निक्सन के रास्ते पर चलकर भारत को घेरने की कोशिश।
प्रदीप सिंह।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के रास्ते पर चल रहे हैं। वह एशिया महाद्वीप में वही खेल खेलना चाहते हैं, जो रिचर्ड निक्सन ने शुरू किया था।
रिचर्ड निक्सन 1969 से 74 तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहे। वाटर गेट कांड में नाम आने के कारण उन्हें दूसरे कार्यकाल के शुरू में ही इस्तीफा देना पड़ गया था। निक्सन जब राष्ट्रपति बने तो वह चीन से संबंध सुधारना चाहते थे और उसके लिए उनको एक मध्यस्थ चाहिए था। इसके लिए उन्होंने पाकिस्तान के मिलिट्री डिक्टेटर याह्या खान को चुना। याह्या खान को यूएन की 25वीं वर्षगांठ के बहाने 1970 में वाशिंगटन बुलाया गया। उस कार्यक्रम में व्हाइट हाउस के अफसरों ने उनकी बड़ी प्रशंसा की। याह्या खान लौट कर पाकिस्तान आए तो उसके बाद पूर्वी पाकिस्तान, जो अब बांग्लादेश है, में नरसंहार शुरू हो गया। लाखों लोग मारे गए। लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ, लेकिन अमेरिका को कभी मानवाधिकार की याद नहीं आई। इसीबीच अमेरिकी सेक्रेट्री ऑफ स्टेट हेनरी किसिंजर ने याह्या खान को चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई से बात करने के लिए तैयार किया। याह्या के मनाने पर चाऊ एन लाई अमेरिका से बात करने के लिए तैयार हो गए। उसके बाद अमेरिका और चीन के संबंधों में काफी सुधार आया। इसके बाद अमेरिका ने पुरस्कार स्वरूप पाकिस्तान को हथियार और गोला बारूद देना शुरू कर दिया, जो उसकी घोषित नीति के विरुद्ध था। भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 का युद्ध हुआ तो अमेरिका ने पूरी दुनिया को दिखाने के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों को हथियार देने से मना कर दिया, लेकिन अमेरिका ईरान और जॉर्डन के जरिए पाकिस्तान को हथियार देता रहा। इतना ही नहीं अमेरिका ने चीन को भी इस बात के लिए तैयार किया कि भारत-पाकिस्तान युद्ध के बीच वह भारत से लगी सीमा के पास अपने सैनिक उतारे और कोई भी सैनिक कार्रवाई के लिए तैयार रहे। हालांकि चीन ने ऐसा किया नहीं। भारत-पाक युद्ध के दौरान अमेरिका का सातवां बेड़ा पाकिस्तान की मदद के लिए बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना हो चुका था। उस समय रूस ने भारत की मदद की। भारत ने अमेरिका का सातवां बेड़ा पहुंचने से पहले अगर युद्ध जीत न लिया होता तो हो सकता है कि अमेरिका और चीन भी इस युद्ध में उतरते, लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं पाया।

तो निक्सन के लिए जो याह्या खान थे, ट्रंप के लिए वही आसिम मुनीर हैं। ट्रंप और आसिम मुनीर की दोस्ती कराने वाले शख्स हैं सज्जाद तरार। वह अमेरिका में रहते हैं और बड़े व्यापारी हैं। तरार के ट्रंप से पहले से अच्छे संबंध हैं। तरार ने आसिम मुनीर से संपर्क किया और उसी के बाद मुनीर को ट्रंप ने लंच पर व्हाइट हाउस बुलाया। अब आप ट्रंप की नीति को समझने की कोशिश कीजिए। याद कीजिए जब हमारे पायलटअभिनंदन को पाकिस्तान ने पकड़ लिया था और भारत ने पायलट को छोड़ने के लिए पाकिस्तान को धमकाया तो पाकिस्तान के पायलट को छोड़ने के दो घंटे पहले ही ट्रंप ने इसकी घोषणा कर दी थी। ट्रंप का उस समय पहला कार्यकाल था। ट्रंप ने कश्मीर के मुद्दे पर भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता का भी प्रस्ताव रखा था। हालांकि भारत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया था। उस समय तो ट्रंप चुप हो गए लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत की प्रेस कॉन्फ्रेंस से दो घंटे पहले ही उन्होंने युद्धविराम कराने की घोषणा कर दी और आज तक दावा करते हैं कि भारत-पाकिस्तान के बीच उन्होंने परमाणु युद्ध रुकवा दिया।
आप देखिए इतिहास कैसे खुद को दोहरा रहा है। आसिम मुनीर के जरिए ट्रंप चीन के साथ बातचीत का एक नया चैनल खोलना चाहते हैं। ट्रंप जब अपने पहले कार्यकाल में थे और बाइडन के समय भी अमेरिका को लग रहा था कि चीन को अगर रोकना है तो भारत को साथ लेना पड़ेगा। लेकिन अब डोनाल्ड ट्रंप की सोच बदल गई है। अब वह भारत को ही घेरने में जुटे हैं। उन्होंने इंडियन इकॉनमी को डेड इकॉनमी कहा। भारत पर 50% टैरिफ लगाया। ट्रेड डील का फ्रेमवर्क तैयार हुआ तो उसमें भी 18% टैरिफ लगाया। रूस से तेल खरीदने से रोकने की लगातार कोशिश करते रहे और अभी सबसे ताजा बयान जो उन्होंने भारत और चीन दोनों के बारे में दिया है कि ये हेल होल हैं। मतलब नर्क हैं। अभी तक अमेरिका की नीति थी कि अगर किसी इमीग्रेंट का बच्चा अमेरिका में पैदा होता है तो जन्म लेते ही वह अमेरिका का नागरिक बन जाता है। उस कानून पर ट्रंप ने रोक लगा दी। हालांकि यह मामला अब अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है और उम्मीद की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट उनके इस आदेश को रद्द कर देगा। इसी के साथ ट्रंप ने इंडियन इमीग्रेंट्स को लैपटॉप वाले गैंगस्टर बताया है। जिन भारतीयों ने सिलिकॉन वैली बनाई, अमेरिका की बड़ी-बड़ी कंपनियां खड़ी कीं,अमेरिका के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया,उनके बारे में ट्रंप यह बात बोल रहे हैं तो इसका मतलब उनका निशाना कहीं और है। वह भारत को बढ़ता हुआ देख नहीं सकते और उनकी सोच में यह फर्क ऑपरेशन सिंदूर के बाद आया है। ऑपरेशन सिंदूर से उन्हें समझ में आ गया कि भारत को सैन्य रूप से भी रोकना अब कठिन है। इसलिए वह लगातार भारत पर हमला कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत रूप से टिप्पणियां करते हैं। यह मोदी का धैर्य है, जिसके कारण दोनों देशों के संबंध अभी बने हुए हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में भारत और अमेरिका के स्ट्रेटेजिक रिलेशनशिप का जितना नुकसान किया है और कोई नहीं कर पाया है, जबकि यह रिलेशनशिप दोनों देशों के लिए फायदेमंद थी।
डोनाल्ड ट्रंप को यह बात स्वीकार नहीं है कि दुनिया के तमाम बड़े देश भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात सुनने को तैयार हैं। सब कहते हैं कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दखल दें तो कोई भी युद्ध रुक सकता है। यह बात ट्रंप के लिए कोई नहीं कहता है। ट्रंप की एक समस्या यह भी है कि एशिया की दो बड़ी ताकतों चीन और भारत दोनों को वह कमजोर करना चाहते हैं, जो कि संभव नहीं है। उन्हें दोनों में से किसी एक का साथ लेना ही पड़ेगा। वह चीन को साथ लेना नहीं चाहते और भारत को रोकना चाहते हैं। हाल ही में उनके एक नेता का बयान आपने सुना होगा कि हम भारत को ऐसी कोई टेक्नोलॉजी नहीं देंगे और ऐसा कोई इन्वेस्टमेंट नहीं करेंगे जिससे भारत और ताकतवर हो और भविष्य में अमेरिका के लिए चुनौती बने। ट्रंप जिस तरह आसिम मुनीर का इस्तेमाल कर रहे हैं, इसका मतलब भारत पाकिस्तान के बीच कुछ ऐसा होने वाला है, जिसकी तुलना सिर्फ 1971 में जो हुआ, उससे की जा सके। अमेरिका को इस बात की भी तकलीफ है कि ऑपरेशन सिंदूर बहुत जल्दी रुक गया। भारत लंबे समय तक युद्ध में फंसा रहता तो उसकी अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत पर असर पड़ता। इसलिए ट्रंप लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उकसा रहे हैं। इस काम में उनकी मदद भारत के ही कुछ विपक्षी नेता भी कर रहे हैं। भारत इस समय बाहर के दुश्मनों, घर के दुश्मनों और दोस्त का रूप धारण किए हुए दुश्मनों तीनों से घिरा हुआ है। इस संकट से निपटने के लिए हमको तैयार रहना पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



