आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। अब एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि नीट (NEET) पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अगर सरकार को इस प्रकार का कदम उठाना ही था, तो वह शुरुआती दौर में ही उठाना चाहिए था। सत्ता का मनोविज्ञान कहता है कि शुरुआती दौर में उठाया गया कदम ‘जवाबदेही’ कहलाता है, और देर से उठाया गया वही कदम ‘दबाव में झुकना’ कहलाता है। वर्तमान परिदृश्य में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा दूसरी श्रेणी में आता है। जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ द्वारा शुरू किया गया आंदोलन उग्र हो गया, तब इस्तीफा लेकर सरकार ने अनजाने में दो संदेश दे दिए। पहला, कि आंदोलन का तरीका सही था। और दूसरा, कि सरकार ने फैसला लेने में देर कर दी।
सरकार आंदोलनों को भांपने में क्यों चूकती है?
यह कोई पहली बार नहीं है। यह एक पैटर्न बनता दिख रहा है। जो किसान आंदोलन शुरुआती बातचीत से खत्म किया जा सकता था, उसे डेढ़ साल तक खिंचने दिया गया। शाहीन बाग को एक सड़क जाम से राष्ट्रीय विमर्श बनने दिया गया, जिसकी परिणति अंततः दिल्ली दंगों के रूप में हुई। छात्र आंदोलन का मनोविज्ञान सबसे अलग होता है। वह फूस की तरह होता है – थोड़ी सी चिंगारी भी उसे दावानल बना सकती है। नीट के अभ्यर्थी और छात्र तो वास्तव में न्याय चाहते हैं, पेपर लीक पर सख्त कानून चाहते हैं। लेकिन जब आंदोलन लंबा खिंचता है, तो उसमें वे चेहरे घुस जाते हैं जिनका नीट या छात्रों से कोई लेना-देना ही नहीं होता। और तब वह दृश्य बनता है, जो हाल में देखा गया – नाबालिग बच्चों के हाथों में अभद्र पोस्टर, महिला पत्रकारों से बदसलूकी, पुलिसकर्मियों पर हमला, गालियों की भाषा। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कोई वास्तविक छात्र, जो खुद डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देख रहा है, ऐसी भाषा का प्रयोग कर सकता है? नहीं। नीट की दुबारा हुई परीक्षा में शामिल होने वाले छात्र और उसमें सफल होने वाले छात्र इस बात की तस्दीक भी करते हैं। आंदोलन की पवित्रता तभी तक है, जब तक वह छात्रों के हाथ में है। जब वह पेशेवर आंदोलनजीवियों के हाथ में चला जाता है, तो वह आंदोलन नहीं, अराजकता बन जाता है।

इस्तीफे के बाद क्या?
इस इस्तीफे से सरकार पर कोई अस्तित्व का संकट नहीं आने वाला। यह स्पष्ट है कि यह आंदोलन पहले दिन से ही नीट के छात्रों के लिए नहीं, बल्कि एक राजनीतिक अवसर के लिए शुरू किया गया था। जिस तरह से मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच श्रेय लेने का खेल चला है, वह इस बात की पुष्टि भी करता है। भारत का आम आदमी भी इस बात को जानता है, लेकिन वह क्या करे! उसे भी तो अपने बच्चों के लिए न्याय चाहिए, लिहाजा वह भी झांसे में आ जाता है, यह जानते हुए कि पूर्व की सरकारों ने किस तरह शिक्षा को बर्बाद कर दिया। शिक्षा का पूरी तरह व्यावसायीकरण कर दिया और वह लोगों की पहुंच से बाहर हो गई। पढ़ने के लिए कर्ज लेना पड़ता है। बहरहाल, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से सरकार इस जड़ को काटने में आंशिक रूप से सफल भी हुई है। एक मंत्री का इस्तीफा लेकर उसने आंदोलन का सबसे बड़ा नैतिक हथियार छीन लिया है। लेकिन नुकसान हो चुका है।
पहला नुकसान है नैरेटिव का। सरकार ने संयम तो दिखाया, लेकिन नैरेटिव वार में वह हमेशा की तरह पिछड़ गई। केरल और कर्नाटक में हाल में हुए लाठीचार्ज पर कोई राष्ट्रीय बहस नहीं हुई। वहां कांग्रेस की सरकारों ने इसी मुद्दे पर बलप्रयोग किया है। इससे पहले भी, रामलीला मैदान में आधी रात को बाबा रामदेव के आंदोलन पर जिस तरह की बर्बर कार्रवाई कांग्रेस सरकार ने की थी, उसकी तुलना में इस सरकार ने अभूतपूर्व सहिष्णुता दिखाई है। आंदोलन में पुलिस पिट रही है, फिर भी सरकार ने अधिक बल प्रयोग नहीं किया, पर यह बात जनता तक कौन पहुंचाएगा? भाजपा का सबसे कमजोर पक्ष यही है। वह काम तो करती है, लेकिन उसे प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं कर पाती। जहां तक पेपर लीक की बात है, पंजाब में 19 जुलाई 2026 को हुई फार्मासिस्ट/फार्मेसी ऑफिसर भर्ती परीक्षा को लेकर पेपर लीक और हाई-टेक नकल का विवाद सामने आया है। इस पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीपके और दूसरे विपक्षी नेता चुप हैं। पंजाब के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा नहीं मांग रहे। चुप्पी साधे हुए हैं।
दूसरा नुकसान है धारणा का। लोगों में यह धारणा पक्की हो रही है कि यह सरकार सुनती देर से है। और यह धारणा अहंकार की धारणा से भी ज्यादा खतरनाक है। पेपर लीक जैसे मुद्दे को आप यह कहकर काउंटर नहीं कर सकते कि ‘पिछली सरकार में ज्यादा लीक हुए थे’। जनता तुलना नहीं, समाधान सुनना चाहती है। उसे पहले दिन से एक्शन चाहिए – जिम्मेदारी तय हो, NTA में सर्जरी दिखे, दोषियों की परेड हो। चुप्पी से मुद्दे दबते नहीं, सड़ते हैं।
आगे का रास्ता क्या हो?
इस सरकार को समझना होगा कि यह न तो पहला आंदोलन है, न आखिरी। 2029 तक ऐसे कई प्रायोजित आंदोलन आएंगे। सरकार को दो मोर्चों पर काम करना होगा। पहला है, प्रशासनिक मोर्चा। पेपर लीक पर जीरो टॉलरेंस सिर्फ नारा नहीं, प्रक्रिया बननी चाहिए। पहले 24 घंटे में ही जवाबदेही तय होनी चाहिए। जांच एजेंसी नहीं, सजा दिखनी चाहिए। सरकार ने पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाकर इसकी शुरुआत कर दी है।
दूसरा है, अपने कम्युनिकेशन सिस्टम और रिस्पॉन्स मेकेनिज्म को मजबूत करना। अपने जनप्रतिनिधियों और संगठन को आम लोगों से निरंतर संवाद बनाए रखने पर जोर देना होगा। सांसद या विधायक जनता के मुद्दों के समाधान करने के लिए, उनकी बात सुनने के लिए बने हैं, यह कोई पद, पुरस्कार या सुविधा के लिए नहीं है। भाजपा इसी संवाद और जनता से जुड़ाव की वजह से ही आज इस जगह पहुंची है और बड़े-बड़े काम और सुधार कर पाई है, लेकिन पिछले कुछ समय से यह प्रक्रिया शिथिल हुई है। यह ‘वार्निंग बेल’ है। फिर से अपने संचार तंत्र और लोगों से जुड़ाव, दोनों को प्रभावी बनाने की जरूरत है। संगठन और जनप्रतिनिधियों को हर आंदोलन में घुसे अराजक तत्वों को, छात्रों और अराजक तत्वों के बीच के फर्क को पहले दिन से जनता को दिखाना होगा। जो छात्र हैं, उन्हें गले लगाना होगा और जो आंदोलनजीवी हैं, उन्हें बेनकाब करना होगा। सहिष्णुता को कमजोरी न बनने दें।
इस्तीफा अंत नहीं है। यह एक महंगा सबक है कि लोकतंत्र में न्याय में देरी, अन्याय के बराबर ही मानी जाती है। चुप्पी हर समस्या का समाधान नहीं होती, कई दफा यह समस्या को विकराल बना देती है। यह चेतने का समय है।










