सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आधिकारिक कर्तव्यों के संबंध में कार्यस्थल पर मौखिक फटकार धारा 504 आईपीसी के तहत आपराधिक अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यदि नियोक्ता या सीनियर अधिकारी कर्मचारियों के कार्य निष्पादन पर सवाल नहीं उठाता है तो कर्मचारी के कदाचार को संबोधित न करना मिसाल कायम कर सकता है, जिससे अन्य लोग भी इसी तरह का व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहित होंगे।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने कहा, “यदि अभियोजन पक्ष और शिकायतकर्ता की ओर से की गई व्याख्या स्वीकार कर ली जाती है तो इससे कार्यस्थलों में स्वतंत्रता का घोर दुरुपयोग हो सकता है। इसलिए हमारी राय में सीनियर की फटकार को धारा 504, आईपीसी के तहत ‘जानबूझकर अपमान करने के इरादे से’ उचित रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, बशर्ते कि फटकार कार्यस्थल से संबंधित मामलों से संबंधित हो, जिसमें अनुशासन और उसमें कर्तव्यों का निर्वहन शामिल हो।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि “केवल गाली-गलौज, अशिष्टता, धारा 504, आईपीसी के अर्थ में जानबूझकर अपमान नहीं मानी जाती।” इस संबंध में मोहम्मद वाजिद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2023 लाइव लॉ (एससी) 624 के फैसले का संदर्भ दिया गया।

न्यायालय ने कहा, “यदि अभियुक्त उकसावे का इरादा नहीं रखता है तो अपराध नहीं बनता है। ‘अपमान करने के इरादे’ के बिना अपमान धारा 504, आईपीसी के तहत दंडनीय नहीं है। इसके अलावा, ‘जानबूझकर अपमान’ इस हद तक होना चाहिए कि यह किसी समझदार व्यक्ति को सार्वजनिक शांति भंग करने या कोई अन्य अपराध करने के लिए उकसाने की क्षमता रखता हो।”

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने ऐसा मानते हुए सिकंदराबाद के बौद्धिक दिव्यांग व्यक्तियों के सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय संस्थान (NIEPID) के निदेशक के खिलाफ मामला खारिज कर दिया, जिन्होंने स्टूडेंट के माता-पिता द्वारा अपने कर्तव्यों के पालन में लापरवाही के बारे में कई शिकायतों के बाद सहकर्मियों के सामने शिकायतकर्ता को फटकार लगाई थी।

तेलंगाना हाईकोर्ट के उस निर्णय को निरस्त करते हुए, जिसमें मामले को निरस्त करने से इनकार कर दिया गया था, जस्टिस मेहता द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया कि अनुशासन बनाए रखने के प्रयास के लिए संस्थान (कार्यस्थल) के निदेशक के विरुद्ध आपराधिक आरोप लगाने की अनुमति देने से कार्यस्थल में आवश्यक संपूर्ण अनुशासनात्मक वातावरण को नुकसान पहुंचाने वाले विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं।

मामले को निरस्त करने के लिए इसे उपयुक्त मामला पाते हुए न्यायालय ने कहा: “इसके पीछे उद्देश्य केवल अधीनस्थों की कथित अनुशासनहीनता को नियंत्रित करना था, जिन पर अपने कर्तव्यों के निष्पादन से बचने तथा पेशे के प्रति सुस्त, उदासीन और शिथिल दृष्टिकोण प्रदर्शित करने का आरोप लगाया गया। यदि इस तरह के व्यवहार को सीनियर अधिकारियों द्वारा नहीं रोका जाता है, जिन्हें प्रशासन का कार्य सौंपा गया तो यह अन्य कर्मचारियों के लिए भी ऐसा करने का प्रीमियम बन सकता है।”

न्यायालय ने कहा, “हमें आरोपपत्र में लागू किए गए अपराधों को बनाने वाले आवश्यक तत्वों का अस्तित्व नहीं मिला, जिससे अपीलकर्ता के खिलाफ आगे अभियोजन की अनुमति मिल सके। इसलिए यह अपीलकर्ता के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने के लिए उपयुक्त मामला है।”