‘अमेरिका-इजराइल फंस गए’ कौन बना रहा ये नैरेटिव
प्रदीप सिंह।
क्या ईरान पर हमला करके अमेरिका और इजराइल फंस गए हैं? यह एक सवाल नहीं,बल्कि कई लोगों का जजमेंट है। उनका कहना है कि अमेरिका और इजराइल अब इससे निकलने का रास्ता खोज रहे हैं। ऐसे लोगों को याद रखना चाहिए कि अभी युद्ध को सिर्फ तीन दिन हुए हैं।
इससे पहले जो युद्ध हुआ था, वह 12 दिन चला था। उसमें अमेरिका और इजराइल का एक लिमिटेड ऑब्जेक्टिव था। 12 दिन के उस युद्ध से अमेरिका और इजराइल समझ चुके थे कि ड्रोन और बैलेस्टिक व सुपरसोनिक मिसाइल ईरान की सबसे बड़ी ताकत हैं। अब बात इस युद्ध की। इसमें अमेरिका और इजराइल किस मकसद से गए थे,पहले तो यह समझना चाहिए। अमेरिका और इजराइल महसूस कर रहे थे कि जिस तरह से ईरान अपनी मिसाइल व ड्रोन की ताकत बढ़ा रहा है और धीरे-धीरे परमाणु हथियार बनाने की ओर बढ़ रहा है, वह विश्व शांति के लिए खतरा है। दूसरी बात, ईरान की बढ़ती सैन्य ताकत इजराइल के अस्तित्व और अमेरिका व उसके खाड़ी के दोस्तों के लिए भी बड़ा खतरा थी।
इस युद्ध को लेकर आप नैरेटिव को देखें तो दो हिस्सों में बंट गया है। अमेरिका और इजराइल के पक्ष में कम लोग नजर आएंगे और विरोध में ज्यादा। जो भी इस्लाम को मानने वाले हैं या उनका समर्थन करते हैं, वे सब इजराइल के विरोध में हैं। अमेरिका और इजराइल के हर एक्शन को कहा जा रहा है कि यह निराशा है। ईरान के हर एक्शन को मास्टर स्ट्रेटजी बताया जा रहा है। जबकि इस युद्ध में शुरू से देखिए क्या हुआ? इजराइल और अमेरिका ने पहले ही हमले में खामेनेई समेत ईरान की टॉप लीडरशिप,जिसमें 40 लोग शामिल थे, को खत्म कर दिया। इससे पता चलता है कि इजराइल और अमेरिका की इंटेलिजेंस किस तरह से काम करती है। दूसरी बात, डोनाल्ड ट्रंप लगातार कहते रहे हैं कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हमारा लक्ष्य है, लेकिन यह उन्होंने कभी नहीं कहा कि हमले के दो-चार या दस दिन में यह हो जाएगा। सत्ता परिवर्तन कब हो सकता है,पहले तो यह समझ लेना चाहिए। इसकी दो स्थितियां होती हैं। एक बूट्स ऑन द ग्राउंड यानी पैदल सेना को उतारकार। दूसरा तरीका है आंतरिक विद्रोह। किसी तीसरे तरीके का इस्तेमाल करके सत्ता परिवर्तन कराया जाए तो वह स्थाई नही होता। इसमें आप इराक, अफगानिस्तान और लीबिया का उदाहरण देख सकते हैं। आज इन देशों में कितनी अराजकता है।

अमेरिका और इजराइल के लिए इस समय ईरान में सत्ता परिवर्तन से ज्यादा जरूरी है उसके मिसाइल प्रोग्राम और मिसाइलों के जखीरे को खत्म करना। कहा जा रहा है कि 2027 तक ईरान मिसाइलों का इतना बड़ा स्टॉक कर लेता कि अमेरिका और इजराइल के लिए उसका मुकाबला करना बहुत कठिन हो जाता। अब आप देखिए कि अमेरिका और इजराइल की ओर से मिसकैलकुलेशन क्या हुआ? उनको उम्मीद नहीं रही होगी कि ईरान गल्फ कंट्रीज पर हमला करेगा। ईरान को इसका तात्कालिक लाभ जरूर हुआ है, लेकिन स्ट्रेटजी की दृष्टि से देखें तो यह उसकी सबसे बड़ी गलती थी। ईरान को लग रहा था कि मॉडर्नाइजेशन की ओर बढ़ रहे खाड़ी के देशों पर हमले से वे अमेरिका और इजराइल पर युद्ध रोकने का दबाव डालेंगे। लेकिन हुआ क्या? नुकसान के बावजूद खाड़ी के देशों ने यह रास्ता नहीं अपनाया कि वे अमेरिका और इजराइल पर युद्ध रोकने का दबाव डालें। उसके बदले वे सब एक हो गए। जो देश तटस्थ या अमेरिका-इजराइल के विरोध में थे, वे भी कहने लगे कि ईरान पर जो भी हमला करेगा उसका समर्थन करेंगे। तो ईरान ने अपने दोस्तों को या जो दुश्मन नहीं थे, उन सबको दुश्मन बना लिया। ये अगर मास्टर स्ट्रेटजी है तो फिर फेल्योर क्या होता है, ये मुझे समझ में नहीं आता।
अमेरिका और न ही इजराइल को यह उम्मीद थी कि उनके इस हमले से सत्ता परिवर्तन हो जाएगा। उनको अच्छी तरह से मालूम है कि सत्ता परिवर्तन की परिस्थितियां क्या होंगी। तो उनका लक्ष्य है कि अभी जो रिजीम है उसको इतना अशक्त बना दो कि उसका डर खत्म हो जाए। इसीलिए बार-बार डोनाल्ड ट्रंप जनता से कह रहे हैं कि आइए और अपने देश को चलाइए। अमेरिका एक बार भी यह संकेत नहीं दे रहा है कि वह ईरान को चलाना चाहता है या ईरान पर शासन करना चाहता है या किसी प्रॉक्सी को सत्ता सौंपना चाहता है। अमेरिका और इजराइल ईरान में रिजीम चेंज की परिस्थितियां तैयार कर रहे हैं ताकि लोग डरे बिना सड़कों पर निकल सकें और सत्ता परिवर्तन कर अपनी सरकार बना सकें। यह काम कोई दो-चार दिन या महीने-दो महीने में नहीं होने वाला है। इसमें लंबा समय लगेगा। इजराइल और अमेरिका का उद्देश्य इस समय यह है कि इस रिजीम के पीछे आईआरजीसी की जो दमनकारी ताकत है, उसको निष्प्रभावी कर दिया जाए। एक अध्ययन है, जिसमें कहा गया है कि अगर किसी देश की 20 फीसदी आबादी सत्ता के खिलाफ हो जाए और सड़क पर उतर आए तो रिजीम चेंज हो जाती है। अब ईरान में यह होगा कि नहीं, यह तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि जब इस युद्ध में अमेरिका ने उतरने का फैसला किया तो ऐसा नहीं है कि उसे पता नहीं था कि ईरान कितने समय तक लड़ सकता है।
जो लोग अमेरिका और इजराइल के खिलाफ हैं,वे कह रहे हैं कि उनके पास तो हथियार खत्म हो रहे हैं। वे ज्यादा दिन टिक ही नहीं सकते। तो ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि इजराइल जीवन भर लड़ता रहा है। लड़ाई उसके लिए रोजमर्रा का काम है। और अमेरिका तो दुनिया भर में हथियार बेचता और बनाता है। इसलिए यह कहना कि अमेरिका के पास हथियार या गोला बारूद खत्म हो जाएगा और ईरान के पास बचा रहेगा, अब इससे ज्यादा हास्यास्पद बात क्या हो सकती है? मेरा मानना है कि इस युद्ध के दौरान अगर अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान की मिसाइल क्षमता को खत्म कर देते हैं तो मान लीजिए कि वे युद्ध जीत गए क्योंकि फिर उसके बाद ईरान कभी हमला करने या जवाबी हमला करने की स्थिति में नहीं रहेगा। उसकी ताकत खत्म हो जाएगी तो वह उतना बड़ा खतरा भी नहीं रह जाएगा। तो यह कहना कि अमेरिका और इजराइल इस युद्ध को शुरू करके फंस गए हैं, कम से कम मैं इसका समर्थन नहीं करता और जो परिस्थितियां हैं, वे भी नहीं करती हैं। ईरान के लोगों के मन में क्या है, इसका छोटा सा संकेत 2 मार्च को मिला जब ईरान की महिला फुटबॉल टीम की सदस्यों ने अपना राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया। यह कोई छोटी बात नहीं है। इससे पहले भी ईरान में जो विद्रोह हुआ था, उसे महिलाओं ने ही लीड किया था। अगर महिलाएं ही सड़क पर उतर आती हैं तो रिजीम चेंज कोई बड़ी मुश्किल बात नहीं है। तो जिस दिन इस रिजीम की सबसे बड़ी ताकत आईआरजीसी का डर खत्म हो जाएगा, उस दिन पता चलेगा कि ईरान के लोग अपनी सत्ता हासिल करना चाहते हैं या नहीं। ऐसे में मान कर चलिए यह लड़ाई बहुत जल्दी खत्म होने वाली नहीं है।

ईरान की तुलना में इजराइल और अमेरिका की संयुक्त ताकत बहुत ज्यादा है, लेकिन नैरेटिव वॉर में मुझे लगता है कि अमेरिका और इजराइल पिछड़ रहे हैं। जो इस्लामी इको सिस्टम है और इसमें खासतौर से जो लेफ्ट इको सिस्टम है, वह नैरेटिव बनाने में बहुत माहिर है। वह ऐसा नैरेटिव बना रहा है जैसे ईरान पर कोई बहुत बड़ा अत्याचार हो रहा है। खामेनेई बहुत बड़ा महात्मा था। उसको मार देना गलत हुआ। एक डिक्टेटर,एक अत्याचारी को मार देना कभी गलत नहीं होता। खामेनेई ईरान के लिए ही नहीं, आसपास के देशों और दुनिया के लिए खतरा था और दुनिया के लिए जो खतरा था, उसको अगर एलिमिनेट कर दिया गया है तो मुझे लगता है कि दुनिया पहले से कुछ तो ज्यादा सुरक्षित हो ही जाएगी। कोई बता सकता है कि पिछले 45 सालों में खामेनेई ने क्या अच्छा काम किया। बहुत से डिप्लोमेट्स को भी मैं सुन रहा हूं जो अमेरिका और इजराइल के कदमों को उनकी निराशा बता रहे हैं। ऐसे लोगों को युद्ध के बारे में कुछ नहीं मालूम। उनको ईरान के बारे में भी कुछ नहीं मालूम। अभी पिक्चर बहुत बाकी है। मेरा मानना है कि अगले पांच-छह दिनों में तय होगा कि यह युद्ध किधर जा रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



