चीन का सैन्य साजोसामान फिर एक्सपोज,भारत के पास ऑपरेशन सिंदूर-2 का बेहतरीन मौका।

प्रदीप सिंह।
बात करीब 25-30 साल पुरानी होगी। भारत में चीनी सामानों की भरमार थी। बहुत सस्ते लेकिन उनका कोई भरोसा नहीं होता था कि कब तक चलेंगे? दिल्ली का करोल बाग चीनी सामानों का बड़ा केंद्र था। वहां अगर आप कोई चीनी सामान लें और दुकानदार से पूछें कि ये कितने समय तक चलेगा? तो उसका एक ही जवाब होता था-चला तो चांद तक,नहीं तो शाम तक। यानी एक बात बड़ी स्पष्ट थी कि चीनी सामान आपको सस्ता मिलेगा,लेकिन उसकी क्वालिटी की कोई गारंटी नहीं है। यह बात आज भी उतनी ही सच है। मैं यह संदर्भ क्यों लेकर आया हूं,वह 3 जनवरी की घटना से जुड़ा है।

वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो पर अमेरिका में चलेगा मुकदमा, उपराष्ट्रपति ने  जिंदा होने का मांगा सबूत
Courtesy: Navjeevan

3 जनवरी को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस  मादुरो और उनकी पत्नी का अमेरिका ने अपहरण कर लिया। यूएस डेल्टा फोर्स के कमांडो उन्हें उनके आवास से उठाकर ले गए और कोई रेजिस्टेंस नहीं हुआ। अब बहुत से लोग अमेरिका की बड़ी प्रशंसा कर रहे हैं कि कितना सटीक और त्वरित ऑपरेशन था। एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति को आपने जबरन उठा लिया, उस पर पूरी दुनिया एक तरह से खामोश है। सिर्फ छिटपुट बयान आए हैं। चीन जिसका स्टेक वेनेजुएला में सबसे ज्यादा था सिर्फ उसने अमेरिका की कड़ी निंदा की है। इससे ज्यादा कुछ नहीं। वेनेजुएला को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस रणनीति को अंजाम देने का फैसला किया कि पश्चिमी गोलार्ध में दादागिरी केवल अमेरिका की चलेगी और जो नॉन हेमिस्फयरिक कॉम्पिटिटर्स (गोलार्ध के बाहर वाले) हैं, उनको बाहर किया जाएगा। अब ये बात सुनने में तो बड़ी सामान्य सी लगती है, लेकिन निशाने पर कौन था? क्या निशाने पर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो थे,जी नहीं,अमेरिका का असली निशाना चीन पर था।

चीन के वेनेजुएला से बड़े मजबूत आर्थिक और सैन्य संबंध थे । चाइनीस डेवलपमेंट बैंक ने वेनेजुएला के ऑयल सेक्टर में 50 से 60 बिलियन का इन्वेस्टमेंट कर रखा था। चीन को अपनी करेंसी यानी युआन में वेनेजुएला का तेल मिल रहा था और चीन इस संबंध तेजी से बढ़ा रहा था। इसके अलावा चीन ने अपना मिलिट्री इक्विपमेंट भी वेनेजुएला को बेच रखा था। आपको याद होगा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद चीन ने ये नैरेटिव बनाने में काफी पैसा खर्च किया कि चीनी इक्विपमेंट बहुत सक्सेसफुल साबित हुए। उसकी वजह से पाकिस्तान भारत को रोक पाया। जबकि अब जो अमेरिकी डॉक्यूमेंट बाहर आ रहे हैं, उससे पता चल रहा है कि पाकिस्तान ने 60 बार अमेरिकी अधिकारियों से बात करने की कोशिश की ताकि वे भारत को हमला रोकने के लिए मना सकें। लेकिन बात वेनेजुएला की हो रही है। चीन ने वेनेजुएला को 60 आर्म्ड व्हीकल भी दे रखे थे। इसके अलावा वहां के जो नेशनल गार्ड हैं,उन्हें वी एन फोर क्लास के 100 आर्म्ड व्हीकल चीन ने दिए थे। चीन से मिले रेडार सिस्टम पर वेनेजुएला को बड़ा नाज था कि हमारे एयर डिफेंस सिस्टम को कोई भेद ही नहीं सकता है। मई 2025 में चीन ने दावा किया था कि उसका जो रेडार सिस्टम है,वह बड़े से बड़े स्टेल्थ फाइटर जेट या जो भी इस तरह के हथियार हैं, उनको डिटेक्ट और डिस्ट्रॉय कर सकता है।  लेकिन अमेरिका ने एफ-22 और एफ-35 से जो हमला किया,उसने सबसे पहले वेनेजुएला के उस रेडार सिस्टम को नष्ट किया,जिस पर वेनेजुएला इतरा रहा था। इसके बाद अमेरिकी कमांडो राष्ट्रपति मादुरो को उठाकर ले गए। इस दौरान एक भी गोली नहीं चली। हालांकि यह भी सही है कि अमेरिका ने वेनेजुएला की मिलिट्री के बहुत से लोगों को खरीद रखा था। लेकिन चीन का जो रेडार सिस्टम है वह अमेरिकी टारगेट को हिट करना तो बहुत दूर की बात है, उसको पहचान भी नहीं पाया।

अमेरिका ने वेनेजुएला में जो किया, उससे चीन इतना क्यों बौखला उठा? बहुत बड़ी  चोट लगी है - The Lallantop
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तो वेनेजुएला पर अमेरिका के इस हमले से सबसे ज्यादा चोट चीन को पहुंची है। वेनेजुएला के साथ उसके जो आर्थिक और सैन्य संबंध बढ़ रहे थे,उन दोनों पर रोक लग गई। अब वेनेजुएला के सारे तेल भंडार पर अमेरिका का कब्जा हो गया है और चीन का सारा इन्वेस्टमेंट डूब गया। चीन ने ऑयल के क्षेत्र में अगले 15-20 साल के लिए वेनेजुएला से जो स्ट्रेटजिक एग्रीमेंट कर रखा था,उस पर भी पानी फिर गया। अब निकोलस मादुरो का तो जो होगा वह एक बात है, दूसरी और अहम बात यह है कि पश्चिमी गोलार्ध में चीन के बढ़ते हुए कदमों को अमेरिका ने उखाड़ दिया है। अमेरिका के इस हमले के बाद चीन के मिलिट्री इक्विपमेंट की क्वालिटी पर सवाल उठने लगा है। यह तय हो गया कि अमेरिका के मिलिट्री इक्विपमेंट के सामने चीन के मिलिट्री इक्विपमेंट कहीं नहीं टिकते। हालांकि यह बात ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पहले ही साबित कर दी थी। अब चीन की मुश्किल यह है कि उसके जो मिलिट्री हार्डवेयर के खरीदार हैं, उन पर इसका क्या असर पड़ेगा? अमेरिकी हमले ने तो उनकी पोल खोलकर रख दी है।

वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले से दो और बातें स्पष्ट होती हैं। पहली अगर चीन ताइवान पर हमला करता है और अमेरिका ताइवान के समर्थन में आता है तो फिर चीन का क्या हाल होगा? दूसरी बात चीन अगर कभी सोचता भी है कि 1962 की तरह भारत पर हमला कर सकते हैं तो भारत क्या जवाब देगा, यह चीन को अब समझ में आ गया है। चीन सीमा पर अशांति बनाए रखकर भारत के लिए समस्या तो पैदा करता रह सकता है,लेकिन वह भारत के साथ सीधे युद्ध में जाने का फैसला कभी नहीं करेगा। उसके पास जो इक्विपमेंट हैं, वह अमेरिका तो छोड़िए भारत से भी मुकाबला करने की हालत में नहीं हैं। सैन्य साजोसामान के मामले में भारत अब लगभग आत्मनिर्भर हो गया है। अब युद्ध की हालत में हमको गोला बारूद किसी और देश से नहीं मंगाना है। देश में सब बन रहा है। मिसाइल भी बन रही है। एयर डिफेंस सिस्टम भी बन रहा है। तो वेनेजुएला में जो हुआ है,वह भारत के लिए भी अच्छा और बुरा दोनों है। किसी भी एक देश की दादागिरी दुनिया पर चले, यह भारत समेत किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं है, लेकिन चीन को एक्सपोज करके अमेरिका ने एक तरह से भारत की मदद की है। अब भारत का कॉन्फिडेंस और ज्यादा बढ़ेगा। चीन का कॉन्फिडेंस और नीचे आएगा। पाकिस्तान जो चीन के दम पर कूदता है, उसकी हालत और ज्यादा खराब होगी। तो इंतजार कीजिए ऑपरेशन सिंदूर के पार्ट टू का। यह कब होगा,मुझे समय नहीं मालूम लेकिन मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि जो हालात हैं उसमें भारत के पास इसके अलावा विकल्प नहीं है। ऑपरेशन सिंदूर का पार्ट टू न करना भारत अफोर्ड नहीं कर सकता। भारत को करना ही है। अब पाकिस्तान की मदद के लिए कोई आ नहीं पाएगा। चीन की भी हिम्मत नहीं होगी। कुल मिलाकर भारत के पास पाकिस्तान की समस्या को खत्म करने का यह बेहतरीन मौका है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)