सनातन की ओर लौट रहे राज्य में बड़ा अवसर देख रही भाजपा
प्रदीप सिंह।दक्षिण भारत में पांच राज्य हैं- तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश,तेलंगाना,कर्नाटक और केरल। क्या आप जानते हैं कि भाजपा के लिए डेमोग्राफी का सबसे कम चैलेंज किस राज्य में है? उस राज्य का नाम है तमिलनाडु फिर भी भाजपा का वहां कोई राजनीतिक अस्तित्व नहीं है। 2024 के चुनाव में भाजपा वहां अकेले लड़ी थी और उसको कोई लोकसभा सीट नहीं मिली। इससे पहले जब भी उसे लोकसभा सीट मिली है तो वह अन्ना द्रमुक या द्रमुक के साथ गठबंधन में मिली है। लेकिन एक समय हर परिस्थिति में बदलाव आता है। तमिलनाडु में वही हो रहा है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को तमिलनाडु में थे और उन्होंने जो बात कही मुझे लगता है कि किसी पार्टी ने कहने की हिम्मत नहीं की। उन्होंने कहा कि डीएमके तमिल विरोधी है। तमिलनाडु में खड़े होकर डीएमके को तमिल विरोधी कहना कोई सामान्य चुनावी भाषण नहीं है। इसे आप इस दृष्टि से मत देखिए कि इसी साल मार्च-अप्रैल में वहां विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। भाजपा का तमिलनाडु में लक्ष्य दो चरणों में है। उसका पहला चरण है कि किसी भी तरह किसी से भी गठबंधन करके डीएमके को सत्ता से हटाया जाए। भाजपा के लक्ष्य का दूसरा चरण दूरगामी है और जो किसी भी पार्टी का होना चाहिए कि एक दिन अपनी पार्टी की सरकार बनाना। बीजेपी वहां लॉन्ग टर्म प्लानिंग पर काम कर रही है। तमिलनाडु देश का ऐसा प्रदेश है, जहां सबसे बड़े और सबसे ज्यादा मंदिर हैं। बीजेपी को हिंदुत्व की पार्टी समझा जाता है फिर भी मंदिरों के इस राज्य में उसका कोई जनाधार नहीं रहा। उसका जनाधार अब बनना शुरू हुआ है, यह एक बड़े बदलाव का एक संकेत है।
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को तमिलनाडु में लगभग 11% वोट मिले। यह मत प्रतिशत देखने में छोटा लगता है, लेकिन बीजेपी की दृष्टि से देखिए तो बड़ी उपलब्धि है। न डीएमके से अलायंस, न एआईएडीएमके से अलायंस हुआ,कोई बड़ा संगठन नहीं फिर भी 11% वोट भाजपा को मिलना कोई छोटी बात नहीं है। अन्नामलाई के रूप में राज्य में भाजपा को अच्छा नेतृत्व मिला था,लेकिन उनको प्रदेश अध्यक्ष पद से क्यों हटा दिया गया,किसी को पता नहीं है। अन्नामलाई ने दिखाया कि भाजपा का जनाधार तमिलनाडु में खड़ा किया जा सकता है। तमिलनाडु में हिंदुत्व और मोदित्व यह दोनों फैक्टर मिलकर राजनीति को बदलेंगे। तमिल की बड़ी प्रतिष्ठित पत्रिका है तुगलक। उसके संपादक एस. गुरुमूर्ति ने कहा कि तमिलनाडु में हिंदुत्व की सुनामी चल रही है। हिंदुत्व की सुनामी का मतलब आप यह मत समझिए कि 2026 में वहां भाजपा की सरकार बनने जा रही है। हिंदुत्व की सुनामी का मतलब है कि तमिलनाडु बदल रहा है। वह जो अपनी जड़ों से और सनातन से दूर हुआ था,अब उसके नजदीक आ रहा है। तमिलनाडु में मुस्लिम और क्रिश्चियन आबादी मिलकर मुश्किल से 8-9% है। बाकी सब हिंदू हैं। तो भाजपा पर जो आरोप लगाया जाता है सांप्रदायिकता या हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने का, उसकी भी वहां कोई जरूरत नहीं है। जहां हिंदू बहुतायत में होते हैं, वहां हिंदुत्व विरोधी ताकतें उनको जातियों में बांटती है। यही काम द्रविड़ राजनीति ने किया है। पहले ब्राह्मणों के खिलाफ अभियान चलाया फिर सवर्णों और दलितों के खिलाफ अभियान चलाकर अलग-अलग जातियों में पूरे प्रदेश को बांट दिया।

अब मोदित्व और हिंदुत्व दोनों मिलकर इसे जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। हिंदुत्व के बारे में आपको बताने की जरूरत नहीं है,लेकिन मोदित्व क्या है? मोदित्व है डेवलपमेंट। आप किसी भी जाति के हों,कोई भी भाषा बोलने वाले हों,किसी क्षेत्र या किसी समाज के हों, विकास सब पर असर डालता है। इसके अलावा राजनीति और धर्म भी सब पर असर डालते हैं। हिंदुत्व की बात करें तो हिंदुत्व आस्था है। उसको स्थूल रूप में आप केवल मंदिरों में देख सकते हैं। उससे बाहर आपको सूक्ष्म रूप में ही दिखाई देता है। लेकिन मोदित्व यानी विकास आपको चलते-फिरते, घर से निकलते हुए और घर के अंदर रहते हुए भी दिखाई देता है। अगर हाईवे बन रहा है, मेट्रो बन रही है,बिजली की व्यवस्था सुधर रही है,नए-नए उद्योग लग रहे हैं, लोगों को रोजगार मिल रहा है तो यह सब दिखाई देता है। इसके अलावा केंद्र सरकार की जो वेलफेयर स्कीम्स हैं, उन पर मोदी और बीजेपी का बहुत ज्यादा जोर है कि उनका लाभ समाज के गरीब तबके को हर हाल में मिले। प्रधानमंत्री और भाजपा तमिलनाडु के लोगों को बताने की कोशिश कर रहे हैं कि केंद्र की योजनाओं का अगर आपको लाभ नहीं मिल रहा है तो उसकी वजह राज्य सरकार है। राज्य सरकार से वित्तीय प्रबंधन संभल नहीं रहा है। तमिलनाड़ पर सकल घरेलू उत्पाद का चार गुना कर्ज है।
तमिलनाडु में भाजपा शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म दोनों दृष्टियों से काम कर रही है। 23 जनवरी को प्रधानमंत्री के तमिलनाडु के दौरे से पहले ही टीटीवी पार्टी के नेता दिनकरण एनडीए में वापस आ गए। हालांकि अन्ना द्रमुक के जनरल सेक्रेटरी ई. पलनिस्वामी उनको साथ लेने को तैयार नहीं थे, लेकिन भाजपा ने उनको आंकड़े देकर समझाया। दिनकरण की वापसी एक तरह का अर्थमेटिक अलायंस है। पिछले चुनाव में दिनकरण के अलग लड़ने की वजह से अन्ना द्रमुक को कई सीटों पर बहुत थोड़े मार्जिन से हार मिली थी। भाजपा को लगता है कि अगर डीएमके को सत्ता से बाहर करना है तो सबको मिलकर चलना पड़ेगा। एक बार डीएमके सत्ता से बाहर हो गई तो उसके बाद तमिलनाडु में प्रधानमंत्री ने हिंदुत्व और मोदित्व का जो माहौल बना दिया है उसका राजनीतिक लाभ सिर्फ और सिर्फ भाजपा को मिलेगा। भाजपा तमिलनाडु की राजनीति में नयापन लेकर आई है। वह द्रमुक को करप्शन, वंशवाद और क्राइम से जोड़ने के साथ एंटी तमिल और एंटी नेशनल बता रही है। यह सिर्फ चुनाव प्रचार के लिए नहीं बोला जा रहा है। भाजपा का मानना है कि डीएमके का सत्ता में बने रहना देश की एकता अखंडता के लिए खतरा है। इस मुद्दे को एनडीए अगर जनता तक ले जाने में कामयाब हो गया तो आप मानकर चलिए कि एमके स्टालिन का सत्ता से बाहर जाना तय है।
तो एस गुरुमूर्ति जब राज्य में हिंदुत्व की सुनामी चलने की बात कहते हैं तो इसका यह मतलब बिल्कुल मत निकालिए कि 2026 में भाजपा की सरकार बनने जा रही है। इसका मतलब है कि द्रविड़ियन राजनीति का किला ढह रहा है। उसके बाद तमिलनाडु की राजनीति का एक नया स्वरूप उभरेगा जिसका पहला दर्शन आपको 2029 के लोकसभा चुनाव और दूसरा 2031 के विधानसभा चुनाव में होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



