संसद में बहस राहुल और विपक्ष का और नुकसान कर गई।
प्रदीप सिंह।
पिछले कई विधानसभा चुनावों में हार के बाद एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ऑफ इलेक्टोरल रोल्स और वोट चोरी को बड़ा मुद्दा बनाने की राहुल गांधी, कांग्रेस पार्टी और विपक्ष ने काफी कोशिश की। इन मुद्दों को लेकर राहुल गांधी बिहार चुनाव में भी उतरे। कांग्रेस और विपक्ष ने इस मुद्दे पर बहस कराने की मांग को लेकर संसद का मानसून सत्र चलने नहीं दिया, जबकि मानसून सत्र चल सकता था जैसे अभी संसद का शीत सत्र चलना शुरू हुआ है। तो इस पूरी बहस ने कई चीजें स्पष्ट की हैं। पहली बात तो यह कि मानसून सत्र बर्बाद करके और शीतकालीन सत्र में इस पर चर्चा के लिए तैयार होकर विपक्ष ने साबित कर दिया कि उनके यहां संसदीय रणनीति के बारे में सोचने वाला कोई नहीं है।

संसदीय रणनीति होती है कि मुद्दे को उठाया कैसे जाए। मुद्दा अगर हम उठा लें और सत्तारूढ़ दल नहीं चाहता कि उस पर चर्चा हो तो हम उस मुद्दे का आधार व्यापक कर दें। यह काम विपक्ष नहीं कर पाया। यह काम किया सत्तारूढ़ दल ने। सत्ता पक्ष ने पहले तो मानसून सत्र में विपक्ष को हंगामा करने दिया। ऐसा करके विपक्ष अपने ही मुद्दे पर बोलने का मौका चूक गया। अगर बहस मानसून सत्र में होती तो विपक्ष को इन मामलों पर बिहार चुनाव से पहले बोलने का मौका मिलता। तो मानसून सत्र में हंगामा कर विपक्ष अपना ही नुकसान कर रहा था और चालाकी से बीजेपी चुप रही।
दूसरा विपक्ष को अगर लगता है कि सरकार किसी मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार नहीं है तो उसे संसदीय जनतंत्र ने एक ब्रह्मास्त्र दिया है, जिसका नाम है अविश्वास प्रस्ताव। अविश्वास प्रस्ताव का जैसे ही नोटिस दिया जाता है और वह बहस के लिए मंजूर होता है, बाकी सारी कार्यवाही रुक जाती है। पहले उस मुद्दे पर चर्चा होती है। अविश्वास प्रस्ताव पर आप किसी भी मुद्दे पर बोल सकते हैं। कोई रोक नहीं है। तो विपक्ष ने इसे भी गंवा दिया।

संसद के शीतकालीन सत्र में संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजीजू ने किया यह कि इस मुद्दे का आधार बढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि एसआईआर पर तो संविधान के मुताबिक चर्चा हो नहीं सकती क्योंकि एसआईआर का काम चुनाव आयोग कर रहा है। वह सरकार का कोई विभाग तो है नहीं, ऐसे में जवाब कौन देगा? इसलिए चुनाव सुधार पर बात कर लीजिए। उसमें आप एसआईआर पर भी बोल लीजिएगा। तो सरकार को सीधे एसआईआर के बजाए चुनाव सुधार पर जवाब देना होगा। और जब सदन में विपक्ष के आरोपों का केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जवाब दिया तो उससे साबित हो गया कि विपक्ष के पास कोई तथ्य था ही नहीं। विपक्षी केवल शोर मचाने के लिए यह मुद्दा उठा रहे थे। राहुल गांधी और अन्य वक्ताओं ने सदन में जो भी तथ्य पेश किए उनका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था। तो जो बात सड़क और गली में थी, वह संसद के रिकॉर्ड में आ गई। हमेशा के लिए दर्ज हो गया कि सबसे बड़े विपक्षी दल और उसके साथियों ने किस तरह इस मुद्दे पर झूठ बोला। किस तरह से सत्तारूढ़ दल ने संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट किया। चाहे वह चुनाव आयुक्तों के चुनाव में जो समिति बनी है उसमें सीजीआई का न होना हो,चाहे जो सीसीटीवी फुटेज है, उसको 45 दिन में डिलीट करने का मामला हो और चाहे मतदाता सूची में बदलाव का मामला हो। केंद्रीय गृह मंत्री ने अपने जवाब में राहुल गांधी के पूरे मुद्दे को हवा में उड़ा दिया। राहुल गांधी के और विपक्षी दलों के पास इस मुद्दे पर बोलने के लिए कुछ नहीं बचा और कोई मुद्दा भी नहीं बचा। इसीलिए अब संसद की कार्यवाही सामान्य ढंग से चल रही है। जिस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे थे उस पर खुद घिर गए। तो इस पर एक मुहावरा है- खाया पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा 12 आना।
एसआईआर और वोट चोरी को मुद्दा बनाकर राहुल गांधी देश की जनता को समझाने की कोशिश कर रहे थे, कर रहे हैं और करते रहेंगे, लेकिन वोट चोरी कैसे होती है? कहां वोट चोरी हुई है? यह वह बता नहीं पाते हैं। जिन लोगों को वोट चोरी का शिकार बताकर वह सामने लेकर आते हैं, वही दूसरे दिन बताते हैं कि हमें कांग्रेस के लोगों ने ऐसा बोलने को कहा था इसलिए बोल दिया। हमारा न तो मतदाता सूची से नाम कटा था और न हमको किसी ने वोट देने से रोका था। संसद में राहुल और कांग्रेस की हालत यह हुई कि जिस मुद्दे को देश के लिए वह सबसे बड़ा खतरा बता रहे थे, उस मुद्दे पर बहस का जवाब सुनने से पहले ही वह सदन से भाग गए।

विपक्ष ने एसआईआर में आरोप लगाया गया लाखों करोड़ों लोगों के नाम जानबूझकर हटाए जा रहे हैं। बिहार में मतदाता सूची से 65 लाख लोगों के नाम हटाए गए, लेकिन छह लोग भी सामने नहीं आए जो कहें कि हम जीवित हैं पर हमारा नाम काट दिया गया। तो संसद में हुई बहस ने इस मुद्दे पर सरकार की विश्वसनीयता को और बढ़ा दिया जबकि विपक्ष की विश्वसनीयता को और गर्त में धकेल दिया। अपने जवाब में जिस तरह से अमित शाह ने बताया कि वोट चोरी का सिलसिला तो गांधी परिवार की चार पीढ़ियों से चल रहा है। शुरुआत जवाहरलाल नेहरू से हुई। वोट मिला था सरदार पटेल को चोरी कर लिया जवाहरलाल नेहरू ने। वोट चोरी में इंदिरा गांधी को सजा हुई तो और इमरजेंसी लगा दी। सोनिया गांधी इस देश का नागरिक बनने से पहले ही मतदाता बन गई थीं। इसके अलावा उन्होंने उदाहरण दिया कि जब वयनाड से राहुल गांधी चुनाव लड़े थे तब भी 17 लाख वोटर्स के नाम हटाए गए थे। तो राहुल गांधी क्या फर्जी वोट से जीते। उस समय क्यों नहीं उठाया वोट चोरी का मामला? कुल मिलाकर नतीजा यह हुआ कि विपक्ष ने जिस उद्देश्य से यह मुद्दा उठाया था, हुआ उसका ठीक उल्टा। राहुल गांधी ने सड़क पर,चुनाव में और संसद में तीनों जगह साबित कर दिया कि उनमें नेतृत्व की क्षमता नहीं है। उनको तथ्यों की जानकारी नहीं है। वह संसद में बिना किसी तैयारी के आते हैं। वे हर बार ऐसी बात बोलते हैं, जिस पर वह खुद और उनका पूरा परिवार घिर जाता है। सार्वजनिक जीवन में यह तरीका भी होता है कि आप कह सकते हैं, हमारी पुरानी पीढ़ी ने गलती की थी। उसकी माफी मांगते हैं। अब आइए नई शुरुआत करते हैं। राहुल में यह कहने की भी हिम्मत नहीं है। जब तक प्रायश्चित नहीं होगा तब तक पाप के दाग से छुटकारा नहीं मिलेगा। वही हो रहा है कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार के साथ।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



