डील को लेकर भारत की रणनीति की आगे हो गए थे बेबस।
प्रदीप सिंह।बहुत से लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि भारत और अमेरिका के बीच में ट्रेड डील की बात कैसे बन गई? पर्दे के पीछे ऐसा क्या हुआ,जिससे एकदम से ट्रंप का मन बदल गया? पहली बात तो यह समझ लीजिए कि ट्रेड डील अभी हुई नहीं है। डील के लिए सैद्धांतिक सहमति हुई है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर लगाए गए टैरिफ को घटाने की घोषणा की है। पहले दोनों पक्ष डील के सारे मुद्दों को फाइनल करेंगे। उसके बाद एक जॉइंट स्टेटमेंट जारी होगा और उसके बाद डील पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर होंगे। लेकिन सोमवार की रात अचानक ट्रंप ने जो घोषणा की उससे यह स्पष्ट हो गया है कि डील होने जा रही है। तो सवाल यह है कि किस बात ने ट्रंप पर प्रभाव डाला?इस डील को करने के लिए किसी एक बात ने ट्रंप पर प्रभाव नहीं डाला बल्कि धीरे-धीरे घटनाक्रम बदलता गया। ट्रंप को पहला झटका तब लगा जब एससीओ समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग तीनों एक साथ खड़े हुए और हाथ मिलाकर अपने हाथ उठाए। वह चित्र पूरी दुनिया में देखा गया। रूस,चीन और भारत का साथ आना अमेरिका के लिए एक सदमा था। लेकिन भारत इसके जरिए क्या संदेश देना चाहता था? भारत का ट्रंप और अमेरिका को संदेश था कि हमारे पास और भी विकल्प हैं।

एससीओ समिट के बाद जब लग रहा था कि भारत और अमेरिका के बीच तल्खी और ज्यादा बढ़ जाएगी, उसी समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल को अमेरिकी विदेशमंत्री मार्को रूबियो से बात करने के लिए अमेरिका भेजा। रूबियो से बातचीत में डोवाल ने प्रधानमंत्री मोदी के तीन संदेश दिए। पहला यह कि भारत झुककर या दबकर कोई समझौता नहीं करेगा। दूसरा संदेश था कि भारत पुरानी कटुता भूलकर ट्रेड डील पर आगे बात करने के लिए तैयार है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण संदेश था कि भारत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल खत्म होने का इंतजार करने को भी तैयार है। इससे बड़ा झटका ट्रंप और अमेरिका के मौजूदा प्रशासन के लिए नहीं हो सकता था। अमेरिका के 50% टैरिफ के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था में कोई हाहाकार नहीं मचा था। यह ठीक है कि इस टैरिफ के कारण हमारे खासतौर से तीन उद्योगों रेडीमेड गारमेंट्स, जेम्स एंड ज्वेलरी और और लेदर को कुछ नुकसान हुआ। चूंकि ये तीनों लेबर इंटेंसिव उद्योग हैं तो वहां मजदूरों की नौकरी पर संकट आ गया,लेकिन भारत दुनिया में नए बाजार की तलाश में जुट गया।
भारत ने यह दिखाया कि वह अमेरिका जितना ताकतवर भले न हो लेकिन अमेरिका के सामने वह कमजोर नहीं है। अमेरिका के सामने वह झुकेगा नहीं। उसके बाद से अगर आप घटनाक्रम देखें तो बदलाव आना शुरू हुआ। 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर राष्ट्रपति ट्रंप ने उनको फोन करके बधाई दी। इसके बाद से दिसंबर तक दोनों नेताओं की चार बार फोन पर बात हुई और चारों बार भारत की ओर से स्पष्ट किया गया कि हम हमारी जो रेड लाइन है उससे समझौता नहीं करेंगे। हम अपना कृषि, डेयरी और फिशरीज का क्षेत्र अमेरिका के प्रोडक्ट्स के लिए नहीं खोलेंगे। अब अमेरिका के बयानों में परिवर्तन के संकेत आने तो शुरू हो गए थे, लेकिन तब भी राष्ट्रपति ट्रंप के सलाहकारों की अकड़ बनी हुई थी। उनके ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने कहा कि अभी भारत को अमेरिका को यह समझाने में काफी समय लगेगा कि वह रूस से तेल नहीं खरीद रहा है या नहीं खरीदेगा।
अमेरिका के रवैये में बड़ा परिवर्तन तब दिखा जब भारत में अमेरिका के नए राजदूत सर्जियो गोर आए और उन्होंने जिस तरह से बात कही। उन्होंने कहा कि दोस्तों में मतभेद हो जाते हैं, लेकिन जो अच्छे दोस्त होते हैं वे अपने मतभेद सुलझा लेते हैं और फिर कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अच्छी दोस्ती है। दोनों नेता जो भी मतभेद हैं, उनको सुलझाने में सक्षम हैं। सर्जियो गोर जिस भाषा में और जिस शैली में बोल रहे थे उससे यह साफ संकेत मिल रहा था कि अमेरिका भारत के साथ डील करने की तैयारी कर रहा है। उसने यह स्वीकार कर लिया है कि भारत ने जो रेड लाइन तय की है, उससे वह पीछे नहीं हटेगा। उसके बाद अमेरिका ने एक नया संगठन बनाया है-पैक्स सिलिका। इसमें रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई चेन बनाने की बात है। इस संगठन की बैठक में भी भारत को न्योता दिया गया, लेकिन जो पाकिस्तान उनको रेयर अर्थ मिनरल्स दे रहा था उसे उस बैठक में नहीं बुलाया गया। फिर पिछले सप्ताह विदेश मंत्री एस जयशंकर और सर्जियो गोर की लंबी मुलाकात हुई। उसके बाद गोर ने एक ट्वीट किया कि कुछ बड़ा होने वाला है।

इस बीच में भारत ने यूरोपियन यूनियन से एफटीए कर लिया। यह भी ट्रंप के लिए एक झटका था। ट्रंप को लगता था कि अमेरिका के बाद यूरोप के देश भी भारत पर टैरिफ बढ़ाएंगे, लेकिन हो गया इसका उल्टा। इसके बाद अमेरिका और ट्रंप को यह पूरी तरह समझ में आ गया कि भारत अमेरिका के सामने आकर गिड़गिड़ाने की बजाय अपने नए विकल्प तलाश रहा है। वह अपनी तैयारी कर रहा है कि अमेरिका से डील न हो तो भी भारत की अर्थव्यवस्था पर कोई बड़ा फर्क न पड़े। हाल ही में भारत का जो नया बजट पेश हुआ है उसको इसी नजरिए से देखना चाहिए। बजट उसी तैयारी का हिस्सा है कि अमेरिका ही नहीं दुनिया के किसी देश की ओर से इस तरह का अगर संकट आए तो पहले से हमारा अपना घर मजबूत हो।
ट्रंप को यह भी दिखाई दे रहा था कि उनके देश की बड़ी कंपनियां उनके रोकने पर भी भारत में लगातार निवेश कर रही हैं। एलन मस्क को उन्होंने धमकी दी थी कि भारत में फैक्ट्री मत लगाओ वरना टैरिफ बढ़ा देंगे। फिर भी मस्क ने फैक्ट्री लगा ली। इसके अलावा माइक्रोसॉफ्ट और गूगल ने घोषणा की कि दोनों मिलकर भारत में 52 बिलियन डॉलर का इन्वेस्टमेंट करेंगे। डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों दलों के सांसदों की राय बन रही थी कि ट्रंप गलत दिशा में जा रहे हैं। मेरा मानना है कि ट्रंप के मन में एक और डर था। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाला है कि अमेरिका के राष्ट्रपति को क्या इस तरह से टैरिफ लगाने का अधिकार है। अमेरिका का संविधान कहता है कि अगर कोई नेशनल इमरजेंसी हो,इकोनॉमिक इमरजेंसी हो तो ही राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार है,इस तरह से मनमाने तरीके से नहीं। यह फैसला आएगा तो ट्रंप को हर हाल में अपने सारे फैसले वापस लेने पड़ते। तो उस स्थिति से भी बचने के लिए ट्रंप को यह नजर आया कि जो नुकसान हो गया, वह तो हो गया आगे न हो। इसके लिए उन्होंने भारत से ट्रेड डील की घोषणा कर दी।
हालांकि डील की घोषणा के बाद अमेरिका की ओर से तमाम बातें कही जा रही हैं कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा लेकिन तुरंत रूस का बयान आ गया कि हमसे भारत का ऐसा कोई कम्युनिकेशन नहीं हुआ है। अमेरिका यह भी कहा रहा है कि भारत 500 बिलियन डॉलर का सामान उससे खरीदेगा और अमेरिका के एग्रीकल्चर प्रोडक्ट भारत में बिकेंगे,लेकिन भारत की ओर से इस पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। भारत ने यह एक बार भी नहीं कहा कि हम रूस से तेल खरीदना बंद कर देंगे। भारत ने यह एक बार भी नहीं कहा कि हम 500 बिलियन डॉलर का सामान अमेरिका से इंपोर्ट करेंगे। तो विश्व व्यवस्था जो बदल रही है और उसमें जो भारत की स्थिति बदल रही है, यह ट्रंप को दिखाई दे रहा है। उनको समझ में आ रहा है कि भारत को वह रोक नहीं सकते। इसलिए भारत से हाथ मिलाने में ज्यादा फायदा है। डोनाल्ड ट्रंप ने ज्यादा फायदे का रास्ता चुना है, इसीलिए ट्रेड डील और टैरिफ घटाने की घोषणा हुई है। ट्रंप जिस हवा के घोड़े पर सवार थे, उससे उन्हें उतरना पड़ा है। अमेरिका को भारत की बहुत जरूरत है और भारत को अमेरिका की जरूरत है। इसलिए आप यह ट्रेड डील होती हुई देख रहे हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



