सुरेंद्र किशोर।
सन 1984 में दिल्ली के सिखों को, खासकर अपने रिश्तेदारों को, सामूहिक संहार से बचाने के लिए तब के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने कई बार प्रधानमंत्री राजीव गांधी को फोन किये। पर, प्रधानमंत्री फोन पर नहीं आये।
31 अक्तूबर 1984 को सिख अतिवादियों ने, जो संतरी के रूप में प्रधानमंत्री आवास पर तैनात थे, प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी। उसकी प्रतिक्रिया में कांग्रेसी नेताओं की अगुवाई व दिल्ली पुलिस के संरक्षण में लगातार चार दिनों तक दिल्ली में सिखों का सामूहिक संहार होता रहा। पर सेना को पांचवें दिन ही तब सड़कों पर उतारा गया जब हत्यारों का मन भर गया।
सवाल उठा कि 1 से 4 नवंबर 1984 तक सेना को क्यों नहीं बुलाया गया?… नेहरू गांधी परिवार के ‘‘सेवक’’ मनमोहन सिंह ने इस पर बाद में कहा था कि 1984 में सेना नहीं बुलाने के लिए तब के गृह मंत्री पीवी नरसिंह राव दोषी थे।
अब पढ़िए कि सन 2018 में हत्यारों में से एक सज्जन कुमार को एक अन्य केस में सजा सुनाते हुए जज ने क्या कहा था? सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर, 2018 को कहा था कि ‘‘1 से 4 नवंबर तक पूरी दिल्ली में 2733 सिखों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। उनके घरों को नष्ट कर दिया गया था। देश के बाकी हिस्सों में भी हजारों सिख मारे गए थे। इस भयावह त्रासदी के अपराधियों के बड़े समूह को राजनीतिक संरक्षण का लाभ मिला और जांच एजेंसियों से भी उन्हें मदद मिली।’’
तब के प्रधान मंत्री राजीव गांधी की उक्ति आपको याद ही होगी- ‘‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।’’
उल्लेखनीय है कि नेहरू-गांधी परिवार की खुशामद में लगे रहने के कारण पत्रकार-लेखक खुशवंत सिंह को कई बार खुशामद सिंह भी कहा जाता था। बात तब की है जब सिख संहार हो रहा था। बेचारे ‘‘खुशामद सिंह’’ ने भी अपने रिश्तेदारों को जल्लादों से बचाने के लिए कई बार प्रधानमंत्री राजीव गांधी को फोन किया। पर राजीव गांधी उनके फोन पर भी नहीं आये।
याद रहे कि आपातकाल में संजय गांधी के कारनामों के भी सरदार खुशवंत सिंह प्रशंसक थे। मेनका गांधी की मासिक पत्रिका ‘‘ सूर्या’’ के तो खुशवंत सिंह सलाहकार संपादक ही थे। प्रिंटलाइन में उनका नाम भी छपता था। पर, आप किसी की जितनी चाहे किसी नेता की खुशामद कर लीजिए, यह कोई जरूरी नहीं कि वह ऐन वक्त पर, गाढ़े समय में आपके काम आएगा ही। सरदार जी ने सूर्या के सलाहकार संपादक का पद तभी छोड़ा जब मना करने के बावजूद मेनका गांधी ने कांग्रेस नेता जगजीवनराम के पुत्र सुरेश कुमार के साथ सुषमा की नंगी तस्वीरें सूर्या में छाप दी थी।
सन 1984 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महा सचिव चंदूलाल चंद्राकर ने कहा था कि ‘‘हमने जांच करा ली है।सिख दंगे में किसी भी कांग्रेसी का हाथ नहीं है।’’ (साप्ताहिक रविवार, कलकत्ता- 25 नवंबर 1984)
पर 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राहुल गांधी ने टी.वी. पत्रकार अर्णब गोस्वामी से बातचीत में यह स्वीकार किया कि हां, कुछ कांग्रेसियों का हाथ था।
ऑपरेशन ब्लू स्टार के तत्काल बाद प्रधानमंत्री की जान पर खतरा बढ़ गया था। उनकी सुरक्षा में लगे योग्य व दूरदर्शी अफसर ने यह निर्णय किया कि प्रधानमंत्री के आसपास से सिख सुरक्षाकर्मियों को हटा दिया जाये। हटाया भी गया। जब इंदिरा जी ने यह नोटिस किया कि उनके आवास पर पहले से तैनात सिख संतरी अब नहीं हैं तो उन्होंने संबंधित अफसर से पूछा। जब अफसर ने कहा कि सुरक्षा कारणों से उन्हें हटाया तो प्रधानमंत्री ने आदेश दिया कि उन्हें जल्द फिर से यहां तैनात करिए। उनकी तैनाती हुई। उन्हीं लोगों ने इंदिरा जी की हत्या कर दी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)