कौन नहीं चाहता भारत-चीन करीब आएं।
प्रदीप सिंह।
पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक को लेकर संसद और संसद के बाहर राहुल गांधी ने खूब नाटक किया। सवाल है कि इसके पीछे राहुल गांधी का उद्देश्य क्या था? उन्होंने यह जो मुद्दा उठाया, उसकी टाइमिंग पर ध्यान दीजिए।
वरिष्ठ पत्रकार दिव्यांश तिवारी ने अपने एक लेख में इस पूरे मामले के पीछे के उद्देश्य को उजागर किया है। उन्होंने लिखा है कि 26 जनवरी को एक अप्रत्याशित घटना हुई। भारत के गणतंत्र दिवस पर इस बार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक विशेष संदेश भेजकर कहा कि हम अच्छे पड़ोसी हैं,दोस्त हैं,पार्टनर हैं और उन्होंने भारत-चीन के संबंधों की तुलना ड्रैगन और एलिफेंट के डांस से की। इस सबका मतलब है कि चीन चाहता है कि उसके भारत से संबंध सुधरें। वह 2020 में गलवान में जो हुआ, उसे पीछे छोड़कर आगे बढ़ना चाहता है। शी जिनपिंग को समझ में आ रहा है कि भारत के साथ अच्छे संबंध दोनों देशों के हित में हैं। दिव्यांश तिवारी लिखते हैं कि जिनपिंग का यह संदेश एटलांटिस्ट विशेषकर अमेरिका के लिए बहुत बुरी खबर है। अमेरिका पिछले 10-15 सालों से चीन के काउंटर वेट के रूप में भारत को खड़ा करना चाह रहा है। उसको लगता है कि अगर चीन को रोकना है तो भारत को साथ लेना पड़ेगा और इसीलिए वह भारत के साथ स्ट्रेटेजिक अलायंस बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन उसकी इन सब कोशिशों के बीच भारत ने अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता से समझौता करने से मना कर दिया। वह अमेरिका के लिए चीन के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होना चाहता। भारत का स्टैंड है कि हम चीन से दुश्मनी करेंगे या दोस्ती करेंगे, यह हमारा राष्ट्रीय हित तय करेगा। यह अमेरिकी राष्ट्रीय हित के हिसाब से तय नहीं होगा। भारत की यह बात अमेरिका और उसके डीप स्टेट को पसंद नहीं आ रही है। दिव्यांश तिवारी का कहना है कि अब एक सूचना को हथियार बनाकर भारत और चीन के संबंध बिगाड़ने की कोशिश हो रही है। दो लोगों के बीच में अगर संबंध सुधारने की कोशिश हो रही हो तो उसको रोकने का एक ही तरीका है कि जब उनके बीच में दुश्मनी थी,उस समय जो बुरा हुआ उसको याद दिलाइए। राहुल गांधी निश्चित रूप से वही कर रहे हैं।
जनरल नरवणे के हवाले से जो बातें राहुल कह रहे हैं वैसी बातें उन्होंने नहीं कही हैं। एक अप्रकाशित किताब को कोट कर राहुल कह रहे हैं कि चीन के चार टैंक जब कैलाश रेंज की ओर बढ़ रहे थे उस समय जनरल नरवणे ने पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से बात की। हर बार राजनाथ सिंह कहते रहे कि अभी हम बताते हैं। उसके बाद राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री से बात की। प्रधानमंत्री ने संदेश भिजवाया कि जो आपको उचित लगे वह कीजिए। अब राहुल गांधी इसको मुद्दा बनाना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने अपना हाथ झाड़ लिया। उन्होंने सेना से कह दिया, जो करना हो करें। हमसे कोई मतलब नहीं। यानी अपनी जिम्मेदारी से भाग गए।
किसी भी देश में जो पॉलिटिकल लीडरशिप होती है, वह इसी तरह का संदेश देती है। इस संदेश का सीधा मतलब था कि आर्मी को फ्री हैंड है। वह इस स्थिति को संभालने के लिए जो करना चाहती है,वह करे। तो आर्मी को फ्री हैंड देना कमजोरी का लक्षण कैसे हो गया? लेकिन राहुल गांधी अगर यह नहीं बोलेंगे तो उनका नैरेटिव कैसे बनेगा? तो उनका नैरेटिव क्या है और नैरेटिव से भी ज्यादा उद्देश्य क्या है? राहुल गांधी बिल्कुल नहीं चाहते कि भारत और चीन हाथ मिलाएं क्योंकि भारत विरोधी ताकतें ऐसा नहीं चाहतीं। भारत विरोधी ताकतें इस मामले में देश के विपक्ष का भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं और विपक्ष इस्तेमाल होने के लिए तैयार भी है। इसीलिए 2020 का यह मामला राहुल गांधी अब उठा रहे हैं। भारत और चीन की दोस्ती से जिन ताकतों को खतरा नजर आ रहा है, यह उन ताकतों का खेल है,जिसे राहुल गांधी खेल रहे हैं।
राहुल गांधी इस मुद्दे को छोड़ना नहीं चाहते। भारत अमेरिका की ट्रेड डील की घोषणा हो गई। इतनी बड़ी खबर है। संसद का बजट सत्र चल रहा है। बजट पर चर्चा होनी है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा होनी है, लेकिन राहुल गांधी इनमें से किसी मुद्दे पर नहीं बोल रहे हैं। इससे उनके उद्देश्य का पता चल जाता है। इस विवाद का लक्ष्य यह भी है कि भारत चीन से दोस्ती करने के बजाय अमेरिका के साथ ही जुड़ा रहे और अमेरिका पर निर्भर रहे। इस पूरे नैरेटिव का उद्देश्य यह भी है कि यह एजेंडा तैयार किया जाए कि भारत को अगर सबसे ज्यादा खतरा है तो चीन से है और जिस चीन से खतरा है उससे अगर सरकार हाथ मिलाती है तो सरकार देश के विरोध में काम कर रही है। राहुल किसी भी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।

राहुल जिस तरह के मुद्दे उठा रहे हैं, उससे दरअसल वह दुश्मन की मदद कर रहे हैं। सीमा पर हमारा जो डिप्लॉयमेंट था, उसके डिटेल्स आप बता रहे हैं कि इस हाइट पर हम थे,कहां पर चीन था। आप यह भी बता रहे हैं कि अगर ऐसी क्राइसिस आती है तो भारतीय सेना की चेन कमांड क्या है? कैसे फैसला होता है? पॉलिटिकल लीडरशिप किस तरह का डायरेक्शन देती है? यह सब ऑपरेशनल डिटेल्स आप अपने दुश्मन को बताना चाहते हैं। तो राहुल गांधी चीन के मददगार भी हैं। हमेशा चीन का पक्ष लेते हैं, लेकिन जब उससे बड़े अंकल आ जाते हैं और वह चाहते हैं कि भारत चीन में दोस्ती न होने पाए तो वह चीन को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करते। वह भारत सरकार और प्रधानमंत्री को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। वह कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कॉम्प्रोमाइज्ड हैं।
तो एक बात तो बड़ी स्पष्ट है कि उनको देश के हित से कोई लेना देना नहीं। वह दरअसल पॉलिटिकल लीडरशिप और मिलिट्री लीडरशिप में एक दरार पैदा करना चाहते हैं। राहुल गांधी और उनके साथी भारत विरोधी ताकतों का मोहरा हैं। किसके फायदे के लिए राहुल गांधी यह अभियान चला रहे हैं? इसका जवाब कांग्रेस पार्टी को जरूर देना चाहिए और आम लोगों को भी कांग्रेस पार्टी की इस साजिश को समझना चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



