प्रदीप सिंह।सब दिन होत न एक समान। इस बात का अहसास इस समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके साथियों को हो रहा है। उनको लग रहा है कि उनकी सत्ता चली गई है। हालांकि अभी गई नहीं है। 4 मई को रिजल्ट आएगा। लेकिन ममता बनर्जी के हावभाव, उनके रवैये को देख लीजिए। नतीजा आपके सामने दिखाई देगा।
आप इतने सालों से ममता बनर्जी को देख रहे हैं। जब वह कांग्रेस में थीं तब भी उनकी शुरुआत कैसे हुई थी? पूरे देश में मशहूर कैसे हुई थीं? उन दिनों जेपी मूवमेंट चल रहा था। जयप्रकाश नारायण कोलकाता पहुंचे थे और कांग्रेस के लोग उनका विरोध कर रहे थे। ममता बनर्जी उस समय यूथ कांग्रेस में थीं। वह जेपी की गाड़ी के बोनट पर चढ़ गईं और हंगामा शुरू कर दिया। वह फोटो देश के लगभग हर अखबार में छपी थी। वहां से ममता बनर्जी की छवि एक लड़ाकू नेता की बनी। राजनीति के इस स्टाइल से उनको बड़ी लोकप्रियता मिली और उन्होंने इसको लगातार जारी रखा। 1998 में जब उन्होंने अपनी पार्टी बनाई तब उनको एक और बात समझ में आई कि हमें सीपीएम से लड़ने के लिए इसी तरह की रणनीति और केंद्र की मदद की जरूरत है। इसीलिए वह 1999 में एनडीए में शामिल हो गईं। 2001 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि हमारा मेनिफेस्टो देख लीजिए। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस स्वाभाविक सहयोगी हैं। आज ममता बनर्जी उसी स्वाभाविक सहयोगी से लड़ रही हैं। केंद्र में बीजेपी की सरकार चली गई तो ममता यूपीए के साथ आ गईं। एनडीए और यूपीए दोनों सरकारों में वह मंत्री रहीं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि उन्होंने सीपीएम के साथ अपनी जान पर खेलकर लड़ाई लड़ी और आखिरकार 2011 में उनकी पार्टी की पश्चिम बंगाल में सरकार बन गई। अब जरा पिछले चुनाव 2021 की ममता बनर्जी और आज की ममता बनर्जी की तुलना कीजिए। उनके हावभाव, उनकी बोलने की शैली, उनकी आवाज का आरोह और अवरोह देखिए। आपको पता चल जाएगा कि एक हारा हुआ नेता बोल रहा है। हालांकि उनकी हार की औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है लेकिन सुवेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी दोनों की बॉडी लैग्वेज देख लीजिए आपको समझ में आ जाएगा। सुवेंदु अधिकारी को देखकर और बोलते सुनकर ऐसा लग रहा है कि वह 4 तारीख का इंतजार कर रहे हैं जब औपचारिक रूप से उनकी पार्टी को विजयी घोषित किया जाएगा। ममता बनर्जी गुरुवार की रात 8:00 बजे जहां ईवीएम रखी जाती है उस स्ट्रांग रूम परिसर में पहुंची। उनका आरोप था कि वहां कुछ गड़बड़ की जा रही है और रात 12:07 तक उस परिसर में रहीं। हालांकि चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि कोई गड़बड़ नहीं हो रही है। ईवीएम के लिए स्ट्रांग रूम अलग है और पोस्टल बैलेट के लिए अलग। पोस्टल बैलेट की छंटाई हो रही थी। उसके लिए चुनाव आयोग के कुछ कर्मचारी गए थे और इसकी सूचना सारे प्रत्याशियों को ईमेल के जरिए दोपहर 3:00 बजे ही दे दी गई थी। उनसे कहा गया था कि आप चाहे तो खुद आ सकते हैं या अपना प्रतिनिधि भेज सकते हैं। स्ट्रांग रूम की थ्री लेयर्ड सुरक्षा है। अंदर सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ है। बाहर बड़ी स्क्रीन लगी हुई है कि कोई भी गतिविधि हो तो दिखाई दे। अब जरा 2021 को फिर से याद कीजिए। तब भी केंद्र में बीजेपी की ही सरकार थी। तब भी सेंट्रल फोर्सेस लगी थीं। ममता बनर्जी का इस तरह का रिएक्शन देखा था क्या आपने? यह उनकी तैयारी है कि जब चुनाव का नतीजा आएगा तो वह किस तरह से इसको जस्टिफाई करेंगी कि वह हारी नहीं, हराई गई हैं। वह धमकी भी दे रही हैं कि अगर कुछ गड़बड़ होगा तो मेरे एक इशारे पर एक सेकंड में 10,000 लोग पहुंच जाएंगे। इसका क्या मतलब है? शासन आपका,पुलिस आपकी,पूरा प्रशासन आपका तो आप 10,000 लोगों को क्यों बुलाएंगी? और गड़बड़ी का कोई प्रमाण मिला है क्या? केवल अपने को पीड़ित दिखाने के लिए वह ये सब मुद्दे उठा रही हैं।
टीएमसी के एक सांसद हैं कल्याण बनर्जी। 28 अप्रैल को उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस अगर आपने देखी होती तो आपको समझ में आता कि टीएमसी का फ्रस्ट्रेशन लेवल कहां पहुंच गया है। वह हर वाक्य के साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को कह रहे थे कि अमित शाह गुंडा है,जल्लाद है। कोई भी पक्ष जब हारने लगता है तो उसका पहला रिएक्शन होता है कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है। वह विक्टिम कार्ड खेलने की कोशिश करता है। जो विपक्षी पार्टी होती है, उसके बारे में तो लोगों में थोड़ी सहानुभूति जग भी जाती है, लेकिन सत्तारूढ़ दल के बारे में वह भी ममता बनर्जी जैसी मुख्यमंत्री के शासन में ऐसी बात कौन सुनेगा? कोई गुंडा हो, बाहुबली हो, माफिया हो या बहुत ताकतवर नेता,उसका भौकाल तभी तक बना रहता है जब तक कोई उसको चुनौती नहीं देता। तो ममता बनर्जी ने पहली गलती यह की कि वह सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से टकरा गईं। उनको चुनौती दे दी। अमित शाह का इस समय देश में चुनावी रणनीति बनाने में कोई सानी नहीं है। ममता बनर्जी ने इसे समझने की कोशिश नहीं की। इस विधानसभा चुनाव में अमित शाह ने ग्राम प्रधान के चुनाव के समय जैसी जमीनी तैयारी होती है,वैसी ही की है। एक-एक घर, एक-एक गांव, एक-एक बूथ स्तर पर खाका तैयार किया गया। ममता बनर्जी को लगा था कि पिछली बार की तरह इस बार भी बाहरी बनाम भीतरी का मु्द्दा चल जाएगा। उन्होंने कहा भी कि बांग्ला संस्कृति को हम रिप्रेजेंट करते हैं। ये लोग बाहर से आए हुए हैं। लेकिन इस बार इसको कोई मानने को तैयार नहीं हुआ क्योंकि इस बार बीजेपी के पास स्थानीय स्तर पर भी नेता हैं। सुवेंदु अधिकारी 5 साल नेता प्रतिपक्ष रहे। वह एक समय ममता बनर्जी के राइट हैंड माने जाते थे। अब सुवेंदु अधिकारी को कौन बाहरी मानेगा। भाजपा ने 2021 के चुनाव में जो-जो गलतियां की थीं, उन सबको ठीक किया। वह ममता बनर्जी के नैरेटिव में बिल्कुल नहीं फंसी। इसीलिए आप देखिए 2021 में पूरे चुनाव के दौरान ममता बनर्जी बोलती थीं और बीजेपी बचाव में जवाब देती थी। इस बार उल्टा हो गया। भाजपा एजेंडा सेट कर रही थी और ममता बनर्जी उस पर रिएक्ट कर रही थीं। आक्रामक रूप में भाजपा थी और डिफेंसिव रूप में ममता बनर्जी। यह सब ममता बनर्जी के रवैये, उनके बोलने,उनके चलने के ढंग में साफ दिखाई देता है।
ममता बनर्जी यह बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं कि पश्चिम बंगाल की सत्ता उनके हाथ से निकल रही है बल्कि मैं कह रहा हूं कि निकल चुकी है। सिर्फ उसकी घोषणा 4 मई को होने वाली है। ममता बनर्जी ने मान लिया था कि वह कुछ भी करेंगी और लोग उसको स्वीकार कर लेंगे। पश्चिम बंगाल के लोगों ने कहा कि अब बस, इससे ज्यादा नहीं। वह भूल गईं कि कांग्रेस और 34 साल राज करने के बाद लेफ्ट की भी यही हालत हुई थी। यह सभी दलों के नेताओं के लिए सबक है कि कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे। जनता हर पार्टी, हर नेता, हर सरकार को एक लॉन्ग रोप देती है। आपकी गलतियों को कई बार नजरअंदाज करती है, लेकिन एक सीमा आती है जब उसको लगता है कि अब इससे ज्यादा नहीं। अब परिवर्तन की जरूरत है। यही पश्चिम बंगाल में होता हुआ दिखाई दे रहा है। सिर्फ ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की भाषा और उनके हावभाव देख लीजिए और 2021 से उसकी तुलना कर लीजिए। नतीजा आपके सामने दिखाई देगा। फिर भी आपको नहीं दिखाई दे रहा है तो आपको कोई नहीं दिखा सकता।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
इसमें कोई दो राय नहीं है कि उन्होंने सीपीएम के साथ अपनी जान पर खेलकर लड़ाई लड़ी और आखिरकार 2011 में उनकी पार्टी की पश्चिम बंगाल में सरकार बन गई। अब जरा पिछले चुनाव 2021 की ममता बनर्जी और आज की ममता बनर्जी की तुलना कीजिए। उनके हावभाव, उनकी बोलने की शैली, उनकी आवाज का आरोह और अवरोह देखिए। आपको पता चल जाएगा कि एक हारा हुआ नेता बोल रहा है। हालांकि उनकी हार की औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है लेकिन सुवेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी दोनों की बॉडी लैग्वेज देख लीजिए आपको समझ में आ जाएगा। सुवेंदु अधिकारी को देखकर और बोलते सुनकर ऐसा लग रहा है कि वह 4 तारीख का इंतजार कर रहे हैं जब औपचारिक रूप से उनकी पार्टी को विजयी घोषित किया जाएगा। ममता बनर्जी गुरुवार की रात 8:00 बजे जहां ईवीएम रखी जाती है उस स्ट्रांग रूम परिसर में पहुंची। उनका आरोप था कि वहां कुछ गड़बड़ की जा रही है और रात 12:07 तक उस परिसर में रहीं। हालांकि चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि कोई गड़बड़ नहीं हो रही है। ईवीएम के लिए स्ट्रांग रूम अलग है और पोस्टल बैलेट के लिए अलग। पोस्टल बैलेट की छंटाई हो रही थी। उसके लिए चुनाव आयोग के कुछ कर्मचारी गए थे और इसकी सूचना सारे प्रत्याशियों को ईमेल के जरिए दोपहर 3:00 बजे ही दे दी गई थी। उनसे कहा गया था कि आप चाहे तो खुद आ सकते हैं या अपना प्रतिनिधि भेज सकते हैं। स्ट्रांग रूम की थ्री लेयर्ड सुरक्षा है। अंदर सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ है। बाहर बड़ी स्क्रीन लगी हुई है कि कोई भी गतिविधि हो तो दिखाई दे। अब जरा 2021 को फिर से याद कीजिए। तब भी केंद्र में बीजेपी की ही सरकार थी। तब भी सेंट्रल फोर्सेस लगी थीं। ममता बनर्जी का इस तरह का रिएक्शन देखा था क्या आपने? यह उनकी तैयारी है कि जब चुनाव का नतीजा आएगा तो वह किस तरह से इसको जस्टिफाई करेंगी कि वह हारी नहीं, हराई गई हैं। वह धमकी भी दे रही हैं कि अगर कुछ गड़बड़ होगा तो मेरे एक इशारे पर एक सेकंड में 10,000 लोग पहुंच जाएंगे। इसका क्या मतलब है? शासन आपका,पुलिस आपकी,पूरा प्रशासन आपका तो आप 10,000 लोगों को क्यों बुलाएंगी? और गड़बड़ी का कोई प्रमाण मिला है क्या? केवल अपने को पीड़ित दिखाने के लिए वह ये सब मुद्दे उठा रही हैं।
टीएमसी के एक सांसद हैं कल्याण बनर्जी। 28 अप्रैल को उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस अगर आपने देखी होती तो आपको समझ में आता कि टीएमसी का फ्रस्ट्रेशन लेवल कहां पहुंच गया है। वह हर वाक्य के साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को कह रहे थे कि अमित शाह गुंडा है,जल्लाद है। कोई भी पक्ष जब हारने लगता है तो उसका पहला रिएक्शन होता है कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है। वह विक्टिम कार्ड खेलने की कोशिश करता है। जो विपक्षी पार्टी होती है, उसके बारे में तो लोगों में थोड़ी सहानुभूति जग भी जाती है, लेकिन सत्तारूढ़ दल के बारे में वह भी ममता बनर्जी जैसी मुख्यमंत्री के शासन में ऐसी बात कौन सुनेगा? कोई गुंडा हो, बाहुबली हो, माफिया हो या बहुत ताकतवर नेता,उसका भौकाल तभी तक बना रहता है जब तक कोई उसको चुनौती नहीं देता। तो ममता बनर्जी ने पहली गलती यह की कि वह सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से टकरा गईं। उनको चुनौती दे दी। अमित शाह का इस समय देश में चुनावी रणनीति बनाने में कोई सानी नहीं है। ममता बनर्जी ने इसे समझने की कोशिश नहीं की। इस विधानसभा चुनाव में अमित शाह ने ग्राम प्रधान के चुनाव के समय जैसी जमीनी तैयारी होती है,वैसी ही की है। एक-एक घर, एक-एक गांव, एक-एक बूथ स्तर पर खाका तैयार किया गया। ममता बनर्जी को लगा था कि पिछली बार की तरह इस बार भी बाहरी बनाम भीतरी का मु्द्दा चल जाएगा। उन्होंने कहा भी कि बांग्ला संस्कृति को हम रिप्रेजेंट करते हैं। ये लोग बाहर से आए हुए हैं। लेकिन इस बार इसको कोई मानने को तैयार नहीं हुआ क्योंकि इस बार बीजेपी के पास स्थानीय स्तर पर भी नेता हैं। सुवेंदु अधिकारी 5 साल नेता प्रतिपक्ष रहे। वह एक समय ममता बनर्जी के राइट हैंड माने जाते थे। अब सुवेंदु अधिकारी को कौन बाहरी मानेगा। भाजपा ने 2021 के चुनाव में जो-जो गलतियां की थीं, उन सबको ठीक किया। वह ममता बनर्जी के नैरेटिव में बिल्कुल नहीं फंसी। इसीलिए आप देखिए 2021 में पूरे चुनाव के दौरान ममता बनर्जी बोलती थीं और बीजेपी बचाव में जवाब देती थी। इस बार उल्टा हो गया। भाजपा एजेंडा सेट कर रही थी और ममता बनर्जी उस पर रिएक्ट कर रही थीं। आक्रामक रूप में भाजपा थी और डिफेंसिव रूप में ममता बनर्जी। यह सब ममता बनर्जी के रवैये, उनके बोलने,उनके चलने के ढंग में साफ दिखाई देता है।
ममता बनर्जी यह बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं कि पश्चिम बंगाल की सत्ता उनके हाथ से निकल रही है बल्कि मैं कह रहा हूं कि निकल चुकी है। सिर्फ उसकी घोषणा 4 मई को होने वाली है। ममता बनर्जी ने मान लिया था कि वह कुछ भी करेंगी और लोग उसको स्वीकार कर लेंगे। पश्चिम बंगाल के लोगों ने कहा कि अब बस, इससे ज्यादा नहीं। वह भूल गईं कि कांग्रेस और 34 साल राज करने के बाद लेफ्ट की भी यही हालत हुई थी। यह सभी दलों के नेताओं के लिए सबक है कि कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे। जनता हर पार्टी, हर नेता, हर सरकार को एक लॉन्ग रोप देती है। आपकी गलतियों को कई बार नजरअंदाज करती है, लेकिन एक सीमा आती है जब उसको लगता है कि अब इससे ज्यादा नहीं। अब परिवर्तन की जरूरत है। यही पश्चिम बंगाल में होता हुआ दिखाई दे रहा है। सिर्फ ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की भाषा और उनके हावभाव देख लीजिए और 2021 से उसकी तुलना कर लीजिए। नतीजा आपके सामने दिखाई देगा। फिर भी आपको नहीं दिखाई दे रहा है तो आपको कोई नहीं दिखा सकता।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



