राजीव रंजन ।जब शब्दों का संसार शालीनता ओढ़कर हमारे बैठकखानों में उतरता था, जब रात के आठ बजते ही घरों में एक अनकहा अनुशासन पसर जाता था, जब समाचार केवल सूचना नहीं, बल्कि संस्कार हुआ करते थे, तब एक आवाज थी, जो विश्वास की तरह हमारे बीच उपस्थित होती थी।
वह आवाज़ थी सरला माहेश्वरी की। सरला माहेश्वरी का जाना केवल एक समाचारवाचिका का अवसान नहीं, यह भारतीय टेलीविज़न पत्रकारिता के उस स्वर्णिम अध्याय का विराम है, जिसमें शब्दों की शुद्धता, उच्चारण की सटीकता और व्यक्तित्व की गरिमा समाचार की आत्मा हुआ करती थी।
1954 में देश की राजधानी दिल्ली में जन्मी सरला जी ने अपने व्यक्तित्व को आकार दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए, एमए और हिंदी में पीएचडी— यह केवल डिग्रियां नहीं थीं, बल्कि भाषा के प्रति उनके समर्पण का प्रमाण थीं। 1976 में, जब वे पीएचडी कर रही थीं, तब उन्होंने दूरदर्शन के उद्घोषक पद के लिए ऑडिशन दिया। चयन हुआ और भारतीय टेलीविज़न को एक ऐसा स्वर मिला, जो आने वाले वर्षों में विश्वसनीयता का पर्याय बनने वाला था।

ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीन प्रसारण तक की यात्रा की वे साक्षी रहीं। उस संक्रमणकाल में, जब देश तकनीकी रूप से आगे बढ़ रहा था, सरला माहेश्वरी की प्रस्तुति शैली ने यह सुनिश्चित किया कि बदलाव केवल रंगों का हो, मूल्यों का नहीं। उनकी आवाज में गंभीरता और आत्मीयता का अद्भुत संतुलन था – न अधिक भावुक, न अधिक कठोर। बस उतना ही, जितना एक समाचार को चाहिए।
1980 और 90 के दशक में, दूरदर्शन का रात आठ बजे का हिंदी बुलेटिन राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा था। सप्ताह में कम से कम तीन दिन वे उस बुलेटिन का चेहरा और स्वर होती थीं। तब एंकर केवल प्रस्तोता नहीं, खबर की विश्वसनीयता का प्रतीक होते थे। वे खबरों को बिना निजी राय, बिना उत्तेजना, बिना शोर के प्रस्तुत करती थीं। समाचार जैसे होते थे, वैसे ही दर्शकों के सामने रख दिए जाते थे— संतुलित, संयत और संस्कारित।

आज जब ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ के नाम पर कोलाहल बढ़ गया है, तब सरला माहेश्वरी की स्मृति और भी अधिक उदास कर देती है। वे उस युग की प्रतिनिधि थीं, जब शब्दों का वजन समझा जाता था और वाक्य संयम से गढ़े जाते थे। उनकी पहचान केवल एक समाचारवाचिका तक सीमित नहीं रही। वे भारतीय आदर्श नारी की गरिमामयी छवि थीं – शिक्षाविद, संस्कृतिमना व्यक्तित्व और महिला सशक्तीकरण की सजीव मिसाल। उनका फैशन सेंस सादगी में सौंदर्य का उदाहरण था – नितांत मर्यादित, किंतु प्रभावशाली। वे बताती थीं कि आधुनिकता और परंपरा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं।
1984 से 1986 तक उन्होंने बीबीसी इंग्लैंड में भी कार्य किया। यह उनकी प्रतिभा की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति थी। परंतु वैश्विक अनुभव के बावजूद, उनकी जड़ें भारतीयता में गहराई से धंसी रहीं। उनके उच्चारण में हिंदी की आत्मा बसती थी।
वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ला लिखते हैं- “मुझे याद आ रही है 1983 या 84 की एक घटना। एक बार मैं और मेरा एक दोस्त लाल किले पर पास बस का इंतजार कर रहे थे। बस आ नहीं रही थी। फिर हमने एक फोर सीटर से ही सफर करने का फैसला किया। जिस फोर सीटर पर बैठे, उसमें सरला जी पहले से मौजूद थीं। हमने उनसे बड़ी हिम्मत करके पूछा- क्या आप ही टीवी पर खबरें पढ़ती हैं? उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- आपने ठीक पहचाना।”
वह क्षण बताता है कि लोकप्रियता के शिखर पर होते हुए भी वे कितनी सहज थीं।
उन्होंने कुछ वर्षों तक सरला जरीवाला नाम से भी समाचार पढ़े, पर नाम से अधिक उनकी पहचान उनके स्वर ने बनाई। नवभारत टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि वे देवकीनंदन पांडे के समाचार वाचन की कायल हैं। यह उनकी विनम्रता थी – स्वयं शिखर पर होते हुए भी प्रेरणा स्वीकार करने का साहस।
उनका पारिवारिक जीवन भी उतना ही संतुलित और प्रेरक रहा। पति पवन माहेश्वरी एक प्रतिष्ठित गैस्ट्रोएन्टेरोलॉजिस्ट; पुत्र कविश माहेश्वरी प्लास्टिक सर्जन और हिमांशु माहेश्वरी—अपने-अपने क्षेत्रों में अग्रसर। वे एक सफल पेशेवर के साथ-साथ एक स्नेहमयी पत्नी और मां भी थीं। आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो लगता है मानो दूरदर्शन के स्टूडियो में फिर से वह शांत स्वर गूंज उठेगा। पर अब वह उद्घोष केवल स्मृति में है। उनका जाना एक युग का अवसान है, पर उनकी विरासत अक्षुण्ण है।
उन्होंने समाचार पढ़ने के लहजे से हमें सिखाया है कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, संस्कार का दर्पण भी है। पत्रकारिता केवल सूचना नहीं, उत्तरदायित्व भी है। उनका जीवन बताता है कि स्त्री की शक्ति उसकी शालीनता, विद्वत्ता और आत्मविश्वास में निहित है। सरला माहेश्वरी अब हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी आवाज भारतीय टेलीविजन के इतिहास में सदा गूंजती रहेगी – विश्वास की तरह, गरिमा की तरह और एक ऐसी स्मृति की तरह,
जो समय के शोर में भी शांति का अहसास कराती है।
विनम्र श्रद्धांजलि।



