के. विक्रम राव।
पिछले दिनों बलूचिस्तान के स्वाधीनता सेनानियों ने इस्लामी पाकिस्तान के खिलाफ अपनी जंगे-आजादी की मुहिम को तेज कर दिया। इस संघर्ष में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक संदर्भ का जिक्र भी हो। नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से (15 अगस्त 2016) इस वायदे को किया था। बलूचिस्तान का हवाला अलग किस्म से पेश किया। प्रधानमंत्री ने गिलगिट और पेशावर की भांति बलूचिस्तान पर पाकिस्तान के जबरन कब्जे की भर्त्सना भी की थी। एक दशक बीत जाने पर भी बलूची स्वाधीनता सेनानियों की भारत मदद नहीं कर पाया।
बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अन्दरूनी मसला भारत मानता रहा है, भले ही कश्मीर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण पाकिस्तान करता आया हो। बलूच जनता के साथ भारत की यह कृतघ्नता है। पाकिस्तान के सरकारी अभिलेखों के अनुसार अंग्रेजों के पलायन के पश्चात आजाद भारतीय संघ में बलोचिस्तान रहना चाहता था, जैसे पश्चिमोत्तर प्रांत में सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खान के पठान अनुयायी। बलूच गांधी और स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल समद खान अचकजाई के नेतृत्व में बलूच सत्याग्रही महात्मा गांधी के आंदोलन में सक्रिय रहे। भौगोलिक दूरी के कारण, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं की सत्ता प्राप्ति की जल्दबाजी से बलुचिस्तान भारत से कट गया। जुड़ना संभव नहीं हो पाया था। अतः पाकिस्तान के विरूद्ध बलूच जनता अपने स्वतंत्र गणराज्य का संघर्ष चलाती रही। जवाब में मोहम्मद अली जिन्ना ने थल और वायुसेना भेजकर (27 मार्च 1948) राजधानी क्वेटा पर कब्जा कर लिया। रियासतों के सारे नवाबों, खासकर कलाट के नवाब मीर अहमद यार खान ने, जिन्ना के विलय प्रस्ताव पर दस्तखत करने से इन्कार कर दिया था। स्वयं मोहम्मद अली जिन्ना इस दमन प्रक्रिया का दिग्दर्शन करने क्वेटा गये। मगर गंभीर रूप से वहाँ बीमार पड़ गये और कराची लौट आये। उसी हफ्ते उनका निधन हो गया। बलूच आजादी की लड़ाई को पाकिस्तानी वायुसेना ने कुचल दी।
ऐतिहासिक तथ्य यह भी है जो बलूची नेता श्रीमती नईला कादरी ने कहा भी था कि पाकिस्तान तो ब्रिटिशों द्वारा पैदा करवाया “टेस्ट ट्यूब बच्चा” है। बलूचिस्तान का कुछ हिस्सा अंग्रेजों को लीज पर दिया गया था। पर ब्रिटिश बलूचिस्तान, ब्रिटिश हिंदुस्तान से बिल्कुल अलग था। ब्रिटेन ने 1947 में उनके अधीन बलूचिस्तान के इलाकों को मुक्त कर दिया था।
मुक्त बलूचिस्तान में भारत का गंभीर सरोकार इसलिए भी है क्योंकि इक्यावन शक्तिपीठों में से एक माता हिंगलाज देवी का सिद्धपीठ बलूचिस्तान में है। हिंदू धर्म ग्रन्थों के अनुसार भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्रि ने यहां घोर तप किया था। उनके नाम पर रखा गया आसाराम स्थान अब भी यहां मौजूद है, जो भगवान परशुराम के नाम से जाना जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम भी यात्रा के लिए इस सिद्ध पीठ पर आए थे।
तारीफ करनी होगी शतवर्षीय लालचंद किशनचंद आडवाणी की जिन्होंने सबसे पहले माता हिंगलाज सिद्ध पीठ को उनके भक्तों के खोलने की मांग की थी। उनकी मांग का आधार था कि अमृतसर स्वर्ण मंदिर के निकट पाकिस्तानी भू-भाग पर श्री करतारपुर साहिब का गुरुद्वारा है। वहां भारतीय धर्मार्थी लोग दर्शन के लिए अनुमति पा चुके हैं।
जवाहरलाल नेहरू से सरदार मनमोहन सिंह तक सारे कांग्रेसी प्रधानमंत्री बलूचिस्तान जनता के संघर्ष से कटे रहे, दूर रहे। नरेंद्र मोदी सक्रिय रहे।
एक विशिष्ट बात यह भी है कि इस देवी मंदिर के पास ही गुरु गोरखनाथ का एक सरोवर भी है जहां माता हिंगलाज देवी स्नान करने आती थीं। इस संदर्भ में योगी आदित्यनाथ से अपेक्षा है कि सिद्ध पीठ हिंगलाज देवी की तीर्थ यात्रा का अधिकार भारतीयों को दिलवाएंगे। प्रधानमंत्री पर दबाव डालेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)