लैंड फॉर जॉब केस में आने वाले फैसले में कांग्रेस को दिख रहा अवसर।
प्रदीप सिंह।
बिहार में चुनाव के साथ ही एक अलग खेल भी चल रहा है। वो चल रहा है आरजेडी और कांग्रेस के बीच में। आरजेडी और कांग्रेस बल्कि कहें कि तेजस्वी यादव और राहुल गांधी एक दूसरे को निपटाना चाहते हैं। उनको लगता है कि यह इनको निपटाने का सबसे सही मौका है। इसका कारण है कि आरजेडी को लगता है कांग्रेस पर निर्भरता उसको नुकसान पहुंचा रही है। उसको लग रहा है कि अगर 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इतनी ज्यादा सीटें न देकर लेफ्ट फ्रंट को दे दी होतीं तो तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बन गए होते। लालू यादव इन सब राजनीतिक बारीकियों को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं। इसलिए उन्होंने इस बार कांग्रेस को टाइट रखा। कांग्रेस से सीधे बात नहीं की। उधर कांग्रेस और राहुल गांधी ने तेजस्वी को अपमानित करने की कोशिश की तो तेजस्वी ने राहुल गांधी को अपमानित किया।

आरजेडी और कांग्रेस के बीच संबंधों में जो खटास आई है वह तात्कालिक नहीं बल्कि स्थाई है क्योंकि यह राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई है। कांग्रेस को लग रहा है कि हमारा जनाधार आरजेडी ले गई है। अगर राज्य में कांग्रेस को रिवाइव करना है आरजेडी का खत्म होना जरूरी है। उधर आरजेडी को भी समझ में आ रहा है कि अगर कांग्रेस को रिवाइव किया तो खतरा हमारे ऊपर ही आएगा। वह कांग्रेस को एक सीमा से ज्यादा बढ़ने नहीं देना चाहती है। कांग्रेस को लग रहा है कि अब वो समय आ गया है कि निर्णायक लड़ाई हो। इसीलिए कांग्रेस ने पहले तो मांग 70 से ज्यादा सीटों की रखी लेकिन आरजेडी 51 से ज्यादा देने को तैयार नहीं हुई। बाद में कांग्रेस ने 61 सीटों पर लड़ने का फैसला किया। इस बारे में एक तरह से सहमति बन गई हालांकि उसकी औपचारिक घोषणा कभी नहीं हुई। जब नॉमिनेशन का समय आया तो कांग्रेस के कई उम्मीदवारों ने आरजेडी के उम्मीदवारों के खिलाफ नॉमिनेशन कर दिया। लालू ने कांग्रेस पर दबाव डाला तो उन सबका नॉमिनेशन वापस करवा दिया गया।
दूसरी ओर आरजेडी के भी 10 उम्मीदवारों ने कांग्रेस के उम्मीदवारों के खिलाफ नॉमिनेशन फाइल कर दिया था। कांग्रेस के दबाव के बावजूद लालू ने आरजेडी उम्मीदवारों की नाम वापसी नहीं कराई। इन 10 सीटों में से ज्यादातर कांग्रेस की मजबूत सीटें हैं। इनमें दो तो कांग्रेस की जीती हुई सीटें हैं। आरजेडी को यह समझ में आ गया है कि अब कांग्रेस से छुटकारा पाने का समय है। इसीलिए वह चाहती है कि कांग्रेस को इतना अपमानित कर दो कि हमको संबंध या गठबंधन न तोड़ना पड़े। कांग्रेस खुद ही अलग हो जाए। इसीलिए कांग्रेस को मजबूर किया गया कि वह घोषणा करे कि मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव होंगे और कांग्रेस को मजबूर होना भी पड़ा। राहुल गांधी को लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव के सामने सरेंडर करना पड़ा। इसीलिए कांग्रेस अब बिहार में कोई दम लगाती दिख भी नहीं रही है। उसकी समझ में आ गया है कि यह चुनाव तो कांग्रेस का नहीं है। उन्होंने सरेंडर कर दिया है कि ठीक है आरजेडी को जो करना है, कर ले लेकिन आरजेडी ने जो हमारे साथ किया है, उसको भूलेंगे नहीं। आने वाले समय में खासतौर से 14 नवंबर के बाद दोनों पार्टियों के बीच मतभेद और ज्यादा बढ़ेंगे।

अब सवाल यह है कि आखिर राहुल गांधी अचानक आरजेडी के इतना खिलाफ क्यों हो गए हैं? और क्यों उनको लग रहा है कि आरजेडी से अलग हो जाएंगे तो कांग्रेस की संभावना बढ़ जाएगी। उनकी उम्मीद लैंड फॉर जॉब वाले केस पर टिकी हुई है। कांग्रेस के पास बड़े-बड़े वकील हैं। उन्होंने समझाया होगा कि यह बिल्कुल ओपन एंड शट केस है। इस मामले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, उनकी बहन मीसा भारती समेत पूरा परिवाार जेल जा सकता है। इन सबके भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाने का मतलब है कि आरजेडी के सर्वाइवल का सवाल पैदा हो जाएगा। उस स्थिति में आरजेडी का जनाधार किसके पास जाएगा? बीजेपी के पास तो जाने से रहा और जब तक नीतीश कुमार बीजेपी के साथ हैं तब तक उनके साथ भी आने से रहा। तो एकमात्र विकल्प बचती है कांग्रेस। इसी पर कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी की नजर है। इसीलिए जैसे ही इस मामले में चार्जशीट फाइल हुई और अदालत ने इसका कॉग्निजेंस लिया तो कांग्रेस और राहुल गांधी का रवैया बदल गया। ये वही राहुल गांधी हैं, जो पिछले साल सावन के महीने में लालू प्रसाद यादव के घर जाकर उनसे चंपारण मीट बनाना सीख रहे थे।
राहुल आखिर क्यों बदल गए। राहुल केवल तेजस्वी से नहीं अपनी पार्टी से भी नाराज हैं। जिस तरह से पार्टी ने तेजस्वी और लालू के सामने उनको सरेंडर करवाया है, उससे वह खुश नहीं है। राज्य में कांग्रेस जिन 61 सीटों पर लड़ रही है, उसमें भी 10 पर फ्रेंडली फाइट हो रही है। इसका मतलब कांग्रेस प्रैक्टिकली सिर्फ 51 सीटों पर लड़ रही है। उसमें भी आरजेडी का अगर अंदरखाने से समर्थन नहीं मिला और भितरघात हो गया तो कांग्रेस कितनी सीटें जीत पाएगी, यह बताना मुश्किल है। 2020 में कांग्रेस को 70 सीटें मिली थीं और वह सिर्फ 19 जीती थी। तब दोनों पार्टियों में सामंजस्य था। तेजस्वी यादव लोकप्रिय हो रहे थे। बीजेपी और जेडीयू के संबंध खराब थे। चिराग पासवान नीतीश कुमार के खिलाफ अभियान चला रहे थे। उस हालत में भी कांग्रेस 19 सीटों से आगे नहीं जा पाई। ऐसे में तेजस्वी और लालू प्रसाद यादव को लगता है कि कांग्रेस को ज्यादा सीटे देना मतलब अपने सत्ता में आने की संभावना को कम करना है और दूसरा खतरा दूरगामी है। अगर आरजेडी कमजोर होती है तो उसका फायदा सीधे-सीधे कांग्रेस को मिलेगा। कांग्रेस इस समय बिहार में आरजेडी के पतन में एक अवसर देख रही है। हालांकि पूरे लालू परिवाार के जेल जाने पर भी कांग्रेस को कितना फायदा मिल पाता है, यह पता नहीं क्योंकि कांग्रेस की कोई क्रेडिबिलिटी बची नहीं है। बिहार में उसके पास कोई जनाधार वाला नेता नहीं है। जो थोड़े बहुत नेता हैं, उनको भी इस चुनाव में राहुल गांधी ने किनारे लगा दिया। इसलिए कांग्रेस का बिहार में रिवाइवल होगा, इसकी संभावना लगती नहीं है। राज्य में संगठन खड़ा करने में राहुल गांधी की कोई रुचि नहीं है। यूपी समेत किसी राज्य में उन्होंने संगठन खड़ा नहीं किया है। लोकसभा चुनाव में यूपी में समाजवादी पार्टी के समर्थन से वह जरूर छह सीटें जीत गए हैं लेकिन वहां पर उनकी पार्टी का कोई जनाधार है नहीं।

बिहार में एक समय बीजेपी ने भी कोशिश की थी कि जेडीयू का जनाधार हमारे पास आ जाए और नीतीश कुमार से छुटकारा पा लें लेकिन बीजेपी को जल्दी ही समझ में आ गया कि बिहार की राजनीति में जब तक नीतीश कुमार सक्रिय हैं तब तक वह उनसे अलग होकर अपना कोई बड़ा अस्तित्व स्थापित नहीं कर सकती। लेकिन अभी तक यह बात लालू प्रसाद यादव, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी को समझ में नहीं आई है कि दोनों पार्टियों का सर्वाइवल साथ रहने में है। अलग होने पर दोनों का गिरना, दोनों का पतन होना तय है। लेकिन अब दोनों ने एक तरह से ठान लिया है कि आरपार की लड़ाई हो जाए। इसीलिए 14 नवंबर के बाद असली लड़ाई कांग्रेस और आरजेडी के बीच में दिखेगी, क्योंकि चुनाव का नतीजा तो पहले से तय है कि एनडीए की सरकार बनने जा रही है।
सरकार न बनने पर तेजस्वी यादव को विपक्ष में बैठना होगा। बीते 25 सालों में आरजेडी बीच में करीब डेढ़ साल और फिर एक साल ही सत्ता में रही है और तेजस्वी दो बार डिप्टी सीएम बन गए। उसके अलावा वह लगातार विपक्ष में रही है। ऐसे में लालू परिवार के जेल चले जाने और इतने लंबे समय तक सत्ता से दूर रहने के बाद आरजेडी के लिए पॉलिटिकली सर्वाइव करना बेहद कठिन हो जाएगा। आरजेडी में बिखराव होना लगभग तय लग रहा है। अब सवाल यह है कि उसका फायदा कौन उठाएगा? जाहिर है कि मुसलमान तो बीजेपी और एनडीए के साथ आने वाला नहीं है। यादव किधर जाएगा? यह बिहार की राजनीति में बड़ा प्रश्न होगा जो बिहार की भविष्य की राजनीति को तय करेगा।
लालू प्रसाद यादव ने अपने परिवार से बाहर कोई नेतृत्व खड़ा नहीं किया। उनकी पार्टी में उनके परिवार के अलावा कोई नंबर दो, तीन, चार या पांच की हैसियत में नहीं है। जो है वह लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव हैं। यहां तक कि उनके बड़े बेटे तक को बाहर जाना पड़ा और अलग पार्टी बनानी पड़ी। तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि परिवार के अंदर ही जब नेतृत्व का झगड़ा है तो परिवार के बाहर वालों को कैसे मौका मिल सकता है। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे और लैंड फॉर जॉब केस का फैसला, ये दो चीजें मिलकर तय करेंगे कि बिहार की भविष्य की राजनीति किस दिशा में जाएगी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)


