अमेरिका-इजराइल को ईरान पर हमले के लिए सऊदी अरब ने उकसाया

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

जिसका डर था, वह हो गया। इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर वहां के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को मार दिया। हमले में ईरानी सेना के टॉप कमांडर भी मारे गए और ईरानियन रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का हेडक्वार्टर ध्वस्त हो गया। ईरान का शासन संभालने के लिए अब थ्री मेंबर कमेटी बना दी गई है। दरअसल अमेरिका और इजराइल पहले ही यह तय कर चुके थे कि ईरान से कोई समझौता नहीं करना है, सिर्फ हमला करना है। जो बातचीत चल रही थी वह सिर्फ एक नाटक था। वे केवल टाइम बाय करने की कोशिश कर रहे थे। यह जो कुछ हुआ है,उसे लेकर मैं दो मुद्दों पर आपका ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूं।

पहला मुद्दा जो आम धारणा थी, ठीक उसके विपरीत है। आपने सुना होगा कि खाड़ी के देश अमेरिका पर लगातार दबाव डाल रहे थे कि वह ईरान पर हमला न करे। लेकिन वाशिंगटन पोस्ट की जो लेटेस्ट खबर है उसके मुताबिक सऊदी अरब ने इजराइल और अमेरिका दोनों पर दबाव डाला कि वे ईरान पर हमला करें। दूसरा काम जो ईरान ने किया। ईरान ने हमले के जवाब में खाड़ी के देशों में जो अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं, उन पर हमला कर दिया,लेकिन साथ ही उसने एक बहुत बड़ी गलती भी कर दी। उसने कतर, यूएई, कुवैत, बहरीन और इराक में सिविलियन पापुलेशन और सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी मिसाइलें बरसा दीं। ये वह देश हैं, जिन्होंने अमेरिका को चेतावनी दी थी कि अगर वह ईरान पर हमला करेगा तो वे अपने एयरबेस का इस्तेमाल नहीं होने देंगे। सिविलियन इलाकों पर हमले का नतीजा यह हुआ है कि खाड़ी के देश ईरान के खिलाफ हो गए हैं। तो जो इस्लामी नाटो बनाने और इस्लामी दुनिया की एकता का सपना देखा जा रहा था,वह टूट गया है। अमेरिका और इजराइल दोनों यही चाहते थे। अब शिया और सुन्नी के बीच की दरार और चौड़ी हो गई है। ईरान शिया देश जबकि सऊदी अरब सुन्नी देश है और दोनों ही इस्लामिक ताकतों का मुखिया बनना चाहते हैं। सऊदी अरब को लगा कि ईरान अगर खत्म हो जाएगा तो मुस्लिम वर्ल्ड की लीडरशिप उसके हाथ आ सकती है। हालांकि अभी ये बहुत दूर की बात है।

खामेनेई की मौत के बाद ऐसा नहीं है कि ईरान का जो मजहबी स्ट्रक्चर था,वह पूरी तरह से खत्म हो गया। लेकिन ईरान पर हुए इस हमले में ध्यान देने की बात यह है कि अमेरिका और इजराइल ने जिस तरह से वहां अपने लक्ष्यों को निशाना बनाया,वह बताता है कि खामेनेई की जो पूरी व्यवस्था थी, उसमें इजराइल पेनिट्रेट कर चुका है। सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस या  सेटेलाइट इमेज के आधार पर इतने सटीक हमले  नहीं हो सकते। इजराइल दो साल से ईरान में ह्यूमन इंटेलिजेंस कलेक्ट कर रहा है इसलिए उसको मालूम था कि खामेनेई किस समय पर कहां थे और उसने पहली ही स्ट्राइक में उन्हें खत्म कर दिया।

तो इजराइल और अमेरिका के इस संयुक्त अभियान से इस्लामी आतंकवाद के एक सेंटर को बहुत बड़ा आघात पहुंचा है। इसे लेकर जहां-जहां शिया आबादी है, चाहे आप इराक में देख लीजिए या भारत में,प्रदर्शन हो रहे हैं। श्रीनगर और लखनऊ में शिया लोग सड़क पर आ गए। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अमेरिका और इजराइल के हमले का विरोध करते हुए कहा कि लोगों को शोक मनाने देना चाहिए। सवाल है कि उनकी यह जबान तब कहां थी, जब लाखों हिंदू कश्मीर से पलायन कर गए थे। ये जबान तब कहां थी, जब पहलगाम में हिंदुओं को धर्म पूछकर मारा गया। तब शोक मनाने के लिए कौन आया था ? इस बात को समझिए कि एक पूरा इको सिस्टम है जो दुनिया में आतंकवाद का मजहब के नाम पर समर्थन करता है। महबूबा मुफ्ती भी कह रही हैं कि अल्लाह ईरान की रक्षा करे। उनको भी अल्लाह तभी याद आते हैं जब किसी इस्लामी देश पर संकट आता है। जब अपने ही देश में हिंदुओं पर उनके द्वारा अत्याचार किया जाता है,तब उनको अल्लाह की याद नहीं आती है। तो इसलिए जो हमारे यहां विरोध-प्रदर्शन के लिए सड़कों पर निकल रहे हैं,उनके साथ सख्ती से निपटा जाना चाहिए। इसे किसी ईरान या किसी खामेनेई के समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे सीधे-सीधे आतंकवाद के समर्थन के रूप में देखा जाना चाहिए और इनसे उसी तरह से निपटा भी जाना चाहिए।

खामेनेई की मौत के बाद अमेरिका का उद्देश्य ईरान में रिजीम चेंज का जरूर है, लेकिन ऐसा जल्दी होने वाला नहीं है। उसमें बड़ा लंबा समय लगने वाला है। ईरान में सत्ता परिवर्तन होने वाला है या जनता ने बगावत कर दी है,इसका प्रमाण तब मिलता है जब बाजारी सड़क पर उतरते हैं। बाजारी मतलब व्यापार करने वाले या दुकानदार। 1979 में जब क्रांति हुई थी और शाह हटाया गया था, तब भी बाजारी सड़क पर उतरे थे। इस बार भी उतर चुके हैं। यह जो लोग प्रदर्शन करते हुए खामेनेई के लिए दुख जता रहे हैं, क्या इन्हें तब दुख हुआ जब खामेनेई ने सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों की निर्ममता से हत्या करवाई। उन्हें जेल में बंद करके यातना दी गई। तब ये कहां थे?

अब सवाल यह भी है कि ईरान इस युद्ध में कितने दिनों तक टिक पाएगा? ईरान की वह ताकत नहीं है कि इस युद्ध को लंबा चला सके। बहुत से लोग उदाहरण देते हैं ईरान-इराक युद्ध 10 साल चला। वे यह भूल जाते हैं कि तब ईरान इराक से लड़ रहा था, अमेरिका और इजराइल से नहीं। दूसरा, ईरान उस समय आर्थिक रूप से बहुत शक्तिशाली था। आज ईरान आर्थिक रूप से जर्जर हो चुका है। वहां भुखमरी की नौबत है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान 10 दिन से ज्यादा इस युद्ध को सस्टेन नहीं कर सकता।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)