#pradepsinghप्रदीप सिंह।
वक़्फ़ संशोधन विधेयक पर बनी जेपीसी की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश हो चुकी है। अब यह तय है कि वक़्फ़ कानून में संशोधन होगा। बजट सत्र के दूसरे भाग में सरकार नया विधेयक लेकर आएगी। मेरा मानना है कि यह वक़्फ़ संशोधन विधेयक भारत देश में मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति है का प्रस्थान बिंदु है। मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति अपने चरम पर पहुंच चुकी है। अब इससे ऊपर नहीं जा सकती।यह कानून लेकर आए थे जवाहरलाल नेहरू। उनके समय कानून आया। इंदिरा गांधी ने इसमें संशोधन किया। और सबसे खतरनाक संशोधन किया 2013 में मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सरकार ने। अब सवाल यह है कि सरकार को यह संशोधन विधेयक क्यों लाना पड़ा। दरअसल इसका आधार कांग्रेस पार्टी की सरकार ने ही तैयार किया था।
Summary of Rejoinder of Patriots Forum to Flawed Findings of Sachar  Committee

 

याद कीजिए सच्चर कमेटी की रिपोर्ट। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने वक्फ बोर्ड की फंक्शनिंग को लेकर उसको पूरी तरह से नंगा कर दिया और बताया कि क्या-क्या गड़बड़ हो रही है? किस तरह की लूट हो रही है? वक़्फ़ के नाम पर किस तरह का धंधा चल रहा है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट कांग्रेस सरकार के दौरान 2008 की है। उसके बाद मई 2014 तक कांग्रेस सरकार रही लेकिन उसने सच्चर रिपोर्ट के बारे में कुछ नहीं किया। बल्कि 2013 में उसने वक़्फ़ बोर्ड और वक़्फ़ कानून में इस तरह का संशोधन किया जिसने उसे भारत की एकता और अखंडता पर हमले के हथियार के रूप में तैयार कर दिया।

ऐसे में सरकार के लिए नया वक़्फ़ बिल लाना जरूरी था। अब बहुत से लोग सवाल पूछते हैं कि मोदी को तो 10 साल हो गए। 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार के प्रधानमंत्री बन गए थे। 2019 में बहुमत और ज्यादा बढ़ गया, 303 सीटें आ गई। तब क्यों नहीं किया? देखिए राजनीति में और जो सुशासन जानता है, गवर्नेंस की बारीकियों को समझता है, उसके लिए कौन सा कदम कब उठाना है इसकी टाइमिंग का बड़ा महत्व होता है। वो वातावरण देखता है कि कौन सा कदम कब उठाने से उसका क्या असर पड़ेगा? इस समय उठाएं तो उसका फायदा होगा या उस पर हमारे लिए मुश्किल पैदा हो सकती है। दस साल 2014 से 2024 तक मोदी सरकार ने देश में हिंदू जागरण का माहौल बनाने का काम किया। आज हिंदुओं की जो स्थिति है- हिंदुओं में जिस तरह की जागृति है- आप भी मानेंगे कि 2014 में यह नहीं थी। आज हिंदू समाज देख रहा है, सुन रहा है और बोल रहा है। बोल रहा है यह सबसे बड़ी बात है। जो समाज चुप रहता है उसके बारे में कहा ही जाता है कि ‘मौन स्वीकृति लक्षणं’। उसके मौन को स्वीकृति का लक्षण मान लिया जाता है।

दूसरी परिस्थिति क्या बदली है देश में? आजादी के बाद से तथाकथित सेक्युलरिस्ट का एक वर्ग तैयार किया गया। जब मैं सेक्युलरिस्ट कह रहा हूं तो केवल हिंदुओं की बात कर रहा हूं… क्योंकि मुसलमान कभी सेक्युलर हो ही नहीं सकता। उसके लिए उसका मजहब पहले है, संविधान, कानून और देश बाद में है। हिंदुओं में एक बड़ा वर्ग तैयार कर इस वर्ग का आकार लगातार बढ़ाया जाता रहा जो रिलीजन न्यूट्रल था। अपने सनातन धर्म को लेकर उसको ज्यादा चिंता परेशानी नहीं थी कि उसके साथ क्या हो रहा है… उसका किस तरह से नुकसान हो रहा है… मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति किस किस तरह से सनातन धर्म का नुकसान कर रही है… इससे उसको कोई मतलब नहीं था। वह उन लोगों को वोट देता था जो तुष्टीकरण की राजनीति का समर्थन करते थे।

अब क्या हुआ है- 10 सालों में क्या बदला है मोदी ने। मोदी ने उस तथाकथित सेकुलर राजनीति का दायरा था छोटा कर दिया है। वो लगातार घटता जा रहा है। इसलिए आप देखिए कि विपक्ष में कांग्रेस सहित उसके साथी दलों की मुस्लिम वोट पर डिपेंडेंस बढ़ती जा रही है। उनको लग रहा है कि यह जो वक़्फ़ संशोधन विधेयक आनेवाला है, यह आरपार की लड़ाई का समय है। आपने कई मुस्लिम संगठनों की बात सुनी होगी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बात सुनी होगी। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को इंदिरा गांधी ने मुस्लिम समर्थन हासिल करने के लिए बनाया था। इस बोर्ड की कोई संवैधानिक या कांस्टीट्यूशनल मान्यता नहीं है। कांस्टीट्यूशनल तो छोड़िए यह वैधानिक (स्टेट्यूटरी) भी नहीं है। लेकिन अपने को मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा ठेकेदार बताता है। यह लगातार राम जन्मभूमि का विरोध करता रहा- मुस्लिम समाज में सुधारों का विरोध करता रहा- यह जेंडर इक्वलिटी के खिलाफ है- तीन तलाक के खिलाफ था- सीएए के खिलाफ था। उस समय सीएए के खिलाफ एक झूठ चलाने की कोशिश हुई और उसके आधार पर एक आंदोलन खड़ा करने की कोशिश हुई कि यह कानून मुसलमानों के खिलाफ है। लेकिन  उस समय की परिस्थिति और आज की परिस्थिति में काफी अंतर है।

अभी की स्थिति यह है कि वक़्फ़ पर जेपीसी की रिपोर्ट संसद के पटल पर रखी गई है। वक़्फ़ संशोधन विधेयक अभी आएगा। मुस्लिम संगठन धमकी दे रहे हैं कि आंदोलन करेंगे, सड़क पर उतरेंगे। अब जरा सीएए के समय पर ध्यान दीजिए। सीएए के मुद्दे पर कुछ जगहों पर मुसलमान सड़क पर आया, पूरे देश में नहीं। केवल शाहीन बाग का उदाहरण पेश करके देश और दुनिया में यह छवि पेश करने की- यह एजेंडा या यह नैरेटिव बनाने की कोशिश हुई कि भारत का सारा मुसलमान सड़क पर है। उस कानून की खामियां बताते तो किसी को कोई एतराज नहीं होता। एक सफेद झूठ बोला गया कि इस कानून के जरिए भारत के मुसलमानों की नागरिकता छीन ली जाएगी। सीएए का कानून बन गया। इसी विरोध के चलते कई राज्यों में- जहां भाजपा विरोधी पार्टियों की सरकारें थी- अपने यहां असेंबली में प्रस्ताव पास किया कि हम इस कानून को अपने राज्य में लागू नहीं होने देंगे। उनकी समझ को देखिए कि इस देश का संविधान- जिसकी राहुल गांधी दिन रात दुहाई देने की कोशिश करते हैं- कहता है कि किसी केंद्रीय कानून को मानने से कोई राज्य सरकार इंकार नहीं कर सकती। यह संवैधानिक अधिकार ही नहीं है राज्य सरकार के पास। केंद्रीय कानून पूरे देश में समान रूप से लागू होगा जब तक कि कानून में ही कोई एक्सेप्शन ना किया गया हो। इसलिए उस प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं था। लेकिन वह प्रस्ताव शुद्ध रूप से मुस्लिम तुष्टीकरण का तरीका था। मुसलमानों को यह बताने का तरीका था कि मोदी सरकार या केंद्र सरकार जो कर रही है हम उसके साथ नहीं है। लेकिन ये राजनितिक दल सड़क पर उनके साथ नहीं आए। हिम्मत नहीं हुई। क्या आज सड़क पर आएंगे?

वक़्फ़ संशोधन विधेयक को लेकर नहीं आएंगे तो मुसलमानों की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। मुस्लिम समाज के कुछ नेता- जो अपने को मुस्लिम वोटों, मुस्लिम हितों का ठेकेदार समझते हैं- उनको लगता है कि भारत में इस्लाम अगर बचा हुआ है तो उन्हीं की वजह से बचा हुआ है। अगर वह नहीं होंगे तो इस्लाम बचेगा नहीं। कम से कम भारत में नहीं बचेगा। यह गलतफहमी उनको लंबे समय से है। उनकी यह गलतफहमी धीरे-धीरे टूट रही है। अनु. 370, 35ए जम्मू कश्मीर से खत्म हो गया- ट्रिपल तलाक का कानून खत्म हो गया- नागरिकता संशोधन विधेयक यानी सीएए का कानून पास और लागू हो गया- अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बन गया, उसका भूमि पूजन हुआ, फिर उद्घाटन हो गया, लाखों की संख्या में लोग वहां पर जा रहे हैं- ये तथाकथित सेकुलर पार्टियां कुछ नहीं कर पाईं।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को तो बोलने का कोई अधिकार ही नहीं है। उसको शर्म आनी चाहिए कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए जो कानून मोदी सरकार ले आई उन्होंने उसका भी विरोध किया। इससे साबित होता है कि यह अपने ही समाज के हितैषी नहीं है। इनकी नजर में सिर्फ अपना निजी हित सर्वोपरि है। इनको ना तो मुस्लिम समाज से मतलब है- ना भारतीय समाज से मतलब है- ना भारत देश से मतलब है- ना भारतीयता से मतलब है। इनको अपने निजी हित से मतलब है और जो इनका निजी हित साध सके उससे दोस्ती है। कांग्रेस पार्टी आजादी के बाद से ही इनका निजी हित साधती रही है। अब वह परिस्थिति बदल रही है।

सेक्युलर पॉलिटिक्स का स्पेस लगातार सीमित होता जा रहा है, सिकुड़ता जा रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों को मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के समर्थन में सड़क पर उतरने का नुकसान उठाना पड़ेगा। इकोनॉमिक्स में एक सिद्धांत है लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न। तुष्टीकरण की राजनीति के मामले में भी लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न लागू हो रहा। अब इसका फायदा कम और नुकसान ज्यादा होने वाला है। मुसलमान तो पहले से ही भाजपा के विरोध में है। मुसलमान न तो भाजपा को वोट देते हैं, न देंगे। यह वोट तो उन्ही सेकुलर पार्टियों को मिलता रहा है जो मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करती रही है और करती हैं। उसमें कोई इजाफा नहीं होने वाला है। उसमें कोई बढ़ोतरी होने वाली नहीं है क्योंकि मुस्लिम समाज का अधिकतम वोट इन दलों को पहले से  मिल रहा है। सवाल है कि तथाकथित सेकुलरिज्म के नाम पर इन दलों को जो हिंदू समाज का वोट मिल रहा था- वह तब भी उन्हें मिलेगा जब वे वक्फ मामले पर मुस्लिम नेताओं के साथ सड़क पर उतरेंगे।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अख़बार’ के संपादक हैं) 

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