हर आँख नम: ‘ट्रैजेडी किंग’ दिलीप कुमार नहीं रहे, सबको लगा जैसे कोई अपना चला गया

आपका अख़बार ब्यूरो।

बॉलीवुड में ‘ट्रैजेडी किंग’ के नाम से मशहूर दिलीप कुमार (11 दिसंबर 1922 – 7 जुलाई 2021) का लंबी बीमारी के बाद बुधवार की सुबह मुंबई में निधन हो गया।  98 वर्षीय अभिनेता को मंगलवार को हिंदुजा अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पाकिस्तान के पेशावर में जन्मे दिलीप कुमार अपने समय के बेहतरीन अभिनेता माने जाते हैं। त्रासद या दु:खद भूमिकाओं के लिए मशहूर होने के कारण उन्हें ‘ट्रेजिडी किंग’ भी कहा जाता था। दिलीप कुमार ने ‘मुगले आजम’, ‘मधुमती’, ‘देवदास’ और ‘गंगा जमुना’  ‘नया दौर’, ‘राम और श्याम’ जैसी बेहतरीन फिल्में दी हैं। उनकी पहली फिल्म 1944 में आयी ‘ज्वार भाटा’थी। उन्हें आखिरी बार 1998 में आई फिल्म ‘किला’ में देखा गया था। तमाम प्रमुख शख्सियतों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है।

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राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द- उभरते भारत के इतिहास को संक्षेप में प्रस्तुत किया

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दिलीप कुमार ने अपने आप में उभरते भारत के इतिहास को संक्षेप में प्रस्तुत किया। अभिनेता के आकर्षण ने सभी सीमाओं को पार कर दिया और उन्हें पूरा उपमहाद्वीप प्यार करता था। उनके निधन से एक युग का अंत हो गया है। दिलीप साहब भारत के दिल में हमेशा जिंदा रहेंगे। परिवार और उनके अनगिनत प्रशंसकों के प्रति संवेदना।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी- हमारी सांस्कृतिक दुनिया के लिए एक क्षति

दिलीप कुमार को सिनेमा के लीजेंड के रूप में हमेशा याद किया जाएगा। उन्हें अद्वितीय प्रतिभा का आशीर्वाद प्राप्त था, जिसके कारण कई पीढ़ियों के दर्शक उन्हें देख मंत्रमुग्ध रहते थे। उनका जाना हमारी सांस्कृतिक दुनिया के लिए एक क्षति है। उनके परिवार, दोस्तों और असंख्य प्रशंसकों के प्रति संवेदना। श्रद्धांजलि।

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह– मुझे इस महान अभिनेता से बातचीत का सौभाग्य मिला

मैं दिलीप कुमार जी से व्यक्तिगत रूप से तब मिला था, जब मैं उन्हें पद्म विभूषण सम्मान देने के लिए मुंबई गया था। वह मेरे लिए विशेष क्षण थे, जब मुझे इस महान अभिनेता के साथ बातचीत करने का सौभाग्य मिला था। उनका निधन भारतीय सिनेमा के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके परिवार, दोस्तों और प्रशंसकों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना। दिलीप कुमार जी एक उत्कृष्ट अभिनेता, एक सच्चे रंगकर्मी थे, जिन्हें भारतीय फिल्म उद्योग में उनके अनुकरणीय योगदान के लिए सभी ने खूब सराहा। गंगा जमुना जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने लाखों सिनेप्रेमियों को प्रभावित किया। उनके निधन से मुझे गहरा दुख हुआ है।

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मनोज कुमार- आज भी लोग कहते हैं मैं दिलीप साहब की कॉपी करता हूँ

अपनी ज़िंदगी की पहली फ़िल्म दिलीप साहब की देखी थी और उनका फ़ैन हो गया था। फ़िल्मों में काम करने लगा तो मीडिया ने कहना शुरू कर दिया था कि मैं दिलीप साहब की कॉपी करता हूँ। ये बात आज भी लोग कहते हैं तो मुझे बुरा नहीं लगता। फ़िल्म क्रांति में दिलीप साहब के साथ बतौर निर्देशक और अभिनेता काम किया। शूटिंग के दौरान उन्होंने कभी महसूस नहीं होने दिया कि तुम मेरी फ़िल्म देख अभिनेता बने, फ़िल्मों में आए और मुझे तेरी बात सुननी पड़ेगी।

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धर्मेंद्र- उन्होंने मुझे सीने से लगाकर कहा हाँ, धरम हम भाई ही हैं

दिलीप साहब को पहली बार स्क्रीन पर देखते ही ऐसा महसूस हुआ जैसे वो मेरे भाई हैं। उनसे मिलने के लिए मेरे दिल में एक तड़प थी। अक्सर इस कोशिश में रहता था कि उनसे कब मिलूं। जब पहली बार मुलाक़ात हुई तब मैंने उनसे कहा था कि हम पैदा तो दो माँ की कोख से हुए हैं लेकिन मुझे लगता है हम भाई हैं। ये सुनने के बाद उन्होंने मुझे अपने सीने से लगाकर कहा हाँ, धरम हम भाई ही हैं।

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रणबीर कपूर- दिलीप साहब और राज साहब की दोस्ती

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उस दौर में अभिनेताओं के बीच बहुत प्रेम हुआ करता था। दिलीप साहब और राज साहब की दोस्ती की कई तस्वीरें आज भी मेरे मोबाइल में हैं। मैंने एक डॉक्यूमेंट्री देखी थी जिसमें सब एक साथ रूस गए थे। समकालीन कलाकार होने के बावजूद भी उनमें बहुत प्यार था। एक दूसरे के लिए बहुत इज़्ज़त थी। कभी एक दूसरे के लिए ईर्ष्या की भावना नहीं थी। एक साल राज साहब बहुत बड़ी हिट फ़िल्म देते थे तो एक साल दिलीप कुमार साहब और देवानंद साहब।

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अमिताभ बच्चन- एक संस्था चली गई…

एक संस्था चली गई… भारतीय सिनेमा का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, वह हमेशा ‘दिलीप कुमार से पहले और दिलीप कुमार के बाद’ लिखा जाएगा। उनकी आत्मा की शांति के लिए मेरी दुआएं और परिवार को इस दर्द को सहन करने की शक्ति मिले।

अनिल कपूर- ख़ुशनसीब हूँ उनके साथ तीन फ़िल्म करने का मौक़ा दिया

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मैं अपने आपको बहुत ख़ुशनसीब मानता हूँ दिलीप साहब के साथ राज कपूर साहब ने एक फ़िल्म की, अमिताभ बच्चन ने एक फिल्म की लेकिन किस्मत ने मुझे उनके साथ तीन-तीन फ़िल्म करने का मौक़ा दिया। पहली शक्ति, जिसमें मैं तीसरा हीरो था, बहुत छोटा रोल था। उसके बाद मशाल और फिर कर्मा। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। वो हमेशा मेरे गुरु रहेंगे.”

Film History Pics on Twitter: "Anil Kapoor, Waheeda Rehman and Dilip Kumar in MASHAAL : released 36 years ago in 1984. Yash Chopra's film written by Javed Akhtar - based on Marathi

कमल हासन- कोई इंसान ऐसा कैसे कर लेता है

मुझे शिवाजी गणेशन साहब के अलावा अगर किसी ने एक्टिंग सिखाई है तो वो यूसुफ़ साहब ही हैं। मैं अब भी उनकी एक्टिंग देखकर चकित रह जाता हूँ कि कोई इंसान ऐसा कैसे कर लेता है।

Kamal Haasan Talks About Dilip Kumar And His Favourite Actress - YouTube


बंगाल में फिर चुनाव में सुलगी हिंसा की आग, केंद्रीय मंत्री की कार पर हमला

अब तक पिछले 8 दिन में 5 की मौत।

18, 7, और 16… ये आपको भले नंबर लग रहा हो, लेकिन यह संख्या है पश्चिम बंगाल में पिछले 3 पंचायत चुनाव में मारे गए लोगों की। बंगाल में इस बार भी नामांकन शुरू होने के साथ ही पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा भड़क उठी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तक पिछले 8 दिन में 5 लोगों की हत्या हो चुकी है, जबकि 90 लोग घायल हुए हैं। हिंसक झड़प की 30 से अधिक घटनाएं हो चुकी है।  विपक्षी पार्टी हिंसा के लिए सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रही है।

 

शनिवार को कूचबिहार में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री निशिथ प्रमाणिक की कार पर उपद्रवियों ने तीर से हमला किया। राज्य में हिंसक घटनाओं को देखते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने सेंट्रल फोर्स बुलाने का आदेश दिया है। हिंसा और सेंट्रल फोर्स की निगरानी में चुनाव बंगाल के लिए नया नहीं है। पिछले 5 दशक से बंगाल का चुनाव रक्तरंजित रहा है। इस स्टोरी में सियासत में जलते भद्रलोक की कहानी को जानते हैं…

राजनीतिक हिंसा में कितनी मौतें?

लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक सवाल के जवाब में बताया कि 2019 में बंगाल में राजनीतिक हत्या से जुड़े 12 केस दर्ज किए गए, जबकि 13 परिवार इससे प्रभावित हुए। 2018 में भी यह आंकड़ा 12 और 13 का ही था।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2018 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 2018 में बंगाल में 12 हत्याएं हुईं हैं। उसी रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 1999 से 2016 के बीच पश्चिम बंगाल में हर साल औसतन 20 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं। इनमें सबसे ज्यादा 50 हत्याएं 2009 में हुईं।

बंगाल को बदनाम करने की बात कहकर 2019 से ममता बनर्जी ने एनसीआरबी को डेटा देना बंद कर दिया। 2021 में बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद भड़की हिंसा में करीब 13 लोगों की मौत हो गई। हाईकोर्ट ने पूरे मामले को लेकर सीबीआई जांच का आदेश दिया था।

बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास

पीएस बनर्जी अपने शोध लोग, शक्ति और राजनीति हिंसा में लिखते हैं- बंगाल में गन और बम कल्चर की शुरुआत 1967 में शुरू हुई। प्रभुत्व को लेकर उस वक्त कांग्रेस और वाम दल के कार्यकर्ता की बीच झड़प शुरू हुई थी। झड़प के दौरान पूर्वी वर्दमान के में एक कांग्रेस कार्यकर्ता की हत्या हो गई।  इसके कुछ महीने बाद वाम मोर्चे में शामिल ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के अध्यक्ष हेमंत बसु की कोलकाता में गोली मारकर हत्या कर दी गई। 1977 के बाद राजनीतिक हिंसा में तेजी आई। इसी साल बंगाल में पहली बार पंचायत चुनाव कराया गया था।

1979 के अंत में मरीचझापी नरसंहार हुआ। 1982 आनंद मार्ग के 13 लोगों को गोलियों से भून दिया गया। इसका आरोप बंगाल पुलिस पर ही लगी। 2000 में बीरभूम के एक गांव में 13 मुसलमानों को पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। यह भी राजनीति से जुड़ा मामला था।

बंगाल में सीपीएम सरकार को तृणमूल चुनौती देने लगी, जिसके बाद हिंसक घटनाओं में इजाफा होने लगा। सीपीएम सत्ता के अंतिम सालों में राजनीतिक हिंसा में बड़ी तादाद में लोग मारे गए। 2009 में 50, 2010 और 2011 में 38-38 लोगों की मौत हुई। 2011 में 34 की वाम सत्ता को ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल और कांग्रेस गठबंधन ने उखाड़ फेंका। ममता सरकार के दौरान आधिकारिक आंकड़ों में जरूर कमी आई, लेकिन राजनीतिक हिंसा पूरी तरह कंट्रोल नहीं हो पाया।

क्यों बार-बार भड़क उठती है राजनीतिक हिंसा?

सवाल उठता है कि भद्रलोक के नाम से प्रसिद्ध बंगाल आखिर बार-बार हिंसा की आग में क्यों जलने लगती है? हाल ही में एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर उर्सुला डैक्सेकर और ओसलो पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के हैन फेजेल्डे ने इस पर 37 पन्नों का एक शोध किया है। शोध के मुताबिक चुनाव के दौरान हिंसा की मुख्य वजहें प्रभुत्व की लड़ाई और राजनीतिक जागरूकता है। उर्सुला डैक्सेकर लिखते हैं- बंगाल में हिंसा तब चरम पर होती है, जब सत्ताधारी पार्टी को कोई दल चुनौती देता है। डैक्सेकर इसके पीछे 2009-2011 और 2018 से 2021 में हुई हिंसा का डेटा को प्रस्तुत करते हैं।

उनके मुताबिक बंगाल में जब-जब हिंसक घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है, तब-तब सत्ताधारी दलों के सामने नई विपक्षी पार्टियां चुनौती बनकर सामने आई है। 2009-11 में राजनीतिक हत्याओं के मामले बढ़े तो तृणमूल की सीटें बढ़ गई और सीपीएम सत्ता से बाहर चली गई। इसी तरह 2018-21 में राजनीतिक हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई। इस दौरान राज्य में बीजेपी की सीटों में जबरदस्त इजाफा हुआ। लोकसभा में बीजेपी 1 से 18 और विधानसभा में 3 से 77 पर पहुंच गई।

राजनीतिक जागरूकता को भी हिंसा की बड़ी वजह बताते हुए डैक्सेकर और फेजेल्डे लिखते हैं- राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को जब यह आभास होता है कि निष्पक्ष तरीके से चुनाव नहीं हो रहा है, तो संघर्ष बढ़ जाता है। यही संघर्ष कई बार हिंसक घटनाओं में तब्दील हो जाता है।  साल 2021 में विधानसभा चुनाव के दौरान में कूचबिहार के सीतलकुची में मतदान ठीक से नहीं कराए जाने को लेकर तृणमूल और बीजेपी में झड़प हो गई थी, जिसके बाद सीआईएसएफ ने फायरिंग कर दी। इस फायरिंग में 4 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई।

एक और मुख्य वजह जमीनी स्तर पर काम कर रहे सिंडिकेट भी है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक बंगाल में सिंडिकेट के जरिए ही गांव स्तर पर सारे कारोबार संचालित किए जाते हैं। इन सिंडिकेटों को सत्ता का शह मिला होता है।  इन्हीं सिंडिकेटों के जरिए राजनीतिक दल जमीन पर अपनी मजबूती बनाए रखती है। ऐसे में चुनाव के दौरान सिंडिकेट किसी भी तरह से अपना वर्चस्व खत्म नहीं करना चाहता है और सत्ता के लिए पूरी ताकत झोंक देता है। (एएमएपी)

गीता प्रेस में कोई आर्थिक संकट नहीं, न बनें धोखाधड़ी का शिकार

अफवाह फैलाने वाले गीता प्रेस के नाम से चंदा इकट्ठा कर अपनी जेबें भर रहे

डॉ. संतोष कुमार तिवारी।

गीता प्रेस बंद होने नहीं जा रहा है। उस पर कोई आर्थिक संकट नहीं है। सोशल मीडिया पर बहुधा आपने अफवाह फैलाने वाली एक अपील देखी होगी।


अफवाह फैलाने वाली अपील

दुखद समाचार

गीता प्रेस गोरखपुर बंद होने वाला है।

Geeta Press Gorakhpur, Murlipura - Book Shops in Jaipur - Justdial

गीता प्रेस अपने कर्मचारियों को वेतन भी देने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि वे सनातन धर्म की सभी पुस्तकें बिना किसी लाभ के बेचते हैं।  अगर गीता प्रेस बंद हो जाती है तो यह हिंदू धर्म के लिए बहुत बड़ी क्षति होगी।  हमें 10 रुपये से कम की चाय भी नहीं मिल सकती है, लेकिन आप हनुमान चालीसा 1 या 2 रुपये में प्राप्त कर सकते हैं।

यदि आप वास्तव में हिंदू धर्म को बचाने में रुचि रखते हैं, तो इसे 20 लोगों तक फॉरवर्ड करें, ताकि गीता प्रेस को बंद न किया जा सके!

कृपया इसे फॉरवर्ड करें।

क्यों फैलाई जाती है गीता प्रेस बंद होने  की अफवाह

इस प्रकार की अपील करने वाले वास्तव में धोखेबाज लोग हैं। और जो लोग इस अपील को फारवर्ड करते हैं, वे अनजाने में इस प्रकार की धोखाधड़ी को बढ़ावा देते हैं।

प्रारम्भ से ही गीता प्रेस की यह नीति रही है कि वह किसी से कोई दान स्वीकार नहीं करता है। गीता प्रेस बंद होने की अफवाहें इसलिए फैलाई जाती हैं, क्योंकि यह अफवाह फैलाने वाले लोग बाद में गीता प्रेस के नाम से चंदा इकट्ठा करते हैं और अपनी जेबें भरते हैं।

आज गीता प्रेस भारत की ही नहीं, विश्व की एक अग्रणी प्रकाशन संस्था है। यहां से प्रतिदिन कोई 50 हजार पुस्तकें छप कर बाजार में आती हैं। लगभग दो सौ कर्मचारी यहां काम करते हैं।


यहां की व्यवस्था अद्भुत

पिछले दिनों गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब के आयोजन में जब गोरखपुर जाना हुआ तो गीता प्रेस जाने का भी अवसर पत्रकार मित्र राहुल देव के साथ मिला। गीता प्रेस अपने आप में इतिहास है और गर्व का क्षण भी। यहां की व्यवस्था अद्भुत है ।लगभग 100 वर्ष से गीता प्रेस का काम अनवरत चल रहा है और यह संस्था हम सबको सनातन धर्म की पुस्तकें ही नहीं प्रेरक और शिक्षा दायक पुस्तकें भी कम से कम दामों में उच्च क्वालिटी के साथ उपलब्ध कराता रहा है , वो भी बिना दान और अनुदान के। बस शायद जरूरत इस बात की है कि गीता प्रेस की पहुंच युवाओं और बच्चों में भी ठीक तरह से हो ताकि वे भी धर्म और समाज को समझ सकें। गीता प्रेस इस मामले में कितना आगे बढ़ कर के जाता है, हम सबको इसकी प्रतीक्षा रहेगी।

अकु श्रीवास्तव
सम्पादक- नवोदय टाइम्स, नयी दिल्ली।


 

इस दुष्प्रचार के आधार पर कुछ  लोग देश और विदेश में गीता प्रेस के नाम पर चंदा उगाही करके अपनी जेबें में भर रहे हैं।

गीताप्रेस के खिलाफ चलाये जा रहे दुष्प्रचार अभियान का सिलसिला पुराना है। 2016-17 में भी ऐसी अफवाहें जोरों पर थीं। तब सन् 2017 में गीता प्रेस ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा: “गीता प्रेस में कोई आर्थिक संकट नहीं है। संस्थान सुचारू रूप से कार्यरत है। भारत में संस्थान के बीस विक्रय केंद्र कार्यरत हैं । इसके अतिरिक्त स्टेशन स्टालों स्थानों की श्रंखला भी कार्यरत है। …गीता प्रेस द्वारा कभी भी आर्थिक सहायता न तो मांगी गई है और न ही स्वीकार की जाती है।”

विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि यदि कोई गीता प्रेस के नाम पर धन संग्रह करता है, तो निश्चित रुप से ऐसे करना ऐसा करने वाला ठगी कर रहा है।

गीता प्रेस बंद होने की अफवाहों के विरुद्ध  वहाँ के प्रशासन ने वर्ष 2020 में एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी। अब सन् 2021 में उन्होंने एक बार फिर फिर विज्ञप्ति जारी की है। फिर भी अफवाह फैलाने वाले अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे।

गीता प्रेस ने 11 करोड़ रुपए की एक पुस्तक-बाइंडिंग मशीन लगाई है। पूरा प्रोजेक्ट 25 करोड़ रुपए का है।

लाभ कमाना नहीं गीता प्रेस का उद्देश्य

Frauds are having close eye on the books of Geeta press - गीता प्रेस की धार्मिक पुस्तकों पर जालसाजों की नजर

गीता प्रेस सस्ते में पुस्तकें इसलिए दे पता है क्योंकि लाभ कमाना उसका उद्देश्य नहीं है। आज गीता प्रेस कोई पंद्रह भाषाओं में सनातन धर्म संबंधी पुस्तकें प्रकाशित कर रहा है। ये भाषाएँ हैं: हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, तमिल, तेलगू, कन्नड, मलयालम, गुजराती, मराठी, बंगला, उड़िया, असमी, गुरुमुखी, नेपाली और उर्दू।

(लेखक झारखण्ड केन्द्रीय विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं)


गीता प्रेस ने सम्मान स्वीकारा लेकिन 1 करोड़ की राशि ठुकराई

गीता प्रेस गोरखपुर को इस बार वर्ष 2021 के गांधी शांति पुरस्कार के लिए चुना गया। संस्कृति मंत्रालय ने इस चयन को लेकर कुछ दिनों पहले ही घोषणा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में विचार-विमर्श के बाद सर्वसम्मति से गीता प्रेस गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार के प्राप्तकर्ता के रूप में चुनने का फैसला किया गया।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार के लिए चुने जाने पर बधाई दी। उन्होंने ट्वीट कर लिखा, ‘गीता प्रेस ने 100 साल में लोगों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन को आगे बढ़ाने की दिशा में काफी सराहनीय काम किया है।’

बता दें कि गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित संस्था या व्यक्ति को एक करोड़ की राशि भी दी जाती है। गीता प्रेस अपनी परंपरा के मुताबिक, किसी भी सम्मान को स्वीकार नहीं करता है। हालांकि, बोर्ड मीटिंग में तय हुआ है कि परंपरा को तोड़ते हुए पुरस्कार स्वीकार किया जाएगा, लेकिन इसके साथ मिलने वाली धनराशि नहीं ली जाएगी।

कांग्रेस ने किया विरोध

इस पुरस्कार की घोषणा होने के बाद कांग्रेस ने इसका विरोध किया है। इसे लेकर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा है कि गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार देना गोडसे और सावरकर को सम्मान देने जैसा है। इस पर बीजेपी ने पलटवार किया है। जयराम रमेश ने ट्वीट कर कहा कि गीता प्रेस गोरखपुर को साल 2021 का गांधी शांति पुरस्कार दिया गया है, जो इस साल अपना अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। अक्षय मुकुल ने इस प्रेस को लेकर 2015 में एक बहुत ही बेहतरीन जीवनी लिखी है, जिसमें उन्होंने महात्मा के साथ इस प्रेस के संबंध, राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक एजेंडे पर चल रहे संघर्ष का जिक्र किया है। गीता प्रेस को पुरस्कार देने का फैसला वास्तव में एक उपहास है और सावरकर-गोडसे को पुरस्कार देने जैसा है।

पुरस्कार राशि नहीं लेगा प्रेस

गांधी पुरस्कार पर चौतरफा राजनीतिक बयानों के तीर चले तो गीता प्रेस ने ये कहकर चौंका दिया कि गांधी पुरस्कार की धनराशि वो नहीं ले रहे हैं। गीता प्रेस के ट्रस्टी देवी दयाल अग्रवाल ने बताया कि ये फैसला किसी दबाव में नहीं लिया गया बल्कि प्रेस की पंरपरा रही है।

‘क्यों कर रहे हैं विरोध?’

वहीं व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए देवी दयाल ने कहा कि विरोध करने वाले ही बताएं कि वह क्यों विरोध कर रहे हैं? अगर सनातन का विरोध हिंदू ही करेगा तो फिर क्या कहेंगे?

गांधी पर कुछ न कहने के सवाल पर देवी दयाल ने कहा कि दरअसल गीता प्रेस ने गांधी पर कई अंक प्रकाशित किए हैं। देवी का ये भी दावा है कि गीता प्रेस के कल्याण पत्रिका के संपादक रहे हनुमान प्रसाद पोद्दार उर्फ भाई जी को भारत रत्न देने का प्रस्ताव तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की ओर से रखा गया तो तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद बल्लभ पंत गोरखपुर में भाई जी से मिलकर भारत रत्न देने का प्रस्ताव रखा तो उन्होने प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।

भाजपा ने कांग्रेस पर साथा निशाना

वहीं भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस पर जमकर भड़ास निकाली। इसके अलावा कांग्रेस के आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि BJP चाहती है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी साबित हो जाए और वही काम कांग्रेस के कुछ नेता जाने अंजाने कर रहे हैं। उन्होंने कहा, मैं नहीं मानता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस बयान से सहमत नहीं हो सकता है। कांग्रेस महत्मा गांधी के पद चिन्हों पर चलने वाली पार्टी है।

सम्मान स्वीकारेंगे लेकिन राशि नहीं

गीता प्रेस गोरखपुर को लागत से कम मूल्य में धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन के लिए जाना जाता है। ऐसा बीते 100 साल से होता आ रहा है। गीता प्रेस गोरखपुर की बोर्ड मीटिंग में तय हुआ है कि इस बार परंपरा को तोड़ते हुए सम्मान स्वीकार किया जाएगा, लेकिन पुरस्कार के साथ मिलने वाली धनराशि नहीं ली जाएगी। जानकारी के मुताबिक, बोर्ड की बैठक में तय हुआ है कि पुरस्कार के साथ मिलने वाली एक करोड़ रुपये की धनराशि गीता प्रेस स्वीकार नहीं करेगा।(एएमएपी)

ओटीटी कंटेट की गुणवत्ता डिजिटल मीडिया आचार संहिता का लक्ष्य : विक्रम सहाय 

आपका अखबार ब्यूरो । 
”डिजिटल मीडिया आचार संहिता 2021 के केंद्र में आम नागरिक हैं। आचार संहिता का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कायम रखते हुए ओटीटी (ओवर-द-टॉप) प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने वाली सामग्री की गुणवत्ता को बनाए रखना है।” यह विचार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव विक्रम सहाय ने नई दिल्ली में बुधवार को भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) द्वारा ‘डिजिटल मीडिया आचार संहिता 2021’ विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान में व्यक्त किए। 

श्री विक्रम सहाय ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल मीडिया की भूमिका काफी बढ़ी है। छह वर्षों में इंटरनेट डेटा का इस्तेमाल 43 गुना तक बढ़ चुका है। भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ ओटीटी मार्केट है। वर्ष 2024 तक इस मार्केट के 28.6% की वार्षिक वृद्धि  के साथ 2.9 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किए जाने वाले कंटेट को लेकर शिकायतें मिल रही थीं, जिसके कारण डिजिटल मीडिया आचार संहिता बनाई गई है।
श्री सहाय ने बताया कि भारत में 35 वर्ष से कम आयु के लोग ऑनलाइन समाचार पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान इन न्यूज वेबसाइ्टस पर लोग 41% ज्यादा समय व्यतीत कर रहे हैं। श्री सहाय ने कहा कि समाचार पत्रों के लिए भारतीय प्रेस परिषद और टीवी न्यूज के के लिए केबल टीवी नेटवर्क अधिनियम, 1995 जैसे कंटेंट रेगुलेटर्स हैं, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर समाचारों के लिए ऐसा कोई विनियमन नहीं है। ओटीटी के मामले में भी कुछ ऐसा ही है।
संयुक्त सचिव ने स्पष्ट किया कि डिजिटल मीडिया आचार संहिता का उद्देश्य महिलाओं के लिए आपत्तिजनक एवं बच्चों के लिए हानिकारक सामग्री के प्रसारण पर अंकुश लगाना है। इसके लिए समाचार प्रकाशकों, ओटीटी प्लेटफॉर्म और कार्यक्रम प्रसारकों को अपने यहां एक शिकायत निवारण अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी और इन शिकायतों की जानकारी भी प्रदर्शित करनी होगी। समाचार प्रकाशकों को एक नियामक संस्था का सदस्य भी बनना होगा, ताकि कार्यक्रम से संबंधित शिकायतों का निपटारा हो सके। इसके अलावा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय एक अंतर-मंत्रालय समिति का गठन करेगा, जो समाचार प्रकाशक या नियामक संस्था द्वारा न सुलझाई गई शिकायतों का निपटारा करेगी।
श्री सहाय ने बताया कि अब तक लगभग 1800 समाचार प्रकाशकों ने मंत्रालय को अपने बारे में सूचना दी है। मंत्रालय किसी भी न्यूज पोर्टल या ओटीटी प्लेटफॉर्म का पंजीकरण नहीं कर रहा है, बल्कि इनके बारे में जानकारी जुटाने का उद्देश्य यह है कि कार्यक्रम के बारे में कोई शिकायत मिलने पर उनसे संपर्क किया जा सके। उन्होंने कहा कि आचार संहिता का उद्देश्य समाचार प्रकाशकों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को उन नियमों के बारे में जागरुक करना है, जिनके पालन से देश की एकता, अखंडता एवं सौहार्द कायम रह सके।
कार्यक्रम में संस्थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, अपर महानिदेशक के. सतीश नंबूदिरपाड, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति प्रो. बलदेव भाई शर्मा एवं आईआईएमसी के डीन (अकादमिक) प्रो. गोविंद सिंह विशेष तौर पर उपस्थिति थे।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. संगीता प्रणवेंद्र ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन आउटरीच विभाग के अध्यक्ष प्रो. प्रमोद कुमार ने किया। इस विशेष व्याख्यान में भारतीय जन संचार संस्थान के सभी केंद्रों के प्राध्यापकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों सहित देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के मीडिया शिक्षकों, पत्रकारों एवं बुद्धिजीवियों ने भी हिस्सा लिया।

दिल्ली-मुंबई में एक साथ दस्‍तक देगा मानसून, भारी बारिश का अलर्ट

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल मानसून में असामान्य बदलाव देखने को मिला है। जिसकी वजह से राजधानी दिल्ली और मुंबई में मानसून एक साथ पहुंचा है। आमतौर पर मुंबई में मानसून जल्दी पहुंच जाता है लेकिन इस साल अरब सागर में मानसून के कमजोर पड़ने के चलते दिल्ली और मुंबई में मानसून लगभग एक साथ पहुंचा है।

इस साल मानसून में दिखा बड़ा बदलाव

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, आमतौर पर दक्षिण पश्चिम मानसून की शुरुआत दक्षिण से होती है और मानसून पहले केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक से होता हुआ महाराष्ट्र पहुंचता है। इस तरह मानसून की शुरुआत में पहले दक्षिण के राज्यों में बारिश होती है और फिर मानसून देश के अन्य हिस्सों में पहुंचता है। हालांकि इस साल देखा गया है कि मानसून पहले पूर्वी राज्यों में पहुंच गया है और उसके बाद दक्षिण के राज्यों में पहुंचा है। हालांकि अब मानसून तेजी से बढ़ रहा है और अगले 48 घंटे तक मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के साथ ही जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड पहुंच जाएगा।

यह है असामान्य मानसून की वजह

मौसम विज्ञानियों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि चक्रवाती तूफान बिपरजॉय की वजह से इस साल मानसून असामान्य रहा। बता दें कि बिपरजॉय तूफान 15 जून को गुजरात के तट से टकराया था। बिपरजॉय की वजह से पश्चिमी  तट पर मानसून के आगे बढ़ने की रफ्तार धीमी हुई। मौसम विज्ञानी कहते हैं कि भारत में मानसून दो दिशाओं से देश को कवर करता है। एक अरब सागर से देश के पश्चिमी हिस्सों को और दूसरा बंगाल की खाड़ी से देश के पूर्वी हिस्सों को। इस साल बिपरजॉय की वजह से अरब सागर से पश्चिमी राज्यों में पहुंचने वाला मानसून देरी से पहुंचा। वहीं बंगाल की खाड़ी से बनने वाला मानसून समय से पूर्वी राज्यों में पहुंच गया। यही वजह रही कि इस साल मानसून असामान्य रहा और पूर्वी राज्यों में पहले बारिश हुई।

दिल्ली में बारिश का यलो अलर्ट जारी

मानसून महाराष्ट्र पहुंच चुका है और अगले 48 घंटे में पूरे देश में पहुंच जाएगा। इसके चलते दिल्ली में सोमवार और मंगलवार को बारिश को लेकर यलो अलर्ट जारी किया गया है। इस दौरान हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है। दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में रविवार को भी बारिश हुई है। अगले कुछ दिनों तक दिल्ली एनसीआर और आसपास के राज्यों में बारिश का दौर जारी रह सकता है।

मुंबई में भारी बारिश, दो की मौत

मानसून की आमद के साथ ही मुंबई में शनिवार को भारी बारिश हुई, जिससे जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ। भारी बारिश के चलते मुंबई को गोवंडी इलाके में दो लोग नाले में बह गए, जिससे उनकी मौत हो गई।  मुंबई में कई जगह पेड़ गिरने और शॉर्ट सर्किट की भी घटनाएं हुई हैं। चेंबूर इलाके में 80 मिलीमीटर बारिश हुई। वहीं  विक्रोली में 79 मिमी, सायन में 61 मिमी, घाटकोपर में 61 मिमी, माटुंगा में 61 मिमी बारिश हुई। अंधेरी सबवे में पानी भर जाने के चलते यातायात प्रभावित हुआ। कई इलाकों में जल जमाव से भी लोगों को परेशानी हुई।(एएमएपी)

बहुत कठिन डगर है रहाणे की

राजीव रंजन।

भारत के पास 13 साल बाद इंग्लैंड में सीरीज जीतने का सुनहरा मौका था ओवल में भारत की जबर्दस्त जीत के बाद 10 सितंबर से मैनचेस्टर ओल्ड ट्रेफर्ड मैदान में होने वाले टेस्ट से पहले मेजबान इंग्लैंड भारी मनोवैज्ञानिक दबाव में था। लेकिन पहले भारतीय कोच रवि शास्त्री, गेंदबाजी कोच भरत अरुण और फील्डिंग कोच आर. श्रीधर और उसके बाद असिस्टेंट फिजियो योगेश परमार के कोरोना पॉजिटिव हो जाने की वजह से ये टेस्ट मैच रद्द हो गया। भारत के 2-1 से आगे होने का बावजूद सीरीज का परिणाम इसके पक्ष में नहीं है, क्योंकि भारतीय खिलाड़ियों ने ही कोरोना के डर से पांचवां टेस्ट खेलने से मना कर दिया था। सीरीज का पांचवां टेस्ट आगे कभी होगा या नहीं, सीरीज को ड्रॉ माना जाएगा या भारत के पक्ष में, इसको लेकर अभी कुछ भी साफ नहीं है। भारत और इंग्लैंड के क्रिकेट बोर्ड इस मसले को सुलझाने में लगे हैं। यह इस बात की संभावना जताई जा रही है कि अगले साल जुलाई में तीन वनडे और तीन टी-20 मैचों की सीरीज खेलने इंग्लैंड जाएगी, तो उस दौरे में एक टेस्ट मैच भी आयोजित किया जा सकता है। हालांकि बीसीसीआई के अध्यक्ष सौरव गांगुली ने अपनी ओर से तो यह साफ कर दिया है कि मैनचेस्टर टेस्ट स्थगित नहीं हुआ है, बल्कि रद्द कर दिया गया है। अगर कभी भारत और इंग्लैंड के बीच एकमात्र टेस्ट खेला जाएगा, तो वह इस टेस्ट सीरीज में नहीं जोड़ा जाएगा।


 

अश्विन या जडेजा?

R Ashwin or Ravindra Jadeja, who's more difficult? Aaron Finch answers fan's question | Cricket News

ओवल (सीरीज के चौथे टेस्ट) में 50 साल बाद भारत की ऐतिहासिक जीत और पांचवें टेस्ट के रद्द होने के घटनाक्रम ने टीम के संयोजन को लेकर कई बहसों को कुछ समय के लिए विराम दे दिया है। लेकिन भारतीय टीम इस साल दिसंबर में जब अगली टेस्ट सीरीज खेलने दक्षिण अफ्रीका जाएगी, तो ये मुद्दे फिर से बहस के केंद्र में होंगे। इन बहसों में दो मुद्दे सबसे प्रमुख है। अगर भारत दक्षिण अफ्रीका की तेज पिचों पर एक स्पिनर के साथ उतरेगा, तो टीम में रवींद्र जडेजा होने चाहिए या भारत के सर्वश्रेष्ठ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन? क्योंकि इंग्लैंड में तो अश्विन के चारों टेस्टों में बेंच पर ही बैठना पड़ा था। अगर ऐसा एक बार फिर होता है, तो क्या यह सही रणनीति है?

रहाणे की खराब फॉर्म बड़ा मुद्दा

और उससे भी ज्यादा गरम मुद्दा यह होगा कि क्या अजिंक्य रहाणे की जगह मध्यक्रम में बनती है? क्या उनकी जगह दूसरे को मौका नहीं मिलना चाहिए? वह भी उस स्थिति में, जब सूर्यकुमार यादव जैसे “इन-फॉर्म” बल्लेबाज टेस्ट टीम में लगातार दस्तक दे रहे हैं। पृथ्वी शॉ, मयंक अग्रवाल, शुभमन गिल और हनुमा विहारी जैसे बल्लेबाज भी इंतजार कर रहे हैं। यानी टीम इंडिया के पास विकल्पों की भरमार है। हालांकि सवाल विराट कोहली की खराब फॉर्म और चेतेश्वर पुजारा की नाकामी पर भी उठ रहे थे। ऋषभ पंत की बल्लेबाजी भी सवालों के घेरे में थी। लेकिन एक तो विराट कोहली बहुत बड़े बल्लेबाज हैं और उनकी उपलब्धियां बहुत बड़ी है। दूसरी बात यह भी है कि उन्होंने अपनी खराब फॉर्म में भी इंग्लैंड सीरीज में दो अर्द्धशतक लगाए और एक पारी में अर्द्धशतक के करीब (44 रन) पहुंचे। वैसे भी टीम में उनकी जगह पर सवाल उठने का सवाल फिलहाल कुछ सालों तक तो नहीं है। साथ ही, वे कप्तान के रूप में लगातार सफलताएं अर्जित कर रहे हैं।

पुजारा ने कुछ कम कीं अपनी मुसीबतें

England vs India 2021 - Relief for India as Cheteshwar Pujara overcomes struggles with the bat

अब बात चेतेश्वर पुजारा की। पुजारा ने इस सीरीज में कम से कम दो पारियां (91 और 61 रन) ऐसी खेली हैं और दो शतकीय साझेदारियां- दूसरे टेस्ट की दूसरी पारी में अजिंक्य रहाणे के साथ 100 रन की और चौथे टेस्ट की दूसरी पारी में रोहित शर्मा के साथ 153 रन की- तो ऐसी की हैं, जिसने भारत की जीत में बेहद अहम भूमिका निभाई। वह इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज में भारत की ओर से तीसरे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले (रोहित शर्मा और के. एल. राहुल के बाद) बल्लेबाज रहे। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि पुजारा ने खुद के लिए थोड़ा और समय हासिल कर लिया है। वहीं ऋषभ पंत के साथ समस्या फॉर्म से ज्यादा टेम्परामेंट की है। वे ज्यादातर खराब शॉट खेलकर आउट होते हैं। चौथे टेस्ट की दूसरी पारी में उन्होंने इस आदत पर लगाम लगाते हुए अहम अर्द्धशतक लगाया, जो उनके करियर का सबसे धीमा अर्द्धशतक था। उन्होंने अपनी विकेटकीपिंग में भी काफी सुधार किया है और उनके साथ उम्र भी है, इसलिए उन्हें अभी कुछ और मौके मिलेंगे। अगर वह बाहर हो भी गए, तो वापसी के कई मौके मिलंगे।

बेहद खराब दौर से गुजर रहे हैं रहाणे

अब बात अजिंक्य रहाणे की। उन्होंने पिछले पांच टेस्ट मैचों की 9 पारियों में महज 173 रन बनाए हैं यानी 20 की औसत से भी कम। इंग्लैंड के साथ अभी-अभी समाप्त हुई सीरीज में तो चार टेस्ट मैचों की सात पारियों में उनके बल्ले से सिर्फ 109 रन आए। औसत रहा मात्र 15.57 का। भारत के उच्च और मध्य क्रम के बल्लेबाजों का औसत तो उनसे ज्यादा रहा ही, शार्दुल ठाकुर जैसे निचले मध्यक्रम के बल्लेबाज ने भी उनसे ज्यादा रन बनाए। वह भी केवल दो टेस्ट मैचों और तीन पारियों में। इस सीरीज के चार टेस्ट मैचों में, रहाणे दोनों टीमों को मिलाकर रन बनाने के मामले में 12वें नंबर पर रहे। यानी वह बल्लेबाजों में सबसे निचले पायदान पर। यह भी ध्यान देने लायक तथ्य है कि इंग्लैंड के डेविड मलान ने दो, मोईन अली ने तीन और ओली पोप तथा क्रिस वोक्स ने सिर्फ एक टेस्ट खेला था। अगर ये खिलाड़ी चारों मैच खेले होते, तो शायद रहाणे का नंबर और नीचे होता। रहाणे का आत्मविश्वास अभी इतना कमजोर हो गया है कि उनके पैर चल ही नहीं रहे हैं। उनका फुटवर्क उनकी बल्लेबाजी को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

चार साल से प्रदर्शन में निरंतरता नहीं

Pujara found a way to score, Rahane hasn't been able to. You might see a change in the Indian batting-order': Zaheer | Cricket - Hindustan Times

दरअसल अजिंक्य रहाणे की फॉर्म में 2017 से ही उतार-चढ़ाव जारी है। इसके पहले उनकी बल्लेबाजी का वार्षिक औसत हमेशा 43 से ऊपर रहा, लेकिन 2017 में वह 34.62 और 2018 में 30.66 पर आ गया। हां, 2019 में उन्होंने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। उनकी बल्लेबाजी का वार्षिक औसत करियर के उच्चतम स्तर पर रहा, जो 71.33 था। इस साल उन्होंने आठ टेस्ट मैचों की 11 पारियों में दो बार नॉट आउट रहते हुए 642 रन बनाए, जिसमें दो शतक और पांच अर्द्धशतक शामिल थे। लेकिन 2020 में फिर उनका सालाना औसत 40 के नीचे पहुंच गया। वैसे कोरोना की वजह से इस साल कई महीने क्रिकेट खेली भी नहीं गई। रहाणे ने 4 टेस्ट मैचों की 8 पारियों में एक बार नॉट आउट रहते 272 रन बनाए 38.86 की औसत से। इस दौरान वे सिर्फ एक शतक लगा पाए। 2021 में तो वह अपने करियर के सबसे खराब दौर में हैं। इस साल वह 11 टेस्ट की 19 पारियों में 19.58 की औसत से 372 रन बना पाए हैं और सिर्फ दो बार 50 का आंकड़ा पार कर पाए हैं। यह भी गौरतलब है कि रहाणे ने अपने आठ-नौ वर्षों के टेस्ट करियर में किसी भी वर्ष (कैलेंडर ईयर) में 1,000 हजार रन नहीं बनाए हैं। फिलहाल टेस्ट में उनका औसत 40 से भी नीचे आ गया है।

बल्लेबाजी क्रम में धकेले गए नीचे

Ajinkya Rahane has been a disappointment, needs to fire if he gets another Test: Wasim Jaffer | Cricket News

रहाणे की खराब फॉर्म का ही नतीजा था कि ओवल टेस्ट में पांचवें नंबर पर उनकी जगह पर रवींद्र जडेजा को भेजा गया। रहाणे छठे नंबर पर आए। पहली पारी में इस कदम से लगा कि लेफ्ट-राइट कॉम्बिनेशन को दिमाग में रख कर जडेजा को भेजा गया था। लेकिन जब दूसरी पारी में भी ऐसा ही हुआ, तो उसके निहितार्थ कुछ और लग रहे थे। शायद टीम प्रबंधन की रणनीति यह रही होगी कि क्रम बदलने से रहाणे को कुछ फायदा मिले। दूसरी बात शायद यह हो सकती थी कि अगर जडेजा पांचवें नंबर पर ठीक प्रदर्शन करते हैं, तो रहाणे की जगह अश्विन को रखा जा सकता है। शार्दुल अच्छी बल्लेबाजी कर रहे हैं और अश्विन के नाम भी चार टेस्ट शतक है। यह एक अच्छा कॉम्बिनेशन साबित हो सकता है। जडेजा इस नंबर पर कुछ खास नहीं कर पाए और दोनों पारियों में केवल 27 रन ही बना सके, लेकिन रहाणे की हालत इससे भी खराब रही। दोनों पारियों में वह 14 और 0 का स्कोर ही बना पाए। इस टेस्ट ने उनकी मुश्किलों में और इजाफा कर दिया है। उनके लिए आगे की डगर की बहुत कठिन लगती है।

मैनचेस्टर हो सकता था एक मौका!

इस सीरीज में तो स्थिति यह रही कि रहाणे से बेहतर बल्लेबाजी औसत मोहम्मद शमी (18.75) और जसप्रीत बुमराह (17.40) का था। हालांकि इस तुलना का अभिप्राय यह नहीं है कि दोनों रहाणे से बेहतर बल्लेबाज हैं। रहाणे ने अपनी बेहतरीन बल्लेबाजी से टीम इंडिया को मैच जिताए हैं और कई बार संकट से बाहर निकाला है। उन्होंने विदेशी पिचों पर शानदार प्रदर्शन किया है और अपने पहले चार शतक विदेशों में ही लगाए हैं। उसमें से भी तीन शतक न्यूजीलैंड, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में तेज गेंदबाजों की मददगार पिचों पर बनाए हैं। उन्होंने विदेशी मैदानों (41.71 की औसत से 3087 रन) पर घरेलू मैदानों (36.47 की औसत से 1605 रन) के मुकाबले लगभग दुगने रन बनाए हैं। ये आंकड़े साबित करते हैं कि वे अच्छी तकनीक से लैस बल्लेबाज हैं। लेकिन उनका पिछले दो सालों का प्रदर्शन बता रहा है कि उनकी तकनीक कहीं खो गई है। उसे दुरुस्त करने की जरूरत है। दिक्कत यह है कि कमजोर आत्मविश्वास इसमें सबसे बड़ी बाधा बन रहा है। और उनके पास समय भी ज्यादा नहीं है। अगर वह एक बार टीम से बाहर हुए, तो वापसी बहुत मुश्किल होगी, क्योंकि उम्र उनके साथ नहीं है, वे 33 साल से ज्यादा के हो चुके हैं। हरभजन सिंह, प्रज्ञान ओझा, गौतम गंभीर जैसे खिलाड़ी इसका उदाहरण हैं। कई युवा खिलाड़ी मौका लपकने के लिए तैयार बैठे हैं। दक्षिण अफ्रीका के दौरे में रहाणे टीम में होंगे या नहीं, अगर होंगे तो अंतिम एकादश में मौका मिलेगा या नहीं, इस पर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है। कुल मिलाकर, रहाणे के पास अवसर बहुत कम हैं। हम तो चाहेंगे कि रहाणे टीम में बने रहे। उनको शुभकामनाएं।

ईडी ने अपने पूर्व अफसर सचिन सावंत को किया अरेस्‍ट

500 करोड़ की हेराफेरी का मामला।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) लगातार घोटाले और हेराफेरी करने वाले अफसरों पर कार्रवाई कर रही है। इस बार ईडी ने अपने ही पूर्व अफसर को करोड़ों की हेराफेरी के मामले में गिरफ्तार किया है। दरअसल, ईडी ने पूर्व डिप्टी डायरेक्टर सचिन सावंत के लखनऊ स्थित आवास पर बुधवार को छापेमारी की। उनके अपार्टमेंट से टीम ने कई दस्तावेज, बैंक खाते से जुड़ी डिटेल और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को कब्जे में लिया है। ईडी की टीम सावंत गिरफ्तार कर मुंबई ले गई है। बताया जा रहा है कि उन्हें कोर्ट में पेश करना है।

आईआरएस अधिकारी सचिन सावंत वर्तमान में लखनऊ में ही तैनात हैं। वह सीमा शुल्क और जीएसटी के लिए काम कर रहे हैं। सावंत काफी समय से ईडी के रडार पर थे। जब वह मुंबई में ईडी में थे तब डायमंड कंपनी की 500 करोड़ रुपए की हेराफेरी में संदिग्ध पाया गया था। सावंत के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतें हुई थीं। इसी को लेकर ईडी टीम मुंबई से लखनऊ पहुंची। ईडी टीम ने शालीमार वन वर्ल्ड स्थित सावंत के आवास पर छापेमारी की। देर तक चले अभियान में ईडी टीम ने कई दस्तावेज अपने कब्जे में लिए।

इसके साथ ही बैंक से जुड़ी डिटेल भी जुटाई। ईडी ने सावंत के घर से बरामद सभी चीजों को अपने कब्जे में लेकर साथ ले गई है। टीम ने सचिन सावंत को भी गिरफ्तार कर लिया है और मुंबई के लिए रवाना हो गई है। ईडी की टीम ने उनके मुंबई स्थित आवास पर भी छापेमारी कर चुकी है।(एएमएपी)

मुफ्त सुविधाओं की घोषणा करने वाली सरकारों को सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा

#pramodjoshiप्रमोद जोशी।

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को चुनावों से पहले मुफ्त उपहारों की घोषणा करने वाली सरकारों और राजनीतिक दलों को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि इससे लोग काम करने से बच रहे हैं और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में श्रम शक्ति सूख रही है।

न्यायमूर्ति बीआर गवई और एजी मसीह का पीठ बेघरों के लिए आश्रय गृहों के बारे में एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस दौरान वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि नीतियाँ केवल अमीरों के लिए बनाई गई हैं। वकील ने कहा, “असली पीड़ित गरीब और बेघर लोग हैं। दुर्भाग्य से, बेघर होने के कारणों की बात नहीं की जाती है। इस देश में यह सबसे कम प्राथमिकता है। मुझे यह कहते हुए खेद है कि करुणा केवल अमीरों के लिए है, गरीबों के लिए नहीं।”

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न्यायमूर्ति गवई ने वकील के यह कहने पर आपत्ति जताई कि करुणा केवल अमीरों के लिए है, और कहा कि राजनीतिक भाषण न दें। न्यायमूर्ति गवई ने कहा, “इस अदालत में वैसा भाषण न दें, जैसा रामलीला मैदान में दिया जाता है। अदालत में, अपने आप को तर्क तक सीमित रखें। यदि आप किसी के पक्ष में बोल रहे हैं, तो उसे (वहीं तक) सीमित रखें। अनावश्यक आरोप न लगाएं। यहाँ कोई राजनीतिक भाषण न दें। हम अपने न्यायालय कक्ष को राजनीतिक मंच में बदलने की अनुमति नहीं देंगे।”

अधिवक्ता ने कहा, “मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। मेरा यह मतलब नहीं था।” फिर जस्टिस गवई ने वकील से पूछा, “आप कैसे कह सकते हैं कि करुणा सिर्फ़ अमीरों के लिए ही दिखाई जाती है?”

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि उन्होंने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि इलाके के सौंदर्यीकरण के लिए कुछ आश्रय स्थलों को हटा दिया गया।

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न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि दिल्ली सरकार के वकील ने जानकारी दी है कि आश्रय गृहों की हालत खस्ता है। मामले में दायर हलफनामे में दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में बताया गया है। साथ ही न्यायमूर्ति गवई ने टिप्पणी की, “तो, देश के विकास में योगदान देकर उन्हें समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनाने के बजाय, क्या हम परजीवियों का एक वर्ग तैयार नहीं कर रहे हैं?”

न्यायमूर्ति गवई ने कहा, “दुर्भाग्य से, चुनाव के समय घोषित इन मुफ्त सुविधाओं के कारण… कुछ लाडली बहन और कुछ अन्य योजनाओं के कारण लोग काम करने को तैयार नहीं हैं। उन्हें मुफ्त राशन मिल रहा है, बिना किसी काम के पैसे मिल रहे हैं, तो वे काम क्यों करें!”

जैसे ही प्रशांत भूषण ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की, न्यायमूर्ति गवई ने कहा, “हम उनके लिए आपकी चिंता की सराहना करते हैं, लेकिन क्या उन्हें समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनाने और राष्ट्र के विकास में योगदान देने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता? मैं आपको व्यावहारिक अनुभव बता रहा हूँ, इन मुफ्त सुविधाओं के कारण, कुछ राज्य मुफ्त राशन देते हैं… इसलिए लोग काम नहीं करना चाहते हैं।”

भूषण ने कहा, ‘इस देश में शायद ही कोई ऐसा होगा जो काम मिलने पर काम नहीं करना चाहेगा।’ उन्होंने कहा कि लोग शहरों की ओर इसलिए आते हैं क्योंकि उनके गाँवों में उनके पास कोई काम नहीं होता।

जस्टिस गवई ने कहा, “आपको सिर्फ़ एकतरफ़ा जानकारी होगी। मैं एक किसान परिवार से आता हूँ। महाराष्ट्र में चुनाव से ठीक पहले घोषित की गई मुफ़्त सुविधाओं की वजह से किसानों को मज़दूर नहीं मिल रहे हैं। जब सभी को घर पर मुफ़्त सुविधाएँ मिल रही हैं, तो वे काम क्यों करना चाहेंगे?

अजित और फडणवीस में बढ़ी आपसी नकदीकी, अलग-थलग पड़े एकनाथ शिंदे

महाराष्ट्र की सरकार में एक नया समीकरण देखने को मिलने लगा है। दोनों ही उपमुख्यमंत्रियों- देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार की जोड़ी जमने लगी है। इस तिकड़ी में शामिल मुख्मयंत्री एकनाथ शिंदे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। मंगलवार को इसकी बानगी भी देखने को मिली। कैबिनेट बैठक के तुरंत बाद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने दोनों डिप्टी सीएम के साथ अलग से अक बैठक की। हालांकि, विभागों के वितरण पर मतभेदों के कारण बैठक बेनतीजा रही और तीनों को निर्णय टालने के लिए मजबूर होना पड़ा। सूत्रों ने बताया कि कैबिनेट बैठक के दौरान बमुश्किल बोलने वाले सीएम शिंदे की नाराजगी साफ झलक रही थी।एक अधिकारी ने कहा, ”उनकी और उनके मंत्रियों की शारीरिक भाषा संयमित थी, जबकि अजित पवार खेमा आक्रामक दिख रहा था। इसके अलावा अजित पवार और देवेंद्र फड़णवीस की दोस्ती अधिक मित्रतापूर्ण देखी गई। इससे यह आभास हुआ कि शिंदे अलग-थलग पड़ गए हैं।”

विभागों के बंटवारे पर नहीं बन रही बात

विभागों के बंटवारे पर चर्चा के लिए बैठकों का दौर जारी है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ”अजित पवार खेमा वित्त, ऊर्जा, खाद्य और नागरिक आपूर्ति, ग्रामीण विकास, जल संसाधन और महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की मांग कर रहा है। वहीं, शिंदे गुट अजित पवार को वित्त विभाग देने का कड़ा विरोध कर रहा है। ऐसा माना जाता है कि पिछवी एमवीए की सरकार में अजित पावर के वित्त मंत्री रहते हुए फंड के असंगत वितरण के कारण शिंदे ने विद्रोह किया था। सीएम ने अपनी पार्टी के मंत्रियों के विभागों में फेरबदल के विचार का भी विरोध किया है, जिसका प्रस्ताव भाजपा ने दिया था।”

एनसीपी को सरकार में शामिल करने पर शिंदे गुट परेशान

शिंदे खेमा काफी परेशान है। विधायक संजय शिरसाट, भरत गोगावले और मंत्री दीपक केसरकर ने बीजेपी द्वारा नया सहयोगी जोड़ने पर सवाल उठाया है। ऐसा कहा जा रहा है कि अजित पवार को सरकार में शामिल करने से पहले एकनाथ शिंदे से नहीं पूछा गया था। शिंदे खेमे के एक विधायक ने कहा, ”हमारे पास पूर्ण बहुमत था तो ऐसा करने की आवश्यकता कहां थी?”

शिवसेना के साथ न्याय करेगी भाजपा

उन्होंने कहा, ”गुस्सा करके हमें क्या हासिल होगा? हम स्थिति को स्वीकार करेंगे और आगे बढ़ेंगे। जिन लोगों को एक भाकरी (रोटी) मिलनी थी उन्हें अब आधी मिलेगी और जिन्हें आधी मिलनी थी उन्हें अब चौथाई मिलेगी।” यह पूछे जाने पर कि क्या शिवसेना विधायक अजित पवार को वित्त विभाग मिलने को लेकर आशंकित हैं, गोगावले ने कहा कि उनका मानना है कि भाजपा, शिवसेना के साथ न्याय करेगी।

शिवसेना नेता गजानन कीर्तिकर ने भी कहा कि अगर शिवसेना को कम विभाग मिले तो ठीक है। उन्होंने कहा, ”लोकसभा चुनाव जीतने और शरद पवार को खत्म करने के लिए एनसीपी को शामिल किया गया है। हमारे कुछ विधायक जो मंत्री पद चाहते थे वे नाराज हैं लेकिन यह कोई बड़ी समस्या नहीं है।”

मंत्री पद की आस में बैठे विधायकों को झटका

इस बीच, सूत्रों ने दावा किया है कि मंत्री पद चाहने वाले कुछ विधायकों ने शिंदे से खुले तौर पर कहा था कि वह उनसे की गई प्रतिबद्धताओं से मुकर गए हैं। मंगलवार शाम को पार्टी के मंत्रियों ने इस मुद्दे के समाधान और सरकार में एनसीपी के शामिल होने के प्रभाव पर चर्चा करने के लिए शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर के आवास पर बैठक की।

भाजपा नेता भी एनसीपी में विभाजन पर लोगों की प्रतिक्रियाओं से परेशान थे। भाजपा नेता ने कहा, ”जिस पार्टी के खिलाफ हमने इतने सारे आरोप लगाए, उससे हाथ मिलाने से मतदाता खुश नहीं हैं। कुछ नेता भी निराश हैं, क्योंकि पार्टी के वफादार कार्यकर्ताओं को सत्ता-साझाकरण से बाहर रखा गया है। लेकिन पार्टी नेतृत्व आश्वस्त था कि लोकसभा चुनाव के लिए यह कदम जरूरी था।”

एक अन्य भाजपा नेता ने कहा कि अजित पवार और एकनाथ शिंदे खेमे को लगभग 13-13 मंत्री पद मिलने की उम्मीद है, जबकि भाजपा लगभग 16 मंत्री पद बरकरार रखेगी। उन्होंने कहा, “शिंदे खेमा भले ही शोर मचा रहा हो, लेकिन अजित पवार गुट के शामिल होने के बाद उसने सौदेबाजी की अपनी शक्ति खो दी है। उसे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के आदेशों का पालन करना होगा।”(एएमएपी)