Surendra Kishore

सुरेंद्र किशोर
सन 1983 के आसपास  मैं जिन- जिन पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखता था,उनके नाम हैं- धर्मयुग, दिनमान, नवभारत टाइम्स, फीचर एजेंसी ‘संवाद परिक्रमा’, रविवार, नईदुनिया, श्रीवर्षा साप्ताहिक, मनोहर कहानियां, माया, ऑनलुकर (अंग्रेजी), मराठवाड़ा, मनोहर-मराठी, कोलफील्ड गजट, मंगलवार दिनांक, मिथिला मिहिर, आदि…। आदि इसलिए लिखा क्योंकि कुछ नाम मुझे याद भी नहीं।
.
मेरा मूल काम तो दैनिक ‘आज’ के पटना संस्करण में था। वहां मैं मुख्य संवाददाता की भूमिका में था। एक समय ऐसा था कि ‘आज’ 6 पेज का अखबार था और संपादकीय विभाग में मात्र 6 लोग ही थे। काम के बोझ का अनुमान लगा लें। हां, एक बात जरूर थी कि सत्य प्रकाश असीम के सशक्त नेतृत्व में प्रूफ रीडर की एक योग्य टीम थी। असीम बाद में संपादक बने।

सन 1983 में मैं प्रस्तावित ‘जनसत्ता’ के इंटरव्यू बोर्ड के सामने था। उपर्युक्त पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित मेरी रपटों की फाइल बी.जी. वर्गीज के हाथों में थी। फाइल उलटते हुए उन्होंने मुझसे पूछा, ‘आप तो दैनिक ‘आज’ में स्टाफ हैं?’
-जी सर।
फिर प्रबंधन इतने अखबारों में लिखने की छूट आपको कैसे देता है?
मैंने कहा कि प्रबंधन की मुझ पर खास कृपा है। मैंने यह सब इसलिए लिखा क्योंकि आज मैं देखता हूं कि कुछ पत्रकार एक ही अखबार की नौकरी में भी ‘बेदम’ रहते हैं।

‘जनसत्ता’ ज्वाइन करने के लिए मैं जब ‘आज’ से इस्तीफा देने प्रबंधक अमिताभ चकवर्ती के पास गया, तो उन्होंने पूछा कि जनसत्ता आपको कितना दे रहा है?
मैंने कहा- 18 सौ रुपए। उन्होंने कहा कि ‘हम आपको 2 हजार देंगे। आप मत जाइए।’ मैंने कहा कि नहीं सर, मैं जरा राष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार चाहता हूं।
शालीन चक्रवर्ती साहब ने मुझे प्यार से विदा किया। कहने का मतलब यह है कि मैं ‘आज’ में भी अपने काम के साथ अन्याय नहीं करता था। अन्यथा, चकवर्ती साहब मुझे क्यों रखना चाहते?

अधिक लिखने के कारण मुझे पैसे मिलते रहे। (वैसे कम होते थे। क्योंकि हिन्दी अखबारों के फ्रीलांसर हिन्दी पत्रकारिता- समाज के ‘शूद्र’ होते हैं। उन्हें उतना ही पारश्रमिक मिलता है ताकि उनके पेट का उनकी पीठ से संबंध बना रहे! चलिए, उतना तो मिलता है। )

खैर,मैंने जितना भी कमाया, उससे यह हुआ कि कभी किसी के सामने हाथ पसारना नहीं पड़ा। उससे कैरियर में भी फायदा हुआ। ठीक ही कहा गया है कि- मेहनत का फल मीठा होता है।

(लेखक की सोशल मीडिया वाल से साभार)