डी-डॉलराइजेशन अभियान पर बन रही सहमति।

प्रदीप सिंह।
शनिवार को दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका ने एक ऑपरेशन किया। यह ऑपरेशन किसी आतंकवादी संगठन पर नहीं,किसी आतंकवादी के ठिकाने पर नहीं बल्कि एक सार्वभौम देश वेनेजुएला पर हुआ। वहाँ पहले बम गिराया गया फिर अमेरिका के कमांडो वहां के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनकी पत्नी को उठाकर ले गए। एक तरह से कहिए किडनैप कर अमेरिका ले गए। इस दौरान मादुरो की सुरक्षा में जो गार्ड थे, उन्होंने कोई प्रतिरोध नहीं किया। इससे आप समझ सकते हैं कि इसकी प्लानिंग कैसे बहुत पहले से हुई थी। इसे अमेरिका की बहुत बड़ी सफलता माना जा रहा है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस वाहवाही को लूटने में सबसे आगे हैं। लेकिन सवाल यह है कि दुनिया खामोश क्यों है? अगर जिसकी लाठी,उसकी भैंस का ही सिस्टम चलना है तो फिर यूनाइटेड नेशंस जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन का मतलब क्या है? चीन, ईरान और रूस ने इस पर ऐतराज जरूर किया है। भारत ने वेनेजुला के लोगों से कहा है कि हमारी नजर इस घटनाक्रम पर है। हमें आपसे सहानुभूति है। इसके अलावा भारी चुप्पी है। सवाल यह है कि अमेरिका ने हमला क्यों किया?

ड्रग्‍स सिर्फ छोटी वजह... असली खेल तो तेल का, अमेरिका ने वेनेजुएला पर  क्‍यों किया हवाई हमला? - US Airstrikes on Venezuela Drugs Supply or Crude  Oil know Inside Story tutd - AajTak
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अमेरिका ने हमले का पहला कारण बताया कि लंबे समय से वेनेजुएला से बहुत बड़ी मात्रा में ड्रग्स अमेरिका में आ रहे हैं। सवाल यह है कि अमेरिका में जो कुल कोकेन आती है, उसका सिर्फ 1% वेनेजुएला से आता है। तो यह तो कोई आधार हुआ नहीं। अमेरिका ने दूसरा दूसरा कारण बताया कि वेनेजुएला और खासतौर से मदुरो आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। इसका जवाब है कि निकोलस मदरो का कोई आतंकवादी संगठन नहीं है। वे किसी आतंकवादी संगठन को फंड नहीं करते। यह आरोप भी सरासर गलत है। अमेरिका ने तीसरा आरोप लगाया कि मुदरो ने जनतंत्र की हत्या की। चुनाव में हार गए थे, लेकिन उस नतीजे को पलट कर अपने को जीता हुआ घोषित कर दिया। सवाल है कि अगर ऐसा किया तो यह उनका आंतरिक मामला है। और अमेरिका को जनतंत्र की कब से चिंता हो गई। जिस सऊदी अरब से उसके इतने करीबी रिश्ते हैं, जिसकी सुरक्षा की अमेरिका गारंटी लेता है,वहां कभी चुनाव हुए हैं क्या? अमेरिका जिस पाकिस्तान को हथियार और पैसा दे रहा है,वहां जनतंत्र की क्या हालत है? अमेरिका ने इराक पर यह कहकर हमला कि सद्दाम हुसैन वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन बना रहे थे,जो सरासर झूठा था। हमले से न तो पहले कोई वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन मिला और न सद्दाम हुसैन की हत्या के बाद मिला।

अब फिर सवाल है कि अमेरिका ने वेनेजुएला के साथ ही ये क्यों किया? इसके लिए थोड़ा सा इतिहास के पन्ने पलटने होंगे। अमेरिका का पूरा फाइनेंशियल सिस्टम पेट्रो डॉलर पर टिका हुआ है। सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद अमेरिका ने डॉलर को अंतरराष्ट्रीय करेंसी का दर्जा यह कहकर दिलवाया कि उसके सपोर्ट में गोल्ड है। यानी जितनी डॉलर की करेंसी छपेगी, उतना गोल्ड उसकी सुरक्षा के लिए रहेगा। उसके बाद 1974 में किसिंजर ने सऊदी अरब से समझौता किया। उन्होंने कहा हम तुम्हें सुरक्षा देंगे, लेकिन हमारी एक शर्त है कि तुम जितना तेल बेचोगे, वह सब डॉलर में होगा। यानी तेल की कीमत डॉलर में निर्धारित की जाएगी। यहां से पेट्रो डॉलर का खेल शुरू हुआ। यह समझौता 50 साल के लिए हुआ था, जो इस साल के आखिर में या अगले साल किसी समय खत्म होने वाला है। पेट्रो डॉलर पर ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से टिकी हुई है और जिस किसी ने पेट्रो डॉलर को चैलेंज करने की कोशिश की, अमेरिका ने उसको बर्बाद कर दिया। साल 2000 में सद्दाम हुसैन ने कहा था कि वह इराक का तेल डॉलर की बजाय दुनिया की दूसरी करेंसी में बेचेंगे। अमेरिका इसको कैसे बर्दाश्त कर सकता था? तो बहाना ढूंढकर इराक पर हमला कर दिया गया और सद्दाम हुसैन की हत्या कर दी गई। इसी तरह 2009 में लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी ने कहा कि वह एक नई करेंसी गोल्ड दीनार बनाएंगे। लीबिया से जिसको तेल खरीदना है उसे व्यापार इसी करेंसी में करना होगा। यह पेट्रो डॉलर पर दूसरा हमला था।

Libyans remember revolution that ousted Gaddafi but brought ...
इसके बाद लोकतंत्र के नाम पर गद्दाफी की हत्या कर दी गई। लीबिया में उसके बाद से क्या हालात हैं,यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। लीबिया में आज तक गृह युद्ध की स्थिति बनी हुई है। अब वेनेजुएला पर आते हैं। वेनेजुएला के पास 303 बिलियन बैरल पेट्रोल है। वेनेजुएला ने 2018 में घोषणा की कि वह डॉलर में ट्रेड से मुक्त हो जाएगा। यह पेट्रो डॉलर पर तीसरा बड़ा हमला था। आप इससे अंदाजा लगाइए कि सऊदी अरब ईरान के पास जितना तेल है, उसका तीन गुना तेल अकेले वेनेजुएला के पास है। वेनेजुएला पिछले कई सालों से चीन को उसकी करेंसी युआन में तेल बेच रहा था। इसके अलावा वह यूरो,रूबल और दूसरी करेंसियों में भी अपना तेल बेच रहा था। यह अमेरिका और पेट्रो डॉलर के लिए खतरे की बात थी। जैसे ही वेनेजुएला ने कोशिश की कि वह ब्रिक्स का सदस्य बन जाए, अमेरिका को समझ में आ गया कि अब वेनेजुएला का हिसाब किताब करने का समय आ गया है। अमेरिका ने फाइनेंसियल ट्रांजैक्शन के लिए जो सिस्टम बनाया है, उसको बाईपास करके चीन के साथ मिलकर वह पेमेंट्स का एक नया सिस्टम डेवलप कर रहा था। वेनेजुएला और चीन मिलकर डीडॉलराइजेशन का प्रोजेक्ट दशकों चला सकते हैं, यह अमेरिका को पता था। जब 1974 में किसिंजर ने सऊदी अरब से समझौता किया और पेट्रो डॉलर की व्यवस्था बनी तो पूरी दुनिया में डॉलर की भारी मांग हो गई। जिसके पास डॉलर वही तेल खरीद सकता है। इसको चुनौती का देने का मतलब है अमेरिका की जो इकॉनमी है, जो फाइनेंशियल सिस्टम है, उसको चुनौती देना। अमेरिका पर 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्जा है। उसकी अर्थव्यवस्था की स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है। ऐसे में अगर डॉलर के आधिपत्य को चुनौती मिल गई तो अमेरिका की पूरी इकॉनमी ध्वस्त हो सकती है। तो वेनेजुएला,चीन और रूस मिलकर पेट्रो डॉलर को चुनौती दे रहे थे। उधर अमेरिका को यह भी डर है कि अगर ब्रिक्स देशों ने लोकल करेंसी में व्यापार करना शुरू कर दिया तो पेट्रो डॉलर का क्या होगा? दो हफ्ते पहले अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी एडवाइजर स्टीफन मिलर ने जिस तरह का बयान दिया था उससे ही स्पष्ट हो गया था कि अमेरिका वेनेजुएला पर हमला करने वाला है। उन्होंने कहा था कि वेनेजुएला में जो ऑयल निकल रहा है 100 साल पहले अमेरिकी कंपनियों ने उसकी खुदाई शुरू की थी इसलिए यह अमेरिका का एसेट है। अमेरिका की संपत्ति पर वेनेजुएला ने डकैती डाली है। अब आप समझिए कि कोई देश अगर अपनी परिसंपत्तियों का नेशनलाइजेशन करे तो यह अमेरिका की नजर में डकैती है। इस सबके अलावा अमेरिका पेट्रो डॉलर पर कोई खतरा नहीं चाहता। इराक पर हमला किया तो फिर से इराक का तेल डॉलर में बिकने लगा और इसीलिए अब दुनिया के सबसे बडे तेल उत्पादक वेनेजुएला पर हमला किया गया। अमेरिका ने तय कर लिया है कि पेट्रो डॉलर को बचाने के लिए अगर किसी देश पर बम गिराना पड़े, वहां तख्ता पलट करना पड़े तो वह सब करने को तैयार है। मदुरो अगर पेट्रो डॉलर के खिलाफ अभियान में शामिल न होते तो उनका यह हश्र न होता। लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे पेट्रो डॉलर बच जाएगा?

ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ के देशों को अब एक बात समझ में आ गई है कि पेट्रो डॉलर के आधिपत्य और अमेरिका के इस आतंक से बचना है तो डीडॉलराइजेशन का अभियान तेज करने की जरूरत है। इसके लिए दुनिया के बहुत से देशों में सहमति बन रही है। जिस पेट्रो डॉलर को बचाने के लिए अमेरिका सार्वभौम देशों पर हमला कर रहा है, उनके राष्ट्रपति को गिरफ्तार करके अपने देश में ले जा रहा है, उसे पूरी दुनिया देख रही है। लेकिन हर चीज चाहे वह अच्छी हो या बुरी उसका अंत एक दिन आता है। अब पेट्रो डॉलर के सिस्टम का भी अंत बहुत नजदीक आ गया है। अमेरिका ने वेनेजुएला में जो किया वह पेट्रो डॉलर के खात्मे की शुरुआत है। जैसे-जैसे पेट्रो डॉलर कमजोर होगा,अमेरिका की अर्थव्यवस्था और अमेरिका कमजोर होगा। कई देश अमेरिका की दादागिरी से परेशान हैं या अमेरिका को पछाड़ना चाहते हैं जैसे चीन,रूस,ईरान और भारत को भी इसमें गिन सकते हैं। भारत पर भी एक झूठ के सहारे 50% टैरिफ लगाकर उसे झुकाने की कोशिश की गई। लेकिन यह नरेंद्र मोदी का देश है,जो किसी के सामने झुकने वाले नहीं हैं। यह बात मैं नहीं कह रहा,रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कही है। यह बात अब डोनाल्ड ट्रंप की भी समझ में आ रही है। अमेरिका जो कदम उठा रहा है,उससे वह दुनिया में अपने को आइसोलेट करता जा रहा है। पेट्रो डॉलर जब तक बना हुआ है तब तक अमेरिका की दादागिरी बनी हुई है। जिस दिन पेट्रो डॉलर गिरेगा,अमेरिका की दादागिरी का दौर भी खत्म हो जाएगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)