आपका अखबार ब्यूरो।

स्वाधीनता संग्राम में भारत के जनजातीय समुदाय का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन दुर्भाग्यवश आजादी की लड़ाई के इतिहास में कुछ नामों की ही चर्चा पुस्तकों में मिलती है। जनजातीय समुदाय के नायकों के बारे में इतिहास की किताबों में शायद ही कुछ देखने को मिलता है। डॉ. सच्चिदानंद जोशी और श्री सत्येंद्र सिंह द्वारा संपादित और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र तथा अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘जनजाति गौरव’ इसी अभाव को पूरा करने का एक प्रयास है। इस पुस्तक का लोकार्पण आईजीएनसीए के सभागार ‘समवेत’ में हुआ। लोकार्पण के अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय जनजाति आयोग के सदस्य श्री अनंत नायक, आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष श्री रामचंद्र खराड़ी, आईजीएनसीए के सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी और पुस्तक के लेखन, प्रकाशन से जुड़े लोग उपस्थित थे। इस पुस्तक में जनजातीय समुदाय के 75 वीरों-वीरांगनाओं के बारे में जानकारी दी गई है।

इस अवसर पर आईजीएनसीए की कला दर्शन गैलरी में एक महत्त्वपूर्ण प्रदर्शनी का आयोजन भी किया गया है, जो 27 फरवरी तक चलेगी। इस प्रदर्शनी में स्वाधीनता संग्राम के विभिन्न चरणों में अपना योगदान और बलिदान देने वाले जनजातीय समुदाय के वीरों-वीरांगनाओं के सुंदर पेंसिल स्केच प्रदर्शित किए गए हैं। साथ ही, उनके बारे में उपयोगी जानकारी भी दी गई है। यह प्रदर्शनी स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय समुदाय के योगदान के बारे में बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी देती है।

लोकार्पण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए श्री अनंत नायक ने कहा कि जब वे कॉलेज में पढ़ते थे, तो इस बात को सोचकर परेशान रहते थे कि क्या आजादी की लड़ाई में जनजातीय समुदाय का कोई योगदान नहीं हैं, क्योंकि किताबों में इसका उल्लेख नहीं मिलता था। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास है और पुस्तक के संपादक तथा प्रकाशक बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदायों के कारण अंग्रेजों को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, इसलिए अंग्रेजों ने जनजातीय समुदायों पर काफी अत्याचार किए, उनके खिलाफ दमनकारी कानून बनाए।

श्री रामबहादुर राय ने कहा कि यह पुस्तक जनजातीय लोगों और हमारे लिए एक धर्मग्रंथ की तरह है। हमारे जनजातीय इलाकों और जनजातीय महापुरुषों के बारे में जो उपेक्षा का भाव था, यह पुस्तक उस उपेक्षा के भाव को तोड़ेगी और उनसे परिचित कराएगी, जिनके बारे में हमें बहुत कम जानकारी है। डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि आज ऐसी अनेक कथाएं हमारे सामने आ गई हैं, जहां हम समझ पाते हैं कि आजादी का संघर्ष कुछ उन लोगों का संघर्ष नहीं हैं, जिनके नाम हमारे सामने पिछले 75 सालों से आ रहे थे। यह संघर्ष भारत के कोने-कोने में जन-जन का संघर्ष था।

लोकार्पण कार्यक्रम के प्रारम्भ में छात्रों ने जनजातीय गौरव पर गीत प्रस्तुत किया और अंत में पूर्वोत्तर के छात्रों ने बिहू नृत्य और अन्य नृत्य प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में जनजातीय समुदाय के बलिदानों के बारे में बतातीं छोटी-छोटी फिल्में भी दिखाई गईं।