प्रदीप सिंह।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को अपने देश के नाम संदेश प्रसारित किया। बहुत से लोगों को उम्मीद थी कि राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के खिलाफ युद्ध से बाहर निकलने की घोषणा करेंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। डिप्लोमेसी में कई बार होता है कि जो बात नहीं कही जाती है यानी बिटवीन द लाइंस जो होता है, वह ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। तो डोनाल्ड ट्रंप ने जो कुछ कहा उससे आप समझने की कोशिश कीजिए कि उनका इरादा क्या है? उन्होंने अपने देशवासियों को आश्वस्त किया कि अमेरिका की इकॉनमी को कोई नुकसान नहीं पहुंच रहा है। अमेरिकी तेल कंपनियां पैसा कमा रही हैं। देश में एंप्लॉयमेंट बढ़ रहा है। दूसरा उन्होंने गिनाया कि अमेरिका कब-कब युद्ध में गया और कितने समय तक उसमें फंसा रहा। सबसे लंबा वियतनाम का युद्ध 19 साल 5 महीने चला था। ईरान युद्ध के बारे में उन्होंने कहा कि अभी तो 32 दिन ही हुए हैं। यह युद्ध जल्दी खत्म नहीं होगा। इसके बाद उन्होंने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया,वह बहुत भयानक है। उन्होंने कहा कि जब तक ईरान को पाषाण युग में नहीं भेज देते तब तक युद्ध नहीं रुकेगा।
अमेरिका में अलग-अलग समय पर अलग-अलग तरह के नैरेटिव चलाए जाते हैं और उनका आप अगर आकलन करें तो मालूम होगा कितना डबल स्टैंडर्ड है। बुश के समय जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया तो पूरी दुनिया में नैरेटिव चलाकर इराक को बुरा बताया गया। कहा गया कि उसके पास वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन हैं, जो कि था ही नहीं। इसके बाद पूरे इराक को बर्बाद कर दिया गया। लेकिन इसके बावजूद इराक से अमेरिका को कुछ मिला नहीं । ऐसा ही वियतनाम और अफगानिस्तान में हुआ। अब ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका में क्या नैरेटिव चलाया जा रहा है। अमेरिका में नैरेटिव गढ़ने वाले मीडिया के लोग और वहां के इंटेलेक्चुअल्स हैं। इनमें से कोई ट्रंप को पसंद नहीं करता। तो इसलिए आपको यह सुनने को मिल रहा होगा कि ईरान कैसे अमेरिका का नुकसान कर रहा है। कैसे इजराइल को नुकसान पहुंचा रहा है। हार मानने को तैयार नहीं है। स्ट्रेट ऑफ हार्मुज खोलने को तैयार नहीं हो रहा है। लेकिन एक भी मीडिया रिपोर्ट ये नहीं बताएगी कि अमेरिका और इजराइल के हमलों से ईरान का कितना नुकसान हुआ है। इसलिए ये पूरी नैरेटिव वॉर एकतरफ़ा है। यह ईरान के पक्ष में और अमेरिका-इजराइल के खिलाफ है।
ईरान का समर्थन करने वाले आप मानकर चलिए ऐसे लोग हैं, जो आतंकवाद का समर्थन करते हैं। ईरान सिर्फ अमेरिका और इजराइल के लिए खतरा नहीं है। इस युद्ध के एक महीना चलने के बाद ईरान पूरी खाड़ी के देशों के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है। अगर ईरान मजबूत रहा तो खाड़ी के देशों का क्या भविष्य है, कोई नहीं बता सकता। इजराइल कब तक रहेगा, कोई नहीं बता सकता। और ईरान के पास अभी परमाणु हथियार नहीं हैं। कल्पना कीजिए कि जब आ जाएंगे तो क्या होगा। ईरान ने सबसे ज्यादा आतंकवाद के प्रॉक्सीज खड़े किए हैं। उनकी आईआरजीसी अपने आप में एक आतंकी संगठन है। ईरान का इरादा पूरे मिडिल ईस्ट पर अपना प्रभुत्व कायम करना है। ईरान में जो नारे लगते हैं डेथ टू अमेरिका, डेथ टू इजराइल, ये कोई शोशेबाजी नहीं है, इसके पीछे एक सोच है जो इन देशों को खत्म करना चाहती है और इसके लिए उसको परमाणु हथियार चाहिए।

तो ईरान का जिसको समर्थन करना है, वह यह मान कर करे कि जिहादी रिजीम का समर्थन कर रहा है। दुनिया में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए ईरान का समर्थन कर रहा है। मैं डोनाल्ड ट्रंप का कोई समर्थक या प्रशंसक नहीं हूं, लेकिन मेरा मानना है कि ईरान के खिलाफ यह जो लड़ाई हो रही है,उसमें अमेरिका नैरेटिव बना नहीं पाया है। इराक, वियतनाम या अफगानिस्तान के युद्ध में अमेरिका की नीति गलत थी लेकिन फिर भी उसने नैरेटिव बना लिया था। यहां उसकी नीति सही है फिर भी नैरेटिव बन नहीं पाया है। नैरेटिव ठीक उल्टा बना है। ईरान का परमाणु संपन्न होना केवल अमेरिका और इजराइल के लिए खतरा नहीं है, पूरी दुनिया के लिए खतरा है। इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाले आपको बहुत कम लोग मिलेंगे। जो लोग ईरान के प्रति हमदर्दी दिखा रहे हैं,उनको यह दिखाई नहीं दे रहा है कि यह वही रिजीम है, जिसने अपने ही देश के 35-40 हजार लोगों को सिर्फ इसलिए मार दिया कि वे अपने अनुसार जीना चाहते थे। अपने मर्जी के मुताबिक कपड़े पहनना और रहना चाहते थे। ईरान की संप्रभुता का समर्थन करने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे,लेकिन क्या दुनिया को ऐसा संप्रभु देश चाहिए जो अपने ही लोगों का निर्दयता से दमन करे और पूरी दुनिया के लिए खतरा हो।
इस युद्ध में इजराइल का सबसे बड़ा लक्ष्य ईरान की हमला करने की क्षमता और उसके प्रॉक्सीज को खत्म करना है। हिजबुल्ला के खिलाफ वह तेजी से अभियान चला रहा है और लेबनान में उसने एक बफर जोन लगभग क्रिएट कर लिया है। ईरान की परेशानी यह है कि हमास को इजराइल पहले ही खत्म कर चुका है। हिजबुल्ला,हमास,हूती और यहां तक कि ईरान का आईआरजीसी और बसीज आर्मी,ये सब एक विचारधारा से प्रेरित संगठन है। इनको आप कमजोर कर सकते हैं,लेकिन इनका विचार नहीं खत्म होने वाला है। तो इनका लगातार दमन करना पड़ेगा। तब आप दुनिया को सुरक्षित बनाने का प्रयास कर सकते हैं। इस युद्ध में ईरान अमेरिका और इजराइल पर हमला कम कर रहा है, खाड़ी के देशों पर ज्यादा कर रहा है साथ ही हमलों का दायरा भी बढ़ाता जा रहा है। पहले उसने कहा कि अमेरिका के सैन्य अड्डों पर हमला करेंगे। फिर वह खाड़ी के देशों के गैस और तेल के सेंटर्स पर हमला करने लगा। सबसे ताजा धमकी यह है कि खाड़ी में अमेरिका की जो मल्टीनेशनल कंपनीज हैं, उन पर हमला होगा। होटल्स पर हमला हो रहा है। नागरिक इलाकों में हमला हो रहा है। लेकिन मैं फिर कह रहा हूं कि आप नैरेटिव की ताकत देखिए। इजराइल और अमेरिका तो डेमोक्रेटिक देश हैं। आप इजराइल में मोबाइल लेकर घूमिए और सब दिखा दीजिए कि कहां मिसाइल गिरी है, कितना नुकसान हुआ। ईरान से कोई खबर आ रही है क्या? वहां यह युद्ध शुरू होने से पहले से ही इंटरनेट बंद है, मोबाइल बंद है। वहां से कोई समाचार नहीं आ रहा है। ईरान की जिस तरह की बर्बादी हुई है, उसको फिर से बनाने में कई दशक लगेंगे। लेकिन ईरान की रिजीम को इससे मतलब नहीं है। उसके लोग भूखे मरें, प्यासे मरें इससे भी मतलब नहीं है। उसको अपनी विचारधारा से मतलब है। और वह विचारधारा मानवता के लिए खतरनाक है।
तो यह लड़ाई अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान नहीं है। यह लड़ाई लगभग उसी तरह की है, जो धर्म और अधर्म की लड़ाई होती है। इसलिए जो लोग नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं कि ईरान एक संप्रभु देश है, उसके खिलाफ इस तरह से आक्रमण नहीं करना चाहिए था। उनको एक बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि वह किसका समर्थन कर रहे हैं। आप ट्रंप और नेतन्याहू के विरोधी हो सकते हैं, लेकिन अगर आप दुनिया को सुरक्षित देखना चाहते हैं,अगर आप दुनिया से आतंकवाद को खत्म होते हुए देखना चाहते हैं तो आप ईरान के समर्थन में कभी नहीं खड़े हो सकते।
हमारा पड़ोसी पाकिस्तान हमारे देश में आतंकवादी भेजता है, आतंकवादी हमले कराता है। उसका सबसे बड़ा समर्थक कौन है? ईरान। ईरान स्ट्रेट ऑफ हार्मुज को बंद करके एक तरह से पूरी दुनिया को ब्लैकमेल कर रहा है। क्या एक ब्लैकमेल करने वाले देश का आप समर्थन करेंगे? तो इसलिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को जो बोला है वह दरअसल ईरान के लिए सबसे बड़े खतरे की घंटी है कि हम युद्ध बीच में छोड़कर नहीं जाएंगे। खाड़ी के देश और इजराइल भी यही चाहते हैं।
ईरान की हमला करने की क्षमता पूरी तरह नष्ट किए बिना अगर यह युद्ध रुका तो दुनिया में भारी तबाही आएगी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



