अराजकता को छूट का खामियाजा भुगतेगा देश।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
देश किधर जा रहा है और कहां जाकर रुकेगा,किसी को नहीं मालूम। सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने जो किया है,उसकी कीमत देश लंबे समय तक चुकाएगा। पहली गलती सरकार ने की जो उसने कॉकरोच जनता पार्टी की प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सारी एफआईआर रद्द करने की मांग लिखित में मान ली। सुप्रीम कोर्ट तो उससे भी आगे चला गया। उसने अपने विशेष अधिकार, जो आर्टिकल 142 में मिला हुआ है,का उपयोग करते हुए कहा कि सीजेपी के प्रदर्शनकारियों पर देश भर में जितनी एफआईआर दर्ज हुई हैं, वे सब खत्म मानी जाएं।
अब आप देखिए सरकार जिसका काम कानून व्यवस्था लागू करना है, वह कह रही है कि जिन्होंने अपराध किया और जिनके खिलाफ पुलिस ने एफआईआर दर्ज की, हम उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेंगे। और सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि अगर पुलिस चाहे भी तो हम कोई कार्रवाई करने नहीं देंगे। सारी एफआईआर वापस लीजिए। इस सरकार ने जिस तरह से सीजेपी के सामने सरेंडर किया है,मुझे याद नहीं आता किसी सरकार ने ऐसे किसी छोटे से संगठन के सामने पहले कभी किया। सीजेपी की कोई हैसियत नहीं। उसकी सिर्फ एक ताकत है, अराजकता पैदा करने की। उसके सामने समर्पण कर दिया। सरकार ने क्या किया, सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया और सीजेपी ने क्या किया,यह बात केवल यहीं तक सीमित रहने वाली नहीं है। यह फैसला करके सरकार ने संदेश दिया है कि सड़क पर आओ और हिंसा करो। हम मुकदमा दर्ज करेंगे और फिर हमारे पास बातचीत के लिए आओ। हम सब वापस ले लेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने संदेश दिया है कि केवल दिल्ली में नहीं, देश में जहां-जहां प्रदर्शन हुआ,वहां सरकार कोई कार्रवाई करना भी चाहे तो हम करने नहीं देंगे क्योंकि उसका फैसला तो देशभर में लागू होता है। तो सुप्रीम कोर्ट ने कंप्लीट जस्टिस के लिए सारी एफआईआर वापस ले लीं। सुप्रीम कोर्ट को बताना चाहिए कि जस्टिस कैसे मिला। प्रदर्शनकारियों के हमले में करीब 200 पुलिस वाले भी घायल हुए। उनके परिवार भी सुप्रीम कोर्ट गए थे। क्या यह उन परिवारों के लिए कंप्लीट जस्टिस है? सुप्रीम कोर्ट संदेश जो भी देना चाहता हो, मैं उसकी नीयत पर सवाल नहीं उठा रहा हूं, लेकिन उसका निष्कर्ष यही निकलेगा कि इस देश में अराजकता की छूट है। सरकार दबने को तैयार है और सुप्रीम कोर्ट सरकार व पुलिस को दबाने के लिए तैयार है। यानी पुलिस को अपना काम नहीं करना है। उसके ऊपर हमला हो तो अपना बचाव नहीं करना है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 2873 लोगों पर दर्ज एफआईआर भी रद्द हो गईं। हालांकि पुलिस ने जब अपना केस प्रस्तुत किया तो कोर्ट ने कहा कि आप नई एफआईआर दर्ज कीजिए। तो यह ईगो का सवाल कहां से आया? अगर ऐसे लोगों के खिलाफ फिर से एफआईआर दर्ज होनी है तो पहले की एफआईआर को आपने खत्म क्यों किया? मैं कोई कानून का विशेषज्ञ नहीं हूं,लेकिन एक आम आदमी के मन में इस फैसले से जो सवाल उठ रहे हैं,उनकी बात कर रहा हूं।
सरकार के फैसले से भी लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं। सरकार अपने खिलाफ आंदोलन करने वालों की हौसला अफजाई कर रही है। उसी का नतीजा है कि शुक्रवार को फिर से दिल्ली में पार्लियामेंट्री स्ट्रीट थाने के बाहर सीजेपी का प्रदर्शन हुआ। आंदोलन में शामिल एक लड़की, जिसने प्रधानमंत्री की तेरहवीं का खाना बांटने का वीडियो बनाकर चलाया था, के पिता को दो लोगों के झगड़े में चोट लगी। मेडिकल एग्जामिनेशन में डॉक्टरों ने कहा कि कोई गंभीर चोट नहीं है। जिसके कड़े से उन्हें चोट लगी थी पुलिस ने उसे हिरासत में लिया और एफआईआर लिखी। उसके बाद उसकी जमानत हो गई क्योंकि कोई गैर जमानती धारा थी नहीं। अब ये मुद्दा बनाया जा रहा है कि उस पर 307 का मुकदमा दर्ज करो। पुलिस कह रही है ऐसा कोई मामला नहीं है। इससे आपको अंदाजा लगेगा कि जिन्होंने अराजकता फैलाई वे आज विक्टिम बने हुए हैं और जो विक्टिम थे वे आतताई बने हुए हैं। यह कमाल सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार ने किया है। इसके आधार पर आप सोचिए कि भविष्य में क्या होने वाला है। और इस लड़ाई में कौन कूदा? आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर रावण। उस पूरे कथित आंदोलन में सबसे ज्यादा सक्रिय उन्हीं की पार्टी के लोग थे। पत्रकारों और दूसरे लोगों पर हमला करने में उनकी पार्टी के कार्यकर्ता सबसे आगे थे। क्या चंद्रशेखर रावण के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज हुई? खैर,अब एफआईआर का तो कोई मतलब ही नहीं रह गया। एफआईआर दर्ज होगी तो सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि किसके खिलाफ आगे कार्रवाई होगी और किसकी एफआईआर वापस हो जाएगी। राहुल गांधी के खिलाफ हल्द्वानी में एससी-एसटी एक्ट में एफआईआर दर्ज हुई है,आज तक उनकी गिरफ्तारी हुई क्या? एक आम आदमी के खिलाफ अगर यह मुकदमा दर्ज  हो जाए तो उसकी गिरफ्तारी में उतना ही समय लगता है जितना पुलिस को उसके घर तक पहुंचने में लगता है। तो दो बातें साबित होती है। एक, इस देश में कानून सबके लिए बराबर नहीं है। दूसरा, इस देश में अब अराजकता करने वालों को छूट मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट उनके साथ खड़ा होगा और सरकार उनके सामने बेबस होगी। यह संदेश पूरे देश में चला गया है।
ऐसा ही चलता रहा तो इन अराजक तत्वों के सामने फिर कौन और क्यों खड़ा होगा? पुलिस इनके खिलाफ कार्रवाई क्यों करेगी? अगर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया तो सुप्रीम कोर्ट पूछेगा कि हमें बताइये लाठीचार्ज करने वालों के खिलाफ क्या एक्शन लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने सीजेपी के प्रदर्शन के बाद यह नहीं पूछा कि जिन लोगों ने पुलिस पर हमला किया, उनके खिलाफ क्या एक्शन लिया? यानी दो कानून चल रहे हैं। कानून के जो रक्षक हैं, उनको आरोपी साबित किया जाएगा और जो आरोपी हैं, उनको निर्दोष बताया जाएगा। दिल्ली में उस दिन की हिंसा के लिए जो आंदोलन के आयोजक थे, उनमें से कोई जवाबदेह क्यों नहीं है? उनमें से किसी के खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं दर्ज हुई? उन लोगों से कम से कम पूछताछ तो होनी चाहिए थी, सुप्रीम कोर्ट ये सवाल तो उठाता। दूसरी ओर रांची में जो कुछ हुआ, उस पर इसी सुप्रीम कोर्ट और इन्हीं राजनीतिक दलों के मुंह से कोई शब्द नहीं निकल रहा है। रांची में जिस तरह से आंदोलनकारी छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ, सुप्रीम कोर्ट ने उसका स्वत: संज्ञान नहीं लिया। इसका क्या मतलब समझा जाए कि अगर कॉकरोचों के खिलाफ कोई एक्शन होगा तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुला हुआ है, लेकिन वास्तविक छात्रों के खिलाफ कुछ होगा तो सुप्रीम कोर्ट को उससे कोई मतलब नहीं। इस तरह से देश में कानून व्यवस्था का राज कैसे कायम होगा? अब एक नया फैशन चल पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट कह रहे हैं कि आप आंदोलन के लिए किसी पर कार्रवाई नहीं कर सकते। मतलब आप इंतजार कीजिए कि आंदोलनकारी किसी की हत्या कर दें तब आप कार्रवाई की बात कीजिएगा। पुलिस वाला घायल होकर आईसीयू में पहुंच जाए,लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। पूछताछ तक नहीं होनी चाहिए। यह सीधे-सीधे देश में अराजकता को आमंत्रण है। यह बात जितनी जल्दी सत्ता में बैठे लोगों, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में बैठे लोगों को समझ में आ जाए, उतना अच्छा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)