जस्टिस वर्मा प्रकरण से पूरी न्याय व्यवस्था पर उठा सवाल।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

समरथ कहुं नहिं दोषु गोसाईं। अगर आप सामर्थ्यवान हैं तो आप किसी भी आरोप, किसी भी दोष से बच सकते हैं। आपको कोई सजा नहीं होगी। भारतीय न्याय,प्रशासनिक और शासन व्यवस्था में यह बात बार-बार साबित होती रही है।

आपको जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम याद होगा। मार्च 2025 में उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास से जले हुए नोटों के बोरे बरामद हुए थे,लेकिन कोई एफआईआर नहीं हुई। मीडिया में खबर आई तो सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? इंटरनल इंक्वायरी कमेटी बिठा दी। जस्टिस वर्मा ने कहा कि मैं तो घर पर था नहीं। मैं होली की छुट्टी में बाहर गया हुआ था इसलिए वह पैसा किन लोगों का था,मुझे कुछ मालूम नहीं। सवाल यह है कि वह जले हुए नोट जब्त क्यों नहीं किए गए? उसके आधार पर एफआईआर क्यों नहीं दर्ज हुई? तो उसका सीधा सा जवाब है जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे। किस पुलिस वाले की हिम्मत एफआईआर दर्ज करने की होती? सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने भी यह नहीं कहा कि एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। उसने बस जस्टिस यशवंत वर्मा का ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट में कर दिया। जैसे कि दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट चले जाएंगे तो उनके सारे पाप धुल जाएंगे। जब जन दबाव के आगे इस मामले को दबाना मुश्किल  हो गया तो उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने का निर्णय हुआ,लेकिन इसमें भी बड़े खेल थे। इस प्रस्ताव का नोटिस 146 लोकसभा सदस्यों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को दिया। लेकिन उसके साथ ही विरोधी दलों के सांसदों ने एक प्रस्ताव राज्यसभा के सभापति जगदीप धनकड़ को दे दिया। कहा जाता है कि यह जगदीप धनकड़ के इशारे पर हुआ क्योंकि प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद उस पर फिर जजेस की एक थ्री मेंबर कमेटी बैठती है। उस कमेटी के गठन में जगदीप धनकड़ का हाथ होता क्योंकि वह ओम बिरला से सीनियर थे। उस पूरे मामले को जगदीप धनखड़ अपने कंट्रोल में रखना चाहते थे जबकि सरकार यह बिल्कुल नहीं चाहती थी। हालांकि बाद में उप सभापति हरिवंश को उस प्रस्ताव को रिजेक्ट करना पड़ा।

जस्टिस वर्मा लगातार इस बात से इनकार करते रहे कि उस रुपए से उनका संबंध है। भाई,आपके घर में नोटों की बोरियां रखी हुई हैं और आपको पता नहीं है, यह बात कौन मान सकता है? लेकिन इस मामले में जिस तरह से कदम उठाए गए उससे साबित होता है कि सुप्रीम कोर्ट उनको बचाना चाहता था पर उसकी भी एक सीमा थी। तो इंपीचमेंट मोशन की कार्रवाई शुरू हो गई। इसबीच लगातार यशवंत वर्मा पर दबाव पड़ रहा था कि इस्तीफा दे दीजिए। वह इस्तीफा देने को तैयार नहीं थे बल्कि वह तीन सदस्यीय जांच कमेटी को भी चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट चले गए। कहा कि राज्यसभा के उपसभापति ने प्रस्ताव रद्द कर दिया था, इसलिए इंपीचमेंट मोशन नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मांग को रिजेक्ट कर दिया क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष ने प्रस्ताव का नोटिस स्वीकार कर लिया था। इस दौरान जस्टिस वर्मा सारी सरकारी सुविधाओं का उपभोग करते रहे क्योंकि उनका सिर्फ तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट में हुआ था और उन्हें न्यायिक काम से वंचित कर दिया गया था। उनकी सुख सुविधा में कोई कमी नहीं आई थी। इसीबीच शुक्रवार को उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को भेज दिया।

अब आपको लगेगा कि जस्टिस यशवंत वर्मा ने एक तरह से अपना नैतिक दायित्व स्वीकार कर लिया। इस गलतफहमी में बिल्कुल मत रहिए। उनको मालूम था कि इंपीचमेंट के बाद उनका पद तो जाएगा ही पोस्ट रिटायरमेंट जो बेनिफिट मिलने हैं,वे भी नहीं मिलेंगे। अब आप देखिए जले हुए नोटों की बोरियां उनके घर से मिलती हैं लेकिन कोई एक्शन नहीं होता है। इस्तीफा देते हैं और पोस्ट रिटायरमेंट के सारे बेनिफिट लेकर मुस्कुराते हुए चले जाते हैं। यशवंत वर्मा ने इस पूरी व्यवस्था को ठेंगा दिखाया है कि आप कुछ नहीं कर सकते। जांच कमेटी अभी जांच कर रही थी, सांसदों ने इंपीचमेंट मोशन दे दिया था। और नतीजा क्या हुआ? अब क्या कभी पता चलेगा कि नोटों की वह बोरियां किसकी थीं?

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात उठने पर हमारे माननीय न्यायाधीश महोदय कितने संवेदनशील हो जाते हैं,इसका उदाहरण पिछले दिनों दिखा था। एजुकेशन मिनिस्ट्री की एक कमेटी थी, जिसने आठवीं की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में एक छोटा सा चैप्टर लिख दिया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट बेहद नाराज हुआ और कहा कि इन तीनों को भविष्य में कभी भी किसी सरकारी विभाग में काम नहीं मिलना चाहिए। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, इस बात को सिर्फ हमारे जजेस नहीं जानते। बाकी सारा देश जानता है और जस्टिस वर्मा के केस ने साबित किया कि भ्रष्टाचार का पैमाना क्या है? अब उनको आप दोषी नहीं कह सकते क्योंकि जांच पूरी नहीं हुई। मुकदमा चला नहीं, इंपीचमेंट हुआ नहीं। हमारे देश में भ्रष्टाचार के मामले में जजेस एक तरह से होली काऊ माने जाते हैं। इनके भ्रष्टाचार की बात मत करो। इनके पास कंटेंप्ट की पावर है। तुरंत जेल भेज सकते हैं। लेकिन सवाल है कि क्या आंख मूंद लेने से सच्चाई बदल जाएगी?

जस्टिस वर्मा की कहानी इस देश की न्यायपालिका के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इस मामले के बाद आम जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति जो सम्मान और विश्वास है, उसमें कमी आना तय है। लेकिन आएगी भी तो लोग क्या कर लेंगे? जजेस को कोई चुनाव तो लड़ना नहीं पड़ता। इसलिए उनको कोई चिंता नहीं है कि लोकप्रियता बढ़ेगी कि घटेगी। जज का अपॉइंटमेंट भी खुद जज लोग ही करते हैं। उनकी ट्रांसफर पोस्टिंग और प्रमोशन आदि भी वही लोग करते हैं। तो सारी व्यवस्था इंटरनल है। जांच भी इंटरनल हुई। लेकिन उस इंटरनल जांच में क्या आया? अगर उसमें कुछ नहीं आया तो आपने जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर क्यों किया? और अब उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। मतलब वह सारे आरोपों से बरी हो गए। अब उनके ऊपर भ्रष्टाचार का कोई मामला नहीं चल सकता। मुझे नहीं मालूम कि कानून में क्या ऐसी कोई व्यवस्था है कि जज के रिटायरमेंट के बाद उसके ऊपर अगर भ्रष्टाचार का आरोप लगा है तो उसका मुकदमा चल सके। तो इस मामले में इस पूरे सिस्टम को सजा मिली है। पूरी न्याय व्यवस्था पर सवाल उठा है कि आखिर दो नियम क्यों? कानून सबके लिए बराबर है। यह विशेष व्यवस्था न्यायाधीशों के लिए क्यों? हमारी न्याय व्यवस्था में सिर्फ चुनिंदा लोगों को न्याय मिलता है और उनमें आम आदमी नहीं आता है। उसकी कोई गिनती ही नहीं है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)