हारे नहीं, हमें हराया गया वाली सोच नहीं बदली तो और बुरा हाल होगा विपक्ष का ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
भारत का पूरा विपक्ष इस समय डिनायल मोड में है। वह ऐसी जगहों से उम्मीद लगाकर बैठा है,जहां उम्मीद की दूर-दूर तक कोई किरण नहीं है। सोमवार को इंडी गठबंधन की बैठक हुई। इसमें शामिल दलों की मनोदशा क्या है और वे कर क्या रहे हैं,इस पर अगर नजर डालें तो पता चलता है कि वे इस डिनायल मोड से बाहर निकलने को तैयार ही नहीं हैं।
सबसे पहले बात तृणमूल कांग्रेस की। यह पार्टी खत्म हो रही है। सत्ता चली गई। उसके बाद विधायक दल और फिर संसदीय दल में टूट हो गई। ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाने वाले सुखेंद्र शेखर राय ने राज्यसभा और पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में और कई राज्यसभा सदस्य ऐसा करेंगे। आज ममता बनर्जी बिल्कुल अकेली बैठी हैं। लेकिन अभी तक वह और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि पश्चिम बंगाल की जनता उनके खिलाफ है। उनके कुशासन, भ्रष्टाचार,कटमनी और सिंडिकेट की राजनीति के खिलाफ जनादेश आया है। चुनावी राजनीति में किसी भी दल और नेता के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल तब आती है जब वह जनादेश को स्वीकार करने से मना कर देता है। यही ममता के साथ हो रहा है। अब जरा अखिलेश यादव का हाल देखिए। लोकसभा में समाजवादी पार्टी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। जब विपक्ष की राजनीति पूरी तरह से डांवाडोल और दिशाहीन दिख रही है और नेताओं का मनोबल गिरा हुआ है, ऐसे में अखिलेश यादव लंदन में छुट्टी मना रहे थे। वह ट्वीट के जरिए राजनीति कर रहे हैं। राजनीति को लेकर वह जरा भी गंभीर होते तो देखते कि बिहार में क्या हुआ। वहां वह अपने रिश्तेदारों के लिए प्रचार करने भी गए थे। उसके बाद देखते कि पश्चिम बंगाल में क्या हुआ, जहां वह ममता बनर्जी के साथ लगातार खड़े थे। वह यह भी देखते कि कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली में हुए प्रदर्शन का क्या हश्र हुआ। इस फर्जी संगठन के दो करोड़ 23 लाख फॉलोअर बताए जाते हैं लेकिन जंतरमंतर पर मुश्किल से एक-डेढ़ हजार लोग जुटे। दिल्ली में आप कोई भी प्रदर्शन कर लीजिए 1000-1200 लोग ऐसे मिल जाएंगे, जो हर प्रदर्शन में आते हैं। जो लोग आए भी थे, उनमें से ज्यादातर को मालूम नहीं था कि किस लिए आए। ये सब इसके बावजूद हुआ जब लेफ्ट का पूरा इको सिस्टम और कांग्रेस की यूथ विंग सब उसके समर्थन में जुटे हुए थे। कॉकरोच जनता पार्टी शुद्ध रूप से भारत द्रोही है, लेकिन विपक्षी उसके साथ इसलिए खड़े हैं कि इनको उम्मीद थी कि वह जेन-जी को सड़क पर उतार देगा और फिर जेन जी हमारे गले में माला पहना देगा। तो विपक्ष की यह जो डिनाइल मोड की अवस्था है,यह उसे खड़ा नहीं होने देगी। यह स्थिति आने वाले लंबे समय तक भाजपा की सत्ता का रास्ता प्रशस्त कर रही है।
एक सेफोलॉजिस्ट हैं, अगर उनका अनुमान सही हो जाए तो स्टूडियो में डांस करते हैं और गलत हो जाए तो रोते हैं, उनका कहना है कि बीजेपी कम से कम 10 साल राज करेगी। मेरा कहना है कि बीजेपी अभी कई दशक तक नहीं जाने वाली है। ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं कि बीजेपी दुनिया की सबसे अच्छी पार्टी है या दुनिया की सबसे ईमानदार पार्टी है या सबसे अच्छा शासन देने वाली पार्टी है। सिर्फ इसलिए कह रहा हूं कि इस समय जो विपक्ष है,उसकी अपनी कोई जमीन नहीं है, अपनी कोई सोच नहीं है। उनके पास कोई नेता नहीं है और सबसे बड़ी बात उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं रह गई है। पहले चुनाव हारने पर हल्ला मचाया कि ईवीएम हैक हो गई। चुनाव आयोग ने चुनौती दी कि आइए, हैक करके दिखाइए,लेकिन कोई नहीं गया। फिर विपक्ष को लगा कि इस मुद्दे का तो कोई असर हो नहीं रहा है। इसके बाद विपक्ष ने एसआईआर का मुद्दा उठाना शुरू किया। कांग्रेस और ममता बनर्जी सहित तमाम विपक्षी दलों को उम्मीद थी कि एसआईआर के विरुद्ध पश्चिम बंगाल की जनता रिवोल्ट करेगी और ममता बनर्जी को भारी बहुमत से जिताएगी लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। जनादेश को ममता के खिलाफ गया ही सामाजिक स्तर पर भी टीएमसी की बहुत दुर्गति हो रही है। टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के प्रति पश्चिम बंगाल के लोगों की घृणा साफ नजर आ रही है। यह परिस्थिति किसी भी नए सत्तारूढ़ दल के लिए बड़ी सहूलियत वाली होती है। इसीलिए शुभेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी या तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने की कोई जरूरत नहीं है। सब कुछ बना बनाया है। उनको बस इस बने बनाए रास्ते पर सावधानी पूर्वक चलना है। अब वहां के लोगों के मन से डर खत्म हुआ है। अब उनके मन में पूरी तरह से सुरक्षा की भावना पैदा करने की बात है और वह लॉ एंड ऑर्डर ठीक करने से पैदा होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश है। उत्तर प्रदेश जैसी कानून व्यवस्था की स्थिति भारत के किसी राज्य में न है और न कभी थी। इसीलिए शुभेंदु अधिकारी पहले दिन से यह संकेत दे रहे हैं कि वह इस मॉडल को अपनाने को तैयार हैं।
बात केवल ममता बनर्जी या पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल नाम का कोई दल है, विधानसभा चुनाव का नतीजा आने के बाद से यह सुनने को नहीं मिल रहा है। यूपी में अखिलेश यादव मुद्दा क्या उठा रहे हैं? राम मंदिर में जो चढ़ावा आता है,उसमें गड़बड़ी हुई है। हालांकि उनके पास इसका कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन उनको खबर में बने रहना है। उनको इस बात को छिपाना है कि वह लंदन में बैठे हैं। अखिलेश यादव की सारी राजनीति मुस्लिम-यादव वोट पर टिकी है। इसमें से एक ईंट भी खिसकी तो अखिलेश यादव की राजनीति किस खाई में जाएगी, इसका पता लगाना मुश्किल हो जाएगा। पश्चिम बंगाल और असम चुनाव का नतीजा वैसे भी बता रहा है कि मुस्लिम वोट का वीटो खत्म हो चुका है। ऐसे समय में जरूरत थी कि अखिलेश जमीन पर होते और बताते कि किस तरह उनकी राजनीति पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की राजनीति से अलग है। वह बताते कि सपा के पिछले शासनों में क्या गलती हुई है, जिसको अब वह दोहराएंगे नहीं। आप जब तक गलती नहीं मानेंगे, लोग आपको माफ करने को तैयार नहीं होंगे। यह बात अखिलेश यादव की समझ में नहीं आ रही है। जिन अरविंद केजरीवाल के साथ खड़े होकर वह बड़े गर्व से बात करते हैं, उन्हीं से सबक लेते। 2013 में पूर्ण बहुमत नहीं होने के बावजूद जिस तरह से मुख्यमंत्री बनने के लिए अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस का साथ लिया और चार महीने में सरकार गिर गई, उसके बाद उन्होंने घूम-घूम कर दिल्ली वालों से माफी मांगी कि गलती हो गई और दिल्ली वालों ने माफ भी कर दिया। इसीलिएआप 2015 और उसके बाद 2020 का जनादेश देख लीजिए। लेकिन अरविंद केजरीवाल को लगा कि ये माफी हमेशा के लिए मिल गई है, अब मैं कुछ भी कर सकता हूं। तो शराब घोटाला,शिक्षा घोटाला और स्वास्थ्य घोटाला हुआ,शीश महल बना। उसकी सजा उनको आज तक मिल रही है। दिल्ली विधानसभा का चुनाव हारने के बाद अरविंद केजरीवाल ने एक बार भी लोगों से माफी नहीं मांगी कि हमसे गलती हो गई। वह डिनायल मोड में हैं। वह कह रहे हैं कि हम हारे नहीं हैं,हमें हराया गया है। यही बात ममता बनर्जी, राहुल गांधी और तेजस्वी यादव बोल रहे हैं। अब इस तरह के नेताओं का आप क्या करेंगे, जो जनता के निर्णय को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं हैं। इसी कारण से पार्टियों का विघटन हो रहा है। तमिलनाडु में देखिए,द्रविड़ राजनीति अपने पतन की ओर बहुत तेजी से जा रही है। अन्ना द्रमुक का खेल इस चुनाव के साथ ही खत्म हो गया। द्रमुक की राजनीति के खात्मे की शुरुआत हो गई है। तमिलनाडु में एक नया पॉलिटिकल ऑर्डर बनने जा रहा है, जिसके केंद्र में अभी विजय हैं, लेकिन वह बने रहेंगे इसमें भारी शंका है। नया स्वरूप क्या होगा,अभी बताना मुश्किल है,लेकिन इतना तय है कि जिस स्वरूप में आज तमिलनाडु की राजनीति है वैसी पांच साल बाद नहीं रहेगी। तो जब तक विपक्ष के नेता और पार्टियां डिनायल मोड से नहीं निकलेंगे। इस बात पर मंथन नहीं करेंगे कि आखिर बार-बार मतदाता हमें रिजेक्ट क्यों कर रहा है तब तक उनकी स्थिति में कोई सुधार होने वाला नहीं है।
विपक्ष को अपना गठबंधन मजबूत करना होता तो भाजपा विरोधी सभी पार्टियों को साथ लाने की कोशिश की जाती। 37 पार्टियों से शुरू हुआ इंडी अलायंस अब 23 पर आ गया है। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी, उड़ीसा में नवीन पटनायक का बीजू जनता दल, तेलंगाना में केसीआर की पार्टी, तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक इंडी अलायंस में नहीं हैं,लेकिन इनको साथ लाने का कोई प्रयास इस गठबंधन की ओर से नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ? क्योंकि वे डिनायल मोड में हैं कि हम तो हारे नहीं हैं, हमको तो हराया गया है। तो इनके आने न आने से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब इस तरह का अहंकार हो तो आपकी हालत सुधरने की कोई उम्मीद नहीं होती है। सवाल यह है कि जितने लोग इस गठबंधन की बैठक में शामिल हुए हैं, उनमें से कितने मन से गठबंधन में हैं और कौन हैं जो विकल्प की तलाश में हैं। अगर यह भी आपको पता नहीं है तो आप अपनी दुर्दशा के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)