#pradepsinghप्रदीप सिंह।
आम आदमी पार्टी एक बार फिर चर्चा में है। राघव चड्ढा पार्टी के राज्यसभा के सदस्य हैं और पार्टी बनने के बाद से अरविंद केजरीवाल के ब्लू आइड बॉय कहे जाते थे। वह केजरीवाल के सबसे विश्वास पात्र लोगों में थे। चूंकि वह चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं इसलिए केजरीवाल को उनकी और जरूरत थी क्योंकि पार्टी में नया-नया पैसा आ रहा था। पैसा कहां लगाना है,कहां भेजना है? इसका इंतजाम उनसे बेहतर कौन कर सकता था। 2022 में जब पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो राघव चड्ढा को डी फैक्टो चीफ मिनिस्टर कहा जाता था। अफसरों की नियुक्ति से लेकर सरकार के फैसलों तक में उनका दखल था। धीरे-धीरे पार्टी में उनका नंबर घटने लगा। उसका कारण यह था कि उनको लगने लगा कि इससे बड़े मंच पर जाया जा सकता है। आम आदमी पार्टी का मंच उनके लिए छोटा है। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद तो उनको लगने लगा कि अब इस पार्टी में ज्यादा समय तक रहना ठीक नहीं होगा।
आम आदमी पार्टी जब से बनी है तब से अब तक उससे तीन चरणों में लोग गए हैं। पहले चरण में वे लोग गए, जो मुद्दों के कारण पार्टी से जुड़े थे और कुछ ही दिन में उनको समझ में आ गया कि अरविंद केजरीवाल का इन मुद्दों से कोई लेना देना नहीं है। दूसरे चरण में ऐसे लोग गए, जो किसी उम्मीद से आए थे कि कुछ मिलेगा। किसी को अपनी राजनीतिक हैसियत चाहिए थी तो किसी को घोटाला करने की ताकत चाहिए थी तो किसी को राज्यसभा जाना था। अब ऐसे लोगों का नाम बताने की जरूरत नहीं है। तीसरे चरण में अब वे लोग जा रहे हैं, जिनको यह समझ में आ गया है कि इस पार्टी का राजनीतिक भविष्य कुछ नहीं है। अरविंद केजरीवाल का आभा मंडल जेल जाने के बाद चकनाचूर हो चुका है। दिल्ली की जिस जनता ने उन्हें दो-दो चुनाव में लगातार प्रचंड बहुमत दिया,उसी ने उन्हें सत्ता से दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया। सीबीआई और ईडी ने शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ इतने सबूत जुटा लिए हैं कि उनका भविष्य तिहाड़ जेल ही है। इसी कारण दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें बरी करने के लोअर कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। केवल समय की बात है कि केजरीवाल कितने दिन बाहर रहते हैं। लोकसभा चुनाव में उन्होंने जनता से अपील की थी कि अगर आप हमारे गठबंधन को दिल्ली की सातों सीटें जिता दें तो मुझे जेल नहीं जाना पड़ेगा,लेकिन जनता ने सातों सीटें हरा दीं। कहा कि जेल जाओ। 2027 के चुनाव में पंजाब से भी आम आदमी पार्टी की सरकार जाना तय है। उसके बाद अरविंद केजरीवाल आपको खोजना पड़ेगा कि कहां हैं?

अक्सर होता यह है कि नेता जब चुनाव हारते हैं तो आत्ममंथन करते हैं कि जो गलतियां कीं,उन्हें न दोहराएं। लेकिन केजरीवाल ने ऐसा कुछ नहीं किया। दिल्ली में शीशमहल बनवाया और चुनाव हारे। पंजाब में भी शीशमहल में रह रहे हैं। बताते हैं कि उनके घर के सामने मैदान पर राज्य सरकार का हेलीकॉप्टर उतरता है। वहीं से हेलीकॉप्टर से केजरीवाल पंजाब का दौरा करते हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान एक तरह से उनके दरबारी हैं। राघव चड्ढा भी उनके दरबारी ही थे। राघव चड्ढा को गलतफहमी हो गई कि वह अरविंद केजरीवाल की बराबरी करने वाली हैसियत में आ गए हैं तो उनको हैसियत बता दी गई। यह जो लोग आम आदमी पार्टी से निकल रहे हैं, ये कोई दूध के धुले हुए नहीं हैं। ये अरविंद केजरीवाल से धूर्तता की लड़ाई में हार गए हैं। तो राघव चड्ढा कोई ऐसे नेता नहीं हैं, जिनकी देश के विकास या देश को बदलने में रुचि हो। उनकी रुचि के विषय क्या हैं यह बताना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि उनको सिर्फ एक बात से मतलब है व्यक्तिगत विकास। उनकी छवि कैसे बढ़े और उनकी संपत्ति कैसे बढ़े। अब मुझे नहीं मालूम कि वह कुछ गलत करते हैं या नहीं। इसका कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन अगर इन लोगों की जांच कराई जाए कि जब आम आदमी पार्टी का गठन हुआ उस समय इनकी संपत्ति क्या थी और आज क्या है और किन स्रोतों से आई है तो सच्चाई का पता चल जाएगा। तब पता चलेगा कौन ईमानदार है, कौन बेईमान है। सवाल यह है कि जांच कोई क्यों कराएगा? जब सब शरीके जुर्म है तो कौन किसके ऊपर उंगली उठाए?
तो राघव चड्ढा के खिलाफ कुछ होगा इसकी उम्मीद मत कीजिए। राघव चड्ढा चूंकि केजरीवाल से अलग हो गए हैं, इसलिए उनको महान मत समझिए। वह उतने ही घटिया हैं जितने अरविंद केजरीवाल। वह 12 साल अरविंद केजरीवाल के हर अच्छे बुरे में साथ रहे हैं। कभी उनको अरविंद केजरीवाल का विरोध करते हुए सुना क्या? तो आज अचानक क्या हो गया? अरविंद केजरीवाल जेल गए तब से उन्होंने दूरी बनानी शुरू कर दी। वह अब नए घर की तलाश में हैं। उनकी तलाश कहां जाकर समाप्त होगी, किसी को मालूम नहीं है। लेकिन यह आम आदमी नाम की जो पार्टी बनी थी, इसका आम आदमी से कोई लेना देना नहीं था। यह आम आदमी को बेवकूफ बनाकर अपने को खास आदमी बनाने की पूरी प्रक्रिया थी। यह पूरी पार्टी ऐसी है, जो जितनी जल्दी खत्म हो जाए भारतीय राजनीति के लिए उतना ही अच्छा है। इसलिए राघव चड्ढा के साथ जो हो रहा है उसके कारण उनके साथ सहानुभूति जताने की जरूरत नहीं है। जो भी केजरीवाल का विरोध करेगा, वह अच्छा होगा यह मानकर मत चलिए। उनसे यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इतने साल तक केजरीवाल के साथ रहे क्यों? अगर 12 साल में आप केजरीवाल को समझ नहीं पाए तो इसका मतलब आपके अंदर समझ ही नहीं है और जिस नेता में व्यक्ति की समझ न हो वह आम जनता के किस काम का? तो राघव चड्ढा और अरविंद केजरीवाल में कोई फर्क नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)