आतंकी हमला करें इससे पहले उन पर हमले की नीति बनानी होगी।

प्रदीप सिंह।
11 साल कोई छोटा समय नहीं होता। 11 साल बाद जम्मू कश्मीर के बाहर भारत में कहीं भी विस्फोट हुआ है। ये है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की 11 सालों की उपलब्धि। लेकिन सवाल यह है कि दिल्ली में सोमवार को लाल किले के सामने जो कार में विस्फोट हुआ,  उससे क्या सबक लेना चाहिए। इस बार पाकिस्तान ने जो टेरर मॉड्यूल बनाया है,  वो है वाइट कॉलर आतंकवादियों का मॉड्यूल। इसमें डॉक्टरों को इस्तेमाल किया गया है। बल्कि कहना चाहिए कि वे इस्तेमाल होने को तैयार थे। वे दरअसल जिहादी हैं, डॉक्टर तो उनका आवरण है। डॉक्टरी पेशे की आड़ में, जिस पर लोग आंख बंद करके भरोसा करते है, उसका फायदा उठाते हुए इन जल्लाद डॉक्टरों ने आतंकवाद का जाल बिछाया। इन डॉक्टरों के पास से अब तक 3000 किलो विस्फोटक बरामद हुआ है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये करना क्या चाहते थे। हमको-आपको देश की सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को बधाई देनी चाहिए कि उन्होंने इतना बड़ा हादसा होने से रोक लिया।


जो हादसा होता है, उसके बारे में तो हमें पता चलता है, लेकिन जो रोक लिया जाता है, उसके बारे में कम ही पता चलता है। पिछले कुछ दिनों से लगातार जिस तरह की गिरफ्तारियां हो रही थीं उससे साफ था कि हमारी सुरक्षा एजेंसियों को एक्शननेबल इंटेलिजेंस इनपुट मिल रहा था। आतंकवाद के मामले में सबसे जरूरी होता है कि आपको एक्शननेबल इनपुट मिले। सिर्फ यह नहीं जो पहले मिलता था कि कहीं विस्फोट हो सकता है। कब हो सकता है, कहां होगा, कुछ पता नहीं है। फरीदाबाद से आप देखिए जम्मू कश्मीर पुलिस, फरीदाबाद पुलिस, दिल्ली पुलिस, उत्तर प्रदेश पुलिस का एक जॉइंट ऑपरेशन इस समय चल रहा है। यूपी एटीएस भी इसमें शामिल हो गई है। यह जो डॉक्टर गिरफ्तार हुआ है, उसकी एक प्रेमिका डॉक्टर शाहीन शाहिद  की भी गिरफ्तारी हुई है, जो कानपुर मेडिकल कॉलेज में काम कर चुकी है  और लखनऊ में रहती थी। तो अब इस जाल को आप समझिए। पहली बात तो अब हमको इस गलतफहमी से बाहर निकल आना चाहिए कि लड़ाई आतंकवाद से है। जब तक हम आतंकवाद से लड़ाई लड़ते रहेंगे तब तक इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी। हमारी लड़ाई वास्तव में पॉलिटिकल इस्लाम से है। इस सच्चाई से जब तक भागते रहेंगे तब तक हम आतंकवाद का शिकार होते रहेंगे। दूसरी बात यह है कि पाकिस्तान  पर हमने सर्जिकल स्ट्राइक की, उसके बाद एयर स्ट्राइक की और फिर ऑपरेशन सिंदूर किया। इन सबका असर थोड़ी देर के लिए हुआ तो इससे आप समझ लीजिए कि यह कोई स्थाई हल नहीं है। आतंकवादी घटना के जवाब में ऑपरेशन सिंदूर जैसी कार्रवाई पाकिस्तान पर इससे पहले कभी नहीं हुई थी। दिल्ली की घटना के बाद  अब कुछ लोग कह रहे हैं कि बीजेपी तो बड़ा दावा कर रही थी कि हमारे राज में आतंकवादी घटनाएं नहीं होती। उनको अंदाजा भी नहीं है कि जो गिरफ्तारियां हुई हैं और जितने हथियार व विस्फोटक बरामद हुए हैं, अगर ऐसा न हो पाता तो इतने बड़े हमले की तैयारी थी कि आप मुंबई का आतंकवादी हमला भूल जाते। इतनी बड़ी साजिश का पर्दाफाश हो गया है, यह सोचकर हमें अब इत्मीनान से नहीं बैठ जाना चाहिए। केवल इतनी संतोष की बात है कि हमारी खुफिया एजेंसियां पहले की तुलना में बहुत ज्यादा चाक चौबंद और बहुत ज्यादा चुस्त हो गई हैं। दिल्ली में लाल किले के सामने जो घटना हुई वह इसलिए कि फरीदाबाद, जम्मू कश्मीर, गुजरात और महाराष्ट्र में जो गिरफ्तारियां हो रही थीं और जो विस्फोटकों का जखीरा बरामद हुआ, उससे यह डॉक्टर, जो गाड़ी चला रहा था, पैनिक कर गया और उसने घबराकर यह विस्फोट कराया। अगर ये गिरफ्तारियां न हुई होतीं तो उनकी तैयारी तो बहुत बड़े आतंकवादी हमले की थी।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद कहा था कि जो भी आतंकी घटना होगी उसे हम युद्ध की घोषणा मानेंगे। तो आप मानकर चलिए कि ऑपरेशन सिंदूर का पार्ट टू किसी भी समय शुरू हो सकता है। अब भारत को केवल तैयारी का समय चाहिए। तैयारी का मतलब रणनीति बनाने का कि किस तरह से हमला करना है। प्रधानमंत्री मंगलवार को भूटान में थे और वहां से उन्होंने कहा है कि इसके पीछे जो लोग हैं, उनको बख्शा नहीं जाएगा। तो इसके पीछे कौन हैं? पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन, पाकिस्तान की सरकार, पाकिस्तान की सेना, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी। लेकिन मेरा मानना है कि इन सबको सजा देने या इन सबके खिलाफ कार्रवाई करने के बाद भी असली मुद्दा वही रहेगा कि आखिर ये कर क्यों रहे हैं? इनका लक्ष्य क्या है? इनका लक्ष्य है पॉलिटिकल इस्लाम को स्थापित करना। इनका लक्ष्य है शरिया का राज कायम करना और भारत को इस्लामी देश बनाना। एक बात सबको मालूम है और जिसे खासतौर से राजनीतिक लोग स्वीकार करने को तैयार नहीं होते कि इस्लाम में राष्ट्रवाद का राष्ट्र का कोई कांसेप्ट ही नहीं है। उनके यहां सिर्फ खलीफा (कैलिफेट) का कांसेप्ट है। मुसलमान राष्ट्रवादी हो सकता है, यह बात हमें अपने दिमाग से निकाल देनी चाहिए क्योंकि उनका मजहब होने नहीं देता। उनका मजहब कहता है कि तुम्हारी आस्था सिर्फ कैलिफेट में होनी चाहिए। जो तुम्हारे मजहब को नहीं मानते हैं, उनको जीने का अधिकार नहीं है। जो मजहब ये सिखाता हो वे लोग आतंकवादी नहीं बनेंगे तो और क्या बनेंगे? आतंकवाद उनके जीवन का लक्ष्य है। तो सवाल यह है कि इस घटना से सबक क्या सीखने होंगे?

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इस घटना के तार जम्मू कश्मीर से जुड़े हैं। वहीं से ये आतंकवादी आए। एक तो चीन से डॉक्टरी पढ़कर आया है। चीन में मुसलमानों के साथ जो हो रहा है, उस पर इन लोगों और इनके आकाओं की बोलने की हिम्मत नहीं क्योंकि उनको मालूम है कि उसके बाद क्या होगा। जैसा चीन उईघर में कर रहा है, जब तक उसी तरह का ट्रीटमेंट इन लोगों को यहां नहीं मिलेगा तब तक इन पर कोई असर नहीं होने वाला है। तो पहला सबक यह है कि कश्मीर घाटी के मुसलमान न पहले कभी भारत के साथ थे, न आज हैं और न कभी भविष्य में होंगे। और जो लोग इस गलतफहमी में हैं कि वे भारत के साथ हो सकते हैं तो उनकी हालत उस शुतुरमुर्ग की तरह है, जो तूफान आने के समय रेत में गर्दन गाड़ लेता है और उसको लगता है कि तूफान गुजर जाएगा, उसका कुछ नहीं होगा। दूसरा सबक यह है कि अगर इसको देश के अंदर ठीक करना है तो घाटी में शॉर्ट टर्म, मिड टर्म और लॉन्ग टर्म डेमोग्राफिक चेंज का प्रोजेक्ट चलाना पड़ेगा। उसकी रणनीति बनानी पड़ेगी और उसको तत्काल प्रभाव से लागू करना पड़ेगा। बिना उसके यह परिवर्तन नहीं आ सकता। ये जो पत्थरबाज थे आखिर अचानक कहां चले गए? क्या उनका हृदय परिवर्तन हो गया? क्या वो राष्ट्रभक्त हो गए? ऐसा कुछ नहीं हुआ। वह समय का इंतजार कर रहे हैं। और यह जो पहलगाम के बाद एक नई शब्दावली गढ़ी गई है, ओवर ग्राउंड वर्कर्स। ये कोई ओवर ग्राउंड वर्कर्स नहीं हैं, ये शुद्ध रूप से आतंकवादी हैं और इनके साथ वही व्यवहार होना चाहिए जो आतंकवादियों के साथ होता है। तीसरा सबक- हमको यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि यह लड़ाई आतंकवाद नहीं पॉलिटिकल इस्लाम के खिलाफ है। आप देखिए ऑपरेशन सिंदूर मई में हुआ था और आज हम नवंबर में हैं। आतंकी हमले में कितना समय लगा? 6 महीने सिर्फ। वह फिर से तैयारी में हैं और उनकी तैयारी लगातार चलती रहती है। आप 10 आतंकवादी मार दीजिए, 100 मार दीजिए, हजार मार दीजिए, उनको फर्क नहीं पड़ता। इसके अलावा इस घटना से यह भी सबक लेना चाहिए था कि इस देश में तत्काल प्रभाव से मदरसे बंद कर दिए जाएं। ये मदरसे ही आतंकवाद की नर्सरी हैं। हमको अब स्थाई हल के बारे में सोचना चाहिए। रिएक्टिव होना बंद कर देना चाहिए। हर बार हम इंतजार करें कि हमारे ऊपर हमला होगा। हम उसका जवाब देंगे। प्रोएक्टिव होना पड़ेगा। वे हमला करें, उससे पहले उन पर हमला होना चाहिए। उनके मन में ये डर बैठना चाहिए कि किसी भी समय हमला हो सकता है। यहां कानून में भी बदलाव होना चाहिए। गिल्टी टिल प्रूवन इनोसेंट कानून लागू होना चाहिए और अदालतों को यह समझना चाहिए और समझाया जाना चाहिए कि देश की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं हो सकता। देश की सुरक्षा का मामला होगा तो कोई मानवाधिकार, कोई मौलिक अधिकार नहीं। और यह जो बड़े-बड़े वकील इनके पक्ष में खड़े होते हैं, इनकी भी जांच होनी चाहिए। इनकी भी निगरानी होनी चाहिए। इनसे भी सवाल पूछा जाना चाहिए।

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पिछले 10 दिनों में जम्मू कश्मीर  पुलिस, हरियाणा पुलिस, दिल्ली पुलिस, उत्तर प्रदेश पुलिस, महाराष्ट्र पुलिस और गुजरात पुलिस ने जिस तरह का एक्शन लिया और खासतौर से अभी फरीदाबाद में जो हुआ है, इसकी शुरुआत कैसे हुई? घाटी में जैश-ए-मोहम्मद के पक्ष में पोस्टर लगे थे। पोस्टर लगाने वालों की जांच शुरू हुई। सीसीटीवी फुटेज से उनके चेहरे पहचाने गए। उनको पकड़ा गया। उनसे पूछताछ हुई तो कड़ी जुड़ती गई। आप कल्पना कीजिए कि अनुच्छेद 370 अब भी होता, जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा होता और यही उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री होते तो क्या जम्मू कश्मीर की पुलिस यह काम कर पाती जो उसने किया, कभी नहीं। तो इसलिए इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझ लीजिए कि दोस्त कौन है? दुश्मन कौन है? हम दुश्मन को ही दोस्त मानकर उसे गले लगाते रहते हैं और वह एक दिन पीठ में छुड़ा मार देता है। हमारी सारी सोच ही धोखा खाने वाली है। धोखा खाने के बाद हमारी थोड़ी देर के लिए आंख खुलती है और फिर हम आंख बंद कर लेते हैं। तो दिल्ली में यह जो विस्फोट हुआ है, यह एक अवसर है अपनी इंटरनल सिक्योरिटी की पूरी डॉक्ट्रिन को ओवरहॉल करने का, उसमें आमूल परिवर्तन करने का। आतंकवाद के खिलाफ और देश के विरोध में काम करने वालों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस होनी चाहिए। अभी तक यह नैरेटिव चलाया जाता था कि गरीबी और अत्याचार से परेशान होकर लोग आतंकवाद में जाते हैं। क्या ये डॉक्टर गरीब थे। इन पर अत्याचार हुआ था। तो यह बहानेबाजी छोड़ देना चाहिए। यही नैरेटिव चलाया जाता था माओवादियों के बारे में। जब हमने मान लिया कि हर माओवादी सोच का व्यक्ति देश का दुश्मन है। तब माओवाद खत्म होना शुरू हुआ या लगभग खत्म ही हो गया है। आतंकवाद के बारे में भी इसी तरह से सोचना पड़ेगा।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)