विशेषज्ञ मान रहे, 2050 तक दुनिया में शीर्ष पर होगा भारत।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

आधुनिक इतिहास ने चार साम्राज्यों का उत्थान भी देखा और उनका पतन भी। आज उनका नाम लेवा तक कोई नहीं है। अब एक पांचवां साम्राज्य है, जिसके पतन का बीजारोपण हो गया है। तो पहले जिन चार साम्राज्यों की बात मैंने की, उनकी बारे में जान लिया जाए।

तुर्की का ऑटोमन साम्राज्य,जिसको कैलिफेट भी कहते थे, यूरेशिया के बड़े हिस्से में फैला था। पश्चिम में स्पेन,पुर्तगाल,बाल्कन, पूर्वी यूरोप, अफ्रीका के कई क्षेत्र और सेंट्रल एशिया पर उसका राज था। साइंस और मेडिसिन के क्षेत्र में सफलता,नए रिसर्च,नए आविष्कार इस साम्राज्य की विशेषता थे। लेकिन 1924 आते-आते सब खत्म हो गया। जब तुर्की में खलीफा को हटा दिया गया,उस समय इस साम्राज्य को बचाने की कोशिश महात्मा गांधी ने जरूर की, जब उन्होंने भारत में खिलाफत आंदोलन शुरू किया। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध में पराजय से पूरा कैलिफेट एक तरह से समाप्त हो गया। अब उसका छोटा सा हिस्सा तुर्की के रूप में बचा हुआ है। इसी तरह भारत में मुगल साम्राज्य था। इस साम्राज्य में हिंदुओं पर बहुत अत्याचार हुए। बड़े पैमाने पर उनकी हत्या की गई, महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ, मंदिरों को तोड़ा गया, हिंदुओं की संपत्ति पर कब्जा कर उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया, जिसने नहीं किया उनसे जजिया वसूला गया। लेकिन कहते हैं कि कोई भी चीज स्थाई नहीं होती है। अच्छा भी खत्म होता है, बुरा भी खत्म होता है। तो मुगल साम्राज्य भी खत्म हुआ। उसकी जगह ब्रिटिश साम्राज्य ने ली।

ब्रिटिशर्स भारत में आए तो व्यापार करने के लिए थे लेकिन एक-एक राज्य को अपने अधिकार में करते गए। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्य का भी पतन शुरू हो गया। अब केवल इंग्लैंड बचा हुआ है। वह भी कितने दिन तक बचा रहेगा कहना मुश्किल है क्योंकि इंग्लैंड अपनी सांस्कृतिक पहचान खो चुका है। कुछ दशकों बाद इंग्लैंड में आपको इंग्लिश मैन खोजे नहीं मिलेंगे। आज जो भी लोग लंदन जाते हैं,वह बताते हैं कि वहां की सड़कों पर दाढ़ी और टोपी ज्यादा दिखाई देती है। अंग्रेज कम दिखाई देंगे। आपको लगेगा कि किसी इस्लामी देश में आ गए। लंदन का मेयर एक पाकिस्तानी मूल का मुसलमान है। और अब तो बातें चलने लगी हैं कि पाकिस्तानी मूल की एक नेता ब्रिटेन की प्रधानमंत्री भी बन सकती है। भारत में शासन के दौरान ब्रिटिशर्स ने हमारी संस्कृति पर हमला  किया। सनातन को पुरातन पंथी बताया जबकि दुनिया में सनातन से ज्यादा साइंटिफिक कोई मजहब है ही नहीं। भारत में उन्होंने केवल लूट की। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कर्ज में डूबा हुआ ब्रिटेन अपनी कॉलोनीज को संभालने में सक्षम नहीं रह गया। 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। इसी तरह से चाइना में किंग साम्राज्य था। वह भी धीरे-धीरे नष्ट हो गया। इन चार राज्यों का उत्थान और पतन इतिहास ने देखा है।

अब बात पांचवें साम्राज्य की। 1776 में अमेरिका जब आजाद हुआ तब मुल्क में गरीबी,अशिक्षा, बेरोजगारी का बोलबाला था। आज जो अमेरिका हमको मानवता और ह्यूमन राइट्स का पाठ पढ़ाता है उसका अतीत क्या है,यह जान लेना बड़ा जरूरी है। सिर्फ 65 साल पहले 1960 तक की बात कर रहा हूं, जब अमेरिका के रेस्टोरेंट्स में काले और गोरे अलग-अलग बैठते थे। कालों के साथ खूब भेदभाव होता था। 1929-30 में अमेरिका में ग्रेट डिप्रेशन आया। वहां की वित्तीय व्यवस्था ध्वस्त होने लगी। स्टॉक मार्केट 75% तक गिर गया। बहुत से अमेरिकियों ने आत्महत्या कर ली। द्वितीय विश्व युद्ध ने ब्रिटेन को दिवालिया कर दिया था। तो अमेरिका दुनिया का दादा बन गया। अमेरिका में डिफेंस इंडस्ट्री कॉरिडोर बनना शुरू हुआ। वहां जहाज और टैंक बड़ी मात्रा में बनाए जाने लगे। पूरी दुनिया को अमेरिका हथियार बेचने लगा। वह हथियारों की मैन्युफैक्चरिंग का हब बन गया। इस तरह से अमेरिकी साम्राज्य का वर्चस्व पूरी दुनिया पर स्थापित हो गया।

अब डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार वहां के राष्ट्रपति बने हैं। वह अमेरिका को 1920-1930 का जो कॉलोनियल एरा था,उससे पहले के दौर में ले जाना चाहते हैं और विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका के वर्चस्व के समाप्त होने की शुरुआत है। यानी अमेरिकी साम्राज्य के पतन का बीजारोपण हो चुका है। आप ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की गतिविधियां देखें। उनके खिलाफ जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। इसके अलावा भारत और चीन के नेतृत्व में एशिया का उभार हो रहा है। तो 400 साल पुरानी विश्व व्यवस्था बदलाव के कगार पर खड़ी है। 1950 तक दुनिया में तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाएं थीं। ब्रिटेन,सोवियत संघ और अमेरिका। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2030 तक दुनिया की जो तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाएं होंगी, उनमें यूरोप का कोई देश नहीं होगा। अभी भी यूरोप का केवल एक देश जर्मनी ही हमसे आगे है। जर्मनी तीसरे और भारत चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था है। चीन दूसरे और अमेरिका पहले नंबर पर है। विश्व के विशेषज्ञों का मानना है कि 2050 तक भारत दुनिया में सबसे ऊपर होगा। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा। लेकिन वह जो दूसरे साम्राज्य हुए हैं उनकी तरह किसी को दबाकर, किसी को गुलाम बनाकर, किसी के संसाधन छीनकर नहीं,अपनी प्रतिभा,अपने संसाधन, अपनी क्षमता के बल पर वहां तक पहुंचेगा।

दुनिया का इतिहास बताता है कि देशों का उत्थान और पतन होता रहता है। ब्रिटेन एक अकेला ऐसा साम्राज्य है, जिसने अपने अत्याचारों की कीमत अभी नहीं चुकाई है। लेकिन आप आज के लंदन की हालत देखिए तो आपको समझ में आएगा कि ब्रिटेन जल्दी ही इसकी कीमत चुकाने वाला है। ब्रिटेन खत्म हो रहा है। पूरा यूरोप खत्म हो रहा है। पूरी विश्व व्यवस्था बदल रही है। तो डोनाल्ड ट्रंप का दूसरी बार राष्ट्रपति बनना मुझे लगता है नियति ने इसलिए निर्धारित किया कि अमेरिकी साम्राज्य के पतन की जो रफ्तार है वह तेज हो जाए। जब कभी अमेरिकी साम्राज्य के पतन का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें डोनाल्ड ट्रंप का नाम जरूर आएगा।

तो जो लोग भारत में हैं,जो सनातनी हैं,उनको एक बात समझनी चाहिए कि भारत अपने उत्थान के नए दौर में है। हमारा जो स्वर्णिम काल था, हम फिर से उसको हासिल करने की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन अगर हम अपनी संस्कृति की उपेक्षा करेंगे, सनातन की उपेक्षा करेंगे तो यह नहीं कर पाएंगे क्योंकि हमारी सबसे बड़ी ताकत और पूंजी वही है। यह मामूली बात नहीं है कि आज दुनिया में धर्म के जो तीन बड़े केंद्र हैं,उनमें एक भारत का है। इस्लाम की दृष्टि से मक्का, क्रिश्चियनिटी की दृष्टि से वेटिकन और सनातन की दृष्टि से अयोध्या। आज अयोध्या का जो उत्कर्ष है,यह सब पिछले 11 सालों में हुआ है। अपनी विरासत का संरक्षण हमारा दायित्व है।

 

यह जो बदलाव हो रहा है इसको पहचानिए। क्या 2014 से पहले यह संभव था? आप सोच भी सकते थे कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनेगा,काशी विश्वनाथ धाम बनेगा,महाकाल धाम बनेगा, अनुच्छेद 370 खत्म हो जाएगा। यह सब पिछले 11 साल में हुआ और किसी देश के इतिहास में 11 साल का कालखंड कुछ नहीं होता है। फ्रांस का राष्ट्रपति अगर भारत में आकर जय हो बोल रहा है तो यह नए भारत की पहचान है। तो इंतजार कीजिए 2050 से पहले वह दिन आए जब हम दुनिया में शिखर पर हों और वह तभी आ सकता है जब हम एकजुट रहेंगे। स्वहित को छोड़कर देश हित और सनातन के हित को प्राथमिकता देंगे। अपने आप से सवाल पूछिए, क्या हम इसके लिए तैयार हैं?

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)