प्रमोद जोशी।
ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या के बाद बुनियादी तौर पर तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ हैं। पहली प्रतिक्रिया अमेरिकी दादागीरी को लेकर है। हाल में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति मादुरो को पकड़ कर ले जाने के बाद से वैश्विक स्तर पर पहले से ही अमेरिका की थू-थू हो रही है। अब इस हत्याकांड ने उस आलोचना को और ऊँचे धरातल पर पहुँचा दिया है। उसकी हिम्मत हो रही है कि एक संप्रभु देश के सुप्रीम नेता की ऐसे खुलेआम हत्या कर दी जाए। यह प्रतिक्रिया निष्पक्ष रूप से सोचने वाले लोगों की है, जो विश्व-व्यवस्था के समर्थक हैं। यह कदम अंतरराष्ट्रीय कानून की संरचना को कमज़ोर करेगा।
अपने बयानों में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि ईरान उनके देशों (अमेरिका और इसराइल) के लिए खतरा है, वहीं ट्रंप ने ईरान को ‘वैश्विक खतरा’ भी बताया है। यदि वह वैश्विक खतरा है, तो उस पर हमले का प्रस्ताव संरा सुरक्षा परिषद से पास होना चाहिए। बेशक ईरान का इस्लामी शासन उनका शत्रु है, लेकिन उसे भी आत्मरक्षा का अधिकार है।

दूसरी प्रतिक्रिया दुनिया भर के मुसलमानों की है, जिनमें ज्यादा बड़ी संख्या शिया मुसलमानों की है, जो ईरान के सर्वोच्च नेता को अपना धर्मगुरु मानते हैं। उन्हें गहरा धक्का लगा है और इस नाराज़गी का प्रदर्शन उन्होंने ईरान के बाहर इराक़, पाकिस्तान के कराची और भारत में लखनऊ, हैदराबाद और श्रीनगर में जैसे शहरों में किया है, जहाँ बड़ी संख्या में शिया रहते हैं।
तीसरी प्रतिक्रिया इस मौत का जश्न मनाने वालों की भी है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार ईरानियों की बड़ी भीड़ रात भर तेहरान और ईरान के अन्य शहरों की सड़कों पर उमड़ी और इस मौत का जश्न मनाया। लगभग 40 वर्षों के सत्तावादी शासन के बाद, आयतुल्ला की मृत्यु, ईरान के धार्मिक शासन के लिए एक ऐतिहासिक बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है। देश के अंदर और बाहर कई ईरानियों ने खुशी मनाई। अलबत्ता अमेरिकी और इसराइली हमलों की धमकी ने कुछ समारोहों को फीका कर दिया। क्या जश्न मनाने वाले इतने हैं कि वे देश पर काबिज़ धार्मिक सत्ता को उखाड़ फेंकें?
आगे क्या होगा?
ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कोर ने कहा है कि हम हत्या का बदला लेंगे। एक वरिष्ठ नेता और खामनेई के विश्वासपात्र अली लारीजानी ने कहा है कि ईरानी सेना और भी अधिक मजबूती से लड़ेगी। हमें ईरान की मौजूदा इस्लामी सरकार की संरचना को भी समझना होगा। वह महज सशस्त्र समूह या आंदोलन नहीं है; वह राज्य पर शासन करती है। वह किसी एक व्यक्ति की सत्ता नहीं है। खामनेई की हत्या के बाद, उनकी जगह तुरंत कोई और आ जाएगा। ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स समर्थित कोई अन्य धर्मगुरु। ट्रंप ने आत्मसमर्पण करने पर उन्हें माफी देने की पेशकश और आत्मसमर्पण न करने पर सजाए मौत की धमकी दी है। पर ईरानी सेना ऐसे नहीं सोचती। ईरान के इस्लामी गणराज्य और शिया इस्लाम की विचारधारा में, ‘शहादत’ अस्तित्व का एक स्थायी भाव है।
सवाल है कि अब क्या होगा? इसमें दो राय नहीं कि इसराइल और अमेरिका की इंटेलिजेंस बेहद कामयाब है। ईरान के चप्पे-चप्पे में उनके एजेंट हैं और आकाश में उड़ते उनके विमानों की निगाहें कोने-कोन पर हैं। खामनेई के अलावा वे ईरानी सेना के चीफ़ ऑफ स्टाफ़ अब्दुल रहीम मौसवी और रक्षामंत्री मेजर जनरल अज़ीज नसीरज़ादेह, रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख जनरल मोहम्मद पाकपुर और कुछ सीनियर कमांडरों को मारने में कामयाब भी गुए हैं, पर केवल हवाई हमलों से सत्ता परिवर्तन नहीं होता। 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन के शासन का पतन भी अमेरिका के नेतृत्व वाले एक बड़े जमीनी युद्ध का परिणाम था, जिसमें करीब डेढ़ महीने का समय लगा था।

लीबिया की विद्रोही सेनाएं 2011 में मुअम्मार गद्दाफी की सरकार को तभी उखाड़ कर फेंक पाईं, जब उन्हें नाटो और कुछ अरब देशों से लगातार हवाई सहायता मिली। दोनों ही मामलों में, राजव्यवस्था टूटी, गृहयुद्ध छिड़ा और हजारों लोगों की मौत हुई। लीबिया आज भी विफल राज्य हुआ है, और इराक व्यापक रक्तपात से जूझ रहा है। ईरान में सत्ता परिवर्तन हो भी जाए, तब भी इस बात की गारंटी नहीं कि मौजूदा इस्लामी सरकार की जगह मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली उदार लोकतांत्रिक सरकार स्थापित हो जाएगी। फिलहाल कोई विश्वसनीय विकल्प या निर्वासित सरकार मौजूद नहीं है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों और विश्लेषकों का अनुमान है कि इस लड़ाई का अब विस्तार होगा। खामनेई की मृत्यु, वह भी इतनी हिंसक परिस्थितियों में, ईरान और पूरे क्षेत्र के लिए एक नए और अनिश्चित युग की शुरुआत कर रही है। खामनेई ने जनता की वफादारी सुनिश्चित करने के लिए अपने प्रति व्यक्तिगत समर्पण का माहौल भी बनाया। साथ ही, राजनीतिक दमन और विरोधियों की मनमानी गिरफ्तारियां कीं और कुछ को मौत की सज़ा भी दी। इसे लेकर उनके प्रति नाराज़गी भी होगी, पर वह कितनी है, यह देखना होगा।
दायरा बढ़ेगा
बहुत कुछ अब इस बात पर निर्भर करेगा कि ईरानी सेना किस तरह से इस आक्रमण का जवाब देगी। यह साफ है कि इसराइल और अमेरिका का नेतृत्व ईरान की धार्मिक सत्ता का पूरा सफाया चाहती है, ताकि काँटा निकल जाए। सवा है कि आयतुल्ला खामनेई की सत्ता पर लंबी और कठोर पकड़ का अंत क्या आसानी से हो जाएगा? उनकी ताकत कट्टरपंथी मौलवियों और क्रांतिकारी गार्डों में है। क्या वे आसानी से परास्त हो जाएँगे।
खामनेई की मौत के बाद ट्रंप ने ईरानी नागरिकों से अपने घरों में रहने और मौलवियों को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार रहने को कहा है। ट्रंप ने कहा, जब हमारा काम ख़त्म हो जाए, तो अपनी सरकार पर क़ब्ज़ा कर लें। यह आपको ही करना होगा। यह शायद कई पीढ़ियों के लिए आपका एकमात्र मौक़ा है। उधर इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा, ईरान में सभी तबकों के लोगों के लिए ज़ुल्म से आज़ाद होने और एक आज़ाद और शांति चाहने वाला ईरान बनाने का समय आ गया है।
अमेरिका और इसराइल ने इन हमलों को ‘पेशबंदी’ बताया है, पर लगता नहीं कि ऐसा किसी तात्कालिक खतरे के जवाब में किया गया है, जैसा कि ‘पेशबंदी’ शब्द से प्रतीत होता है। बहरहाल इस लड़ाई ने वैश्विक परिदृश्य को बेहद खतरनाक और अप्रत्याशित परिणामों की ओर धकेल दिया है। इस हमले का लक्ष्य ईरानी नेतृत्व को पूरी तरह नेस्तनाबूद करना है। इसराइली सेना (आईडीएफ़) ने ईरान के डिफेंस सिस्टम के सात बड़े सदस्यों के नाम बताए हैं, जिनके मारे जाने की बात कही गई है। इनमें डिफेंस कौंसिल के सेक्रेटरी और खामनेई के भरोसेमंद सलाहकार अली शमखानी, साथ ही आईआरजीसी कमांडर मेजर जनरल मोहम्मद पाकपुर और रक्षामंत्री ब्रिगेडियर जनरल अज़ीज़ नसीरज़ादेह शामिल हैं।
आसान नहीं है पूरी जीत
ईरान छोटा देश नहीं है कि उसपर आसानी से कब्ज़ा कर लिया जाए। 86 वर्षीय खामनेई तीन दशकों से सत्ता में थे, जो दुनिया के सबसे लंबे शासन कालों में से एक है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से, ईरान में केवल दो सर्वोच्च नेता रहे हैं: आयतुल्ला रूहोल्ला खुमैनी और आयतुल्ला अली खामनेई। इस पद में सभी शक्तियाँ निहित हैं; सर्वोच्च नेता राज्य के प्रमुख और क्रांतिकारी गार्डों सहित सभी सशस्त्र बलों के वे कमांडर भी होते हैं। ईरान के सत्ता के केंद्रों में उनका ऐसा स्थान है, जहाँ वे सरकारी नीतियों को वीटो कर सकते हैं और यहाँ तक कि सरकारी पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन भी स्वयं कर सकते हैं।
2019 में, जब ईंधन की बढ़ती कीमतों को लेकर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन भड़क उठे, तो खामनेई ने प्रदर्शनों को रोकने के प्रयास में कई दिनों तक इंटरनेट बंद कर दिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल का आरोप है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को मशीन गनों से मार डाला। हालाँकि उन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर लगे उन प्रतिबंधों को हटा दिया जो उनके पूर्ववर्ती आयतुल्ला ने लगाए थे, लेकिन वे लैंगिक समानता के समर्थक नहीं थे। उनके शासनकाल में हिजाब के खिलाफ अभियान चलाने वाली महिलाओं को गिरफ्तार किया गया, प्रताड़ित किया गया और तनहाई में रखा गया।
2022 में घटी एक घटना इस्लामी क्रांति के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक साबित हुई। यह घटना पुलिस हिरासत में महसा अमिनी की मौत थी, जिन्हें हिजाब ठीक से न पहनने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, हत्या के बाद हुए प्रदर्शनों में सुरक्षा बलों ने 550 लोगों को मार डाला और लगभग 20,000 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया।
ईरान ने इसराइल के खिलाफ अपने संघर्ष में लेबनान स्थित शिया सशस्त्र संगठन हिज़बुल्ला को एक प्रॉक्सी के रूप में इस्तेमाल किया। हालाँकि उन्होंने ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ जैसे नारों के प्रभाव में अपनी जनता को रखा, लेकिन उनकी विदेश नीति कुछ इस तरह की थी कि अमेरिका के साथ सीधा टकराव न हो, बल्कि समझौता हो। सबसे अहम मुद्दा परमाणु हथियारों का था। 20 साल पहले, खामनेई ने घोषणा की थी कि परमाणु हथियार गैर-इस्लामिक हैं और उनके उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने वाला फतवा जारी किया था। फिर भी उनके शासनकाल के दौरान, इसराइल और पश्चिमी देशों का यह पक्का विश्वास था कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल करने की कोशिश कर रहा है। इसी आधार पर उन्होंने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए।
ईरान कभी तेल के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक था, लेकिन प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया। परिणामस्वरूप, बेरोजगारी बढ़ी और जनता में असंतोष भी बढ़ा। 2015 में एक समझौता हुआ था जिसके तहत आर्थिक प्रतिबंधों में राहत के बदले ईरान की परमाणु गतिविधियों पर अंकुश लगाया गया। खामनेई ने इस समझौते का विरोध नहीं किया, लेकिन उन्होंने इस बात पर संदेह व्यक्त किया कि अमेरिका लंबे समय तक इस पर कायम रहेगा। और ऐसा हुआ भी। 2018 में, राष्ट्रपति ट्रंप ने परमाणु समझौते को त्याग दिया और ईरान को एक नए समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करने के प्रयास में उस पर फिर से प्रतिबंध लगा दिए।

दो साल बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति ने इराक पर हमले का आदेश दिया जिसमें ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के शीर्ष जनरलों में से एक और सर्वोच्च नेता के करीबी सहयोगी कासिम सुलेमानी को निशाना बनाकर मार दिया गया। खामनेई ने बदला लेने की कसम खाई और रूस और चीन के साथ अपने संबंधों को और मजबूत किया। जब इसराइली सेना ने जून 2025 में ईरान पर हमला किया, जिसमें उसके परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल भंडार और शीर्ष सैन्य कमांडरों को निशाना बनाया गया, तो ईरान ने इसराइली शहरों की ओर मिसाइलों की बौछार की।
जब अमेरिका युद्ध में शामिल हुआ और ईरान के तीन प्रमुख परमाणु संयंत्रों पर हमला किया, तो खामनेई ने कभी आत्मसमर्पण न करने की कसम खाई। लेकिन पहली बार, वे कमजोर दिखाई दिए। जनवरी 2026 में, ईरान की बिगड़ती आर्थिक स्थिति के कारण खामनेई सरकार को व्यापक विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, सरकार ने कठोर दमनकारी कार्रवाई की, जिसमें कम से कम 6,488 प्रदर्शनकारी मारे गए और 53,700 गिरफ्तार किए गए।
अगले कुछ हफ्तों में, ट्रंप ने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने का आदेश दिया और कहा कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर एक नए समझौते पर सहमत नहीं हुआ, तो उस पर हमला होगा। जनवरी 2026 के अंत में खामनेई ने चेतावनी दी: ‘अमेरिकियों को पता होना चाहिए कि अगर वे युद्ध शुरू करते हैं, तो इस बार यह पूरे क्षेत्र में फैल जाएगा।’
अमेरिका और इसराइल ने शायद यह अनुमान लगाया होगा कि ईरान का इस्लामी शासन इस समय बेहद कमज़ोर है। यह शासन न केवल गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है, बल्कि ईरानी प्रदर्शनकारियों पर हाल ही में हुई कठोर कार्रवाई के प्रभावों से भी ग्रस्त है, जबकि पिछले साल गर्मियों में इसराइल के साथ हुए युद्ध के बाद ईरान की रक्षा प्रणाली भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। बहरहाल चुनौती अमेरिका और इसराइल के सामने है, तो ईरान के सामने भी है। अगले कुछ दिनों में स्थितियाँ स्पष्ट होंगी, तभी कहा जा सकेगा कि क्या होने वाला है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘हिंदुस्तान’, दिल्ली के पूर्व वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं)



