कुर्मी समाज को साधने के लिए बनाए गए यूपी भाजपा अध्यक्ष लेकिन संगठन के काम का अनुभव नहीं।
प्रदीप सिंह।
उत्तर प्रदेश भाजपा का नया अध्यक्ष केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी को बनाया गया है। वह कुर्मी समाज से आते हैं और महाराजगंज से सात बार सांसद चुने जा चुके हैं। कुर्मी समाज का वोट भाजपा के पास के साथ जनसंघ के समय से रहा है। 2014 में तो इस समाज का वोट बहुत बड़ी संख्या में भाजपा को मिला, लेकिन 2022 से यह खिसकना शुरू हो गया और 2024 के लोकसभा चुनाव में पूरी तरह खिसक कर समाजवादी पार्टी के साथ चला गया। अखिलेश यादव इसीलिए पीडीए की बात बहुत जोर शोर से करते हैं। यूपी में भाजपा के सामने एकमात्र चुनौती पीडीए है। पिछड़ा वर्ग में यादव वोट के बाद कुर्मी समाज का वोट सबसे ज्यादा है। ऐसे में भाजपा इस वोट को वापस अपने पाले में लाना चाहती है।

भाजपा में यूं तो कई कुर्मी नेता रहे हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश से ओम प्रकाश सिंह, अवध में विनय कटिहार और प्रेमलता कटिहार। पश्चिम में संतोष गंगवार,जो बरेली से लंबे समय तक सांसद और केंद्र में मंत्री रहे। ये सभी पूरे प्रदेश स्तर पर नहीं जाने गए। एक सीमित क्षेत्र में ही उनका प्रभाव रहा। उसके अलावा सोनेलाल पटेल,जो बहुजन समाज पार्टी से निकले और अपना दल नाम से अलग पार्टी बनाई। उनकी बड़ी बेटी हैं अनुप्रिया पटेल,जिन्होंने भाजपा से समझौता किया। वे केंद्र में इस समय मंत्री हैं। मुलायम सिंह यादव ने भी जब समाजवादी पार्टी बनाई तो उसमें कुर्मी समाज के नेता बेनी प्रसाद वर्मा रहे, लेकिन उनका प्रभाव भी अवध के बाहर नहीं रहा। इसी तरह से अलग-अलग पार्टियों में भी जो कुर्मी नेता रहे हैं, उनका प्रभाव क्षेत्र भी सीमित रहा है। भाजपा ने कुर्मी वोट की तलाश में पहले स्वतंत्र देव सिंह को भी प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, लेकिन खास सफलता नहीं मिली। इसीलिए भाजपा को 2027 का चुनाव साधने के लिए एक कुर्मी नेता की तलाश थी। एक और समीकरण है,जिसके कारण पंकज चौधरी को चुना गया है। पंकज चौधरी व्यवसायी हैं। उनकी कंपनी राहत रूह नाम से एक तेल बनाती है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश में और उधर नेपाल तक काफी लोकप्रिय है।

पंकज चौधरी हालांकि सात बार के सांसद हैं लेकिन संगठन में उन्होंने कभी काम नहीं किया। अपने लोकसभा क्षेत्र महाराजगंज से भी ज्यादा बाहर वह जाते नहीं। तो सवाल यह है कि उनको चुना क्यों गया? पंकज चौधरी के बारे में आप यह नहीं कह सकते कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुर्मी समाज के बड़े प्रभावशाली नेता हैं। उनके केंद्रीय मंत्री और कई बार सांसद रहते ही 2022 और 2024 में कुर्मी समाज का वोट बीजेपी से छिटक गया। तो बीजेपी को अगर लगता है कि कुर्मी समाज से किसी को अध्यक्ष बना देंगे तो उस समाज का वोट मिल जाएगा,ऐसा राजनीति में होता नहीं है। इसके लिए व्यक्ति का अपने समाज पर गहरा प्रभाव होना जरूरी है। केशव प्रसाद मौर्य सालों उप मुख्यमंत्री रहे लेकिन अपना विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पाए। पंकज चौधरी 1991 में पहली बार सांसद बने थे। लेकिन उन्होंने अपने दायरे से बाहर निकलने की कोशिश नहीं की। 1991 से 2024 तक चुनावों में भाजपा ने यूपी के विभिन्न जिलों में उनका कितना उपयोग किया है। तो मेरा मानना है कि,इसको नकारात्मक अर्थ में मत लीजिए,वह अपने चुनाव क्षेत्र में तो प्रभावशाली हैं इसीलिए जीतते हैं,लेकिन उसके बाहर उनका कोई बड़ा प्रभाव नहीं है। लेकिन पार्टी को लगता है कि सिंबॉलिज्म भी राजनीति में मायने रखता है। इसी से काम चल जाएगा। अगर काम चल जाए तो बड़ी अच्छी बात है, लेकिन ऐसा होता हुआ दिखता नहीं। मुझे लगता है कि कुएं के मेंढक को निकालकर भाजपा ने समुद्र के पानी में छोड़ दिया है। अगर भाजपा को यह काम करना ही था तो 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद करना चाहिए था। तब पंकज चौधरी को भी काम करने,लोगों के बीच में जाने,घूमने,समाज के लोगों से बात करने,उनकी समस्या जानने,उसका निदान करने का समय मिलता। अब विधानसभा चुनाव में मुश्किल से एक साल रह गया है। अभी उनको अपनी टीम बनानी पड़ेगी। टीम बनाने के लिए भी उनको पार्टी हाईकमान का रुख देखना पड़ेगा। हाईकमान तय करेगा कि उनकी टीम में कौन लोग होंगे। अब उनमें कौन उनके सहायक होंगे,कौन उनके लिए काम करेंगे,कौन उनके विरोध में काम करेंगे,किसी को पता नहीं है। क्योंकि हर पार्टी में ऐसा होता है, भाजपा भी उसका अपवाद नहीं है। तो सवाल यह है कि पंकज चौधरी की सबसे बड़ी योग्यता क्या है? मेरा मानना है कि उनके पक्ष में जो पलड़ा झुका,उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वे महाराजगंज से चुनाव जरूर लड़ते हैं पर रहते गोरखपुर में ही हैं और योगी विरोधी कैंप के माने जाते हैं। वे योगी के लिए समस्या पैदा कर सकते हैं या समस्या पैदा न भी करें तो एक पैरेलल पावर सेंटर बन सकते हैं। पार्टी को लंबे समय से ऐसे व्यक्ति की तलाश थी, जो योगी आदित्यनाथ के सामने खड़ा हो सके,स्टैंड ले सके और उनकी बात को मानने से इनकार करने की भी ताकत रखे। तो हाईकमान का उन्हें पूरा समर्थन है और वह योगी विरोधी राजनीति करते रहे हैं। अब सवाल यह है कि यह योगी आदित्यनाथ के लिए तो समस्या हो सकती है, लेकिन मेरा मानना है कि उससे बड़ी समस्या भाजपा के लिए होगी। चुनाव से एक साल पहले अगर आप सरकार और संगठन के बीच में एक खाई पैदा करना चाहते हैं तो इसका नुकसान अल्टीमेटली पार्टी को होगा। तो संगठन और सरकार के बीच दूरी कम करने की जो बात हो रही थी, इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि उद्देश्य वह नहीं है। संगठन और सरकार के बीच में खाई बनी रहे या उसको और चौड़ा किया जाए, इसकी कोशिश है। तो योगी आदित्यनाथ को कमजोर करने के चक्कर में मुझे लगता है कि भाजपा अपने को ही कमजोर कर रही है। क्योंकि इस समय उत्तर प्रदेश में उनसे ज्यादा लोकप्रिय,उनसे ज्यादा प्रभावी कोई नेता नहीं है। भाजपा के पास जो एसेट है उसको लायबिलिटी बनाने की कोशिश हो रही है। तो अगर 27 में जीत गए तो श्रेय किसको जाएगा? जिन लोगों ने पीडीए के काट की रणनीति बनाई। और अगर हार गए या हारने जैसी स्थिति आ गई तो उसका दोष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर मढ़ा जाएगा। पंकज चौधरी सज्जन और मिलनसार हैं, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन पार्टी संगठन के लिए और चुनाव से एक साल पहले वे किसी तरह से उपयोगी नहीं हैं, सिवाय इसके कि वह कुर्मी समाज से आते हैं।
मेरा मानना है कि पार्टी ने पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर एक जुआ खेला है। दूसरी समस्या उनका स्वास्थ्य है। वह बहुत ज्यादा भागदौड़ नहीं कर सकते। ज्यादा कार्यकर्ताओं के बीच नहीं जा सकते। तो पिछला जो अध्यक्ष था,वह बोलता नहीं था। यह ऐसे अध्यक्ष होंगे जो न तो बोलेंगे और न सुनेंगे। अब उसका चुनाव में क्या असर होगा? हालांकि मेरे हिसाब से उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति बहुत मजबूत है, लेकिन हर चुनाव मुश्किल होता है और जब आप सत्ता में हो तो चुनौती और बड़ी होती है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



