विशेष सत्र से सेट किया 27 का नैरेटिव ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक पर यूपी विधानसभा का एक दिन का विशेष सत्र 30 अप्रैल को आयोजित हुआ। सरकार ने इस मौके पर विपक्ष के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी को ऐसा पटक-पटक कर धोया जैसे धोबी घाट पर धोबी पत्थर पर पटक कर कपड़ों को धोता है।
योगी ने गेस्ट हाउस कांड का उदाहरण देते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी शुरू से ही महिला विरोधी रही है। एक दलित महिला नेता मायावती का जिस तरह से घेराव हुआ,अपमान हुआ और लगभग उनकी जान पर बन आई। उन्होंने कहा कि भाजपा के वरिष्ठ नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने अपनी जान पर खेलकर उनको बचाया और भाजपा ने पहली बार उत्तर प्रदेश में किसी दलित महिला को मुख्यमंत्री बनाने के लिए समर्थन दिया। इस घटना के जरिए एक बार फिर उत्तर प्रदेश और देश के लोगों को योगी ने याद दिलाया कि ये लोग महिला विरोध में किस हद तक जा सकते हैं। गेस्ट हाउस कांड समाजवादी पार्टी के माथे पर लगा हुआ ऐसा कलंक है, जो कभी धुल नहीं सकता। राजनीति के क्षेत्र में भारत में कम से कम ऐसी घटना किसी प्रदेश में कभी नहीं हुई और उसके लिए समाजवादी पार्टी ने कभी माफी तक नहीं मांगी। इस विशेष सत्र में योगी ने विपक्ष के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पेश किया तो शुरुआत ही इस बात से की कि महिला आरक्षण का दिल्ली में विरोध करते हैं और लखनऊ आते-आते जब महिला शक्ति से डर लगने लगता है तो यहां समर्थन करने लगते हैं कि हम भी महिला आरक्षण के समर्थक हैं। इनके आगे तो गिरगिट भी शर्मा जाएगा। इसके बाद उन्होंने गिनाना शुरू किया कि समाजवादी पार्टी की सरकारों के समय महिलाओं के साथ किस तरह का व्यवहार हुआ। समाजवादी पार्टी के पास इन तथ्यों का कोई जवाब नहीं था। तो यह विशेष सत्र और उसमें योगी जी का भाषण, मेरा मानना है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है।
इससे पहले दो और घटनाएं हो चुकी हैं। नारी वंदन संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से अखिलेश यादव पर तंज किया था कि हमारे दोस्त हैं, समय-समय पर मदद करते रहते हैं और अखिलेश यादव ने कृतज्ञता के भाव से हाथ जोड़कर सिर झुका लिया कि जी हुजूर,उससे सपा की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। हालांकि उस घटना के पांच दिन बाद अखिलेश को समझ में आया कि यह गड़बड़ हो गया तो सफाई देने की कोशिश की लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था। उसके बाद गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने सीधा हमला समाजवादी पार्टी, उसके गुंडा तंत्र, माफिया राज और भ्रष्टाचार पर बोला। गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा एक्सप्रेसवे है और उसके खुलने के बाद अब देशभर में जितने एक्सप्रेसवे हैं, उनका 60% उत्तर प्रदेश में है। लेकिन प्रधानमंत्री का वह भाषण अगर आप सुनें तो आपको लगेगा कि चुनाव का प्रचार शुरू हो चुका है। यूपी में सीधी लड़ाई भाजपा और समाजवादी पार्टी में है, इसमें कोई दो राय नहीं। योगी आदित्यनाथ को अगले साल मार्च में मुख्यमंत्री बने हुए 10 साल हो जाएंगे। विकास के क्षेत्र में पिछले 9 साल में योगी ने जितनी बड़ी लकीर खींच दी है, उसके सामने अखिलेश यादव की लकीर बहुत छोटी है।
उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव परिवार को चार बार सरकार चलाने का मौका मिला। तीन बार मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और एक बार अखिलेश यादव। लेकिन इस परिवार के पास विकास के नाम पर उपलब्धि क्या है? लगभग जीरो। अखिलेश यादव ने अपने 5 साल के शासनकाल में यूपी को केवल एक एक्सप्रेसवे दिया। इसके अलावा उन्होंने उत्तर प्रदेश को माफिया राज दिया, जिसमें पुलिस माफिया के मातहत थी। 2012 में जैसे ही अखिलेश की सरकार बनी सबसे पहले उन्होंने आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद चार लोगों का मुकदमा वापस लेने का आदेश जारी किया। वह तो भला हो इलाहाबाद हाई कोर्ट का, जिसने फटकार लगाते हुए कहा कि आज इनको आप रिहा कर दीजिए और कल इनको पद्म पुरस्कार दे दीजिएगा। मुझे अच्छी तरह याद है कि इन सब पर बाद में मुकदमा चला और ये सभी कन्विक्ट हुए। वे आतंकवादी थे और उनको सजा हुई। क्या समाजवादी पार्टी ने इस पर कोई सफाई दी कि हमसे गलती हो गई थी। देखिए गलती किसी से हो सकती है। गलती की माफी होती है, लेकिन अगर आप अपराध करते हैं तो उसकी सजा होती है और डेमोक्रेसी में सबसे बड़ी सजा सत्ता से हटा दिया जाना है। वही समाजवादी पार्टी के साथ हुआ।
मैं बार-बार इस बात को दोहराता हूं कि समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश की जनता किस तरह से सजा दे रही है। 2012 के बाद सपा को अगर खुश होने का किसी चुनाव में मौका मिला तो वह 2024 का लोकसभा चुनाव था, जिसमें उसकी 37 सीटें आ गईं। वरना 2014 में अखिलेश के मुख्यमंत्री रहते लोकसभा का चुनाव हुआ और उनकी पार्टी को सिर्फ पांच सीटें मिलीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा सिर्फ 47 सीटों पर सिमट गई जबकि 2012 में उसे 224 सीटें मिली थीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश को समझ में आ गया था कि अकेले कुछ नहीं कर सकते तो बसपा से गठबंधन कर लिया। फिर भी लोकसभा की सीटें पांच ही रह गईं। फिर 2022 के विधानसभा चुनाव में ऐसा नैरेटिव बनाया गया कि अखिलेश यादव मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने ही वाले हैं। उनको बधाइयां मिलने लगीं। राज्य के एक बहुत ही सीनियर आईपीएस अफसर नतीजे की घोषणा से एक दिन पहले ही उनको बुके देने चले गए। ब्यूरोक्रेसी में ऐसे कई लोग सामने आ गए जिनके बारे में पता चला कि वे दरअसल सरकार की नौकरी नहीं करते। वे समाजवादी पार्टी की नौकरी करते हैं। उन लोगों ने भी समाजवादी पार्टी के नेताओं को बधाई देना शुरू कर दिया। मंत्रिमंडल के बंटवारे की सूचियां बनने लगीं। नतीजा आया तो समाजवादी पार्टी को साथियों के साथ केवल 125 सीटें मिलीं।
बीते पांच सालों में समाजवादी पार्टी पीडीए का नारा देने के अलावा समाज के किसी वर्ग को अपने साथ जोड़ नहीं पाई। अगर सपा को लग रहा है कि जो 37 सीटें लोकसभा चुनाव में आई हैं, उसी तरह का नतीजा 2027 के विधानसभा चुनाव में होगा तो वह गलतफहमी में है और उसका सबसे बड़ा प्रमाण 30 अप्रैल को विधानसभा के विशेष सत्र में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भाषण है। उस भाषण के दौरान योगी के आत्मविश्वास का स्तर बता बता रहा था कि वह उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार भाजपा की सरकार बनने के प्रति निश्चिंत हैं। सवाल यह भी है कि 2027 के चुनाव में जब समाजवादी पार्टी जाएगी तो योगी सरकार के खिलाफ उसका मुद्दा क्या होगा? किस मामले में आलोचना करेगी? बिजली, सड़क, पानी, एक्सप्रेसवे, हवाई अड्डे, नोएडा में इंटरनेशनल एयरपोर्ट। उसके अलावा अस्पतालों की संख्या,एम्स की संख्या,कोई भी मुद्दा ले लीजिए, हर क्षेत्र में तेजी से प्रगति हुई है। उत्तर प्रदेश का एक्सपोर्ट लगातार बढ़ रहा है। बीते नौ सालों में राज्य में जिस तरह से इन्वेस्टमेंट आया है, पहले कभी नहीं आया। और सबसे बड़ी उपलब्धि कानून व्यवस्था। जब किसी महिला या लड़की को यह लगे कि हम घर से रात में भी बाहर निकलेंगे तो हमारे लिए डर की कोई बात नहीं है तो समझिए कि सुशासन है और उत्तर प्रदेश में यह सुशासन स्थापित हो चुका है। ऐसा नहीं है कि उसके बाद कोई दुर्घटना नहीं हुई। लेकिन शासन कैसा है इसका पता तब चलता है कि घटना के बाद एक्शन कैसा हुआ। आज देश का हर राज्य योगी जैसा मुख्यमंत्री चाहता है। किसी के काम पर इससे बड़ी मोहर और क्या लग सकती है। यही योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पूंजी है, जो उन्होंने अपने परिश्रम से अर्जित की है।
देखिए संवाद में अगर तंज और व्यंग्य हो तो अक्सर अच्छा लगता है, लेकिन तंज और व्यंग्य अगर आपका डिफॉल्ट सिस्टम बन जाए। हर समय उसी लहजे में आप बोलने लगें तो फिर वह आपके खिलाफ जाने लगता है, जो अखिलेश यादव के साथ हो रहा है। वह विरोध नहीं करते,वह योगी आदित्यनाथ को अपमानित करने की कोशिश करते हैं। जिस व्यक्ति का सम्मान उत्तर प्रदेश से बाहर भी हो,उसके प्रति ऐसी भाषा और शब्दावली,मुझे नहीं लगता कि सपा का कार्यकर्ता भी पसंद करता होगा। तो उत्तर प्रदेश में आप मानकर चलिए कि भले ही चुनाव फरवरी मार्च 2027 में हो, लेकिन चुनाव अभियान योगी आदित्यनाथ ने शुरू कर दिया है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं आपका अखबार के संपादक हैं)