भाजपा के अंदर से रचे गए षड्यंत्र का नतीजा हैं यूजीसी के नए नियम।
प्रदीप सिंह।इस मामले में पहली बात जो मेरी समझ में आती है वह यह कि आप इसे अगड़ा-पिछड़ा की लड़ाई के रूप में मत देखिए। यह समस्या उससे बहुत ज्यादा गहरी है और उससे ज्यादा खतरनाक हैं इसके नतीजे जो होने जा रहा था। अगर हम इस समस्या की गहराई तक नहीं पहुंचेंगे तो उसका समाधान भी नहीं कर पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यूजीसी की यह गाइडलाइंस आईं कैसे? सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद क्या सरकार अब उन लोगों की पहचान करेगी, जो इस गाइडलाइंस को लेकर आए। मेरा तो स्पष्ट रूप से मानना है कि यह सिर्फ और सिर्फ हिंदू समाज को तोड़ने के लिए लाई गई थी। सनातन की बढ़ती हुई एकता से जिनको परेशानी थी,यह उन्हीं का काम है। कुछ लोग कह रहे हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे के विरुद्ध जाति का एजेंडा जीत गया और तभी से पार्टी ने तय कर लिया था कि जाति के एजेंडे पर हमको अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलना है। इसी कारण यह गाइडलाइंस लाई गईं। इसमें कितनी सच्चाई है,यह मुझे नहीं मालूम। ये जानबूझकर किया गया हो,अनजाने में किया गया हो,अक्षमता के कारण किया गया हो, लापरवाही के कारण किया गया हो,इसकी समीक्षा हो सकती है। लेकिन मेरा मानना है कि केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट देने से पहले इस बात का पता लगाना चाहिए कि इन गाइडलाइंस के लिए जिम्मेदार कौन लोग हैं,वे किस मानसिकता के हैं,इसके पीछे उनका उद्देश्य क्या था? यह बहुत खतरनाक कदम था। सुप्रीम कोर्ट ने देश को जातीय हिंसा की आग में जाने से बचा लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू समाज को बचाने का काम किया है।

देश में इस समय हिंदू एकता जिस तरह से मजबूत हो रही है,उससे बहुत से लोगों को परेशानी है। अगर आपको यह लगता है कि भाजपा में सब लोग ऐसे हैं, जो हिंदू एकता से खुश हैं तो आप गलतफहमी में हैं। भाजपा में भी सूडो सेकुलरों की कोई कमी नहीं है,लेकिन उनकी इतनी ताकत और हिम्मत नहीं है कि खुलकर बोल सकें,इसीलिए पीछे से षड्यंत्र कर रहे हैं। तो यूजीसी की यह नई गाइडलाइंस भाजपा के अंदर से रचे गए षड्यंत्र का नतीजा है। इस षड्यंत्र के जो किरदार हैं,उनकी पहचान करके उनको सजा अगर नहीं दी गई तो यह समस्या आने वाले समय में और बड़ी बनेगी।
सुप्रीम कोर्ट अगर यह कहे कि यह गाइडलाइंस समानता को बढ़ावा नहीं देती तो सरकार के इस फैसले पर इससे ज्यादा प्रतिकूल टिप्पणी और क्या हो सकती है। अपने फैसले में सबसे अहम बात सुप्रीम कोर्ट ने यह कही कि देश की एकता सबसे महत्वपूर्ण है। उसके ऊपर कुछ भी नहीं है। इसका अर्थ है कि ये जो गाइडलाइंस हैं, यह देश की एकता को तोड़ने के वाली हैं। तो सवाल यह है कि देश को तोड़ने वाले ये नियम किसने बनाए? बहुत से लोग कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही ये गाइडलाइंस बनी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि 2012 की गाइडलाइंस में सुधार की जरूरत है, यह नहीं कहा था कि आप अन्यायपूर्ण व्यवस्था लेकर आएं और ऐसे नियम बनाएं जिसमें एक वर्ग को बिना जांच के पहले से ही अपराधी घोषित कर दिया जाए।
दूसरा सवाल यह है कि जिस पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी ने यह रेकमेंडेशन दी थी उसमें भाजपा की मेजॉरिटी थी। तो भाजपा के नेता उस कमेटी में क्या कर रहे थे? क्या किसी ने इसका विरोध किया? उनको इसमें कुछ गलत नहीं दिखाई दे रहा था तो उनकी समझ और निष्ठा पर भी सवाल उठता है। वे बताएं कि क्या उनको इसके लिए मजबूर किया गया था। अभी तक किसी का ऐसा कोई बयान नहीं आया है। बल्कि कुछ लोग तो बहुत फूहड़ तरीके से इसका बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं। एक और अहम सवाल यह है कि पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी की रेकमेंडेशंस मैंडेटरी नहीं होतीं। उनको मानने की सरकार के सामने कोई बाध्यता नहीं होती तो सरकार ने ऐसी सिफारिशों को अक्षरश: क्यों मान लिया?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने समाज को न केवल बंटने बल्कि जाति की हिंसा से भी बचा लिया और साथ ही भाजपा और केंद्र सरकार को बहुत बड़े संकट से उबार लिया। पहले तो ये गाइडलाइंस आनी ही नहीं चाहिए थीं और अगर आ गई थीं तो इस पर तुरंत सरकार को एक्शन लेना चाहिए था। इस पर स्टे लगाना चाहिए था। लेकिन सरकार में या तो हिम्मत नहीं थी या नीयत नहीं थी। अगर हिम्मत नहीं हुई तो चिंता की बात है और अगर नीयत नहीं थी तो और ज्यादा चिंता की बात है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



