हितेश शंकर।

रोज नया तमाशा दिखाने वाला बाजीगर भौचक खड़ा है। कल तक दर्शक दीर्घा में बैठे लोग आज ताली बजा रहे हैं। दिल्ली की राजनीति ने अजब मोड़ लिया है। यह क्षण है उस जुगनू की चमक बुझ जाने का, जो खुद को सूर्य समझ बैठा था।

राजनीति की परिघटना से पैदा एक लहर पर सवार होकर जिसने जनमानस को क्षुद्र, मूर्ख और अपनी उंगलियों पर नाचने वाला खिलौना समझ लिया था। याद कीजिए, एक ऐसा दल, जिसने भ्रष्टाचार मिटाने और राजनीति को नई दिशा देने का शोर मचाया था, खुद उसी भ्रष्टाचार और नैतिक पतन का शिकार हो गया।

यह छद्म नायकत्व के बिखरने और राजधानी के पुनर्संकल्पित होने का क्षण है। यह संकल्प है दोषारोपण की राजनीति के अंत का, विश्वासघात की विदाई का और अराजकता को राज्यव्यवस्था से बुहारने का।

2025 के चुनावों में आम आदमी पार्टी (आआपा) की करारी हार सिर्फ  एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि उस राजनीतिक पाखंड, झूठे वादों और सत्ता के दंभ की चौराहे पर चीरफाड़ है, जिसने दिल्ली की राजनीति और मतदाताओं की समझदारी को एक मजाक बनाकर रख दिया था।

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की झुग्गी बस्तियों और जे.जे. कॉलोनियों को मानो अपना स्थायी किंतु बुद्धिहीन ‘वोटबैंक’ मान लिया था। उनकी रणनीति स्पष्ट थी-कुछ किलो घटिया राशन और पानी-बिजली की ‘भीख’ देकर इन मतदाताओं को कृतज्ञता की जंजीरों में बांध दिया जाए। लेकिन उनके रणनीतिकारों को यह सत्य समझ में नहीं आया कि गरीब सिर्फ  खैरात पर नहीं जीता। उसे भी साफ सड़कें, शुद्ध पानी, स्वास्थ्य सेवाएं और सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है।

जब झुग्गीवासी कचरे के ढेर, गंदे पानी और बीमारियों से जूझते रहे, तो उन्होंने वह फैसला लिया जो उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था-‘सत्ता बदल दो!’ ये मतदाता समझते हैं कि सरकार का काम उनके जीवन को बेहतर बनाना है, न कि हर किसी से टकराना और हर बात पर बहाने बनाना।

अरविंद केजरीवाल ने सत्ता में आते ही ऐलान किया था, ‘हम राजनीति का स्तर ऊपर उठाएंगे!’ और नतीजा क्या निकला? राजनीति का स्तर इतना ऊंचा उठ गया कि अब जमीन से दिखाई भी नहीं देता। भ्रष्टाचार के आरोपों, व्यक्तिगत हमलों और अराजकता के नए कीर्तिमान इस बीच स्थापित हुए।

आज केजरीवाल का नाम राजनीतिक नैतिकता की कब्र पर लिखा जा रहा है। वह शख्स, जिसने कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंका था, आज खुद शराब घोटाले के दलदल में डूबा है। दिल्ली में हुए शराब नीति घोटाले में प्रर्वतन निदेशालय ने केजरीवाल को धन शोधन मामले में गिरफ्तार किया था। इस मामले में जमानत मिलने के बाद सीबीआई ने उन्हें सीधे तौर पर शराब घोटाले के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।

सीबीआई ने अपने आरोपपत्र में स्पष्ट  लिखा है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल शराब नीति बनाने और उसे लागू करने की आपराधिक साजिश में शुरू से शामिल थे। वे पहले से ही शराब नीति के ‘प्राइवेटाइजेशन’ का मन बना चुके थे। फिलहाल केजरीवाल जमानत पर बाहर हैं। वह मफलरधारी ‘आम आदमी’, जिसने कभी सादगी का ढोंग रचा था, अब आलीशान बंगलों और राजकीय सुख-सुविधाओं का पर्याय बन चुका है।

दिल्ली के गरीबों के लिए बुनियादी सुविधाएं -जैसे कि साफ पानी, अच्छी सड़कें, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और स्वच्छता-अब भी एक कल्पना हैं।

मोहल्ला क्लीनिक, जो स्वास्थ्य क्रांति का प्रतीक बनने वाले थे, आज घटिया दवाओं और डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि आबकारी नीति बनाते समय दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने नियम-कायदों को नजरअंदाज किया था। इसके चलते सरकारी खजाने को 2026 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

इसी तरह, यमुना सफाई अभियान को देखकर यमुना जी खुद सोच रही होंगी कि वह औरों को कोसते और अपनी जिम्मेदारियों से भागते दिल्ली के राजनीतिक नेतृत्व पर हंसें या रोएं!

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नदियां साफ करने के दावे खोखले साबित हुए, क्योंकि नदी में प्रदूषण का स्तर बद से बदतर होता गया। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ( डीपीसीसी) की जुलाई 2024 में आई रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के सभी पैमानों पर दिल्ली सरकार पिछड़ गई। सड़कें गड्ढों से भरी हैं और हर बारिश के बाद दिल्ली जैसे किसी झील में बदल जाती है, मानो सरकार ने गरीबों को कीड़े-मकोड़ों की तरह जीने के लिए अभिशप्त कर दिया हो। इसलिए गरीबों ने महसूस किया कि झूठे वादों पर भरोसा करके सड़ने से अच्छा है, उन वादों को तोड़ने वालों को सत्ता से बाहर कर दिया जाए।

आआपा पर हमेशा से ही अर्बन नक्सलियों और वामपंथी विचारधारा के साथ साठगांठ करने के आरोप लगते रहे हैं। शाहीनबाग आंदोलन से लेकर दिल्ली दंगों तक, पार्टी की संदिग्ध भूमिका पर कई सवाल उठे। राष्ट्रीय सुरक्षा पर विवादास्पद बयानों और देश-विरोधी ताकतों के साथ कथित संबंधों ने देशभक्त व राष्ट्र सर्वोपरि की सोच रखने वाले मतदाताओं को पार्टी से दूर कर दिया।

और केजरीवाल? उन्होंने इन सभी आरोपों पर रहस्यमय चुप्पी साध ली, शायद यह सोचकर कि चुप्पी ही उनका सबसे बड़ा रणनीतिक जवाब है। लेकिन जनता ने इसे अपराध-बोध और अराजक तत्वों के प्रति सहानुभूति के रूप में देखा।

कभी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का झंडा बुलंद करने वाली पार्टी खुद भ्रष्टाचार के दलदल में डूब गई। शराब नीति घोटाला, दिल्ली जल बोर्ड में अनियमितताएं और मोहल्ला क्लीनिक फंडिंग में धांधली के आरोपों ने पार्टी की विश्वसनीयता को पूरी तरह से खत्म कर दिया। और इस सबके बीच, केजरीवाल और उनके मंत्रियों की आलीशान जीवनशैली-महंगे सरकारी घर, भव्य कार्यालय और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की कहानियां हर गरीब मतदाता के दिल में गहरे जख्म कर गईं। वह खांसता दयनीय ‘आम आदमी’, जो सादगी का मुखौटा ओढ़े था, अब राजसी वैभव का प्रतीक बन गया।

जबकि आआपा अपने पतन की ओर अग्रसर थी, कांग्रेस ने धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश की। 2015 और 2020 के चुनावों में पूरी तरह से मिट जाने के बाद कांग्रेस ने 2025 में अपना मत प्रतिशत लगभग 2 प्रतिशत बढ़ा लिया। 2020 के चुनावों में जहां कांग्रेस का मत प्रतिशत 4.26 था, इस बार कांग्रेस मत प्रतिशत 6.34 रहा। नई दिल्ली विधानसभा सीट पर कांग्रेस से लड़ रहे संदीप दीक्षित को 4,568 वोट मिले। भाजपा के प्रवेश साहिब सिंह यहां पर विजयी रहे। उन्होंने 4089 मतों से जीत हासिल की। तकरीबन उतने ही मतों से केजरीवाल को हार मिली, जितने वोट संदीप दीक्षित के खाते में गए। हालांकि, यह कोई बड़ी सफलता नहीं थी, लेकिन इसने आआपा के पतन के समानांतर एक दिलचस्प बदलाव का संकेत दिया। कांग्रेस का पुनरुत्थान उन मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल रहा, जो आआपा से निराश थे और कांग्रेस में अब भी सम्भावना देखते हैं।

याद रहे, आआपा के भीतर कई वरिष्ठ नेताओं के इस्तीफे, निष्कासन और उनके साथ हुई मारपीट ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को जर्जर कर दिया। स्वाति मालीवाल, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और कुमार विश्वास जैसे नेताओं के मन टूटे। आक्रोश भड़का। कुछ ने पार्टी छोड़ दी और अरविंद केजरीवाल पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया। इससे पार्टी के भीतर की कलह और असंतोष सड़क पर आ गया। तो क्या यह अंत है?

दिल्ली में आम आदमी पार्टी का पतन एक जटिल कहानी है, जिसमें राजनीतिक भ्रम, खोखले वादे और मतदाताओं का मोहभंग शामिल है। एक ऐसा दल, जो बदलाव का अग्रदूत बनकर उभरा था, वह आज सत्ता की भूख और भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गया है। आआपा के पतन ने यह साबित कर दिया कि राजनीति में कोई भी स्थायी नहीं होता और जनता हमेशा उन नेताओं को खारिज कर देगी, जो अपने वादों को पूरा करने में विफल रहते हैं। लोकतंत्र में लगातार सुधार की यही प्रक्रिया तो ‘लोकमत परिष्कार’ है।

अब देखना यह है कि क्या आम आदमी पार्टी इस विनाशकारी हार से सीख लेकर खुद को फिर से संगठित कर पाएगी, या भारत के राजनीतिक इतिहास के पन्नों में महज एक फुटनोट बनकर रह जाएगी! दिल्ली की जनता ने एक नई राजनीतिक यात्रा शुरू कर दी है- शायद इस बार वादों की नहीं, बल्कि कर्म और जिम्मेदारी की राजनीति।

(लेखक ‘पाञ्चजन्य’ पत्रिका के संपादक हैं। आलेख सोशल मीडिया से साभार)