बिरयानी खाकर गंगा में हड्डियां फेंकने वालों का समर्थन करने वाले अखिलेश जैसों को पहचानिए।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
जब संवेदना मर जाती है तो अनुभूति भी नहीं होती। एक घटना हाल ही में आपने पढ़ी और सुनी होगी। 17 मार्च को वाराणसी में गंगा में नाव पर इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया और उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया गया। इफ्तार में कुछ लोगों ने बिरयानी खाई और हड्डियां गंगा नदी में फेंक दीं। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस हरकत में आई और 14 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। ये सभी मुसलमान हैं। यह कोई सामान्य घटना नहीं है। यह हिंदुओं की सांस्कृतिक अस्मिता पर सीधा हमला और बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है।
हमारी जो संस्कृति है, वह हमारी सबसे बड़ी सॉफ्ट पावर है और जिसका लोहा पूरी दुनिया मानती है। हमारे जो वैचारिक दुश्मन हैं वे सोचते हैं कि भारत की इस सॉफ्ट पावर को खत्म करो तो सनातन संस्कृति को खत्म कर सकते हैं। मुगलों और अंग्रेजों ने कोशिश की,लेकिन सफल नहीं हुए। अब भारत के नए मुगल और अंग्रेज इस कोशिश में लगे हैं। उनकी इस कोशिश में हिंदुओं का एक वर्ग भी शामिल हो गया है,जो अपने को सेकुलर कहता है। भारत में सेकुलर होने का मतलब है कि अगर आप मुस्लिम परस्त हैं तो सेकुलर हैं। अगर हिंदू की बात करते हैं तो कम्युनल हैं। तो इन युवकों की गिरफ्तारी पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं आईं। एक प्रतिक्रिया उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की भी आई। इसे आप सुनेंगे तो संज्ञा शून्य हो जाएंगे। उन्होंने हंसते हुए कहा कि पुलिस की हथेली गर्म नहीं की इसलिए एक्शन हुआ, कर देते तो नहीं होता। यह सोच है उस व्यक्ति की,जो प्रदेश का 5 साल मुख्यमंत्री रह चुका है और 2017 से फिर से मुख्यमंत्री बनने की कोशिश कर रहा है। अखिलेश जब मुख्यमंत्री थे तो मुजफ्फरनगर में दंगा हुआ था। दंगे के बाद पीड़ित हिंदू और मुसलमान अलग-अलग कैंप्स में रखे गए। उस दंगे में समाजवादी पार्टी और आजम खान की क्या भूमिका थी, इसके बारे में बहुत चर्चा हो चुकी है। लेकिन एक बात शायद लोग भूल गए हों। दंगों के बाद सोनिया गांधी और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मुजफ्फरनगर पहुंचे। लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सिर्फ उन कैंप्स में गए, जहां मुस्लिम दंगा पीड़ित थे। जिन कैंपों में हिंदू दंगा पीड़ित थे, उनमें गए ही नहीं और दिल्ली लौटकर मुआवजे की घोषणा भी केवल मुस्लिम दंगा पीड़ितों के लिए की। इस फैसले पर हंगामा मचा और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने मनमोहन सिंह सरकार कड़ी लताड़ लगाई और कहा कि आप मुआवजा कैसे धर्म के आधार पर दे सकते हैं। इसके बाद आदेश बदला गया। यह था अखिलेश यादव का मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल, जिसमें यह सब हुआ। उनके मन में हिंदुओं के प्रति कोई संवेदना है नहीं। उत्तर प्रदेश का रहने वाला,उत्तर प्रदेश में राजनीति करने वाला, उत्तर प्रदेश में फिर से मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने वाला अगर अयोध्या में भव्य राम मंदिर के दर्शन करने जाने में अपना अपमान समझता हो तो आप समझ लीजिए कि सनातन के प्रति उसकी कितनी निष्ठा है।
Only bones were thrown into the Ganga, Hindus immerse ashes”: How the  left-liberal ecosystem is defending the actions of Muslim youths, with  Congress calling it 'iftar'
4 नवंबर 2008 को मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था। उसका उद्देश्य था प्रदूषण को कम करना, नदी के संरक्षण को बढ़ावा देना और सबसे महत्वपूर्ण गंगा नदी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पवित्रता को बनाए रखना। बिरयानी खाकर हड्डी फेंकना, यह सांस्कृतिक पवित्रता को बनाए रखने का प्रयास है क्या? जो लोग कह रहे हैं कि इसको मुद्दा क्यों बना रहे हैं,दरअसल उनकी संवेदना अपनी संस्कृति के प्रति मर चुकी है। देश की सबसे पवित्र नदियों में गंगा की गिनती होती है। हिंदू चाहे बनारस जाए,चाहे हरिद्वार, ऋषिकेश या गंगोत्री। वे जब नदी में उतरते हैं तो सबसे पहले किनारे से नदी का जल हथेली में लेकर अपने शरीर पर छिड़कते हैं, उसका आचमन करते हैं और उसके बाद नदी को प्रणाम करते हैं। इसके बाद नदी में पांव रखते हैं। गंगा के प्रति यह आस्था है। कोई ऐसा धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, जिसमें गंगा जल का प्रयोग न किया जाता हो। हम भगवान की जितनी पूजा करते हैं, उससे ज्यादा प्रकृति की पूजा करते हैं। पीपल के पेड़ पर जल अर्पित करते हैं। तुलसी घर में लगाते हैं। हमारी सभ्यता ही नदियों के किनारे बसी हुई है। और ये लोग कह रहे हैं कि गंगा नदी में अगर हड्डी फेंक दी तो क्या हो गया? गंगा में बिरयानी खाकर हड्डियां फेंकने वालों का जो समर्थन कर रहे हैं, वे दरअसल आपकी सांस्कृतिक अस्मिता पर हमला कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि आपकी सांस्कृतिक अस्मिता नष्ट हो जाए। इसीलिए देखिए हमारे रीति रिवाजों का मजाक उड़ाने का चलन कितना ज्यादा बढ़ गया है और इसमें हिंदू समाज के ही कई लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। मैकाले की तो यही कोशिश थी कि सनातनियों में अपनी संस्कृति,अपने धर्म,अपनी सभ्यता के प्रति एक तरह का हिकारत का भाव पैदा करो। उनको यह समझाओ कि इस पर हमको शर्म आनी चाहिए और हमको शर्म आने लगी। आजादी के 80 साल बाद भी आ रही है। अगर ऐसा न होता तो ये जो 14 युवक गिरफ्तार हुए हैं, इनके खिलाफ पूरे देश से आवाज उठती है कि इनको कानून के मुताबिक सख्त से सख्त सजा दी जाए। आप मानकर चलिए कि अगर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार नहीं होती तो इनकी गिरफ्तारी भी न होती। और अखिलेश यादव क्या बोल रहे हैं कि सरकार को खुश करने के लिए अफसर ऐसा कर रहे हैं। मैं कहता हूं कि अगर यह अफसर सरकार को खुश करने के लिए ऐसा कर रहे हैं तो इनको पुरस्कृत किया जाना चाहिए। क्योंकि ये अफसर समझते हैं कि जो सत्ता में हैं, संस्कृति के प्रति उनके मन में किस तरह के गर्व का भाव है।
Varanasi Ganga Iftar Row: SP, Congress Support | Muslim Vote Bank
अपनी जड़ों से कटा हुआ कोई भी पौधा बहुत दिन तक सर्वाइव नहीं करता। अखिलेश यादव जैसे लोग अपनी संस्कृति से कटे हुए हैं। वे अपनी ही दुनिया में मस्त रहना चाहते हैं। देश में कई ऐसे बुद्धिजीवी भी हैं,जिनमें अपनी संस्कृति के प्रति हिकारत का भाव है। ऐसे लोग भारतीय संस्कृति,भारतीय सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। दुश्मन तो सामने नजर आता है, लेकिन ऐसे लोग आस्तीन के सांप हैं। अरे भाई, अगर सनातन संस्कृति के प्रति कोई आस्था नहीं है तो कम से कम पर्यावरण संरक्षण की ही चिंता कर लेते। जो लोग कह रहे हैं कि गंगा नदी में हड्डी फेंकना कोई बुरी बात नहीं है, वे सनातन संस्कृति विरोधी कृत्यों को नॉर्मलाइज करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि लोग इसको स्वीकार कर लें। कोई भी हिंदू अपने घर में बिना नहाए पूजा नहीं करता है। ऐसे हिंदुओं की संख्या करोड़ों में होगी जो नॉन वेजिटेरियन फूड खाते हैं, उनके घर में बनता है। कल को कोई यह कहे कि भाई आप जब खाते हैं तो डाइनिंग टेबल पर क्यों खाते हैं? आप पूजा घर में जाकर खाइए। उसमें क्या बुराई है? ऐसे कुतर्कियों का कोई जवाब नहीं हो सकता।
तो इसलिए कह रहा हूं जरा अपने आसपास देखिए कि हो क्या रहा है। समझने की कोशिश कीजिए। सनातन संस्कृति पर लगातार चोट बहुत लंबे समय की परियोजना है, जिस पर काम हो रहा है। मेरा मानना है कि हमें खासकर युवा पीढ़ी को बेहद सजग रहने की जरूरत है। उनको समझना चाहिए कि हमारी संस्कृति क्या है? दुनिया का कोई ऐसा धर्म नहीं है, जो हिंदू धर्म का किसी क्षेत्र में मुकाबला कर सके। वह चाहे प्रकृति के संरक्षण की बात हो,प्रकृति के अनुकूल जीवन बिताने की बात हो या फिर विज्ञान की बात हो।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)