देश के और विभाजन का एजेंडा चलाने वालों की कुछ हिंदू ही कर रहे मदद।
प्रदीप सिंह।
घुसपैठ का मुद्दा पिछले कई दशकों से देश में उठ रहा है और देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि यह बीजेपी का पॉलिटिकल मुद्दा है। बीजेपी हिंदू मुसलमान करना चाहती है इसीलिए यह मुद्दा उठाती है। ऐसा मानने वाले मुसलमान हैं, इसमें तो कोई शक ही नहीं है लेकिन ऐसा मानने वालों में हिंदुओं की भी बहुत बड़ी संख्या है। अब ऐसे लोगों को क्या कहें। लेकिन मैं आपको तीन किस्से सुनाता हूं। इनमें दो भारत के हैं और एक दूसरे देश का है। इन किस्सों से आपको समझ में आएगा कि ये जो घुसपैठिया हैं, दीमक की तरह भारत के शरीर में अपना घर बना चुके हैं और अंदर से शरीर को खोखला कर चुके हैं या लगभग करने वाले हैं। लेकिन हमें अभी यह समझ में नहीं आ रहा है कि इसकी गंभीरता क्या है? इसके खतरे क्या हैं और यह कितनी बड़ी साजिश है।

आपको पहले एक छोटा किस्सा सुनाता हूं। यह किस्सा है एक इकलाज मुल्ला का। यह बांग्लादेशी है और 20 साल पहले भारत आया। इसने अपना नाम बदलकर पिकलू डे रख लिया। भारत में बांग्लादेश से आने वाले ज्यादातर घुसपैठिए बंगाल में आते हैं। शायद भाषा और वहां का जो तंत्र है, वह उनके , वोटर आई कार्ड बना और पैन कार्ड के साथ ही अपना पासपोर्ट भी बनवा लिया और उसके बाद वह नौकरी करने कुवैत चला गया। लिए सहायक सिद्ध होता है। तो इकलाज मुल्ला ने भारत आकर सारे आइडेंटिटी कार्ड बनवा लिए। उसने आधार कार्डवहां कई साल की नौकरी के बाद उसका पासपोर्ट एक्सपायर होने वाला था तो कुवैत की मिनिस्ट्री ऑफ़ फॉरेन अफेयर्स के जरिए उसने अपने पासपोर्ट को रिन्यू करा लिया। उसके पास काफी पैसा आ गया तो वह लौट कर कोलकाता आ गया। कोलकाता में उसने प्रॉपर्टी खरीदी और उसके बाद अपने परिवार को बांग्लादेश से लाने वाला था। प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन के समय शक हुआ तो जांच शुरू हुई। जांच में पता चला कि वह बांग्लादेशी घुसपैठिया है। 20 साल से वह भारत में था और एक तरह से भारतीय ही बन गया था और परिवार को लाने में अगर वह सफल हो गया होता तो उसके परिवार के सारे सदस्य भारतीय हो जाते।
दूसरा किस्सा और भी इंटरेस्टिंग है। इससे आपको समझ में आएगा कि हो क्या रहा है। किस तरह की रणनीति के तहत भारत के दुश्मन काम कर रहे हैं और किस तरह से भारत की डेमोग्राफी को बदलने की कोशिश हो रही है। वे भारत में शरिया का राज लाना चाहते हैं। इसके लिए जरूरी है कि उनकी आबादी एक सीमा तक पहुंचे। अभी पश्चिम बंगाल में दो जिलों के बारे में तो खबर आ ही चुकी है कि वहां के स्थानीय नेताओं ने घोषणा कर दी कि हमारी आबादी जो है इतने परसेंट हो गई है और अब यहां शरिया का राज चलेगा। यह तब है जब भारत का संविधान लागू है और देश में 78 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू रहते हैं। मध्य प्रदेश में पलाश अधिकारी नाम के व्यक्ति को बांग्लादेशी होने के संदेह में पुलिस ने पकड़ा तो उसने सारे दस्तावेज पैन कार्ड, आधार कार्ड था और वोटर आई सब दिखा दिए और कहा कि मैं हिंदू और भारतीय हूं। मामला अदालत में पहुंच गया। अदालत ने उसके दस्तावेज आधार अथॉरिटी, इनकम टैक्स और चुनाव आयोग को जांच के लिए भिजवाए तो तीनों ने पाया कि जो आइडेंटिटी है वो सही है। अब इतने पर ही अगर अदालत रुक गई होती तो उसका कुछ नहीं होता। भले ही पुलिस संदेह करती रहे लेकिन पुलिस को उसे गिरफ्तार करने या उसके खिलाफ मुकदमा चलाने का कोई अधिकार नहीं होता। लेकिन जो भी जज थे शायद उन्हें देश की चिंता थी या शायद उन्हें यह मामला गंभीर लगा तो उन्होंने कहा कि जरा पीछे जाते हैं और 2002 की एसआईआर के रिकॉर्ड मंगवाए। पलाश ने बताया था कि उसके पिता का नाम रमेश अधिकारी है और वह पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के रहने वाले हैं। रमेश अधिकारी के बारे में पता किया गया। रिकॉर्ड में रमेश अधिकारी का नाम था और लेकिन पकड़ में यह बात आई कि इलेक्शन कमीशन के 2002 के रिकॉर्ड में रमेश अधिकारी के दो लड़के दिखाए गए जबकि पलाश ने कहा, हम चार भाई हैं। उसने बताया कि मैं सबसे बड़ा बेटा हूं। मेरा नाम पलाश अधिकारी है। इसके बाद सुब्रतो अधिकारी, सोमेन अधिकारी और राहुल अधिकारी हैं। और जांच हुई तो पता चला कि 2015 से रिकॉर्ड में रमेश अधिकारी के यह चार बेटे दिखने लगे। उससे पहले तक दो बेटे ही दिखते थे। रमेश अधिकारी से पूछताछ हुई तो उन्होंने कहा कि मैं राहुल अधिकारी और पलाश अधिकारी को नहीं जानता हूं। मेरे दो ही बेटे हैं सोमेन अधिकारी और सुब्रतो अधिकारी। सुब्रतो बड़ा पुत्र है, जिसका जन्म 1995 में हुआ और रमेश अधिकारी की शादी 1993 में हुई। अब यह जो पलाश अधिकारी नाम का व्यक्ति था, उसने रिकॉर्ड में अपनी उम्र 42 साल दिखाई थी। इसका मतलब हुआ कि वह रमेश अधिकारी की शादी से 10 साल पहले पैदा हुआ था। पूछताछ में थोड़ी कड़ाई की गई तो पता चला पलाश का असली नाम शेख मोइनुद्दीन है। वह खुलना बांग्लादेश का रहने वाला है और अवैध तरीके से भारत में घुसा। भारत में युवाओं का धर्म परिवर्तन कराना उसका काम था और वह 10 साल से भारत में रह रहा था। पुलिस अब उसके दूसरे साथी या तथाकथित भाई राहुल की तलाश कर रही है। अब इस घटना से अंदाजा लगाइए कि इस देश में फर्जी दस्तावेज बनवाना कितना आसान है। थोड़े से पैसे लेकर जन्मतिथि प्रमाण पत्र से लेकर सारे दस्तावेज तक बना दिए जा रहे हैं। एक पूरा तंत्र इस काम में लगाा है। बांग्लादेश से आने वालों को बॉर्डर पर लिया जाता है। फिर अलग-अलग प्रदेशों में भेजा जाता है। शुरू में कुछ दिन इनके खाने-पीने के खर्च का पैसा दिया जाता है और इनके दस्तावेज बनवाए जाते हैं और उसके बाद ये लोग अपने काम में लग जाते हैं। और काम क्या है? हिंदू लड़कियों से शादी करना और अगर जनजातीय क्षेत्र में हैं तो जनजातीय लड़कियों से शादी करना और उनकी जमीन पर कब्जा करना और फिर आबादी बढ़ाना। जिस तरह दीमक लकड़ी के अंदर रहकर उसे धीरे-धीरे खाती है वैसे ही ये लोग इस देश को धीरे-धीरे खोखला करने की कोशिश कर रहे हैं।

अगर आपको लग रहा है कि यह सब भारत में दुष्प्रचार हो रहा है तो आपको डेनमार्क का एक किस्सा सुनाता हूं, जो वहां की एक नेता ने सुनाया है। 1992 में डेनमार्क ने 321 फिलिस्तीनियों को शरण दे दी। ये हमेशा याद रखिए कि मुस्लिम शरण उस देश में मांगते हैं जो नॉन मुस्लिम हैं। ये किसी भी इस्लामी देश में शरण मांगने नहीं जाते क्योंकि इनका मजहब इनको सिखाता है कि वहां जाओ, जहां तुम्हारी जनसंख्या नहीं है या बहुत कम है और वहां जाकर अपना विस्तार करो और फिर एक दिन उस देश पर अपना कब्जा करो। तो डेनमार्क ने इनको शरण दे दी। वहां ये जो 321 लोग आए थे, इनमें से 63% का अलग-अलग अपराधों में कन्विक्शन हुआ। उनमें से 22% जेल हुई और 55% को वेलफेयर डिपार्टमेंट के हवाले कर दिया गया। उनको वेलफेयर स्कीम्स का फायदा मिलने लगा। यानी डेनमार्क के लोगों के टैक्स का पैसा इन पर खर्च होने लगा। जो हमारे आपके देश में भी हो रहा है। इन 321 लोगों के 999 बच्चे हुए। चूंकि डेनमार्क एक विकसित देश है। वहां पढ़ाई लिखाई से लेकर हर तरह की सुविधा है तो इनको सारी सरकारी सुविधा मिल रही है। अब इन पैदा हुए बच्चों में से भी 34% अलग-अलग अपराधों में कन्विक्ट हुए। इनमें 13% जेल गए और 37% को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने लगा। यह 1992 से 2025 तक का आंकड़ा है, जो एक अध्ययन में निकल कर सामने आया। इन सालों में इन लोगों पर 246 से लेकर 319 मिलियन डॉलर खर्च हुए। मतलब प्रति व्यक्ति लगभग 8 लाख डॉलर खर्च हुए। अब डेनमार्क के लोग कह रहे हैं कि हमारा इनका तो कोई मेल ही नहीं है। इनको हम कैसे अपने यहां रख सकते हैं? उनमें हर तरह की आपराधिक प्रवृत्ति होना हमारे देश के लिए खतरा है। तो डेनमार्क के लोगों को जागने में कितना समय लगा दिया आप अंदाजा लगा लीजिए। भारत में वह जागृति अभी तक नहीं आ रही है। घुसपैठ को बेहद हल्के तौर पर लिया जा रहा है और इस घुसपैठ विरोधी अभियान को भोथरा करने का सबसे बड़ा हथियार है कि कह दो कि यह बीजेपी का एजेंडा है। बीजेपी मुसलमानों के खिलाफ है इसलिए यह मुद्दा उठा रही है। घुसपैठ का दंश असम झेल रहा है। जहां सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एनआरसी चल रही है। जिसकी बात अगर आप पूरे देश के स्तर पर कर दें तो पूरा विपक्ष सिर के बल खड़ा हो जाता है कि होने नहीं देंगे। सड़क पर आ जाएंगे। घुसपैठियों के बचाव के लिए जो इको सिस्टम है, वह बहुत मजबूत है। इनके बीच में एकता बहुत है और हम विभाजित हैं। उसका वह फायदा उठाते हैं।

देश में एक फ्रॉड लंबे समय से चल रहा है- गंगा जमुनी तहजीब यानी हिंदू मुसलमान साथ-साथ रहें, जो कभी नहीं हो सकता और यह मैं नहीं कह रहा हूं यह मुसलमानों के बड़े-बड़े नेता कहते हैं कि हमारी संस्कृति अलग है। हमारे नायक अलग हैं। हमारे जो नायक हैं, इनके खलनायक हैं। इनके जो खलनायक हैं, वो हमारे नायक हैं तो हम हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते। लेकिन घुसपैठ का मामला हो तो ये साथ रहने को तैयार हैं। क्यों? क्योंकि इनको समय का इंतजार करना है कि हमारी आबादी इतनी बढ़े तब हम अपनी मांग रख सकें और इनकी मांग एक ही होती है- पूरी दुनिया में खलीफा का राज हो। भारत उनके लिए एक अनफिनिश्ड एजेंडा है। जहां वे अभी तक सफल नहीं हो पाए हैं, लेकिन जिस दिन सफल होंगे उनकी सफलता में सबसे बड़ा योगदान हिंदुओं का होगा। जिनको लगता है कि अगर मुसलमानों का साथ देना है तो हिंदू का विरोध करना पड़ेगा। ऐसी मानसिकता वालों में इसमें सबसे आगे हैं कम्युनिस्ट। और अब तो कांग्रेस पार्टी तक मुस्लिम लीग से आगे चली गई है। अभी हमने 7 तारीख को राष्ट्रगीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ मनाई है। इस गीत को जिन्ना की मांग पर खंडित किया गया। नेहरू को लगा कि उन दो स्टैंजा को निकाल देंगे, जिसमें मां दुर्गा की स्तुति की गई है तो मुसलमान और जिन्ना खुश हो जाएंगे और जिन्ना पाकिस्तान की मांग छोड़ देंगे। इतिहास गवाह है कि आपने एक मांग मानी उसके बाद उन्होंने दरवाजा खोल लिया और भारत का बंटवारा करके ही माने। लेकिन अभी यह कॉमा था फुल स्टॉप नहीं हुआ है। वह अब भारत का और बंटवारा चाहते हैं। उसके लिए उनको लग रहा है कि डेमोग्राफी में चेंज बहुत जरूरी है। उनको नहीं चाहिए हाईवे, नहीं चाहिए एक्सप्रेसवे, नहीं चाहिए एयरपोर्ट, नहीं चाहिए पोर्ट। उनको नहीं चाहिए अच्छे शिक्षण संस्थान, अच्छे अस्पताल। उनको चाहिए सरकारी सहायता और आबादी बढ़ाने की छूट। चाहे वो जन्म दर के जरिए हो, चार शादियों के जरिए हो या फिर बाहर से घुसपैठियों को आश्रय देकर हो। वह हर ऐसे हथकंडे, हर ऐसे अपराध, हर ऐसे गैर कानानूनी काम को करने के लिए तैयार हैं जिससे उनकी संख्या बढ़े और इस देश की संपत्ति पर कब्जा हो। वक्फ एक्ट उसी का परिणाम है कि मुसलमानों को इस देश की संपत्ति पर कब्जा करने का कानूनी अधिकार मिल जाए। इसी वजह से उसमें संशोधन हो रहा है तो मुसलमानों के साथ-साथ लेफ्ट इको सिस्टम को भी तकलीफ हो रही है। भारत के अगले विभाजन के इनके लक्ष्य को पूरा करने में जानकर या अनजाने में सबसे ज्यादा मदद हिंदू कर रहे हैं। जिस दिन वह इस मामले में सहयोग करना बंद कर देंगे या जिस दिन उनकी आंखें खुल जाएं कि अपने ही देश के विरोध में काम कर रहे हैं और यह काम नहीं होने देंगे, उस दिन पूरी तस्वीर बदल जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसा होगा? कम से कम अभी तो दिखाई नहीं देता। जिस देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी इस अभियान में पूरी ताकत से जुट गई हो तो आप क्या उम्मीद कर सकते हैं? लेकिन कोशिश करना छोड़ना नहीं चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)


