घाटी की मस्जिदें और मदरसे रडार पर,जुटाया जा रहा डेटा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
कश्मीर घाटी में देश की सुरक्षा और इंटेलिजेंस एजेंसियां इस समय एक अभियान चला रही हैं। वहां जितनी भी मस्जिदें और मदरसे हैं,उनका एक तरह का सर्वेक्षण चल रहा है। उनको एक फॉर्म दिया गया है, जिसमें उनको बताना है कि यह मस्जिद कब बनी,इसके लिए पैसा कहां से आया,मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य कौन है,उनके सारे पर्सनल डिटेल,मोबाइल और आईएमईआई नंबर,सब लोगों के बैंक डिटेल्स और ट्रैवल हिस्ट्री। इसके अलावा उनको यह भी बताना है कि किस सेक्ट से जुड़े हुए हैं। मतलब वे बरेलवी हैं,देवबंदी है,हफी हैं या अहले हदीस को मानने वाले हैं।अब सवाल है कि यह क्यों हो रहा है? हाल ही में लालकिले के पास एक डॉक्टर ने बम ब्लास्ट  कर खुद को उड़ा लिया था। वह अलफला यूनिवर्सिटी का डॉक्टर था। जांच पड़ताल में कश्मीर घाटी के नौगाम की एक मस्जिद के बारे में जानकारी मिली। पता चला कि उस मस्जिद का मौलवी आतंकवाद के लिए पढ़े लिखे लोगों खासतौर से डॉक्टर,इंजीनियर का रिक्रूटमेंट कर रहा था। गुजरात समेत देश के अन्य हिस्सों से भी कई लोगों को पकड़ा गया। उसके बाद से कश्मीर घाटी में सुरक्षा एजेंसियों ने मस्जिदों और मदरसों के सर्वेक्षण का काम शुरू किया।इसमें कोई दो राय नहीं कि कश्मीर समस्या जवाहरलाल नेहरू की पैदा की हुई है। पाकिस्तान की फौज कबायलियों के रूप में जब जम्मू कश्मीर में घुस रही थी तो एक बैठक में सरदार पटेल,जवाहरलाल नेहरू,सैन्य अधिकारी सैम मानिकशाह आदि मौजूद थे। बैठक के आखिर में झल्लाकर सरदार पटेल ने जवाहरलाल नेहरू से पूछा कि यह बताओ कि तुम कश्मीर चाहते हो कि नहीं? नेहरू ने कहा, मैं बिल्कुल चाहता हूं। तो सरदार पटेल ने मानिक शाह से कहा कि कर्नल यू हैव योर ऑर्डर्स। और उसके बाद भारतीय सेना ने जो किया वह इतिहास का हिस्सा है। इसी तरह जब कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली बन रही थी तो शेख अब्दुल्ला दिल्ली आकर जवाहरलाल नेहरू से मिले। नेहरू ने उनसे कहा कि कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली के सदस्य बनाने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजिए। शेख अब्दुल्ला ने मना कर दिया और कहा कि हम इस संविधान को नहीं मानते। हम मुस्लिम मेजॉरिटी स्टेट हैं। हमारा संविधान अलग होगा। थोड़ा सा और पीछे जाइए जब देश का विभाजन हो रहा था, उस समय शेख अब्दुल्ला चाहते थे कि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बन जाए। लेकिन वह जिन्ना से अश्योरेंस चाहते थे कि कश्मीर का जो सब नेशनलिज्म है, उसको रिकॉग्नाइज किया जाएगा। जिन्ना ने साफ मना कर दिया। तो उसके बाद शेख अब्दुल्ला के पास भारत के साथ रहने के अलावा कोई चारा नहीं था। भारत के साथ आने में उनका लक्ष्य था कि भारत के संविधान के तहत भारत में एक पाकिस्तान बनाएं। तो जम्मू कश्मीर भारत के संविधान के संरक्षण में बना हुआ भारत के अंदर एक पाकिस्तान है। अगर कश्मीर की समस्या हल करनी है तो इसको इस नज़रिए से ही देखना पड़ेगा। इसीलिए वहां जिहाद आजादी के समय से ही लगातार चल रहा है। सबसे उसका विद्रूप रूप हम लोगों ने 1990 में देखा। जब मस्जिदों से ऐलान हुआ कि धर्म परिवर्तन कर लो,मुसलमान बन जाओ या फिर अपनी औरतों को यहां छोड़कर भाग जाओ या मरने के लिए तैयार रहो। कश्मीर में मस्जिदें ही आतंकवाद का गढ़ हैं। आतंकवादी सुरक्षा बलों से बचने के लिए इन्हीं में छिपते हैं। कश्मीर में मस्जिदों के सर्वेक्षण का यह काम अनुच्छेद 370 व 35 ए हटने के बाद ही शुरू हो जाना चाहिए था औैर मेरा तो मानना है कि ऐसा अभियान देशभर में चलना चाहिए,हर मस्जिद के बारे में ऐसी जानकारी इकट्ठा की जानी चाहिए क्योंकि देश की सुरक्षा से बढ़कर कुछ नहीं है। इसमें यह नहीं देखना चाहिए कि कोई विक्टिम कार्ड खेलेगा या इसे कोई मुद्दा बनाएगा।

Kashmir Issue - Understand the multiple dimensions - ClearIAS

दुनिया में कहीं भी आतंकवाद हो, उसकी जड़ आपको जम्मू कश्मीर और देवबंद में मिलेगी। 1947 में शेख अब्दुल्ला का जो सोचना था, कश्मीर घाटी का मुसलमान आज भी वही सोचता है। वह अपने को भारत का हिस्सा मानता ही नहीं है। कश्मीर में आप कितना भी विकास करा दीजिए उनको कोई फर्क नहीं पड़ता। उनको इन सब चीजों की जरूरत नहीं है। उनको जरूरत है पाकिस्तान के साथ और भारत से अलगाव की। मजबूरी में पासपोर्ट पर उनको भारतीय लिखना पड़ता है। इसीलिए कश्मीर में जब भी कोई आंदोलन होता है तो नारे लगते हैं-हमको चाहिए जिन्ना वाली आजादी। जिन्ना की आजादी क्या थी? भारत को तोड़कर पाकिस्तान बनाना। और अब तो इनकी विचारधारा देश के दूसरे हिस्सों में भी फैल रही है। जेएनयू में तो आए दिन ऐसा देखने को मिलता है। दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगे के दौरान शरजील इमाम और उनके साथियों ने ‘हमको चाहिए जिन्ना वाली आजादी’नारे लगाए थे।

आप देखिए पाकिस्तान की आईएसआई और वहां के आतंकी सगठनों को सबसे ज्यादा समर्थन कहां से मिलता है? घाटी के मुसलमानों से। आतंकवादी जिन निर्दोष लोगों को मारते हैं उनसे कश्मीर घाटी के लोगों को कोई सहानुभूति नहीं है। पहलगाम की घटना पर आपको जो मोमबत्ती का जुलूस दिखाई दिया,वह सिर्फ धोखा है। सिर्फ यह दिखावा करने के लिए कि हम आतंकियों के साथ नहीं है। तो यह जो मस्जिदों की प्रोफाइलिंग हो रही है,इसके बाद एक्शन भी होना चाहिए। आ रहे धन का सोर्स अगर वह डिस्क्लोज नहीं करते हैं तो मुकदमा चलना चाहिए। जेल भेजा जाना चाहिए। देश में आतंकवादी बनाने का काम मदरसों में ही होता है। अब भी अगर कड़े कदम नहीं उठाए गए तो देश के एक और विभाजन के लिए तैयार रहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)