बिहार में भाजपा के लिए सिर्फ नीतीश ही समस्या नही हैं।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
बिहार में राज्यसभा के चुनाव हो गए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए चुन लिए गए,लेकिन मुझे आश्चर्य हो रहा है कि उन्होंने अभी तक मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया। कुछ लोग होते हैं जो अपने सार्वजनिक जीवन में बड़ी राजनीतिक पूंजी कमाते हैं और उनमें से बिरले होते हैं, जो उस पूंजी को आखिरी दम तक बचाए रख पाते हैं। नीतीश कुमार की दो खासियत हैं। उन्होंने जब जनता दल और लालू प्रसाद यादव का साथ छोड़ा था तो दो मुद्दे भ्रष्टाचार और वंशवाद का जिक्र करते हुए कहा था कि इन पर कभी कोई समझौता नहीं करेंगे। भ्रष्टाचार से उन्होंने आज तक कोई समझौता नहीं किया, लेकिन अपने राजनीतिक जीवन के आखिरी दौर में वंशवाद से समझौता कर लिया। तो उन्होंने अपनी राजनीतिक पूंजी का 50% गंवा दिया। वह अपने बेटे को राजनीति में ले आए और उस समय ले आए जब वे खुद राजनीति में बने हुए हैं।
नीतीश कुमार में नैतिक बल की जो ताकत थी, वह आजकल दिखाई नहीं दे रही है। नैतिकता यही कहती थी कि आप राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देते। अब उनके और बीजेपी नेतृत्व के बीच बात हुई होगी कि कब किस तारीख को इस्तीफा देंगे। लेकिन नीतीश कुमार का कांटा अभी पूरी तरह से निकला नहीं है। भाजपा को उसे इतनी सफाई से निकालना है कि वहां पर कोई दर्द न हो।
नीतीश कुमार आप मानकर चलिए कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी बीजेपी के लिए समस्या बने रहेंगे। इसके साथ ही बीजेपी की दूसरी अंदरूनी समस्या है कि मुख्यमंत्री किसे बनाएं? आजादी के बाद से पहली बार अगर भाजपा को बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका मिला है तो जाहिर है कि ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जो उसकी विचारधारा पर चलने वाला हो। बिहार ऐसा राज्य है जहां हिंदुत्व का रास्ता बनाने में भाजपा के पसीने छूट गए। अयोध्या आंदोलन के दौरान भी नहीं बना पाए। जैसे-जैसे लालू प्रसाद यादव की राजनीति का पराभव हुआ और नीतीश कुमार की राजनीति कमजोर पड़ती गई तब बीजेपी को उभरने का मौका मिला। बीजेपी ने बड़े धैर्य के साथ अपने समय का इंतजार किया।

भाजपा ने जिन सम्राट चौधरी को राज्य का उप मुख्यमंत्री बनाया है और जिनके बारे में कहा जाता है कि मुख्यमंत्री की रेस में फ्रंट रनर हैं, उनका भाजपा और हिंदुत्व की विचारधारा से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। सम्राट समय लंबे समय तक आरजेडी में थे और लालू प्रसाद यादव एवं राबड़ी देवी के विश्वस्त माने जाते थे। फिर वह जनता दल यूनाइटेड में गए। वहां से भाजपा में आए। कांग्रेस राज्य में किसी हालत में थी नहीं वरना शायद कांग्रेस में भी रह लिए होते। उनका लक्ष्य केवल सत्ता है। न तो सम्राट चौधरी के बयान और न उनकी राजनीति इस बात की ओर इशारा करती है कि उन्होंने भाजपा की विचारधारा को अपना लिया है, जैसे असम में हिमंत बिस्वासरमा ने किया। असम में हिमंत ने जैसा काम किया है, वैसा भाजपा के बहुत से नेता नहीं कर सकते। हिमंत कभी गंगा-जमुनी तहजीब की बात नहीं करते। वह जिसको सही मानते हैं, उसको बोलने में हिचकिचाते नहीं हैं। शतरंज के खेल में अक्सर ऐसा होता है कि जिस प्यादे को आगे किया जाता है, उसको पिटवाने के लिए आगे करते हैं ताकि दूसरे मोहरों के निकलने की जगह बन सके। तो क्या सम्राट चौधरी भाजपा का वही प्यादा हैं? अब यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा। लेकिन अगर भाजपा सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद पर बिठाने का फैसला करती है तो आप मानकर चलिए कि वह अपनी विचारधारा से अलग रास्ते पर जा रही है। बिहार में भाजपा के जो नेता हैं, उनमें से ज्यादातर ऐसे लोग हैं जिनके लिए छद्म धर्मनिरपेक्षता की राजनीति न्यू नॉर्मल है। उनके लिए इसमें कोई अनहोनी बात नहीं है। इसलिए रोजा इफ्तार में जाने में और अरबी गमछा पहनने में उनको कोई हिचक नहीं होती है।

भाजपा की विचारधारा में पगा हुआ नेता ही बिहार का मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। हालांकि भाजपा की ओर से इस बारे में अभी कोई संकेत नहीं दिया गया है,लेकिन मुझे लगता है कि राष्ट्रीय नेतृत्व तय कर चुका होगा कि किसे अगला मुख्यमंत्री बनाना है। इस सवाल का जब जवाब मिलेगा तो पता चलेगा कि भाजपा बिहार की राजनीति को किस दिशा में ले जाना चाहती है। वैचारिक प्रतिष्ठान को और मजबूती देना चाहती है या बीच के रास्ते पर चलती है। यह संदेश नीचे तक पूरे कैडर में जाएगा। जो लोग विचारधारा से तप कर निकले हैं, उनके बीच संदेश जाएगा कि हमारा भी समय आ सकता है केवल धैर्य की जरूरत है या ऐसा तो नहीं होगा कि बाहर से आया हुआ व्यक्ति जिसका विचारधारा से कोई नाता नहीं है, वह सर्वोच्च पद पर बैठ जाएगा। इस सवाल के जवाब में छिपा है बिहार में भाजपा का राजनीतिक भविष्य और मुझे लगता है कि यह जवाब जल्दी ही मिलना चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)