछ नहीं हुआ उसको toilet में जाना था। वो पूछने आई थी की नीचे करके आती हूँ दीदी।
मैंने हाँ कह दी- अब इतनी बात को आपने कितना उलझा दिया।
अरे वो नीचे क्यों गई? हमारे यहाँ 4 toilet हैं- उनको यूज़ कर लेती।
अरे ये लोग हमारे toilet में नहीं जाते हैं। आप भी ना जानते कुछ हो नहीं। हमारी पूरी कालोनी में ये बाई लोग कालोनी के पब्लिक toilet में ही जाते है।
ये क्या बात हुई- हमें दूसरों से क्या लेना देना। हमारा घर है हम अपने हिसाब से रहते हैं।
तुम भी तो रोज़ उसको गर्म खाना खिलाती हो कि नहीं। उसका टिफ़िन भी लाने नहीं देती। तब तुम सोचती हो क्या? जैसा दूसरे लोग सोचते है।

मतलब हद है वो काम वाली बाईं toilet हमारा उपयोग करेगी तो वो गंदा हो जाएगा , है ना ये बात। हमारा स्टैंडर्ड कम हो जाएगा उसके जाने से .,सब लोग यही घटिया तरीक़े से सोचते है तो हम भी ऐसा ही सोचे क्या? काम वाले लोगों को नीचे ही toilet करना होगा , हमारे घर पर उन्हें allow नहीं है कमाल है इस छोटी सोच की।
हम दोनो पती पत्नी में बहस होते होते भयंकर झगड़ा हो गया।
ऐसी तमाम सोच जो हमारे अपने काम वाले लोगों और हम में इतना अपमानजनक भेद करे बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं, मनन बोला।
अगर आज जब दुनिया कहां से कहां निकल गई तब भी इतना हम भारतीय परिवार इतने निम्न स्तर पर जाकर सोचेंगे- भेद करेंगे छोटे-गरीब और नौकर-मालिक में …तो इन महँगे घरों को गिरा देना चाहिए, वो भी तुरंत।
ऐसे तमाम लोगों को ईश्वर इतना सक्षम ही न करे की वो नौकर रख सकें और उन बेचारों का भेदभाव करके अपमान कर सकें। मनन ने अपनी भावना बताई।

यक़ीनन, तभी तो उस मासूम सुरु ने चौकीदार की बेटी संजना के उनके घर का toilet उपयोग कर ले क्या- वाला सवाल पूछा। क्योंकि वो बिना बोले भी जान गईं थी की हम पढ़े लिखे मॉडर्न लोग toilet जाने में भी इतना बड़ा फ़र्क़ करते है तो ज़िन्दगी की रोजाना की बातों में क्या जुल्म, भेद भाव नहीं करते होंगे।
बिटिया सुरु का यह सवाल हम सो कॉल्ड लिटरेट, उच्च वर्गीय, सम्मानित लोगों को इसके जवाब के लिए अपने अपने गिरेबान में झाँकने को मजबूर तो कर ही देगा। अगर आप भी अपने घर में अपने नौकर, बाई को उनकी ज़रूरत पर toilet यूज करने नहीं देते तो आपका पढ़ा लिखा, सभ्य दिखना महज़ धोखा है society के सामने, और कुछ नहीं।
(सोशल मीडिया से)

बुद्ध का संदेश रेगिस्तानों, समुद्रों और सभ्यताओं से होकर कैसे गुज़रा

आपका अखबार ब्यूरो।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के बृहत्तर भारत और क्षेत्रीय अध्ययन विभाग ने ‘बुद्ध के पदचिह्न’ प्रदर्शनी आयोजित की है। यह प्रदर्शनी बुद्ध के जीवन और एशिया में उनकी शिक्षाओं के दूरगामी प्रभाव की एक चिंतनशील यात्रा प्रस्तुत करती है। ‘बुद्धशासनं चिरं तिष्ठतु’ अर्थात् बुद्ध की शिक्षाएं सिद्धांत चिरस्थायी की शाश्वत आकांक्षा पर आधारित यह प्रदर्शनी सावधानीपूर्वक तैयार किए गए फाइबर मानचित्र को दिखाती है, जो एक वर्ष के शोध और कलात्मक संलग्नता का परिणाम है। इसमें कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धर्थ गौतम द्वारा स्थापित धर्म के भारत और एशिया के विमिन्न क्षेत्रों में प्रसार को दिखाया गया है। यह प्रदर्शनी 15 अगस्त तक जनता के लिए खुली रहेगी।
इस अवसर पर आदरणीय गेशे दोरजी दामदुल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। अन्य विशिष्ट अतिथियों में केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव लिली पांडेय, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, अकादमिक आईबीसी के निदेशक रवींद्र पंत, सेवा इंटरनेशनल के अंतरराष्ट्रीय समन्वयक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद् के महासचिव श्याम परांडे, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के बाल मुकुंद पांडे, आईजीएनसीए की निदेशक डॉ. प्रियंका मिश्रा और आईजीएनसीए के बृहत्तर भारत एवं क्षेत्रीय अध्ययन के प्रमुख प्रो. धर्म चंद चौबे शामिल थे। इस अवसर पर मंगोलिया और वियतनाम के आदरणीय भिक्षु और भिक्षुणियां भी उपस्थित थे।

यह मानचित्र भगवान बुद्ध से जुड़े चार पवित्र स्थलों- लुम्बिनी (जन्मस्थान), बोधगया (ज्ञान प्राप्ति स्थल), सारनाथ (धर्मचक्रप्रवर्तन स्थल) और कुशीनगर (महापरिनिर्वाण स्थल) को केवल भौगोलिक बिंदुओं के रूप में ही नहीं, बल्कि जागृति, आध्यात्मिक संचार और स्मृति के जीवंत स्थलों के रूप में भी सामने लाता है। इसके बाद भगवान बुद्ध के परिभ्रमण स्थलों, जैसे- राजगृह, वैशाली, श्रावस्ती, संकाश्यनगर और मथुरा को दिखाया गया है। भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद सम्राट अशोक ने पाटलिपुत्र में भगवान बुद्ध के उपदेशों के संगठित रूप में प्रकाशन और प्रसारण के निमित्त बौद्ध विद्वानों की एक बड़ी सभा बुलाई थी, जिसमें निर्णय हुआ कि भगवान बुद्ध के चार आर्य सत्यों, उनके पवित्र सिद्धान्तों और उपदेशों को दिक् दिगन्त में प्रसारित करने के लिए धम्म प्रचारकों को विश्व भर में भेजा जाएगा। फलतः इसमें भारत और समस्त एशिया के उन स्थलों को प्रदर्शित किया गया है, जहां-जहां ये धम्म प्रचारक गए और इनके बाद एशिया में कई स्थान, जो आगे चलकर बौद्ध धर्म के बड़े केन्द्र के रूप में उभरे, उनको दिखाया गया है। यह मथुरा, गांधार, खोतान, लुओयांग, दुनहुआंग, यांगून, अंगकोर वाट, बोरोबुदुर और उसके आगे के क्षेत्रों से होते हुए धर्म की यात्रा का पता लगाता है और इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे बुद्ध का संदेश रेगिस्तानों, समुद्रों और सभ्यताओं से होकर गुज़रा, भिक्षुओं, तीर्थयात्रियों, विद्वानों और दूतों द्वारा पहुँचाया गया, जिनके प्रयासों ने एशिया के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक ताने-बाने को आकार दिया। यह प्रदर्शनी 15 अगस्त तक जनता के लिए खुली रहेगी।
इस अवसर पर बोलते हुए आदरणीय गेशे दोरजी दामदुल ने कहा कि बुद्ध के संदेश को दुनिया तक पहुंचाने की बात करना ही पर्याप्त नहीं है, हमें पहले इसे अपने भीतर आत्मसात करना होगा। उन्होंने कहा कि करुणा को बाहर फैलाने से पहले, हमें यह पूछना चाहिए- क्या मैं खुश हूं, क्या मेरा परिवार खुश है? यदि घर में करुणा नहीं है, तो कोई भी बाहरी प्रयास धर्म के सच्चे सार को नहीं पहुंचा सकता। परम पावन दलाई लामा की 90वीं जयंती के उपलक्ष्य में और इस वर्ष को करुणा वर्ष के रूप में मनाते हुए उन्होंने सभी से अपने हृदय और घरों में करुणा का विकास करने का आग्रह किया।

लिली पांडेय ने कहा कि यह भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवपूर्ण क्षण है। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि एक उल्लेखनीय घटनाक्रम में, अंतरराष्ट्रीय नीलामी में प्राप्त बुद्ध के पवित्र अवशेषों (पिपरहवा अवशेष) को, सांस्कृतिक कलाकृतियों की वापसी के माननीय प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण के अनुरूप, सम्मानपूर्वक भारत वापस लाया गया है। उन्होंने कहा, “हम एक बड़ी प्रदर्शनी की दिशा में काम कर रहे हैं, जो इन पवित्र अवशेषों को आईजीएनसीए के मानचित्र मॉडल के साथ प्रदर्शित करेगी, जो बौद्ध धर्म के वैश्विक प्रसार को दर्शाता है।” उन्होंने कहा कि यह पहल भगवान बुद्ध के शाश्वत संदेश- शांति, करुणा और संवाद के प्रति भारत की स्थायी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

इस अवसर पर डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की वापसी और प्रदर्शनी का एक साथ उद्घाटन अत्यंत आनंद का क्षण होगा, सोने पर सुहागा की तरह। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शनी विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए बनाई गई है। उन्होंने संस्थानों, स्कूलों और कॉलेजों से आग्रह किया कि वे इसे देखें और जानें कि शांति, सुख और करुणा का भगवान बुद्ध का संदेश एक समय में विभिन्न सभ्यताओं में कैसे फैला और आज भी इसकी प्रासंगिकता कितनी गहरी है।

इससे पूर्व प्रदर्शनी के बारे में बताते हुए प्रो. धर्मचंद चौबे ने कहा कि यह प्रदर्शनी राजकुमार सिद्धार्थ के बुद्ध में रूपांतरण और उनकी शिक्षाओं के दूरगामी प्रसार का एक सम्मोहक दृश्य आख्यान प्रस्तुत करती है। यह मानचित्र दर्शाता है कि कैसे भिक्षुओं और विद्वानों की भक्ति के माध्यम से धर्म भारत से आगे तक पहुंचा। उन्होंने कहा कि यह केवल एक मानचित्र प्रदर्शनी नहीं है, बल्कि उन लोगों के प्रति श्रद्धांजलि है जिन्होंने बुद्ध के संदेश को पूरे एशिया में पहुंचाया। साथ ही नैतिकता, विज्ञान, कला और ज्ञान प्रणालियों में भारत की सभ्यतागत समृद्धि को भी पहुंचाया, जिसने सांस्कृतिक रूप से भारतीयकृत एशिया को आकार देने में मदद की।

इस अवसर पर अन्य अतिथियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। अंत में डॉ. अजय मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस प्रदर्शनी के माध्यम से, आईजीएनसीए एक बार फिर विश्वमित्र के रूप में भारत की भूमिका की पुष्टि करता है और हमारे समय में चिंतन, एकता और वैश्विक सद्भाव के मार्गदर्शक के रूप में बुद्ध के चिरस्थायी ज्ञान को प्रस्तुत करता है।

लगता था अमेरिकी वायुसेना के विमानों को खाड़ी में गिराकर ही मानेगा चीन

के. विक्रम राव।

अमेरिकी राजनेता श्रीमती नैंसी पेट्रीशिया पेलोसी की 2 अगस्त की रात ताईवान की यात्रा के विरोध में जिस भांति कम्युनिष्ट चीन चिंघाड रहा था, यकीन हो चला था कि अमेरिकी वायुसेना के विमानों को खाड़ी में गिराकर ही चीन मानेगा। पेलोसी का शव लहरों में खोजना होगा। रात ढले भारत के कई खबरिया चैनल तो यह दिखा रहे थे कि एशिया का ‘यूक्रेन’ यह ताईवान बन जायेगा। मगर हुआ क्या? लाल चीन की दहाड़ महज घुड़की थी। मिमियाने का स्वर तक सुनायी नहीं पड़ा। लद्दाख में लाल सेना के तेवर से जाहिर हो गया था कि चीन अब कागजी शेर मात्र है। क्या कर पाया?

प्रतिरोध में ताईवान को उसने बालू का निर्यात रोक दिया। समुद्री खाद्य पदार्थ के आयात को बंद कर दिया। यही कारण था कि चीन की मुद्रा ‘येन’ के दाम दुनिया के बाजार में बुरी तरह ढा गये।

पेलोसी है कौन

तो यह पेलोसी है कौन? यह 82-वर्षीया रणबांकुरी अमेरिका के संसद (लोकसभा) की स्पीकर है (श्री ओम बिडला जैसी)। अमेरिकी केे संविधान में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के बाद तीसरे नंबर पर है। तेज तर्रार हैं। प्राणपण आशंका के बाद भी वे ताईवान गयीं। बिना भय के। जान पर खेल कर। दुनिया को संदेश दे दिया कि मानव भावना को तानाशाही कुचल नहीं सकती। उन्होंने कहा भी कि ताईवान की महिला राष्ट्रपति साई इंग वेन बहुमत से निर्वाचित हुई हैं। पड़ोसी चीन के शीं जिनपिंग जैसी नहीं जो बिना मतदान के आजीवन राष्ट्रपति बने बैठे हैं।

इधर रात बीत गयी एक गोला तक नहीं दगा। पेलोसी के एक खरोच तक नहीं लगी। राजधानी ताइपै का अंतरराष्ट्रीय विमानपतनम सोंगशान रात भर जगमगाता रहा। वहां से राष्ट्रपति आवास तक हजारों ताईवानवासी राजमार्ग पर इस अमेरिकी नेता के स्वागत में झण्डा तथा पुष्प बरसाते रहे। दाद देनी पड़ेगी ताईवान की राष्ट्रपति सायी-इंग वेन की- जो निडर होकर लाल चीन का डटकर सामना करने पर तत्पर थीं। उनकी सखा पेलोसी पहले ही ऐलान कर चुकीं थीं कि ताईवान अकेला नहीं है। वह जनतंत्र का प्रतीक है। अधिनायकवादी चीन केे मुकाबले में डटा हुआ है। अमेरिका लोकतंत्र के साथ में है। ताईवान के साथ खड़ा है।

लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता अलोकतांत्रिक देश

तुर्रा यह कि बिना मतदान के चुनाव कराने वाले कम्युनिष्ट चीन का आदेश है कि ताईवान में ठगी, दमन और बल से चुनाव में धांधली कर वे राष्ट्रपति बनी हैं। जबकि दो प्रत्याशियों में ताईवान के गत निर्वाचन में वोट पड़े। करीब 57 प्रतिशत वोट पाया सायी इंग वेन ने। उनकी हरीफ खान ग्वो (कोमिनतांग पार्टी) को 38 प्रतिशत वोट मिले। उन्हें पराजित कर वे दोबारा चुनाव जीतीं। चीन में तो एक ही दल (कम्युनिष्ट पार्टी) नामांकन कराता है। मतदान से तो आम चीनी वोटर अनभिज्ञ ही है।

व्यापक सोच की राजनेता

अब इस वीरांगना पेलोसी पर कुछ। शौर्य और आत्मबल की वे अथाह भण्डार है। वह जब मात्र 12 वर्ष की थी तो राष्ट्रपति जान कैनेडी के साथ टीवी पर आयी। तभी उसने डेमोक्रेटिक पार्टी से संबद्ध होने का निर्णय किया था। विधि की छात्रा रहीं पेलोसी धर्म से रोमन कैथोलिक है। पर गर्भपात पर पाबंदी लगाने की उन्होंने भर्त्सना की थी। प्रतिद्वंदी रिपब्लिकन पार्टी की वे तीव्र आलोचक हैं। उनहोंने ‘निकम्मे राष्ट्रपति’ डोनाल्ड ट्रंप पर महाभियोग का मुकदमा चलाने की मांग की थी। जब राष्ट्रपति का अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में अभिभाषण हो रहा था, तो मंच पर ही राष्ट्रपति ट्रंप के मुद्रित भाषण को फाड कर सदन में ही पेलोसी ने फेंक दिया था। रोष दिखाया था। ईराक पर जार्ज बुश के हमले का खुलकर विरोध किया था। जब संविधान संशोधन आया कि ध्वजा जलाना निषिद्ध हो तो पेलसी की मान्यता रही कि जनाक्रोश करने का यह अहिंसक माध्यम है। वे धार्मिक प्रतीकों की सार्वजनिक नुमाइश की विरोधी रहीं हैं। वे दलाईलामा और तिब्बती आजादी की पैरोकार रही हैं। धर्मशाला नगर (हिमाचल प्रदेश) गयी भी थीं। वे अमेरिका का क्यूबा से संबंध सुधारने की हिमायती रहीं। वैचारिक रूप से पेलोसी काफी जनोन्मुखी और व्यापक सोच की राजनेता हैं। इसीलिये उन्हें भारतमित्र कहते हैं।

लगता था अमेरिकी वायुसेना के विमानों को खाड़ी में गिराकर ही मानेगा चीन

भारत में निवेश करना चाहता है ताईवान

अब ताईवान के बारे में। आखिर ताईवान आज भारत के समीपस्थ समुद्री क्षेत्र में युद्ध का कारण कैसे बन रहा है? तो पहले उस भूगोल को देंखे। उत्तरी और दक्षिणी चीन की खाड़ियों के बीच बसा ताइवान द्वीप जलडमरूमध्य है। चीन के सागर तट से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर पर स्थित ताइवान द्वीप समूह आकार, मौसम और विकास की दृष्टि से गुजरात सीखा है। पहाड़ियों से घिरे, चौदह हजार वर्ग किलोमीटर में बसा है ताइवान जिसकी आबादी दो करोड़ है। जिसमें आधे श्रमिक वर्ग के हैं। कृषि केवल तीन फीसदी लोग का व्यवसाय है। तीन चौथाई आबादी बौद्ध धर्मावलम्बी है। और ईसाई छह लाख हैं। पुरुषों की औसत आयु 72 वर्ष है तो महिलाओं की उनसे छह साल अधिक है। राजधानी ताइपे की आबादी लखनऊ के बराबर है पर आकार तिगुना है। अगर ताइवान आज विश्व के सर्वाधिक विकसित राष्ट्रों में गिना जाता है तो इसका कारण मुक्त व्यापार और श्रमिकों का योगदान है। विकास दर 5.3 प्रतिशत है तो सकल घरेलू उत्पाद 11.50 खरब रुपये (साढ़े अट्ठाइस अरब डालर) वार्षिक है। उसका वार्षिक मुद्रा भंडार लगभग 96 अरब डालर (चार खरब रुपये) है जिसका वह भारत में निवेश करना चाहता है।

ताइवान की सार्वभौमिकता की उपेक्षा

ताइवान विश्व शांति के लिए चुनौती है। चीन बलपूर्वक उसे हथियाना चाहता है। जो लोग यह तर्क देते हैं कि ‘एक चीन’ नीति के तहत हांगकांग, मकाओ, पुर्तगाली उपनिवेश और ताइवान चीन के ही भू-भाग हैं वे यह नजरंदाज करते हैं कि ताइवान एक स्वाधीन निर्वाचित शासन वाला गणराज्य है जिसकी अपनी (गैर कम्युनिस्ट) विचारधारा है। अपना संविधान, राष्ट्रध्वज और दलीय राजनीतिक प्रणाली है। वह 1895 से चीन से अलग रहा है। हांगकांग की भांति कोई अंतरराष्ट्रीय संधि उस पर लागू नहीं थी कि वह चीन को लौटा दिया जाएगा।

ताइवान के मसले पर विश्व के राष्ट्रों का नजरिया अपने स्वार्थ से प्रभावित रहा है। बस भारत ही एकमात्र अपवाद है। चीन के विशाल बाजार का लोभ इन औद्योगिक राष्ट्रों के लिए इतना मोहक है कि वे ताइवान की सार्वभौमिकता की उपेक्षा कर रहे हैं। अमरीका इसका सबसे बड़ा अपराधी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। आलेख लेखक की वॉल से)