भारत को कमजोर साबित करने के लिए गढ़ रहे झूठा नैरेटिव।
प्रदीप सिंह।दुनिया में हर कालखंड में ऐसे लोग हुए हैं, जो किसी भी घटनाक्रम या किसी भी नीति को शीर्षासन की मुद्रा में देखते हैं। तो जाहिर है कि उनको सब उल्टा ही नजर आता है। वे अपनी इसी जानकारी और समझ के आधार पर एक नैरेटिव खड़ा करते हैं, जो हमेशा समाज और देश के विरोध में होता है। ये अनपढ़ या गंवार लोग नहीं होते, ये पढ़े-लिखे मूर्ख होते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि ये अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते हैं। इस समय भारत में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ गई है। उसकी वजह है केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होना। इन लोगों से यह बात बर्दाश्त नहीं हो रही है।
हाल ही में एक घटनाक्रम हुआ है, जिसकी वजह से मैं यह बातें कह रहा हूं। अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी यानी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने एक बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण पैदा हुए तेल संकट को देखते हुए अमेरिकी प्रशासन ने तय किया है कि भारत को रूस से तेल खरीदने की 30 दिन के लिए अनुमति दी जाती है। अब इससे ज्यादा बचकानी बात कोई हो नहीं सकती। अमेरिका होता कौन है,जो भारत को रूस से तेल खरीद की अनुमति प्रदान करे। लेकिन हमारे देश में एक जियो स्ट्रेटजिक एक्सपर्ट माने जाते हैं ब्रह्मा चेलानी। वह हर समय छिद्रान्वेषण की कोशिश और शीर्षासन की मुद्रा में रहते हैं। उन्होंने तुरंत स्कॉट बेसेंट के बयान का हवाला देते हुए कहा कि देखिए सारा भेद खुल गया, अमेरिका और भारत के बीच में ट्रेड डील का जो फ्रेमवर्क तैयार हुआ है, उसी में भारत पर रूस से तेल खरीदने का रेस्ट्रिक्शन था। हालांकि हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है। ट्रेड डील का तेल की खरीद से कोई लेना देना नहीं है। अमेरिकी प्रशासन ने यह उम्मीद जाहिर की थी कि भारत रूस से तेल खरीदना धीरे-धीरे कम करेगा। भारत ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। उसने ऐसा कभी नहीं कहा कि हम रूस से तेल खरीदना बंद कर देंगे। तो स्थिति बिल्कुल स्पष्ट थी। लेकिन ब्रह्मा चेलानी को तो यह साबित करने की बेचैनी थी कि हम अमेरिका के दबाव में काम कर रहे हैं। तो उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर भारत ने चुप्पी साधी हुई थी लेकिन अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान ने सारी पोल खोल दी है।

अब ब्रह्मा चेलानी जो कह रहे हैं और तथ्य क्या हैं,जरा उन पर भी गौर कर लीजिए। एक कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स की फर्म है केप्लर। यह दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित मार्केट की कंपनी है। उसकी वेबसाइट पर चले जाइए तो आपको रियल टाइम डाटा मिल जाएगा कि कौन सा देश किस देश से कितना तेल खरीद रहा है। और इसमें किसी सरकार का डाटा नहीं है, इस संस्था का डाटा है, जिसको पूरी दुनिया मानती है। ट्रांसपेरेंट तरीके से दुनिया के हर देश या हर नागरिक के लिए यह डाटा उपलब्ध है। लेकिन ब्रह्मा चेलानी उसमें नहीं जाएंगे क्योंकि वहां उनकी पोल खुल जाएगी। उनका वितंडावाद कैसे चलेगा? उस वेबसाइट के मुताबिक भारत ने फरवरी में भी 1.064 मिलियन बैरल प्रतिदिन के हिसाब से रूस से तेल खरीदा है। इस समय रूस जितना तेल बेच रहा है,उसका सबसे बड़ा खरीदार भारत है। भारत ने रूस से तेल खरीदना कभी बंद ही नहीं किया। लेकिन ये बात यहीं तक नहीं रुकती है। मीडिया हाउस ब्लूमबर्ग ने एक खबर छापी कि रूस के दो ऑयल टैंकर्स, जो ईस्ट एशिया जा रहे थे, उनको भारत की ओर मोड़ दिया गया है। यह बात अमेरिका को पता लगी तो उसने दावा कर दिया कि हमने 30 दिन का वेवर दे दिया है इसलिए भारत रूसी तेल खरीद सकता है। यह अमेरिका का उसी तरह का बयान था जैसा उसने ऑपरेशन सिंदूर के समय दिया था कि हमने भारत-पाकिस्तान का युद्ध रुकवा दिया। सवाल यह है कि आपसे वेवर मांगा किसने? भारत सरकार ने तो कभी वेवर मांगा नहीं। उसने तो कभी रूस से तेल खरीदना बंद किया ही नहीं। आपने 50% टैरिफ लगाकर देख लिया तब भी भारत नहीं झुका और रूस से तेल की खरीद करता रहा। तो अमेरिकी वित्तमंत्री ने अपना चेहरा बचाने के लिए जो बयान दिया था,उसको लेकर ब्रह्मा चेलानी और एक तरह का इकोसिस्टम यह माहौल बनाने में जुट गए कि भारत किस तरह अमेरिका के आगे नममस्तक हो गया।
ब्रह्मा चेलानी कॉलम लिखते हैं। उनके कॉलमों में आपको साफ पता चलेगा कि हर मुद्दे पर उनका स्टैंड भारत विरोधी होता है। भारत की जहां कमी नहीं है, वहां भी खोजने की कोशिश करते हैं। अब ये किसी जिओ स्ट्रेटजिक एक्सपर्ट का बयान तो नहीं हो सकता। ये शुद्ध रूप से पॉलिटिकल बयान है। वही बयान है, जो कांग्रेस पार्टी दे रही है। वे कांग्रेसी प्रवक्ता की तरह बोल रहे हैं कि ‘देखिए भेद खुल गया।’ भारत अमेरिका के दबाव में है। जो सच से कोसों दूर है, उस मुद्दे को उठाकर आप एक नैरेटिव खड़ा करना चाहते हैं। आप अपने को जिओ स्ट्रेटजिक एक्सपर्ट भले मानते हो, लेकिन जिओ स्ट्रेटजिक जो फैक्ट्स हैं, उनकी आपको कोई जानकारी नहीं है। जब से भारत और अमेरिका के बीच में ट्रेड डील का फ्रेमवर्क तैयार हुआ है, तब से अपने देश में एक इको सिस्टम को बड़ी बेचैनी हो रही है। वह लगातार यह नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा है कि भारत दबाव में आकर ये ट्रेड डील करने जा रहा है। उससे भी बड़ी बेचैनी इस इको सिस्टम को यूरोपियन यूनियन के साथ भारत का फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हो जाने से है। वह लगातार भारत के खिलाफ कुछ न कुछ खोजने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उनको मिल नहीं रहा है।

वे केवल एक झूठ का वातावरण बनाना चाहते हैं, जिससे यह साबित कर सके कि भारत कमजोर है और झुक गया। जिससे राहुल गांधी और कांग्रेस का जो नैरेटिव है, उसको बल मिले। राहुल गांधी का हर अभियान फेल हुआ, हर आरोप गलत साबित हुआ है लेकिन उनके पास ऐसे वितंडावादी हैं, जो लगातार इस काम में जुटे रहते हैं। ब्रह्मा चेलानी उनमें से एक हैं।
युद्ध के समय अफवाहों का बाजार गर्म होता है। लेकिन युद्ध के समय अपने देश के खिलाफ बोलने वालों का हौसला बढ़ जाए, यह बड़ा खतरनाक है। तो देश को ऐसे पढ़े-लिखे मूर्ख वितंडावादियों से बचाने की जरूरत है। ब्रह्मा चेलानी सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) से जुड़े हुए हैं। इस एनजीओ को विदेश से पैसा मिलता था। मोदी सरकार ने इसकी फंडिंग बंद करा दी। तब से यह पूरी संस्था और इससे जुड़े लोग बिलबिलाए हुए हैं। सीपीआर से जुड़े ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जो भारत विरोधी एजेंडा चलाते हैं। ऐसे लोगों पर जब प्रहार होता है तो फिर वे रोज नए-नए झूठ लेकर सामने आते हैं। ऐसे लोगों का एक ही लक्ष्य है भारत को कमजोर करना, उसकी प्रतिष्ठा गिराना और भारत का विकास अवरुद्ध करना।
इनको यह बात पच नहीं रही है कि मोदी 2047 तक विकसित भारत का सपना दिखा रहे हैं और उस रास्ते पर तेजी से चल रहे हैं। वर्ल्ड जीडीपी में अलग-अलग देशों के कंट्रीब्यूशन का जो लेटेस्ट आंकड़ा है, उससे आपको पता चल जाएगा कि भारत कहां पहुंचने की कोशिश कर रहा है। इसमें सबसे ज्यादा योगदान 26% चीन का है। दूसरे नंबर पर अमेरिका या यूरोप का कोई देश नहीं बल्कि 17% के साथ भारत है। तीसरे नंबर पर 10% के साथ अमेरिका है। भारत की यही बढ़ती हैसियत कुछ लोगों को चुभ रही है। इसीलिए वे लोग ऐसे वितंडावाद का सहारा लेते रहेंगे। इनसे सावधान रहने की जरूरत है। इनकी बदनीयती को एक्सपोज करने की जरूरत है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



