#pramodjoshiप्रमोद जोशी।
बुनियादी सवाल अब भी अपनी जगह है। बांग्लादेश में चुनाव होंगे या नहीं और हुए तो परिणाम क्या होगा, कैसी सरकार बनेगी? अंतरिम सरकार को जो आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयाँ विरासत में मिली हैं, वे अब और बढ़ गई हैं, जो आने वाली सरकार के मत्थे मढ़ी जाएँगी। भारत के साथ रिश्ते भी इन चुनाव-परिणामों पर निर्भर करेंगे।

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ब्रह्म चेलानी जैसे रक्षा पर्यवेक्षक मानते हैं कि पिछले साल देश में हुए सत्ता-परिवर्तन के पीछे सेना की भूमिका थी। बांग्लादेश का कोई विरोधी देश नहीं है, फिर भी उसने दो लाख से ज़्यादा सैनिकों वाली बड़ी सेना खड़ी कर रखी है।

सेना के पास सुरक्षा की बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं है, इसलिए उसके अफसर लंबे समय से राजनीतिक चालें चलते रहे हैं। जब सेना सीधे शासन नहीं करती है, तब पाकिस्तानी सेना की तरह असैनिक सरकारों के मार्फत राजनीतिक सत्ता की गोटियाँ खेलती है।

सेना को अमेरिकी समर्थन भी हासिल है। शेख हसीना के तख्तापलट को अमेरिका की मौन स्वीकृति थी। 2009 के बाद से दुनिया भर में दो दर्जन से ज़्यादा तख्तापलट हुए हैं। इनमें से ज्यादातर की अमेरिका ने निंदा नहीं की, क्योंकि वह उन्हें अमेरिकी हितों के अनुकूल मानता है।

आमतौर पर अमेरिका तख्तापलट की निंदा तब करता है जब वह तख्तापलट क्षेत्र में अमेरिकी शक्ति और प्रभाव के लिए हानिकारक हो। हाल में ट्रंप ने पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष को जिस तरह से वाइट हाउस में बुलाया, वह भी इस बात की पुष्टि करता है।

शेख हसीना ने सेना और इस्लामी उग्रवाद पर तब तक लगाम लगाए रखी, जब तक कि सेना प्रमुख ने छात्रों के नेतृत्व वाले विद्रोह का इस्तेमाल भीड़ की हिंसा को पुलिस और अर्धसैनिक बलों के नियंत्रण से बाहर जाने देकर उन्हें सत्ता से बेदखल करने के लिए नहीं कर दिया।

पाकिस्तान-परस्ती

पिछले एक साल में बांग्लादेश के साथ संबंधों में सुधार लाने वाला एकमात्र देश पाकिस्तान है, जिसे पहले उत्पीड़क माना जाता था, जिससे बांग्लादेश ने 1971 के अपने मुक्ति संग्राम के माध्यम से आज़ादी मांगी थी।

दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें फिर से शुरू हो गई हैं। पर भारत के ऊपर से होकर गुज़रे बिना, ये उड़ानें पाकिस्तान के साथ व्यापार की संभावनाओं को सीमित ही करेंगी।

इस्लामी समूहों से प्रभावित छात्र पूरी व्यवस्था को बदल देना चाहते हैं। उनका दावा है कि शेख हसीना का तख्तापलट क्रांति थी, जिसने हमें संविधान को फिर से लिखने और देश की राजनीतिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने का जनादेश दिया है।

भारत के साथ तनाव

हर रोज़ कोई न कोई ऐसी खबर निकल कर आती है, जिससे इस नई राजनीति में भारत के प्रति दुर्भावना झलकती है। हाल में ऐसी ही एक खबर है विवादास्पद भारतीय उपदेशक ज़ाकिर नाइक की यात्रा को मंजूरी देना। हालाँकि बाद में सरकार ने कहा कि चुनाव के पहले ज़ाकिर नाइक की यात्रा की अनुमति नहीं दी है।

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इसी तरह मुहम्मद यूनुस ने हाल में एक पाकिस्तानी जनरल को एक पुस्तक भेंट की, जिसके कवर पर ऐसा नक्शा बना था, जिसमें भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बांग्लादेश का हिस्सा दिखाया गया है।

यह घटना पाकिस्तान के जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष जनरल साहिर शमशाद मिर्जा की हाल की ढाका यात्रा के दौरान घटी। यह यात्रा 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार के संकेतों के बीच हुई। अब पाकिस्तान की नौसेना के प्रमुख एडमिरल नवीद अशरफ भी वहाँ पहुँचे हैं।

पूर्वोत्तर का ज़िक्र

विश्लेषक मानते हैं कि यूनुस का बार-बार भारतीय पूर्वोत्तर का ज़िक्र करना उनके पाकिस्तान और चीन की ओर बढ़ते झुकाव को दर्शाता है। हालाँकि यूनुस ने नक्शे के प्रकरण पर सफाई दी है कि वह देश में पिछले साल हुए आंदोलन के दौरान दीवारों पर की गई चित्रकारी का एक नमूना था, पर प्रतीक रूप में ही उसका पाकिस्तानी फौजी जनरल को समर्पित किया जाना, काफी मायने रखता है।

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ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब यूनुस ने भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के बारे में टिप्पणी की है। अप्रैल 2025 में अपनी चीन यात्रा के दौरान, उन्होंने बांग्लादेश को इस क्षेत्र के लिए ‘समुद्र का एकमात्र संरक्षक’ बताते हुए कहा था, ‘भारत के सात राज्य, भारत का पूर्वी भाग… चारों ओर से ‘स्थल-रुद्ध’ क्षेत्र हैं। उनके पास समुद्र तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं है।’

बढ़ता अविश्वास

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ का मुद्दा, लंबे समय से दोनों देशों के लिए परेशानी का सबब रहा है। शेख हसीना की सरकार होने के कारण दोनों ने इन परेशानियों को सुलझाने की कोशिश की थी। पर अब दोनों तरफ से अविश्वास है।

पिछले तीन दशकों से भारत के साथ घनिष्ठ आर्थिक संबंधों के कारण सीमाएँ खुलने से बांग्लादेश को व्यापार के लिए अतिरिक्त भूमि और समुद्री मार्ग उपलब्ध हुए थे, जो अब प्रभावित हो रहे हैं। हालाँकि बिजली आयात के लिए बांग्लादेश-भारत-नेपाल त्रिपक्षीय समझौता अभी लागू है, पर भविष्य को लेकर आशंकाएँ ही हैं।

पिछले साल दिसंबर में बांग्लादेश ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए इंटरनेट कनेक्टिविटी की सुविधा को खत्म कर दिया था। अब भारत ने अपनी तकनीक से पूर्वोत्तर को इंटरनेट से अच्छी तरह जोड़ लिया है। उधर भारत ने बांग्लादेश के साथ एक ट्रांसशिपमेंट समझौता खत्म कर दिया है।

भारतीय चिंता

भारत ने हाल में सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बांग्लादेश सीमा पर तीन नए फौजी बेस स्थापित किए हैं। सिलीगुड़ी कॉरिडोर को चिकेंस नेक के नाम से भी जाना जाता है। यह मुख्य भूमि भारत को इसके सात पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाली 22 किलोमीटर चौड़ी महत्वपूर्ण पट्टी है।

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हाल में खबर आई है कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास स्थित लालमोनिरहाट एयरबेस पर बांग्लादेश, एक नई वायुरक्षा रेडार प्रणाली स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है। ऐसा भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान की खुफिया आपत्तियों के बावजूद हो रहा है।

बांग्लादेश ने चीनी रक्षा कंपनियों के साथ अपने सैन्य-तकनीकी सहयोग को और गहरा किया है। बांग्लादेश के फौजी अधिकारियों ने 13 मई को चाइना वैनगार्ड कंपनी लिमिटेड के प्रतिनिधियों से मुलाकात की और चीन निर्मित प्रणालियों की खरीद पर चर्चा की।

इनमें एचक्यू-17एई कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, जेएसजी शृंखला के लक्ष्य पहचान रेडार और एफके-3 मध्यम दूरी की सैम मिसाइलें शामिल हैं।

तुर्की में बने टीआरजी-300 कैप्लान मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम की तैनात किए जा चुके हैं। चीनी एसवाई-400 कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल की खरीद की बात चल रही है।

इसी घटनाक्रम के बरक्स रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने अंतरिम मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस को ‘अपने शब्दों पर ध्यान देने’ की चेतावनी दी है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारत दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता नहीं देखना चाहता।

वर्तमान सरकार को जनता ने नहीं चुना है, बल्कि वह सेना की सहायता से कब्ज़ा करके आई है। ऐसे में चुनाव ज़रूरी हैं, ताकि बांग्लादेश की जनता का राय सामने आए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। आलेख ‘जिज्ञासा’ से  साभार)