नीतीश ‘रिटायर्ड हर्ट’।
प्रदीप सिंह।
भारतीय जनता पार्टी के ऑपरेशन बिहार का पहला चरण पूरा हो चुका है। नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। वह राज्यसभा का सदस्य बनने जा रहे हैं। नीतीश कुमार के स्वास्थ्य की जो हालत है, उसको देखते हुए उनको मुख्यमंत्री के रूप में ज्यादा समय तक चलाना मुश्किल हो रहा था। भाजपा का यह ऑपरेशन कोई नया नहीं है।
देश के पूरब में तीन राज्य हैं। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और बिहार। 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद उड़ीसा में भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री बना लिया था। पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाला है। वहां भाजपा अपना मुख्यमंत्री बना पाएगी या नहीं,यह अप्रैल के अंत या मई के पहले हफ्ते तक पता चल जाएगा। बिहार में इस बार तय माना जा रहा था कि बीजेपी की जेडीयू से ज्यादा सीटें आएंगी और आईं भी। लेकिन अंतर जितना है भाजपा को उससे ज्यादा की उम्मीद थी। भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाने या नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद पर न रहें,इसके लिए उनको तैयार करने की योजना 2020 से ही बना ली थी। 2020 के चुनाव से पहले ही भाजपा नहीं चाहती थी कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनें। जो समीकरण बना उसमें जेडीयू को बीजेपी से लगभग आधी सीटें मिलीं। जेडीयू और भाजपा का गठबंधन होने के बाद से 2020 में पहली बार ऐसा हुआ जब जेडीयू जूनियर पार्टनर बन गई। उस समय बड़ा दबाव था कि भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाए। नीतीश कुमार ने कह भी दिया था कि आप बड़ी पार्टी हैं। अपना मुख्यमंत्री बनाइए। लेकिन बीजेपी को पता था कि अगर अपना मुख्यमंत्री बना लिया तो नीतीश कुमार चलने नहीं देंगे। अब 2026 आते-आते बहुत कुछ बदल गया है। भाजपा बिहार में और ज्यादा मजबूत हुई है। 243 सदस्यों की विधानसभा में इस बार उसकी 89 सीटें आई हैं। 85 जनता दल यूनाइटेड को मिली हैं। कुल मिलाकर बिहार विधानसभा में एनडीए का प्रचंड बहुमत है। सवाल था टाइमिंग का कि नीतीश कुमार से कब हटने के लिए कहा जाए और नीतीश कुमार इसके लिए तैयार भी हो जाएं। भाजपा इस बारे में बहुत सजग थी कि बिल्कुल ऐसा संदेश नहीं जाना चाहिए कि वह नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहती है क्योंकि उसकी नजर मुख्यमंत्री पद पर ही नहीं, जेडीयू के वोट बैंक पर भी है। नीतीश कुमार को नाराज करके वह वोट बैंक भाजपा के साथ नहीं आ सकता। तो भाजपा ने ऐसा समय चुना बल्कि मैं कहूंगा ऐसा वातावरण बनाया।

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद जब नीतीश कुमार एक बार फिर आरजेडी के साथ चले गए और कुछ समय बाद फिर एनडीए में लौट आए,उसके बाद से ही मेरा मानना है कि बीजेपी ने यह ऑपरेशन शुरू कर दिया था। इस ऑपरेशन के तहत जेडीयू के ही वरिष्ठ नेताओं का इस्तेमाल किया गया। जेडीयू के दो-तीन वरिष्ठ नेता जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी माने जाते थे, उनको भाजपा ने अपनी तरफ मिला लिया। मेरा मानना है कि भाजपा का यह ऑपरेशन इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद की तरह का था कि अपने दुश्मन के खेमे में जो लोग प्रभावी हैं, उनको अपने साथ मिला लो। उनसे ह्यूमन इंटेलिजेंस इकट्ठा करो। तो ये नेता जेडीयू में रहकर बीजेपी का काम कर रहे थे और वह ऑपरेशन अब पूरा हो गया। कुछ लोग कह रहे हैं कि दबाव में जबकि कुछ का मानना है कि खुद नीतीश ने यह फैसला लिया है। मेरा सवाल है कि क्या नीतीश कुमार कोई भी फैसला लेने की स्थिति में हैं। इसका जवाब किसी के पास नहीं है। नीतीश कुमार के बारे में कोई मेडिकल बुलेटिन जारी नहीं हुआ है। इसलिए आप आधिकारिक रूप से नहीं कह सकते कि उनके स्वास्थ्य की स्थिति क्या है। सार्वजनिक कार्यक्रमों में नीतीश का जो व्यवहार है, उससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि उनकी स्थिति ठीक नहीं है और अब उनको मुख्यमंत्री बनाए रखना बिहार के लिए हानिकारक होगा। लेकिन नीतीश कुमार की बिहार में जो लोकप्रियता और जनाधार है,आज किसी नेता का नहीं है इसलिए बीजेपी बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रही है और ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है कि नीतीश कुमार स्वेच्छा से राज्यसभा में जा रहे हैं। ऐसे में मेरा सवाल है कि अगर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री का पद संभालने की स्थिति में नहीं हैं तो राज्यसभा में जाकर क्या करेंगे? तो इस कदम से उनको एक सम्मान पूर्ण एग्जिट दी जा रही है। हालांकि इस कदम से पटना में जेडीयू के कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखी जा रही है,लेकिन मेरा मानना है कि यह तात्कालिक नाराजगी है। पिछले डेढ़ दो साल से जेडीयू के कार्यकर्ता भी समझ रहे थे कि अब नीतीश कुमार बहुत लंबे समय तक मुख्यमंत्री के पद पर नहीं रह सकते। उनका मुख्यमंत्री पद से हटना जेडीयू के कार्यकर्ताओं के लिए एक्सपेक्टेड सरप्राइज है। नीतीश कुमार के करीबी नेताओं ने जिस तरह से बीजेपी का काम किया,उसकी वजह से जेडीयू कार्यकर्ताओं में ज्यादा नाराजगी है।

राज्य में अगले दो-तीन दिन में ही नया मुख्यमंत्री आने वाला है,ऐसा नहीं है। बीजेपी इसको ठंडा करके खाएगी। नीतीश कुमार राज्यसभा के सदस्य की शपथ लेंगे और उसके बाद भी हो सकता है कुछ दिन तक दिन वह मुख्यमंत्री बने रहें। नए मुख्यमंत्री के चुनाव के लिए जो एनडीए की बैठक होगी, उसमें नए मुख्यमंत्री के नाम का प्रस्ताव नीतीश कुमार से ही कराया जाएगा और नीतीश कुमार यह बात समझ गए हैं कि अब जो मुख्यमंत्री बनेगा वह भाजपा का होगा। तो पूरब के तीन राज्यों में से दो में भाजपा का मुख्यमंत्री हो जाएगा और इस बात की संभावना बढ़ रही है कि पश्चिम बंगाल में भी भाजपा का मुख्यमंत्री बन सकता है। पूर्वोत्तर में पहले से ही बीजेपी का परचम फहरा रहा है। उत्तर भारत और पश्चिम भारत में भी उसका वर्चस्व बना हुआ है। इसके बाद सिर्फ़ दक्षिण का एक किला बचेगा।
बिहार में मुख्यमंत्री का चयन भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। सामाजिक समीकरण और शीर्ष नेतृत्व की पसंद के बीच में रस्साकशी होगी। जिस तरह से राजस्थान,मध्य प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों के मुख्यंत्रियों के नाम पर्ची निकालकर तय हुए हैं, उसी तरह से बिहार में किसी को मुख्यमंत्री बनाया गया तो मानकर चलिए कि वहां भाजपा के लिए आने वाला समय बहुत ही कठिन होने वाला है। जिन राज्यों में पर्ची निकालकर मुख्यमंत्री बनाए गए उन राज्यों में भाजपा का पूर्ण बहुमत था और उसका संगठन भी बहुत मजबूत था। इसके ठीक विपरीत बिहार में न तो भाजपा का पूर्ण बहुमत है न ही पूरे राज्य में उसका संगठन उस तरह से मजबूत है जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ में है। इस समय चर्चा में जो तीन नाम हैं,उनमें एक हैं उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी,जो कुशवाहा समाज से आते हैं। अगर सम्राट मुख्यमंत्री बनते हैं तो कुर्मी समाज से उप मुख्यमंत्री बनेगा और यह लगभग तय है कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार अगले डिप्टी सीएम होंगे। जो दो और नाम चर्चा में हैं, उसमें एक हैं नित्यानंद राय, जो यादव समाज से आते हैं और केंद्र में राज्य मंत्री हैं। तीसरा नाम है संजय जायसवाल का, जो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और सांसद हैं। चर्चा यह भी है कि बीजेपी सरप्राइज कर किसी महिला को मुख्यमंत्री बना सकती है। हालांकि इस तरह का कोई नाम दिखाई नहीं दे रहा है। दो दशक की लंबी इनिंग के बाद मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार रिटायर हो रहे हैं। इसी के साथ मंडल आंदोलन से उपजे नेताओं की पारी खत्म हो रही है। पहले लालू प्रसाद यादव की विदाई हुई। अब नीतीश कुमार की हो रही है। हालांकि नीतीश कुमार राजनीति से बाहर नहीं हो रहे हैं, लेकिन उनकी राज्यसभा की सदस्यता रिटायरमेंट के बाद की पेंशन की ही तरह है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



