#shivcharanchauhanशिवचरण चौहान।

महात्मा गांधी सत्य के प्रबल समर्थक थे। सत्य को वह तप मानते थे।  कबीर ने लिखा है- ‘सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदय सांच है ताके हिरदय आप।।’ गांधी जी ऐसे ही सत्य के समर्थक थे। वह सत्य बोलते थे और झूठ बोलने से हरदम डरते थे। उनकी पुस्तक सत्य के प्रयोग में तमाम ऐसे उदाहरण और बातें आईं हैं। आज तो हर तरफ झूठ का बोलबाला है। जितना बड़ा आदमी, उतना ही बड़ा झूठ बोल लेता है। आज के गांधीवादी भी झूठ बोलने से परहेज नहीं करते। ऐसे में गांधीजी बहुत याद आते हैं। लगता ही नहीं कि इसी समाज में एक ऐसा भी व्यक्ति था जो सदैव सत्य बोलता था भले ही उसके कोई भी परिणाम हो।

बात छोटी, मायने बड़े

गांधी जी के पास एक महिला आई। उसने कहा कि मेरा बेटा बहुत गुड़ खाता है इसकी आदत आप छुड़वा दीजिए। गांधीजी ने कहा माई कल आना। दूसरे दिन वह महिला अपने बेटे को लेकर गांधी जी के पास पहुंची तो गांधीजी ने कहा -बेटे गुड़ कम खाया करो ज्यादा गुड़ खाना दांतों को नुकसान करता है।

महिला बोली महात्मा जी यही बात तो आप कल भी कह सकते थे। गांधीजी बोले- माई कल तक तो मैं भी ज्यादा गुड़ खाता था। कल शाम को यह मैंने ज्यादा गुड़ खाना बंद कर दिया है। इसीलिए आज मैंने तुम्हारे बेटे को कम गुड़ खाने के लिए कहा है। कल तक मै ही ज्यादा गुड़ खाता था तो आपके बेटे को कैसे मना करता।

व्यक्तित्व का चमत्कार

Gandhi Is Deeply Revered, But His Attitudes On Race And Sex Are Under  Scrutiny : NPR

नमक सत्याग्रह के दाडी कूच से कुछ पहले की घटना है। गांधीजी जैतपुर की एक सभा में भाषण दे रहे थे। यह मोहल्ला दलितों का था। गांधीजी ने दलितों का नाम हरिजन  दिया था। सभा में मौजूद  व्यक्तियों में अधिकांश या तो हरिजन थे या मैमन जाति (कठियावाड़ी मुसलमानों की एक विशेष जाति) के व्यक्ति। उन दिनों मैमन जाति के लड़के बहुत ही उग्र, व्यसनी, आवारा और जिद्दी हो रहे थे। स्वयं माता पिता भी अपनी इस नयी पीढ़ी से परेशान थे। इसी जाति का एक बिगड़ा दस बारह साल का लड़का घूमता फिरता सभा स्थल आ गया। वह लड़का बीड़ी पी रहा था। इधर उधर खड़े हुए लोगों को धक्के देता हुआ वह लड़का सबसे आगे आ पहुंचा और बीड़ी पीते हुए बड़ी अशिष्टता से गांधी जी की ओर देखने लगा। गांधी जी की  दृष्टि उस पर पड़ी तो उन्होंने अपना भाषण रोक दिया और बड़े अपनत्व से उसकी और देखते हुए बोले- ‘अरे, इतना छोटा लड़का बीड़ी पी रहा है? फेंक दे भाई। बीड़ी फेंक दें।’

गांधीजी के इन शब्दों ने उस लड़के पर जादू का सा प्रभाव पड़ा। सभी लोगों ने यह चमत्कार देखा। उस लड़के ने तत्काल बीड़ी फेंक दी और श्रोताओं में ही एक तरफ बैठकर गांधी जी का भाषण सुनने लगा। यह चमत्कार था गांधीजी के व्यक्तित्व का और अपनत्व से भरे उनके शब्दों का।

बैरिस्टर देवचन्द भाई

गांधी जी सत्य कहने में कभी संकोच नहीं करते थे, चाहे उससे उनके कितने ही निकट के व्यक्ति नाराज क्यों न हो जाये। जैतपुर यात्रा की ही घटना है । गांधी जी जैतपुर में बैरिस्टर देवचन्द भाई के यहाँ ठहरे थे, जो उनके अच्छे मित्र थे। गांधीवादी चिन्तक देवचन्द भाई शुद्ध खादी के बने स्वदेशी वस्त्र पहनते और अत्यन्त सादगी से जीवन व्यतीत करते। अपने क्षेत्र में देवचन्द भाई अत्यधिक सम्मानित भी थे। इस सब के बावजूद गांधीजी ने जब उनका चरखा देखा तो महसूस किया कि वे नित्य प्रति नियमित रूप से चरखा नहीं कातते। इस पर उन्होंने देवचन्द भाई को एक मीठी फटकार दी और संध्या को अपने भाषण में मेजबान की आलोचना करते हुए कहा- आज  देवचन्द भाई के घर मुझे जो चरखा कातने को दिया गया उसकी ताक ही जाम थी। इससे मुझे लगा कि इस चरखे को कोई नियमित रूप से कातता नहीं है। ऐसा नहीं चलेगा। ऐसा ही चलता है तो बेहतर यह है कि मैं उनके यहां ठहरने के बदले किसी हरिजन मोहल्ले में ठहरूं।

बेइज्जती जेल जाने में नहीं चोरी करने में

गांधीजी की सत्यनिष्ठा ने एक बार प्रसिद्ध व्यापारी रूस्तम जी को भी कठिनाई में डाल दिया। लेकिन अन्त में इस सत्यनिष्ठा ने ही उन्हें संकट से उबारा भी। दक्षिण अफ्रीका की घटना है। रूस्तम जी गांधी जी के मुवक्किल थे और सहयोगी भी। प्रायः रूस्तम जी अपने सभी कार्य गांधी जी की सलाह से किया करते थे किंतु एक काम वे गांधी जी से छुपाकर भी करते थे। वह काम यह था कि वे कलकत्ता और बम्बई से जो सामान मंगवाते थे उस पर चुंगी चुरा लेते थे। एक बार उनकी यह चोरी पकड़ी गई। नौबत यहां तक आ पहुंची कि रूस्तम जी के जेल जाने की आशंका उत्पन्न हो गई। रूस्तम जी गांधी जी के पास पहुंचे और अपना सम्पूर्ण अपराध कह सुनाया। गांधी जी ने उन्हें स्पष्ट सलाह दी- सीधे चुंगी अधिकारियों के पास जाकर अपना अपराध स्वीकार कर लो। भले ही इससे जेल हो जाये। बेइज्जती जेल जाने में नहीं चोरी करने में है। गांधी जी की सलाह मानकर रूस्तम जी चुंगी अधिकारियों के पास गए और अपना अपराध स्वीकार कर लिया। रूस्तम जी के सत्य बोलने से चुंगी अधिकारी बहुत खुश हुए। उन्होंने उन पर मुकदमा चलाने का विचार त्याग दिया। जितना धन रूस्तम जी की तरफ बकाया निकला, उससे दुगनी राशि वसूल करके मामला समाप्त कर दिया गया।

जब गांधी जी से मिले मुस्लिम लीगी नेता

गांधीजी सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति थे। वे हर परिस्थिति में समझौता करने और मिलकर साथ चलने में विश्वास करते थे। सत्याग्रह के समय मुस्लिम लीग मुसलमानों को आन्दोलन से अलग रखने की कोशिश कर रही थी। गांधी जी ने जब मुसलमानों से सहयोग की अपील की तो कुछ मुस्लिम नेता गांधी जी से मिले और उनके सामने अनेक ऐसी मांगे प्रस्तुत कीं जिनके बारे में उनका विचार था कि वे मांगे पूरी नहीं की जा सकतीं। मगर गांधीजी ने उनकी सभी मांगे स्वीकार कर लीं। इस पर मुस्लिम नेता बौखलाए। उन्हें तो लीग के उच्च अधिकारियों से किसी भी कीमत पर.सहयोग न देने के निर्देश मिले थे। वे सोच विचार कर जवाब देने की बात कहकर गांधी जी के पास से चले आए। मगर वे फिर लौटे नहीं। जब उन्होंने अपने लीगी नेता जिन्ना से इस सम्बन्ध में बात की तो जिन्ना का सपाट उत्तर था- आप में कोई गांधीजी से न मिले। गांधी जी के विवेक के हमले के सामने टिकना मुश्किल है। अब से कोई गांधी  से मिलने नही जाए। गांधी जी की बात मंजूर नहीं, इतना भर कहलवा देना। भला इस प्रकार की तर्कहीन बातों का क्या उत्तर हो सकता है।

काम का ढोंग नहीं

महात्मा गांधी अपने कर्त्तव्य के प्रति पूर्ण निष्ठावान थे। किसी भी प्रकार के प्रदर्शन या ढोंग से दूर रहते थे। उनकी यह प्रवृत्ति जेल में यथावत बनी रही। उन दिनों वह सश्रम कारावास की सजा भोग रहे थे। एक दिन जब उनके हिस्से का काम समाप्त हो गया तो वे बैठ कर एक पुस्तक पढ़ने लग गए। इस पर जेल का एक सन्तरी उनके पास दौड़ा आया और कहा कि बड़े दरोगा मुआयने के लिए आ रहे हैं। इसलिए वह कुछ न कुछ काम करते रहें। इस बात के लिए गांधी जी ने साफ मना कर दिया और कहा कि वह काम का ढोंग नहीं करेंगे। इससे तो अच्छा यह है कि उन्हें किसी ऐसी जगह भेज दिया जाए, जहां पर काम काफी अधिक हो और जिसे समय से पहले पूरा न किया जा सके।

आज लोग गांधी जी को भूलने लगे हैं। बहुत से लोग गांधीजी को भला बुरा भी कहते हैं। लेकिन गांधी जी के सत्य के प्रयोग हर युग में शाश्वत रहेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)