डॉ॰ मधुबाला शुक्ल ।
मार्च का एक विशेष महत्त्व है कि यह माह विश्वभर में ‘स्त्री अस्मिता और सशक्तीकरण के उत्सव’ के रूप में जाना-माना व मनाया जाता है। प्रत्येक वर्ष ८ मार्च को मनाया जाने वाला ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ केवल एक तिथि नहीं, बल्कि स्त्रियों के संघर्ष, उपलब्धियों और अधिकारों की सतत यात्रा का प्रतीक है। यह हमें उन ऐतिहासिक आंदोलनों की याद दिलाता है, जिनके माध्यम से महिलाओं ने शिक्षा, रोजगार, वेतन व सामाजिक न्याय…आदि में समान अधिकार के अपने आत्मसम्मान को पाने के लिए लंबा संघर्ष किया।
भारतीय संदर्भ में भी महिला दिवस का महत्व अत्यंत व्यापक है। यहाँ स्त्री ने परंपराओं और सामाजिक बंधनों के बीच रहते हुए भी अपनी पहचान को निरंतर सुदृढ़ किया है। आज की भारतीय नारी शिक्षा, साहित्य, कला, राजनीति, विज्ञान…आदि हर क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है, फिर भी अनेक स्तरों पर असमानता और चुनौतियाँ अभी विद्यमान हैं। इस प्रकार महिला दिवस के आयोजन केवल उत्सव तक सीमित न रहकर संवाद, विमर्श और जागरूकता के माध्यम होते हैं। इस अवसर पर आयोजित विचार-गोष्ठियाँ, कविता-पाठ, नाट्य-प्रस्तुतियाँ और सांस्कृतिक आयोजन स्त्री के विविध अनुभवों, संघर्षों और उपलब्धियों को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम बनते हैं – उन्हें मंच प्रदान करते हैं…।
ऐसे में मुम्बई की सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस : एक अनौपचारिक उपक्रम’ द्वारा मार्च माह में आयोजित कार्यक्रम ‘स्त्री: परम्परा व प्रगति की देहरी पर’ के माध्यम से स्त्री जीवन के विभिन्न आयामों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया…। इसमें अतिथि वक्ता के रूप में पधारीं विभा रानी अपने लेखन एवं सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में नारी की प्रगति एवं उसके सशक्तीकरण में निरंतर प्रयत्नशील है। उन्होंने विवाह से पूर्व और पश्चात मजदूर स्त्री-पुरूषों की असमानता को बार-बार देखने-टकराने की जानिब से अपने विचार रखते हुए कहा कि खेतिहर मजदूरों के रूप में समान कार्य करने के बावजूद दोनों की मजदूरी अलग-अलग होती थी। उदाहरण स्वरूप – पुरुषों को दिहाड़ी के रूप में जब पाँच रुपये और खाने के लिए आधा सेर चावल मिलता था, तब स्त्रियों को मात्र ढाई रुपये और एक पाव चावल दिया जाता था। इतना ही नहीं, स्त्रियों को वह चावल भी अपने परिवार के साथ बाँटना पड़ता, जबकि पुरुष अपना पूरा हिस्सा स्वयं खाता। यह स्थिति उनके मन में प्रश्न उत्पन्न करती कि जब कार्य समान है, तो मजदूरी में यह असमानता क्यों?
विभाजी ने कहा कि आधुनिक समय में आज भी विशेषकर निजी क्षेत्रों में स्त्री और पुरुष के वेतन में असमानता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उन्होंने उल्लेख किया कि ईश्वर ने स्त्री और पुरुष की शारीरिक संरचना भिन्न अवश्य बनायी है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि कोई एक-दूसरे से श्रेष्ठ है। पुरुषों के इस कथन पर कि “हमारे बिना सृष्टि का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता”, उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि ऐसा है तो पहले वे अकेले ही सृष्टि चला कर दिखाएँ – उन्हें स्त्रियों का भगवान बनने की आवश्यकता नहीं है। विदुषी वक्ता ने प्रश्न उठाया कि आज  इतने आधुनिक संसाधनों और प्रगतिशील सोच के बावजूद, स्त्रियों की वास्तविक स्थिति क्या है कि स्त्री-विमर्श की आवश्यकता बनी हुई है? उन्होंने स्पष्ट किया कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं और जिस दिन यह बात समाज -विशेषकर पुरुषों- की समझ में आ जायेगी, उस दिन ‘महिला दिवस’ मनाने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।
अपने अनुभव साझा करते हुए विभाजी ने आगे कहा कि अनेक कार्यक्रमों में वे देखती हैं कि कवि अपनी रचनाओं में नारी सशक्तीकरण की बातें तो करते हैं, परंतु उनके साथ उनकी पत्नी, बेटी, बहन या माँ उपस्थित नहीं होतीं। इस पर उनका प्रश्न रहा कि यदि निजी जीवन में स्त्रियों को समान स्थान नहीं दिया जा रहा, तो केवल साहित्य व भाषणों में नारी-शक्ति की बात करने का क्या अर्थ रह जाता है? उनके अनुसार स्त्रियों के सामने चुनौतियाँ हमेशा रही हैं और रहेंगी…क्योंकि  चुनौतियाँ जीवन का हिस्सा हैं और उनसे ही जीवन का अर्थ और आनंद बनता है।
युद्ध के संदर्भ में उन्होंने उल्लेख किया कि उसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव स्त्रियों को झेलना पड़ता है। अपने एक नाटक ‘मैं कृष्णा, कृष्ण की’ का उदाहरण देते हुए विभा रानी ने बताया कि उसमें युधिष्ठिर स्त्रियों और बच्चों के दुख को महसूस करते हैं, जबकि द्रौपदी उन्हें यह विश्वास दिलाती है कि आने वाली पीढ़ियाँ एक नये समाज का निर्माण करेंगी…।
विभा रानी ने समाज की विडंबना पर यूँ प्रकाश डाला कि हम ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष तो करते हैं, पर शहीदों के परिवारों -विशेषकर उनकी पत्नियों- की वास्तविक स्थिति को कुछ समय बाद भूल जाते हैं। संजय चौहान की फिल्म का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि शहीद की पत्नी को भी गैस जैसी साधारण सुविधाएँ पाने में कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। तलाकशुदा स्त्रियों की स्थिति के प्रति समाज के अति संकीर्ण दृष्टिकोण का खुलासा करते हुए रानीजी ने कहा कि यदि बच्चों की कस्टडी पिता को मिल जाये, तो माँ को तरह-तरह के ताने सुनने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, तलाकशुदा स्त्री को समाज अक्सर गलत दृष्टि से देखता है।
महानगरों में स्त्रियों की स्थिति पर उनका कहना है कि मुंबई जैसे शहर में भी अकेली स्त्रियों को किराए पर घर लेने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनके जीवन पर अनावश्यक निगरानी रखी जाती है – कौन आ रहा है, कौन जा रहा है…आदि बातों का उन्हें हिसाब देना पड़ता है। विभाजी ने ऐसी मानसिकताओँ व स्थितियों को बदलने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आज के समय में स्त्री को कोमल मात्र नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार सशक्त और दृढ़ भी बनना होगा।
एक और अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि एक घर में बहू के ऑफिस जाने को “घूमने जाना” समझा जाता है, जबकि बेटे के ऑफिस जाने को “काम करना” माना जाता है। इस प्रकार की रुग्ण व सौतेली मानसिकताओँ को बदलना अत्यंत आवश्यक है। परंपराओं के संदर्भ में विभाजी का मत रहा कि स्त्रियाँ स्वाभाविक रूप से रीति-रिवाजों, व्रत-त्योहारों…आदि सांस्कृतिक गतिविधियों को अपनाती हैं और उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुँचाती हैं। यह उनके अस्तित्व और अभिव्यक्ति का एक माध्यम भी है।
अंत में विभा रानी ने कहा कि वास्तविक समानता तब संभव होगी, जब समाज के हर क्षेत्र – यहाँ तक कि एक सभागार में भी स्त्री और पुरुष की भागीदारी बराबर हो। उन्होंने जोर दिया कि गृहस्थ जीवन की गाड़ी तभी सुचारु रूप से चल सकती है, जब पति-पत्नी दोनों समान रूप से जिम्मेदारियाँ निभाएँ। तभी एक सशक्त समाज और मजबूत राष्ट्र का निर्माण संभव है।
‘कविता में स्त्री’ शीर्षक से पाठ एवं प्रस्तुतियों की… श्रृंखला के अंतर्गत ग़ज़लकार राकेश शर्मा ने शायर कैफ़ी आज़मी की नज़्म ‘उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे’  का सशक्त पाठ किया। हमेशा की तरह अपने सदाबहार निराले अंदाज में जवाहरलाल ‘निर्झर’ ने लोकगीत सुनाकर सभी का मन मोह लिया। कवि एवं विचारक रमन मिश्र ने अपनी ‘अली अम्मा’, ‘दो बहनें’, ‘मुन्नी,’ एवं ‘औरत’ शीर्षक कविताएँ सुनाईं, जिन्हें भरपूर सराहना मिली। रासबिहारी पांडेय ने ‘काहे बरसेला अंखियां’ और ‘सूने-सूने से घर, सूने आँगन लगते हैं, बेटी बिना अधूरे फागुन सावन लगते हैं’ जैसे गीतों के सस्वर गायन से सभी को भाव विभोर कर दिया। कवि अनिल गौड़ ने अपनी कविता ‘राम चले मानस से आगे’ प्रस्तुत की। कवयित्री अंबिका झा ने ‘हिसाब-किताब में बहुत ही कच्ची होती हैं महिलाएं’ शीर्षक अपनी कविता अपने निराले ही अंदाज में पढ़ी। सिने गीतकार कल्पेश यादव की मुक्त कंठ से गायी कविता ‘जब मैं बाज़ार से खरीदी गई, तभी मेरे घर से गरीबी गई’ पर सभी ने उन्हें खूब सराहा। प्राध्यापक बृजेश सिंह ने ‘सेजिया से सैंया रूठि गइलें हो रामा, कोयल तोरी बोलिया’ और ‘नइहर से केहू नाहीं अइलें हो रामा, बीतल फगुनवां’ जैसे चैता गीतों के लिए श्रोताओं की खूब तालियाँ बटोरीं। प्रज्ञा मिश्र ने जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा सर्ग ‘से श्रद्धा के रूप-वर्णन का अपने ही तैयार किये संगीत में सस्वर पाठ किया। अभिनेता सोनू पाहुजा ने मन्नू भंडारी की प्रसिद्ध कहानी ‘अकेली’ को कंठस्थ करके बड़े प्रभावशाली ढंग से पेश किया। रंगकर्मी आशी मालवीय ने नादिरा ज़हीर बब्बर लिखित नाटक ‘सक़ू बाई’ का एक बड़ा अंश प्रस्तुत किया। डॉ. मधुबाला शुक्ला ने युगांक धीर अनूदित सीमोन द बोउवार की जीवनी ‘स्वतंत्रता व प्रेम की राह’ पुस्तक के एक अंश का पाठ किया। इन पाठ-प्रस्तुतियों को दर्शकों ने खूब सराहा…। रंगकर्मी प्रमोद सचान ने धर्मवीर भारती के नाटक ‘अंधा युग’ से गांधारी के विलाप-शाप का प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण किया।
सुपरिचित कवयित्री, लेखिका एवं संचालिका प्रतिमा सिन्हा ने पूरे कार्यक्रम के दौरान विभिन्न कवियों-शायरों की पंक्तियाँ सटीक ढंग से उद्धृत करते हुए बेहद सुचारु संचालन किया।
‘बतरस’ संस्था के आधार स्तंभ, साहित्य एवं रंग समीक्षक प्रोफ़ेसर सत्यदेव त्रिपाठी व मीडियाकर्मी एवं लेखक विजय पंडित तथा रंगकर्मी एवं टीवी-सिने अभिनेता विजय कुमार, रंगकर्मी एवं सिने अभिनेत्री शाइस्ता खान, शायर और निर्देशक कमर हाजीपुरी, बीबीसी के पत्रकार रहे डॉ आर.एस रावत, अध्यापिका बबीता…आदि  ने अपनी महनीय उपस्थित से आयोजन की शोभा बढ़ायी…।
इस तरह कविता, लोकगीत, नाटक, कहानी और विचार-वक्तव्य…आदि माध्यमों से स्त्री के विविध रूपों पर हुई यह समृद्ध साहित्यिक चर्चा राष्ट्रगान के साथ पूरी हुई और यह यादगार संध्या अल्पाहार व चाय-पान के साथ संपन्न हुई।