#pradepsinghप्रदीप सिंह।

‘सरकार एक घोटाले अनेक’, यह बात कही जा सकती है 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह के नेतृत्व में रही यूपीए सरकार के लिए। घोटालों का सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं। बड़े-बड़े घोटाले जो पहले हो चुके हैं, जो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुके हैं उनकी बात छोड़ दीजिए, नए घोटाले सामने आ रहे हैं। ये बता रहे हैं कि यूपीए सरकार को देश की अर्थव्यवस्था की,  सुरक्षा की, एकता और अखंडता की कोई चिंता ही नहीं थी। सबसे ताजा घोटाला जो सामने आ रहा है वह करेंसी नोटों के छापने का है। वित्त मंत्रालय के पूर्व सचिव अरविंद मायाराम के खिलाफ सीबीआई की रेड हुई है। पहले अरविंद मायाराम के बारे में थोड़ा जान लीजिए, फिर आगे इस मुद्दे के बारे में बताते हैं।

अरविंद मायाराम पूर्व आईएएस अधिकारी हैं। उनकी मां इंदिरा मायाराम 1998 से 2002 तक राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार में मंत्री थीं। उनके पिता जुगल किशोर चतुर्वेदी भी मंत्री रह चुके हैं यानी पूरा परिवार कांग्रेसी है। इस समय वह राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के आर्थिक सलाहकार हैं। अभी वह चर्चा में तब आए जब भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी के साथ देखे गए। इसके बाद सीबीआई ने छापा मारा और कांग्रेस उनके बचाव में उतर आई। सवाल यह है कि घोटाले के आरोपी के समर्थन में कांग्रेस पार्टी क्यों उतरी है। अब जरा क्रोनोलॉजी समझिए। 2004 में यूपीए की सरकार बनने के बाद ब्रिटिश कंपनी डेला रू इंटरनेशनल लिमिटेड को करेंसी नोटों के कागज और उसमें इस्तेमाल होने वाले सिक्योरिटी थ्रेड (धागा) की सप्लाई का ठेका मिला। यह सप्लाई 2004 से 2010 तक चलती रही, कोई सवाल नहीं उठा। 2010 में हमारी इंटेलिजेंस एजेंसीज ने जो खबर दी उससे किसी भी सरकार के होश उड़ जाने चाहिए, बड़े पैमाने पर जांच होनी चाहिए थी, लोगों के खिलाफ एक्शन होना चाहिए था लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

मां इंदिरा मायाराम

पाकिस्तान को भी करेंसी के कागज सप्लाई करती थी ब्रिटिश कंपनी

इंटेलिजेंस एजेंसीज ने कहा कि यही कंपनी पाकिस्तान को भी करेंसी प्रिंटिंग के लिए कागज और दूसरे सामान देती है। दोनों देशों की करेंसी का कागज एक जैसा ही होता है इसीलिए आईएसआई जाली करेंसी छाप कर लगातार देश में भेज रही है। इसके जरिये आतंकवाद, नक्सलवाद और इन जैसी दूसरी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। आपको याद होगा, एक समय आईएसआई का एक प्रोजेक्ट था कि भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को खोखला कर देंगे। उसमें असली करेंसी कम हो जाएगी और नकली करेंसी की बाढ़ आ जाएगी। पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था को ठप करने का यह प्रोजेक्ट था। वह प्रोजेक्ट उसी कंपनी के जरिये चल रहा था। उस समय देश के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी थे। उनको जब इस बारे में पता चला तो उन्होंने तुरंत ठेका रद्द कर दिया। फिर गृह मंत्रालय को लिखा कि इसको ब्लैक लिस्ट में डालिए। उस समय पी चिदंबरम गृह मंत्री थे। प्रणब मुखर्जी का दबाव ऐसा था कि चिदंबरम को उसे ब्लैक लिस्ट करना पड़ा। 2004 में जब कंपनी को ठेका मिला था तो उस समय पी चिदंबरम ही वित्त मंत्री थे। सीबीआई ने डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक अफेयर्स, जो वित्त मंत्रालय के अधीन आता है, के चीफ विजिलेंस ऑफिसर की शिकायत पर यह केस दर्ज किया है। 2018 में शुरुआती शिकायत दर्ज हुई। अभी जनवरी में एफआईआर दर्ज करके छापा मारा गया है।

चिदंबरम के खास थे मायाराम

अब 2004 में फिर लौट कर आते हैं। अरविंद मायाराम 2004 से 2008 तक डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक अफेयर्स में एडिशनल सेक्रेटरी थे। वित्त मंत्री पी चिदंबरम 2008 के बाद गृह मंत्री बन गए और प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री बन गए। अरविंद मायाराम वित्त मंत्रालय से चले गए और ग्रामीण विकास मंत्रालय में एडिशनल सेक्रेटरी बने। उनके ऊपर मनरेगा को लागू कराने का जिम्मा था। वहां से फिर बदलाव देखिए, 2012 में जब प्रणब मुखर्जी  वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने चले गए तब पी चिदंबरम फिर से वित्त मंत्री बन गए। अरविंद मायाराम फिर से वित्त मंत्रालय में आ गए। वह कंपनी जिसको चिदंबरम ने ही ब्लैक लिस्ट किया था उसको ब्लैक लिस्ट से हटा दिया गया और उसको तीन साल (2012 से 31 दिसंबर 2015 तक) का एक्सटेंशन दे दिया गया। सवाल यह है कि गृह मंत्री रहते हुए जिस कंपनी को चिदंबरम ने ब्लैक लिस्ट किया था उसे ठेके का एक्सटेंशन कैसे मिल गया, वह भी इतने गंभीर आरोप के बाद। इतना ही नहीं, उस कंपनी ने जब 2004 में ठेका लिया तो उसने भारत सरकार को बताया कि उसने करेंसी के सुरक्षा धागे को खासकर भारत के लिए विकसित किया है। उसके पास इसकी प्रिंटिंग का, इसकी मैन्युफैक्चरिंग का लाइसेंस है यानी पेटेंट है। लेकिन भारत सरकार ने इस बात की भी पड़ताल करने की जरूरत नहीं समझी कि उसके पास पेटेंट है भी या नहीं। जबकि उसने 2004 में ही पेटेंट के लिए आवेदन किया और उसे 2011 में पेटेंट मिला। उसने जिस आधार पर ठेका लिया वह आधार ही झूठा था कि उसके पास इसका पेटेंट है। उसके पास सिक्योरिटी थ्रेड का न तो पेटेंट था, न ही मैन्युफैक्चरिंग का एक्सक्लूसिव राइट्स था फिर भी उसको ठेका दिया गया। देश के साथ इससे बड़ा धोखा और क्या हो सकता है। मैं पी चिदंबरम के बारे में बिल्कुल नहीं कह रहा हूं कि वह उसमें शामिल थे लेकिन अगर शामिल नहीं थे तो यह कैसे हो रहा था। वित्त मंत्री की जानकारी के बिना क्या उनके मंत्रालय का कोई अधिकारी ऐसी कंपनी का ठेका तीन साल के लिए बढ़ा सकता है जिसको ब्लैक लिस्ट किया गया हो, वह भी उसी के गृह मंत्री रहते जिसने ब्लैक लिस्ट किया था। यह अद्भुत कारनामा दुनिया में आपने कहीं सुना नहीं होगा।

ईडी की एंट्री की भी संभावना

अब यह मामला खुला है। अरविंद मायाराम के यहां से काफी दस्तावेज बरामद हुए हैं और दूसरी सूचनाएं मिली हैं। सीबीआई इस मामले की शुरुआती जांच कर चुकी है इसलिए उसके पास और भी दस्तावेज और तथ्य हैं। सवाल यह है कि यह कहां तक जाएगा। सवाल अरविंद मायाराम का नहीं है, मायाराम तो एक छोटा सा प्यादा है। इसके पीछे कौन-कौन था? ब्रिटिश कंपनी को जो ठेका दिया गया और ब्लैक लिस्ट होने के बाद फिर उसको जो एक्सटेंशन दिया गया इसमें किसको कितना मिला? इस ब्रिटिश कंपनी की ओर से जिस अनिल रगबीर ने कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत किए उसको ऑफशोर एंटिटी से 8.2 करोड़ रुपये मिले। यह राशि ब्रिटिश कंपनी की ओर से अनिल रगबीर को दिए गए कमीशन या फीस, आप जो भी कह लें, उसके अलावा है। ऑफशोर एंटिटी से मिला पैसा ब्लैकमनी होता है। यह टैक्स हैवन देशों से आता है। मुझे लगता है कि जल्दी ही इस मामले में ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) की भी एंट्री होने वाली है। ईडी की एंट्री हुई तो यह मामला अरविंद मायाराम तक ही नहीं रुकेगा। अरविंद मायाराम की गिरफ्तारी तय है। कब होगी मुझे नहीं पता। यह एजेंसी ही तय करेगी कि गिरफ्तार करेगी या बिना गिरफ्तारी के ही चार्जशीट फाइल करेगी। मगर इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है जिस तरह का यह मामला है वह अरविंद मायाराम तक नहीं रुकेगा। इसके पीछे जो राजनीतिक लोग हैं,  यूपीए सरकार और कांग्रेस के बड़े-बड़े लोग हैं, कौन लोग हैं इसका जांच में खुलासा होगा। 31 दिसंबर, 2015 को  कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद इस कंपनी को नया कॉन्ट्रैक्ट नहीं दिया गया।

नोटबंदी का एक कारण यह भी

कहा यह भी जा रहा है कि इसी की वजह से आईएसआई बड़े पैमाने पर जाली करेंसी आतंकवादियों, नक्सलियों को सप्लाई कर रही थी और भारतीय बाजार में झोंक रही थी। नोटबंदी का एक बड़ा कारण यह भी था। इसके बारे में पहले पता नहीं था। सरकार ने सिर्फ इतना कहा था कि जाली करेंसी का चलन बहुत ज्यादा बढ़ गया है। अब पता चला है कि क्यों बढ़ गया था। नोटबंदी से सबसे ज्यादा तकलीफ कांग्रेस के नेताओं को हुई, खासतौर से जो लोग इस घोटाले के बारे में जानते थे। इस घोटाले के तार निश्चित रूप से बड़े कांग्रेसी नेताओं तक पहुंचेगी। जांच आगे बढ़ेगी तो पता चलेगा कि कौन-कौन लोग उसमें शामिल थे। यह ऐसा घोटाला है जिसमें देश की सुरक्षा को, अर्थव्यवस्था को खतरे में डाला गया, जिसमें देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा करने की कोशिश हुई। उसमें अगर एक राजनीतिक दल जो उस समय सत्तारूढ़ था, उसके लोग शामिल हैं तो उसके क्या मतलब होते हैं। क्या उस पार्टी को या उस पार्टी के जो नेता इसमें शामिल थे उसको राष्ट्र प्रेमी कहा जाएगा या राष्ट्रद्रोही कहा जाएगा?

इस सवाल का जवाब मैं आपके ऊपर छोड़ता हूं। आप तय कीजिए कि ऐसे लोगों को क्या कहना चाहिए और ऐसे लोगों के बारे में अदालतों का क्या रुख होना चाहिए। क्यों नहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिये इस मामले का जल्दी से जल्दी निपटारा हो, क्यों नहीं ऐसे लोग बेनकाब हों जो इस देश की सुरक्षा और इस देश की अर्थव्यवस्था को खतरे में डालना चाहते थे। जो आतंकवादियों, नक्सलियों और आपराधिक तत्वों की मदद कर रहे थे ऐसे लोगों का बेनकाब होना देश के लिए बहुत जरूरी है।