नेहरू की अनकही मूढ़ता ।
प्रदीप सिंह।
इतिहास बड़ा बेरहम होता है। किसी के साथ कोई मुरव्वत नहीं करता। इतिहास की सच्चाई जब सामने आती है तो बहुत सी गलतफहमियां दूर हो जाती हैं। हमारे देश में भी मुगलों और नेहरू-गांधी परिवार का इतिहास दबाया-छिपाया गया और जो बताया गया, वह महिमामंडित करके बताया गया। लेकिन उस इतिहास की परतें अब खुलने लगी हैं। देश में बहुत बार चर्चा हुई है कि नेहरू ने जम्मू कश्मीर और तिब्बत की नीतियों को लेकर क्या गलतियां कीं। देश की 38,000 स्क्वायर किलोमीटर जमीन चीन ने कैसे हड़प ली,लेकिन उनकी जिस गलती की चर्चा लगभग नहीं के बराबर हुई है, वह है उनकी अफगानिस्तान या नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस को लेकर चूक।
आजादी के समय नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस देश का एकमात्र ऐसा मुस्लिम बहुल इलाका था, जो पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहता था। इसका कारण थे सीमांत गांधी या कहें खान अब्दुल गफ्फार खान। उनकी एक संस्था थी खुदाई खिदमतगार। वे लोग एक पृथक पश्तूनिस्तान चाहते थे, जो भारत और पाकिस्तान दोनों से अलग हो। आजादी से पहले नेहरू नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के दौरे पर गए थे। वहां उनका बहुत विरोध हुआ और बड़ी मुश्किल से उनकी जान बची थी। वहां की कांग्रेस इकाई चाहती थी कि नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस को जनमत संग्रह में तीन विकल्प दिए जाएं। भारत में मिलना चाहते हैं,पाकिस्तान में मिलना चाहते हैं या स्वतंत्र होना चाहते हैं। लेकिन नेहरू ने माउंटबेटन के दबाव में तीसरा विकल्प हटवा दिया। नॉर्थवेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के लोगों को स्वतंत्रता का विकल्प ही नहीं दिया तो उनके सामने दो ही विकल्प बचे पाकिस्तान के साथ जाएं या भारत के साथ। ऐसी परिस्थिति में भी शायद वहां के लोग भारत के साथ आ सकते थे, ऐसे में जिन्ना ने मजहब का हथियार निकाला। उन्होंने नारा दिया कि इस्लाम खतरे में है, लेकिन माउंटबेटन को पता था कि इस नारे के बावजूद इस प्रांत के लोग पाकिस्तान के साथ नहीं जा सकते हैं। तो उन्होंने नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर कांग्रेस के तीन विधायकों को तोड़ा और उनसे मुस्लिम लीग के समर्थन में वोट दिलवा दिया। इस तरह यह प्रांत पाकिस्तान के साथ चला गया।
माउंटबेटन की वर्ल्ड वॉर दो में परफॉर्मेंस बहुत ही खराब रही थी। चूंकि उनके संबंध तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल से काफी अच्छे थे,इस वजह से वह भारत के वायसराय बने थे। उन्होंने नेहरू को पूरी तरह से शीशे में उतार लिया था। नेहरू ने भारत के स्ट्रेटेजिक हित पर माउंटबेटन से दोस्ती को तरजीह दी। इस पर वरिष्ठ पत्रकार उत्पल कुमार ने एक लेख लिखा है। उसमें उन्होंने सबसे पहले उस डूरंड लाइन का जिक्र किया है, जहां पर आजकल अफगानिस्तान और पाकिस्तान का युद्ध चल रहा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को दशकों से लगता था कि अफगानिस्तान पर उसका नियंत्रण रहेगा तो उसको भारत के मुकाबले भू राजनीतिक बढ़त मिलेगी। लेकिन इस युद्ध के कारण उसका यह सपना चकनाचूर हो गया है। उत्पल कुमार कहते हैं कि भारत की अफगान नीति खामियों से भरी रही है। एक तरफ पाकिस्तान आजादी के बाद अफगानिस्तान को हथियार बंद करता रहा तो दूसरी तरफ भारत नैतिकता का पाठ पढ़ाता रहा। आजादी के समय भारत के जो नीति निर्धारक थे, उनको भू राजनीतिक स्थिति की कोई समझ नहीं थी। इसका नतीजा यह हुआ कि अफगानिस्तान पूरी तरह पाकिस्तान के प्रभाव में आ गया। उसी प्रभाव के जरिए पाकिस्तान जम्मू कश्मीर में भारत को नुकसान पहुंचाने लगा। इस सब के लिए अगर कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार है तो वह जवाहरलाल नेहरू हैं। पश्तून लोग अपनी जातीय अस्मिता पर बड़ा गर्व करते हैं। वे किसी भी बाहरी अधिनायकवादी शक्ति को संदेह की नजर से देखते हैं। चूंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश था इसलिए भारत से उनके संबंध ज्यादा बेहतर हो सकते थे। भारत का इरादा कभी इस इलाके पर कब्जा करने का नहीं था, जो पाकिस्तान का था। 47 में नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस पाकिस्तान में नहीं गया। उसके बाद पाकिस्तान की सेना ने चढ़ाई उसे अपने कब्जे में लिया। आज तक इस बात को पश्तूनों ने स्वीकार नहीं किया है। वे आज तक डूरंड लाइन को नहीं मानते हैं। अगर उनको स्वतंत्र रहने का विकल्प मिला होता तो हो सकता है आगे चलकर वह अफगानिस्तान से मिल जाते और भारत के लिए यह बहुत ही अच्छी स्थिति होती। पश्चिमी क्षेत्र में उसका एक दोस्त होता। उत्पल कुमार लिखते हैं कि अगर पश्तुनिस्तान बन जाता तो पूरे दक्षिण एशिया का नक्शा ही बदल जाता। लेकिन नेहरू ज्यादा प्रभावी थे। वे अंतरिम सरकार में विदेश मंत्री थे। माउंटबेटन से उनके बड़े करीबी संबंध थे और माउंटबेटन ने उनका इस्तेमाल किया।

लेखक राघवेंद्र सिंह की एक किताब है इंडियास लॉस्ट फ्रंटियर,जिसे उत्पल कुमार जी ने कोट किया है। उसमें उन्होंने लिखा है कि नेहरू यह मानकर चल रहे थे कि माउंटबेटन को इस बात का एहसास है कि नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में लोगों को दिक्कतें हैं। लेकिन नेहरू को यह भी विश्वास था कि माउंटबेटन उन दिक्कतों को दूर कर देंगे। अब आप देखिए जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति और उनकी भू रणनीतिक समझ कैसी थी। इससे पता चलता है कि नेहरू, जिनको विदेश नीति का बहुत बड़ा जानकार माना जाता है,भारत में अब तक जितने विदेश मंत्री हुए हैं उनमें सबसे घटिया विदेश नीति उन्हीं की थी। उत्पल कुमार लिखते हैं कि नेहरू ने सीमांत गांधी और भारत के रणनीतिक हितों को भेड़ियों के हवाले कर दिया। पश्तुनिस्तान अगर स्वतंत्र होता तो पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा कट जाता। अफगानिस्तान में पाकिस्तान का कोई प्रभाव नहीं होता। वे यहां तक कहते हैं कि अगर ऐसा हुआ होता तो जम्मू कश्मीर में आजादी के बाद जो कबायलियों के नाम पर हमला हुआ,जिसमें पाकिस्तान की रेगुलर फोर्स आई, वह भी न हुआ होता और लगभग आधा जम्मू कश्मीर जो पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, वह भी न जाता। अब इससे आप समझिए कि नेहरू ने इस देश के साथ क्या-क्या किया है। अगर पश्तूनिस्तान बना होता तो जम्मू कश्मीर में आज भारत को जिस तरह के आतंकवाद का सामना करना पड़ रहा है,वह भी न करना पड़ता।

उत्पल कुमार ने अपने लेख में पूर्व डिप्लोमेट राजीव डोगरा की किताब डूरंड्स कर्स लाइन अक्रॉस पठान हार्ट को कोट करते हुए कहा है कि पश्तुनिस्तान बना होता तो पाकिस्तान की समस्या जिस रूप में आज हमारे सामने है, उस रूप में तो बिल्कुल न होती। इस क्षेत्र में भारत का प्रभाव बहुत ज्यादा होता। अब आप देखिए नेहरू की नीतियों ने भारत के रणनीतिक उद्देश्यों को कितना बड़ा नुकसान पहुंचाया। इतिहास की ये बातें हमसे दबाई-छिपाई जाती रही हैं। नेहरू-गांधी परिवार और इनके समर्थकों ने इतिहास लिखने का काम लेफ्ट इको सिस्टम से कराया और उन्होंने सिर्फ इस परिवार के महिमा मंडन का काम किया। इनके लिखे इतिहास को आप पढ़ें तो लगेगा कि देश की आजादी में सबसे बड़ा योगदान किसी एक परिवार का था तो इस नेहरू परिवार का था। लेकिन इतिहास और सच ये दो ऐसी चीजें हैं जो बहुत लंबे समय तक दबी या छिपी नहीं रहती है। ये जब सामने आते हैं तो चौंकाते हैं। अब सच झूठ को धकेल कर सामने आ रहा है और जाहिर है कि इससे बहुत से लोगों के मन में बेचैनी हो रही है। बहुत से लोग परेशान हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



