राज कपूर का जीवन प्रेम का पर्याय था। यही प्रेम उनकी फिल्मों में कलकल बहता हुआ दिखाई देता था। उन्हें जिस चीज से सबसे ज्यादा प्यार था, उसका नाम है सिनेमा। और, संगीत उनके सिनेमा का आत्मा था। ‘प्रेम रोग’ का आइकॉनिक गाना ‘ये गलियां ये चौबारा यहां आना न दोबारा’ राजकपूर के अधूरे प्रेम की सिनेमाई अभिव्यक्ति है। इसके पीछे एक दर्दभरी दास्तान है। इस लेख में आगे हम उनकी फिल्मों से जुड़े कुछ और गानों की कहानी भी बताएंगे, साथ ही बताएंगे राज कपूर के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘हिना’ के बारे में।

संगीत राज कपूर की फिल्मों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष होता था। उन्होंने शंकर-जयकिशन, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश और लता के साथ जो टीम बनाई थी, फिल्म जगत में उसका कोई सानी नहीं है। इस टीम ने जो गाने दिए, वे अमर हैं। 1966 में शैलेन्द्र और 1971 में जयकिशन की मृत्यु के बाद राज कपूर को बड़ा झटका लगा और 1976 में मुकेश की मृत्यु के बाद तो वे टूट से गए। उन्होंने कहा था- मेरी तो आवाज़ ही चली गई। लेकिन राज कपूर की फिलॉसफी थी- ‘शो मस्ट गो ऑन’ और हमेशा वे इस फिलॉसफी पर चलते रहे। बाद में उन्होंने अपनी टीम में संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, रवींद्र जैन, गीतकार नीरज, आनंद बख्शी, पंडित नरेंद्र शर्मा, संतोष आनंद, को शामिल किया और अविस्मरमणीय संगीत का सिलसिला जारी रहा।

बरसात का ‘राजा की आएगी बारात’, ‘पतली कमर है तिरछी नज़र है’, आवारा का ‘दम भर जो उधर मुंह फेरे’, ‘अब रात गुजरने वाली है’, ‘घर आया मेरा परदेसी’, श्री 420 का ‘रमैया वस्ता वैया’, ‘फिर प्यार न कैसे हो’, ‘मेरा जूता है जापानी’, जागते रहो का ‘जागो मोहन प्यारे’, जिस देश में गंगा बहती है का ‘ओ बसंती पवन पागल’, ‘आ अब लौट चलें’, ‘मेरा नाम राजू घराना अनाम’, संगम का ‘बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं’, ‘दोस्त दोस्त ना रहा’, ‘क्या करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया’, मेरा नाम जोकर का ‘जीना यहां मरना यहां’, ‘जाने कहां गए वो दिन’, ‘ऐ भाई जरा देख के चलो’, कल आज और कल का ‘भंवरे की गूंजन है मेरा दिल’, बॉबी का ‘हम तुम एक कमरे में बंद हो’, ‘झूठ बोले कौव्वा काटे’, ‘अंखियों को रहने दे अंखियों के आसपास’, धरम करम का ‘एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल’, सत्यम शिवम सुंदरम का ‘यशोमति मैया से बोले नंदलाला’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’, ‘रंग महल के दस दरवाजे’, प्रेमरोग का ‘ये गलियां ये चौबारा’ ‘भंवरे ने खिलाया फूल’, ‘मोहब्बत है क्या चीज’, ‘मेरी किस्मत में तू नहीं शायद’, राम तेरी गंगा मैली का ‘सुन साहिबा सुन’, ‘एक राधा एक मीरा’ आदि राज कपूर की फिल्मों के कुछ गाने हैं, जो आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने तब थे। अगर उनकी फिल्मों के सारे गीतों की चर्चा की जाए तो एक ग्रंथ तैयार हो सकता है।

दरअसल, राज कपूर को खुद भी संगीत की जबर्दस्त समझ थी। उन्हें ये संस्कार अपनी मां रमासरनी देवी से मिला था। रमासरनी देवी को गीत गाना बहुत अच्छा लगता था और वे गाती भी बहुत अच्छा थीं। उनके पास लोक गीतों का भंडार था। लिहाजा, राज कपूर को बचपन से ही संगीत के प्रति आकर्षण हो गया था, जो उनकी फिल्मों में स्पष्ट रूप से दीखता था। प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक और फिल्मों के वितरण व निर्माण से जुड़े रहे दिवंगत जयप्रकाश चौकसे ने राज कपूर पर एक बहुत अच्छी किताब लिखी है- ‘राज कपूर सृजन प्रक्रिया’। वे राज कपूर से व्यक्तिगत रूप से भी जुड़े थे। उन्होंने लिखा है- “विश्व सिनेमा में संभवतः राजकपूर ऐसे एकमात्र फिल्मकार हुए हैं, जिनके मन में पहले ध्वनियों का जन्म होता था, फिर दृश्य-संरचना का विचार रूपायित होता था। एक धुन अथवा एक दृश्य राजकपूर के मन के तहखाने में बरसों दबी रहती थी। सही समय पर तथा सही स्थान पर वह हिट बनकर उभरती थी।” संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने राजकपूर की संगीत क्षमता के बारे में कहा कि यदि वे संगीतकार बनना चाहते, सर्वश्रेष्ठ संगीतकार सिद्ध होते।

A Guide To Raj Kapoor's Cinema On His 100th Birth Anniversary

यह बात पूरी तरह से सही है। एक रोचक वाकया, जो प्रेमरोग के गाने से जुड़ा है, इसकी तस्दीक करता है। राजकपूर जब जवान हो रहे थे, तब उन्हें एक लड़की से प्यार हो गया। लड़की भी उन्हें बहुत चाहती थी। दोनों एक ही बिरादरी के थे, लेकिन दोनों का रिश्ता परवान नहीं चढ़ सका। दरअसल लड़की के पिता को पसंद नहीं था कि उनका होने वाला दामाद फिल्मों के चक्कर में पड़े। वह चाहते थे कि उनका दामाद घर जमाई बन कर रहे। अब ये भला कैसे हो सकता था कि राज कपूर फिल्मों का प्रेम छोड़कर घर जमाई बन जाएं। इसलिए ये शादी नहीं हो पाई। राजकपूर आखिरी बार जब उस लड़की से मिलने गए, तो उसने राज कपूर को ठेंगा दिखाकर कहा, ‘ये गलियां, ये चौबारा, यहां ना आना दोबारा’। राज कपूर इस पंक्ति को कभी भूले नहीं और लगभग चार दशक बाद उन्होंने फिल्म प्रेम रोग में अल्हड़ नायिका मनोरमा (पद्मिनि कोल्हापुरे) पर गीत फिल्माया- “ये गलियां ये चौबारा यहां आना ना दोबारा के अब हम तो भये परदेसी के तेरा यहां कोई नहीं।”

जयप्रकाश चौकसे लिखते है- “उस असफल प्यार से दुखी राजकपूर कश्मीर जाना चाहते थे, जहां वह लड़की अपने परिवार के साथ गई थी। पृथ्वीराज कपूर ने पैसे देने से इनकार कर दिया। आधी रात को एक दर्द भरी आवाज़ सुकर पृथ्वीराज की नींद टूट गई। उन्होंने देखा कि टूटे हुए दिल से राज कपूर एक पेड़ के नीचे बैठे दर्द भरी आवाज़ में गीत गा रहे हैं और कुछ लोग मन्त्रमुग्ध होकर सुन रहे हैं। यह बात देहरादून की है। दूसरे दिन सुबह पृथ्वीराज ने राजकपूर को पैसे भी दिए और कश्मीर जाने की इजाजत भी। पृथ्वीराज कपूर को इस बात का हमेशा अफसोस रहा कि राजकपूर ने गीत-संगीत को अपना पेशा नहीं बनाया।

Prem Nath Brother In Law Of Raj Kapoor Most Busiest And Highest Paid Actor In 60s And 70s - राज कपूर के साले साहब प्रेमनाथ, जो हीरो से भी दोगुनी फीस लेते

इसी तरह का एक और रोचक वाकया है। फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के समय राज कपूर का अपने साले और दोस्त मशहूर अभिनेता प्रेम नाथ से किसी बात को लेकर मनमुटाव हो गया। इसके बाद राजकपूर ने प्रेमनाथ को मनाने की खूब कोशिश की, पर प्रेमनाथ नहीं माने और कुछ भी सुनने से मना कर दिया। फिर राज कपूर ने बड़े इसरार से प्रेम नाथ को कहा, ‘सुन साहिब सुन, प्यार की धुन, मैंने तुझे चुन लिया, तू भी मुझे चुन’। इसके कई बरस बाद राज कपूर ने फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में इन बोलों को मंदाकिनी पर फिल्माया।

इसी तरह, एक और किस्सा है। बॉबी के दिनों में राज कपूर ने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के म्यूजिक रूम में एक धुन बनाई थी। वो धुन थी- वो कहते हैं उम्र नहीं है प्यार की, नादां हैं क्या जाने कली खिल चुकी बहार की’। उन दिनों लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के यहां संगीतकार राजेश रोशन काम सीखते थे। करीब पंद्रह वर्ष बाद राजेश रोशन ने फिल्म ‘दरियादिल’ में इस गाने का कुछ इस तरह इस्तेमाल किया- “वो कहते हैं हमसे/ अभी उमर नहीं है प्यार की/ नादां हैं वो क्या जाने/ कब खिली बहार की”। राजकपूर ने जब रेडियो पर ये गीत सुना तो बहुत नाराज हुए। राजेश रोशन को लग रहा था कि पन्द्रह वर्षों में राजकपूर इस धुन को भूल गए होंगे या फिर उसका इस्तेमाल नहीं करना चाहते होंगे। लेकिन राजकपूर अपनी कोई धुन कभी नहीं भूलते थे।

Heena (1991) - Hindi Romance Drama Movie | Rishi Kapoor, Zeba Bhaktiar, Ashwini Bhave | Full Movies

अब बात राज कपूर के ड्रीम प्रोजेक्ट हिना की। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे ‘हिना’ फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उनके जीवनकाल में ‘हिना’ नहीं बन सकी। इस फिल्म का आइडिया राज कपूर के मन में कई दशक पहले आया था। इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है। 1950 के दशक के अंतिम वर्षों की बात होगी। निर्माता सुभाष देसाई अपने छोटे भाई मनमोहन देसाई, जो बाद में बहुत बड़े निर्देशक बने, को फिल्म ‘छलिया’ से बतौर निर्देशक लॉन्च कर रहे थे। वे चाहते थे कि राजकपूर इसमें हीरो की भूमिका निभाएं। पर एक संशय था कि क्या राज कपूर एक नए निर्देशक के साथ काम करेंगे? हालांकि जब सुभाष देसाई ने राजकपूर को प्रस्ताव दिया, तो वे एकदम आसानी से तैयार हो गए। ‘छलिया’ की कहानी भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि पर थी। शायद यही वज़ह थी कि सुभाष देसाई विभाजन से जुड़ी अखबारी कतरनें राजकपूर को पढ़ने के लिए देते थे। इन्हीं खबरों में एक ख़बर थी कि दुर्घटनावश भारत का एक युवक झेलम नदी में बहकर पाकिस्तान पहुंच गया। वहां के पहाड़ी खानाबदोश लोगों ने उसकी जान बचाई। इस खबर ने राजकपूर को बेचैन कर दिया। यहीं से हिना का बीज राजकपूर के मन में पड़ा।

हालांकि उस ख़बर में पहाड़ी कबीले की किसी लड़की का कोई जिक्र नहीं था। आपको जानकर हैरानी होगी कि शुरू में हिना में हिना थी ही नहीं। खैर, राज कपूर कई सालों तक इस आइडिया को मन में विकसित करते रहे। इस बीच वे दूसरी फिल्मों के निर्माण में लगे रहे। ‘बॉबी’ फिल्म के निर्माण से पहले उन्होंने खानाबदोश गायिका रेशमा की आवाज सुनी। उन्होंने रेशमा से एक गाना भी ‘बॉबी’ में गवाया। रेशमा से ही उन्हें ‘हिना’ में खानाबदोश लड़की के किरदार का आइडिया आया। उन्होंने स्क्रिप्ट पर काम करना शुरू किया, लेकिन बात बन नहीं पा रही थी। हिना के कई स्क्रिप्ट उन्होंने तैयार किए। एक समस्या हीरोइन की भी आ रही थी। वे जैसी हिना चाहते थे, वैसी कोई लड़की मिल नहीं रही थी। इसमें बहुत सारा समय निकल गया। उन्होंने इस बीच ‘राम तेरी गंगा मैली’ भी बना ली। इसके बाद फिर एक बार ‘हिना’ पर काम शुरू किया। उन्होंने अपने जीवनकाल में इसके तीन गाने रिकॉर्ड कर लिए थे, जिसमें ‘चिट्ठिये’ गाना भी शामिल था। फिर राजकपूर दादासाहेब फाल्के पुरस्कार लेने दिल्ली आए, तो उसी समय उनकी तबियत बहुत खराब हो गई और 2 जून 1988 को उनका निधन हो गया। इसके बाद रणधीर कपूर ने जेबा बख्तियार को ‘हिना’ की हीरोइन के रूप में चुना और ‘हिना’ की शूटिंग शुरू की। राजकपूर की मृत्यु के तीन साल बाद ‘हिना’ रिलीज हुई। राज कपूर नहीं थे, लेकिन उनका सपना आख़िरकार साकार हुआ। रणधीर कपूर ने ‘हिना’ को वैसे ही बनाया, जैसा राजकपूर चाहते थे।