आपका अखबार ब्यूरो।
भारत की गणतंत्र दिवस झांकियां केवल औपचारिक प्रदर्शन नहीं होतीं, बल्कि वे राष्ट्र की सभ्यतागत स्मृति का चलता-फिरता अभिलेख होती हैं। हर वर्ष ये झांकियां विचारों, मूल्यों और ऐतिहासिक अनुभवों को एक साझा दृश्य भाषा में ढालती हैं और हमें यह याद दिलाती हैं कि संस्कृति गणराज्य की सजावट नहीं, बल्कि उसकी जीवनदायिनी आत्मा है। यह बात केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय के श्री विवेक अग्रवाल ने संस्कृति मंत्रालय की झांकी के बारे में बताते हुए कही।
उन्होंने बताया कि भारतीयों के हृदय में ‘वंदे मातरम्’ का स्थान विशिष्ट है। क्रांतिकारियों की जुबान पर कभी गूंजने वाला ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत भर नहीं है। श्री अरविंद ने इसमें ऐसी आध्यात्मिक शक्ति देखी थी, जो सामूहिक चेतना को जगा सकती है और इतिहास ने इस दृष्टि की पुष्टि भी की है। 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत एक सभ्यता की पुकार के रूप में सामने आया, जिसमें राष्ट्र को ‘माता’ के रूप में देखा गया है, जो सुजलाम् (जल से परिपूर्ण), सुफलाम् (फलों से परिपूर्ण) है तथा प्रकृति और भाव से परिपूर्ण है। औपनिवेशिक काल में इसने लोगों का आत्मसम्मान लौटाया, भक्ति को साहस में और कविता को संकल्प में बदल दिया, और विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं व आस्थाओं के भारतीयों को स्वतंत्रता की साझा आकांक्षा में एकजुट किया। 2026 के लिए संस्कृति मंत्रालय की गणतंत्र दिवस झांकी इस यात्रा को सशक्त दृश्य रूप देती है। जब भारत 2026 का गणतंत्र दिवस मना रहा है, तब ‘वंदे मातरम्’ हमें केवल स्वतंत्रता को याद करने के लिए नहीं, बल्कि उसके योग्य बने रहने का भी आह्वान करता है।
झांकी के बारे में बताते हुए इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि संस्कृति मंत्रालय की झांकी सिर्फ एक मंत्रालय या एक विभाग की झांकी नहीं है। वह पूरे देश की भावनाओं को व्यक्त करने वाली, देश के इतिहास, देश की भावना को प्रकट करने वाली झांकी है। उनके अनुसार, गणतंत्र दिवस के अवसर पर संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली झांकी की थीम ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ निर्धारित की गई है। यह झांकी राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की डेढ़ शताब्दियों लंबी प्रेरक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा को सजीव रूप में प्रस्तुत करेगी। झांकी में ‘वंदे मातरम्’ की रचना से लेकर उसके राष्ट्रव्यापी प्रभाव तक की कथा को कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से दर्शाया जाएगा।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी के अनुसार, पिछले छह सालों से आईजीएनसीए संस्कृति मंत्रालय की झांकी की संकल्पना तैयार करने और उसे क्रियान्वित करने की ज़िम्मेदारी निभा रहा है। गणतंत्र दिवस परेड में विभिन्न मंत्रालय और राज्य अपनी-अपनी उपलब्धियों, कार्यक्रमों, संस्कृति को झांकी के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। लेकिन संस्कृति मंत्रालय सभी मंत्रालयों में एक ऐसा अनूठा मंत्रालय है, जो अपनी उपलब्धि या कार्यक्रम को नहीं, सबको मिलाकर अपनी झांकी की अवधारणा तैयार करता है। दरअसल, हम संस्कृति को किसी चीज से अलग नहीं कर सकते। बाकी सारे मंत्रालय या बाकी सभी इंस्टीट्यूशंस एक वर्टिकल्स में काम करते हैं, लेकिन संस्कृति मंत्रालय की जो गतिविधियां हैं, वो क्षैतिज होती हैं यानी सारे आयामों को समेटते हुए की जाती हैं। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि 2021 में संस्कृति मंत्रालय की झांकी की थीम थी- ‘भारतीय स्वतंत्रता के 75वें वर्ष का उद्घोष।’ इसी तरह, 2022 में थीम थी- ‘श्री अरविंद के 150 वर्ष’, 2023 में ‘शक्ति रूपेण संस्थिता — जीवन के अंतर्निहित सिद्धांत के रूप में शक्ति’, 2024 में ‘भारत: लोकतंत्र की जननी — भारत की प्राचीन लोकतांत्रिक भावना’ और 2025 में थीम थी- ‘विरासत भी, विकास भी — परंपरा और प्रगति का समन्वय’, तो वहीं 2026 की थीम है- ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’।
औपनिवेशिक काल में जेलों, सभाओं और जुलूसों में वंदे मातरम् के उद्घोष ने विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं और आस्थाओं के लोगों को जोड़ा और भक्ति को शौर्य तथा काव्य को संकल्प में परिणत किया। इसका उद्देश्य विजय नहीं, बल्कि श्रद्धा और एकता था।
संस्कृति मंत्रालय की गणतंत्र दिवस झांकी वंदे मातरम् की 150 वर्षों की पूरी यात्रा को दृश्य रूप देती है। चलते ट्रैक्टर पर ‘वंदे मातरम्’ की पांडुलिपि दिखाई गई है, जिसके पीछे भारत के चारों दिशाओं से आए लोक कलाकार सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक बनते हैं। झांकी के केंद्र में ज़ेन जी ‘वंदे मातरम्’ का गायन करते हैं, जो विष्णुपंत पागनीस की ऐतिहासिक धुन से प्रेरित है। उन्होंने इस गीत को राग सारंग में रिकॉर्ड किया था। औपनिवेशिक सेंसरशिप से बचने के लिए उन्होंने अंतरों का क्रम बदल दिया, और इसी से उनका राष्ट्रगीत कला के माध्यम से विरोध का एक ऐतिहासिक उदाहरण बना। झांकी में शहीद मदनलाल ढींगरा और खुदीराम बोस को भी ‘वंदे मातरम्’ का स्मरण करते हुए दर्शाया गया है। अंत में, भारत माता को तिरंगा थामे दिखाया गया है, जो पीढ़ियों से प्रेरणा का अक्षय स्रोत रही है।
जब भारत गणतंत्र दिवस 2026 मना रहा है, तब ‘वंदे मातरम्’ हमें केवल स्वतंत्रता को याद करने के लिए नहीं, बल्कि उसके योग्य बने रहने का भी आह्वान करता है।
प्रस्तुति का उद्देश्य ‘वंदे मातरम्’ को केवल एक गीत के रूप में नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, उसकी एकता और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रतीक के रूप में रेखांकित करना है। झांकी में भारत की विविधता, प्रकृति, मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और स्वतंत्रता संग्राम की चेतना का समन्वित चित्रण देखने को मिलेगा।
संस्कृति मंत्रालय की यह झांकी न केवल ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देती है, बल्कि नई पीढ़ी को इसके मूल्यों और संदेश से जोड़ने का सशक्त माध्यम भी बनेगी। गणतंत्र दिवस परेड में यह प्रस्तुति राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक गौरव और एकात्मता की भावना को और अधिक प्रगाढ़ करेगी।



